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बाजार में क्या रहेगा ट्रेंड? जानें 22 मई का शेयर मार्केट और गोल्ड आउटलुक

नई दिल्ली। 22 मई 2026 को भारतीय शेयर बाजार और सर्राफा बाजार दोनों में हलचल देखने को मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों के संकेत, डॉलर की चाल, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां शुक्रवार के कारोबार की दिशा तय करेंगी। विशेषज्ञों के अनुसार, शेयर बाजार में जहां उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, वहीं सोने की कीमतों में हल्की तेजी देखने को मिल सकती है। भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक BSE Sensex और NIFTY 50 में शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में दबाव और खरीदारी दोनों का मिश्रित असर देखने को मिल सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और वैश्विक बाजारों का रुख निवेशकों की धारणा को प्रभावित करेगा। आईटी, बैंकिंग और ऑटो सेक्टर के शेयरों में हल्की मजबूती देखने को मिल सकती है, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में मुनाफावसूली का दबाव रह सकता है। पिछले कुछ दिनों से बाजार में जारी तेजी के बाद निवेशक अब सतर्क नजर आ रहे हैं। ऐसे में ट्रेडिंग के दौरान उतार-चढ़ाव अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी जारी रहती है तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। वहीं अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक आर्थिक संकेतकों का असर भी भारतीय बाजार पर दिखाई देगा। निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे बिना रणनीति के बड़े निवेश से बचें और स्टॉप लॉस के साथ ट्रेडिंग करें। दूसरी ओर, सर्राफा बाजार में सोना की कीमतों में तेजी के संकेत मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की कमजोरी और सुरक्षित निवेश के बढ़ते रुझान के कारण सोने की मांग बढ़ सकती है। अनुमान है कि 24 कैरेट सोना 98 हजार से 99 हजार 500 रुपए प्रति 10 ग्राम के बीच कारोबार कर सकता है, जबकि 22 कैरेट सोने का भाव 89 हजार 500 से 91 हजार रुपए प्रति 10 ग्राम तक रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव के माहौल में निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं। यही वजह है कि गोल्ड में लगातार निवेश बढ़ रहा है। हालांकि शहरों और राज्यों के हिसाब से टैक्स और मेकिंग चार्ज के कारण कीमतों में थोड़ा अंतर हो सकता है। आर्थिक जानकारों के अनुसार, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बाजार में गिरावट के दौरान अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदना फायदेमंद हो सकता है। वहीं सोने में निवेश करने वालों के लिए डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF भी अच्छे विकल्प बनकर उभर रहे हैं। कुल मिलाकर 22 मई का दिन निवेशकों के लिए काफी अहम रहने वाला है। शेयर बाजार में जहां सावधानी के साथ निवेश की जरूरत होगी, वहीं सोने की चमक निवेशकों को आकर्षित कर सकती है।

गोवा की बेकरी परंपरा को नई उड़ान, GI टैग से बढ़ेगा पारंपरिक ब्रेड्स का अंतरराष्ट्रीय बाजार

नई दिल्ली । गोवा की समृद्ध पाक परंपरा में शामिल पारंपरिक ब्रेड्स पोई, पाओ और उंडो को जल्द ही भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिलने की संभावना है। यह कदम न केवल इन पारंपरिक व्यंजनों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि इससे स्थानीय बेकरी उद्योग को भी नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने इन ब्रेड्स के लिए संयुक्त रूप से GI टैग के लिए आवेदन प्रस्तुत किया है, जिससे गोवा की सदियों पुरानी बेकरी परंपरा को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। गोवा की इन पारंपरिक ब्रेड्स की जड़ें पुर्तगाली शासनकाल से जुड़ी हुई मानी जाती हैं, जब पाओ बनाने की तकनीक राज्य में आई थी। समय के साथ यह परंपरा गोवा की स्थानीय संस्कृति में इस तरह रच-बस गई कि आज यह वहां के दैनिक भोजन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। पोई, पाओ और उंडो न केवल स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि इनकी खास सुगंध और बनावट इन्हें अन्य ब्रेड्स से अलग पहचान देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की पारंपरिक विधियों को कानूनी संरक्षण मिलेगा और इनके असली स्वरूप को बनाए रखने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे मार्केटिंग और ब्रांडिंग को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे इन ब्रेड्स की मांग राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ सकती है। स्थानीय बेकरी उद्योग लंबे समय से कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनमें पारंपरिक सामग्री की कमी और बदलती उत्पादन प्रक्रियाएं प्रमुख हैं। पहले जहां इन ब्रेड्स को पारंपरिक तरीकों और प्राकृतिक खमीर जैसी विधियों से तैयार किया जाता था, वहीं अब कई जगहों पर व्यावसायिक खमीर का उपयोग बढ़ गया है, जिससे इनके मूल स्वाद और गुणवत्ता में बदलाव देखा जा रहा है। इसके बावजूद गोवा में आज भी सैकड़ों बेकरी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं और पीढ़ियों से चली आ रही विधियों का पालन कर रही हैं। अनुमान है कि राज्य की अधिकांश बेकरी अभी भी इन पारंपरिक ब्रेड्स का उत्पादन करती हैं, जो स्थानीय लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा हैं। GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ने की उम्मीद है, खासकर उन देशों में जहां गोवा के प्रवासी समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं। इससे न केवल स्थानीय उत्पादकों को बेहतर मूल्य मिलेगा बल्कि गोवा की सांस्कृतिक पहचान भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर और मजबूत होगी। राज्य पहले से ही कई कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए GI टैग प्राप्त कर चुका है और अब पारंपरिक ब्रेड्स का यह कदम इस सूची को और समृद्ध कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल गोवा की खाद्य विरासत को वैश्विक मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस: प्रकृति के संतुलन और जीवन संरक्षण का वैश्विक संदेश

हर साल 22 मई को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस (International Day for Biological Diversity) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव-जंतुओं, पौधों, सूक्ष्मजीवों और पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधता के महत्व को समझाना और उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन केवल मानव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी प्रकृति एक जटिल और संतुलित व्यवस्था है, जिसमें हर जीव की भूमिका महत्वपूर्ण है। जैव विविधता क्या है?जैव विविधता का अर्थ है पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवन के विभिन्न रूपों की विविधता। इसमें पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीट, समुद्री जीव, सूक्ष्मजीव और यहां तक कि उनके रहने के प्राकृतिक आवास भी शामिल होते हैं। यह विविधता तीन स्तरों पर देखी जाती है— आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) प्रजातीय विविधता (Species Diversity) पारिस्थितिक विविधता (Ecological Diversity) ये तीनों मिलकर पृथ्वी के जीवन को संतुलित और स्थिर बनाए रखते हैं। अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस का इतिहासइस दिवस की शुरुआत 1993 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई थी। शुरुआत में इसे 29 दिसंबर को मनाया जाता था, लेकिन बाद में 2000 में इसे 22 मई को स्थानांतरित कर दिया गया। यह तारीख 1992 में हुए रियो अर्थ समिट (Earth Summit) की याद में चुनी गई, जहां जैव विविधता संरक्षण पर वैश्विक समझौता हुआ था। जैव विविधता क्यों जरूरी है?जैव विविधता हमारे जीवन का आधार है। यह हमें भोजन, दवा, स्वच्छ हवा, पानी और जलवायु संतुलन जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करती है। जंगल, नदियां, समुद्र और पहाड़ सभी मिलकर पृथ्वी को रहने योग्य बनाते हैं। यदि जैव विविधता नष्ट होती है तो इसका सीधा असर मानव जीवन, कृषि, मौसम और पर्यावरण पर पड़ता है। जैव विविधता के सामने चुनौतियांआज के समय में जैव विविधता तेजी से घट रही है। इसके प्रमुख कारण हैं वनों की कटाई प्रदूषण जलवायु परिवर्तन शहरीकरण और औद्योगीकरण अवैध शिकार और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन इन कारणों से कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। संरक्षण के उपायजैव विविधता को बचाने के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। जैसे अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना प्लास्टिक का कम उपयोग करना वन्यजीव संरक्षण कानूनों का पालन करना प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करना पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता बढ़ाना सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ-साथ आम नागरिकों की भूमिका भी इसमें बेहद महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस केवल एक जागरूकता दिवस नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ हमारे संबंधों को समझने और उसे बचाने का संकल्प लेने का अवसर है। यदि हम आज प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक असंतुलित और असुरक्षित दुनिया छोड़ जाएंगे। इसलिए जरूरी है कि हम सभी मिलकर जैव विविधता के संरक्षण के लिए कदम उठाएं और पृथ्वी को फिर से हरियाली और जीवन से भर दें। -अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस

Vivo S60 5G लॉन्च से पहले चर्चा में: 7,200mAh बैटरी, 90W फास्ट चार्जिंग और तीन आकर्षक कलर ऑप्शन के साथ आ सकता है नया स्मार्टफोन

नई दिल्ली। Vivo जल्द ही अपनी S सीरीज का नया स्मार्टफोन Vivo S60 5G लॉन्च करने जा रहा है। कंपनी इस डिवाइस को 29 मई को चीन में पेश करेगी। यह फोन पिछले साल लॉन्च हुए Vivo S50 का अपग्रेड वर्जन होगा और इसे एक नए डिजाइन और बड़ी बैटरी के साथ लाया जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार Vivo S60 5G की सबसे बड़ी खासियत इसकी 7,200mAh की दमदार बैटरी होगी, जो लंबे बैकअप के लिए डिजाइन की गई है। इसके साथ 90W फास्ट चार्जिंग सपोर्ट भी मिलेगा, जिससे फोन तेजी से चार्ज हो सकेगा। कंपनी का दावा है कि इसमें दिया गया पावर मैनेजमेंट सिस्टम चार्जिंग के दौरान डिवाइस के तापमान को कंट्रोल करने में मदद करेगा। फोन को लेकर यह भी बताया गया है कि इसमें Global Direct Drive Power Supply 2.0 टेक्नोलॉजी दी जाएगी, जो बैटरी परफॉर्मेंस को बेहतर बनाएगी। साथ ही इसमें Micro Electric Wizard 2.0 फीचर भी होगा, जो अचानक बैटरी खत्म होने की स्थिति में चल रहे काम को सेव करने में मदद करेगा। डिजाइन की बात करें तो Vivo S60 5G को तीन नए कलर ऑप्शन में पेश किया जाएगा—Early Summer Green, Midsummer Night’s Dream और Sea of Stars। इनमें से Sea of Stars वेरिएंट में खास स्टार-लाइक पैटर्न और वाइट-ब्लू फिनिश देखने को मिल सकता है। कैमरा सेटअप के तौर पर इसमें पीछे की तरफ ट्रिपल कैमरा सिस्टम दिया जाएगा, जो एक रेक्टेंगुलर मॉड्यूल में फिट होगा। हालांकि कैमरा सेंसर की पूरी जानकारी लॉन्च के समय सामने आएगी। फोन का लॉन्च 29 मई को चीन में लोकल समय अनुसार शाम 7:30 बजे (भारत में 5:00 बजे) होगा। कंपनी इस इवेंट में Vivo TWS 5e ईयरबड्स भी पेश कर सकती है। अगर लीक और रिपोर्ट्स सही साबित होती हैं, तो Vivo S60 5G अपने बड़े बैटरी बैकअप और फास्ट चार्जिंग के कारण मिड-रेंज सेगमेंट में एक मजबूत विकल्प बन सकता है।

यूपी पंचायतों में बड़ा बदलाव या राजनीतिक रणनीति? कार्यकाल खत्म होने के बाद प्रधानों को प्रशासक बनाने की तैयारी से सियासी हलचल तेज

नई दिल्ली  /उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद प्रशासनिक ढांचे को लेकर एक नए संभावित प्रयोग ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में गहरी बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार इस विकल्प पर विचार कर रही है कि कार्यकाल खत्म होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी दी जा सकती है। अगर यह फैसला लागू होता है तो यह प्रदेश के पंचायत इतिहास में एक अभूतपूर्व कदम माना जाएगा, क्योंकि अब तक इस तरह की व्यवस्था कभी नहीं अपनाई गई है। परंपरागत रूप से पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने और नए चुनाव होने तक की अवधि में प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों के पास रहती रही है, लेकिन इस बार तस्वीर बदलती नजर आ रही है। प्रस्ताव के तहत पंचायतों का कामकाज उन्हीं चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में रहने की संभावना है, जिनका कार्यकाल पूरा हो चुका होगा। इस संभावित बदलाव को लेकर जहां एक ओर इसे प्रशासनिक निरंतरता का कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे ग्रामीण राजनीति में सत्ता संतुलन से जोड़कर भी देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ग्रामीण स्तर पर संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने की रणनीति भी हो सकती है। उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में ग्राम प्रधान होते हैं, जो स्थानीय स्तर पर जनता और शासन के बीच सबसे अहम कड़ी माने जाते हैं। गांवों में विकास कार्यों से लेकर जनकल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन तक में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में इनका प्रशासनिक रूप से सक्रिय रहना ग्रामीण राजनीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है। इस पूरे मुद्दे के केंद्र में पंचायत चुनावों की संभावित देरी भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। ओबीसी आरक्षण से जुड़ी प्रक्रियाओं और आयोग की रिपोर्ट के चलते पंचायत चुनावों के समय पर होने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इसी वजह से यह संभावना जताई जा रही है कि मौजूदा व्यवस्था को कुछ समय तक जारी रखने के लिए प्रशासनिक विकल्प तलाशे जा रहे हैं। वहीं विपक्ष इस संभावित फैसले पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव टालकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर किया जा रहा है और इससे ग्रामीण स्तर पर सत्ता का संतुलन प्रभावित हो सकता है। उनका तर्क है कि अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को ही प्रशासक बना दिया गया तो निष्पक्ष प्रशासन की अवधारणा पर असर पड़ सकता है और यह राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा कानून में सरकार को असाधारण परिस्थितियों में प्रशासक नियुक्त करने का अधिकार जरूर दिया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों को दी जा सकती है या नहीं। इसी कारण इस प्रस्ताव को लेकर भविष्य में कानूनी चुनौती की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर यह भी चर्चा है कि अगर ग्राम पंचायतों में यह मॉडल लागू होता है तो इसका असर क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर तक भी जा सकता है, जहां पहले से ही सरकारी अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता रहा है। ऐसे में पूरे पंचायत ढांचे में एक नया प्रशासनिक और राजनीतिक मॉडल आकार ले सकता है। इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण राजनीति की दिशा तय करने वाले संभावित कदम के रूप में भी समझा जा रहा है। गांवों में राजनीतिक पकड़ और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले समय में और अधिक चर्चा में रहने की संभावना है।

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा: जानें शुक्रवार के दिन क्यों माना जाता है खास

नई दिल्ली। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुक्रवार का दिन मां लक्ष्मी की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी दिन विशेष रूप से मां वैभव लक्ष्मी का व्रत करने का भी विधान है, जिसे करने से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि, वैभव और शांति का संचार होता है। मान्यता है कि यह व्रत न केवल आर्थिक समस्याओं को दूर करता है, बल्कि दांपत्य जीवन में भी खुशहाली लाता है। इस व्रत की शुरुआत संकल्प लेकर की जाती है, जिसमें श्रद्धालु 11, 21 या अपनी इच्छा अनुसार जितने शुक्रवार तक व्रत रखने का निर्णय लेते हैं। हर शुक्रवार को पूरे नियम और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है और वैभव लक्ष्मी व्रत कथा का पाठ किया जाता है। व्रत के दौरान भक्त मां लक्ष्मी को लाल फूल, मिठाई और विशेष रूप से खीर का भोग अर्पित करते हैं। व्रत कथा के अनुसार, एक समय एक शहर में लोग भक्ति और धर्म से दूर होकर भोग-विलास में डूब गए थे। उसी शहर में शीला नाम की एक धार्मिक और संतोषी स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। समय के साथ उसका पति बुरी संगत में पड़कर अपना सारा धन गंवा बैठा और जीवन संघर्षों से भर गया। शीला ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद भगवान पर आस्था बनाए रखी। एक दिन उसके घर एक दिव्य तेज से युक्त वृद्ध महिला आई, जिन्होंने शीला को मां लक्ष्मी का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि यह व्रत सरल है और श्रद्धा से करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उनके मार्गदर्शन पर शीला ने पूरे विश्वास के साथ यह व्रत प्रारंभ किया। हर शुक्रवार वह पूरी विधि से पूजा करती और कथा सुनती। धीरे-धीरे उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा। उसके पति का स्वभाव सुधरने लगा और वह मेहनत करके व्यापार करने लगा। कुछ समय बाद घर में फिर से धन-समृद्धि लौट आई और सुख-शांति स्थापित हो गई। कथा के अनुसार, व्रत के अंतिम चरण में उद्यापन किया जाता है, जिसमें सात सुहागिन महिलाओं को पूजा सामग्री या व्रत कथा की पुस्तक भेंट की जाती है। यह प्रक्रिया व्रत को पूर्ण करने के लिए आवश्यक मानी जाती है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, मां लक्ष्मी की आराधना से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सकारात्मकता का संचार होता है। विशेष रूप से मां वैभव लक्ष्मी का व्रत करने से आर्थिक परेशानियां कम होती हैं और जीवन में स्थिरता आती है। आज के समय में भी हजारों श्रद्धालु इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा के साथ करते हैं और इसे अपने जीवन में सुख-समृद्धि का माध्यम मानते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा कभी निष्फल नहीं जाती और मां लक्ष्मी अपने भक्तों पर सदैव कृपा बनाए रखती हैं।

बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन

नई दिल्ली। त्वचा की देखभाल में नेचुरल उपाय हमेशा से प्रभावी माने गए हैं। खासकर फल (fruits) से बने स्क्रब स्किन को बिना नुकसान पहुंचाए साफ और चमकदार बनाने में मदद करते हैं। बाजार के केमिकल स्क्रब की तुलना में प्राकृतिक फलों से बने स्क्रब ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी माने जाते हैं। त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार पपीता एक बेहतरीन प्राकृतिक स्क्रब माना जाता है। इसमें मौजूद एंजाइम (papain) त्वचा की मृत कोशिकाओं (dead skin cells) को हटाने में मदद करता है और स्किन को मुलायम बनाता है। यह मुंहासों और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक होता है। स्ट्रॉबेरी भी स्क्रब के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसमें प्राकृतिक एसिड और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो त्वचा को साफ करने के साथ-साथ पोर्स को टाइट करते हैं। यह स्किन को फ्रेश और ग्लोइंग बनाती है। केला भी एक अच्छा विकल्प है, खासकर ड्राय स्किन वालों के लिए। इसमें मौजूद विटामिन और मिनरल्स त्वचा को नमी प्रदान करते हैं और स्किन को सॉफ्ट बनाते हैं। इसे शहद के साथ मिलाकर स्क्रब की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। संतरे का छिलका या उसका पाउडर भी एक प्राकृतिक स्क्रब की तरह काम करता है। यह त्वचा से अतिरिक्त तेल हटाने और टैनिंग कम करने में मदद करता है। इसमें विटामिन C होता है जो स्किन को ब्राइट बनाने में सहायक होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि फलों से बने स्क्रब का नियमित लेकिन सीमित उपयोग ही करना चाहिए। हफ्ते में 2 बार स्क्रब करना पर्याप्त होता है। अधिक स्क्रबिंग से त्वचा में जलन या सूखापन हो सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए किसी भी नए फल से बने स्क्रब को इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। अगर त्वचा संवेदनशील है तो हल्के और सौम्य फलों का ही उपयोग करना चाहिए। कुल मिलाकर कहा जाए तो पपीता, स्ट्रॉबेरी, केला और संतरा जैसे फल त्वचा के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित स्क्रब के रूप में बेहतरीन विकल्प हैं। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर ये स्किन को साफ, स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से चमकदार बना सकते हैं।

मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय

नई दिल्ली । भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच ठंडा पानी हर किसी की जरूरत बन चुका है। कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंचने के कारण घरों में रखा पानी भी जल्दी गर्म हो जाता है। ऐसे में फ्रिज का पानी भले ही तुरंत राहत देता है, लेकिन सेहत की दृष्टि से लोग अब फिर से मटके के पानी की ओर लौटने लगे हैं। मटके का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा और ताजगी देने वाला माना जाता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी में यह भी जल्दी सामान्य तापमान पकड़ लेता है। इसी समस्या के समाधान के लिए पुराने समय से अपनाए जा रहे देसी तरीके एक बार फिर चर्चा में हैं। जानकारों के अनुसार, मटके के पानी को लंबे समय तक ठंडा रखने का सबसे सरल तरीका उसे सूती कपड़े से ढंकना है। कपड़े को गीला करके मटके के चारों ओर लपेटने से उसमें मौजूद नमी धीरे-धीरे वाष्पित होती रहती है, जिससे मटके की सतह ठंडी बनी रहती है और अंदर का पानी भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। कई जगहों पर लोग सूती कपड़े की जगह टाट या जूट के बोरे का उपयोग भी करते हैं, जो गर्मी में बेहतर कूलिंग प्रभाव देते हैं। इसके अलावा मटके को रखने का स्थान भी पानी की ठंडक पर बड़ा असर डालता है। यदि मटका सीधे धूप या गर्म सतह पर रखा जाए तो पानी तेजी से गर्म हो जाता है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में एक पुराना तरीका अपनाया जाता है, जिसमें मटके को गीली रेत या मिट्टी के बीच रखा जाता है। रेत में मौजूद नमी और ठंडक मटके को बाहर से ठंडा रखती है, जिससे पानी लंबे समय तक ताजा और ठंडा बना रहता है। कुछ घरेलू उपायों में नया मटका इस्तेमाल करने से पहले उसमें सेंधा नमक डालकर कुछ समय तक पानी भरकर रखने की परंपरा भी शामिल है। माना जाता है कि इससे मटके की प्राकृतिक ठंडक बनाए रखने की क्षमता बढ़ जाती है। बाद में उस पानी को निकालकर ताजा पानी भरने पर मटका अधिक प्रभावी ढंग से पानी को ठंडा रखता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मटके का पानी न केवल प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर विकल्प है। अत्यधिक ठंडा फ्रिज का पानी कई बार गले और पाचन पर असर डाल सकता है, जबकि मटके का पानी शरीर को संतुलित तरीके से ठंडक प्रदान करता है। इसी कारण अब शहरों में भी लोग पारंपरिक तरीकों की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं और इन देसी जुगाड़ों को फिर से अपनाया जा रहा है, ताकि गर्मी के मौसम में बिना बिजली के भी ठंडे पानी का आनंद लिया जा सके।

मध्यप्रदेश में गर्मी का कहर, 44 डिग्री के पार पहुंच सकता है पारा

मध्यप्रदेश । मध्यप्रदेश में गर्मी का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। 22 मई 2026 को भी प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी और लू का असर देखने को मिलेगा। राजधानी भोपाल सहित कई जिलों में तापमान 41 से 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। मौसम विभाग के अनुसार अगले कुछ दिनों तक राहत मिलने के आसार बेहद कम हैं और प्रदेश के कई हिस्सों में हीटवेव की स्थिति बनी रह सकती है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर और मध्य भारत में चल रही गर्म और शुष्क हवाओं का असर मध्यप्रदेश पर भी साफ दिखाई दे रहा है। प्रदेश के ग्वालियर, चंबल, बुंदेलखंड, रीवा, सागर और उज्जैन संभाग में गर्म हवाओं का असर अधिक रहेगा। दोपहर के समय सड़कों और बाजारों में लोगों की आवाजाही कम देखने को मिल सकती है। राजधानी भोपाल में दिन का तापमान 41 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने का अनुमान है, जबकि ग्वालियर, खजुराहो, नौगांव और दतिया जैसे इलाकों में पारा 44 डिग्री तक पहुंच सकता है। रात के तापमान में भी बढ़ोतरी होने से लोगों को गर्मी से राहत नहीं मिल पा रही है। मौसम विभाग ने ‘वार्म नाइट’ की स्थिति को लेकर भी सतर्क रहने की सलाह दी है। भीषण गर्मी का असर जनजीवन पर साफ दिखाई देने लगा है। दोपहर के समय बाजारों में सन्नाटा पसरा रहता है और लोग जरूरी काम होने पर ही घरों से बाहर निकल रहे हैं। सड़क किनारे ठंडे पेय पदार्थ, गन्ने का रस, छाछ और लस्सी की दुकानों पर लोगों की भीड़ बढ़ गई है। वहीं अस्पतालों में डिहाइड्रेशन, सिरदर्द और लू से संबंधित मरीजों की संख्या भी बढ़ने लगी है। मौसम विभाग और स्वास्थ्य विभाग ने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। लोगों को दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक धूप में निकलने से बचने की सलाह दी गई है। बाहर निकलते समय सिर को ढंकने, हल्के रंग के सूती कपड़े पहनने और लगातार पानी पीते रहने की अपील की गई है। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने के लिए कहा गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता फिलहाल कमजोर है, जिसके कारण प्रदेश में बारिश की संभावना बेहद कम बनी हुई है। आने वाले तीन-चार दिनों तक तापमान में और बढ़ोतरी हो सकती है। कुछ क्षेत्रों में 45 डिग्री के करीब तापमान पहुंचने की आशंका भी जताई जा रही है। गर्मी के इस तीखे दौर ने बिजली की मांग भी बढ़ा दी है। एसी, कूलर और पंखों के लगातार इस्तेमाल से कई शहरों में बिजली व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में प्रशासन ने लोगों से सतर्क रहने और जरूरी सावधानियां अपनाने की अपील की है।

शुक्रवार के ये वास्तु उपाय बदल देंगे घर की किस्मत, आएगी बरकत

नई दिल्ली। शुक्रवार का दिन हिंदू धर्म में धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए विशेष माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि इस दिन कुछ सरल उपाय अपनाए जाएं तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक समस्याएं धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। वास्तु विशेषज्ञों का मानना है कि शुक्रवार के दिन घर की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मुख्य द्वार को हमेशा साफ और आकर्षक रखना चाहिए क्योंकि इसे ऊर्जा प्रवेश का प्रमुख स्थान माना जाता है। दरवाजे पर हल्दी या कुमकुम से स्वस्तिक और लक्ष्मी चरण चिह्न बनाना शुभ माना जाता है। इससे घर में शुभ ऊर्जा का प्रवेश होता है और नकारात्मकता दूर होती है। शुक्रवार के दिन घर में घी का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से पूजा स्थल और मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। साथ ही, घर में सुगंधित अगरबत्ती या धूप का प्रयोग करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा बनी रहती है। वास्तु के अनुसार शुक्रवार को घर में सफेद या गुलाबी रंग के फूलों का उपयोग करना चाहिए। यह रंग शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। साथ ही, घर के उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) को हमेशा साफ और व्यवस्थित रखना चाहिए क्योंकि यह दिशा धन और ज्ञान की मानी जाती है। शुक्रवार को घर में तुलसी के पौधे की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। तुलसी में जल अर्पित कर दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं। इसे घर की समृद्धि के लिए अत्यंत प्रभावी उपाय माना गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में टूटे-फूटे सामान या अनावश्यक कबाड़ को शुक्रवार से पहले ही हटा देना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा कम होती है और नए अवसरों के मार्ग खुलते हैं। इसके अलावा, शुक्रवार के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। सफेद वस्त्र, मिठाई, या जरूरतमंदों को भोजन कराने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में स्थायी सुख-समृद्धि का वास होता है। कुल मिलाकर, शुक्रवार के ये सरल वास्तु उपाय न केवल घर के वातावरण को सकारात्मक बनाते हैं, बल्कि आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करने में सहायक माने जाते हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ अपनाए गए ये उपाय जीवन में स्थिरता और खुशहाली ला सकते हैं।