सागर में मौन जुलूस: जैन समाज का विरोध, साध्वियों की सुरक्षा को लेकर उठी मांग

मध्य प्रदेश । Sagar में सोमवार को जैन समाज ने रीवा में 20 मई को हुए सड़क हादसे में दो साध्वियों की मौत के विरोध में शांत लेकिन प्रभावशाली मौन जुलूस निकाला। इस घटना के बाद पूरे समाज में गहरा आक्रोश देखा जा रहा है, जिसके चलते शहर में धार्मिक संगठनों की सक्रियता बढ़ गई है। सुबह करीब 8 बजे समाज के लोग गौराबाई और पार्श्वनाथ मंदिर, कटरा नमकमंडी में एकत्र हुए। इसके बाद सफेद वस्त्रों में पुरुष और पीले-केसरिया वस्त्रों में महिलाएं शांतिपूर्वक कोतवाली थाने तक मौन जुलूस के रूप में पहुंचे। पूरे जुलूस के दौरान लोगों ने किसी नारेबाजी के बजाय गंभीरता और शांति के साथ अपना विरोध दर्ज कराया। कोतवाली पहुंचकर सकल दिगंबर जैन समाज के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और जिला कलेक्टर के नाम सिटी मजिस्ट्रेट गगन बिसेन और सीएसपी कश्यप को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में सड़क दुर्घटना के दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग के साथ-साथ इस घटना की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई। समाज ने इस मौके पर यह भी कहा कि संतों और साध्वियों की सुरक्षा को लेकर अब ठोस और राष्ट्रीय स्तर की नीति बनाई जानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। ज्ञापन में ‘संत सुरक्षा प्रोटोकॉल’ लागू करने और इसे विशेष संवेदनशील श्रेणी में रखने की मांग प्रमुख रूप से रखी गई। इस आंदोलन का असर केवल शहर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि Sagar जिले के बांदरी और जरुआखेड़ा जैसे क्षेत्रों में भी देखने को मिला, जहां जैन समाज ने मौन जुलूस निकालकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा। बांदरी में जुलूस के दौरान समाज के लोगों ने काली पट्टी बांधकर विरोध जताया और थाने पहुंचकर अपनी मांगें रखीं। वहीं जरुआखेड़ा में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते हुए पुलिस चौकी को ज्ञापन सौंपा गया। समाज के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि संत समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग को लेकर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में आंदोलन और तेज किया जाएगा।
खदान बनी मौत का फंदा: पैर फिसलते ही युवक गहराई में समाया, SDERF जुटी

मध्य प्रदेश । Katni जिले के स्लीमनाबाद थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम धुरी-बंधी में रविवार शाम एक दर्दनाक हादसा सामने आया, जब एक युवक गहरे पानी से भरी खदान में डूब गया। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और स्थानीय लोग बड़ी संख्या में मौके पर एकत्र हो गए। जानकारी के अनुसार, ग्राम धुरी निवासी दुर्गेश कुशवाहा (लगभग 26 वर्ष) रविवार शाम खदान के पास गया था। इसी दौरान उसका पैर फिसल गया और वह सीधे लगभग 100 फीट गहरी पानी से भरी खदान में गिर गया। आसपास मौजूद लोगों ने उसे बचाने की कोशिश की और शोर मचाया, लेकिन कुछ ही पलों में वह पानी में समा गया। घटना की सूचना मिलते ही स्लीमनाबाद थाना पुलिस और प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंची और तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू कराया गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कटनी से SDRF टीम को भी बुलाया गया। SDRF की चार सदस्यीय विशेषज्ञ टीम प्लाटून कमांडर श्वेता गुप्ता के नेतृत्व में आवश्यक रेस्क्यू उपकरण, बोट और लाइफ जैकेट के साथ मौके पर पहुंची। लेकिन खदान की अत्यधिक गहराई और संकरी संरचना के कारण बचाव कार्य में कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं। अंधेरे के कारण रात में रेस्क्यू ऑपरेशन और भी कठिन हो गया। टीम ने टॉर्च और सर्च लाइट की मदद से देर रात तक खोजबीन जारी रखी, लेकिन युवक का कोई सुराग नहीं मिल सका। Katni पुलिस और SDRF की टीम पूरी सतर्कता के साथ लगातार सर्च ऑपरेशन चला रही है। प्रशासन ने खदान के आसपास सुरक्षा घेरा बनाकर ग्रामीणों की भीड़ को नियंत्रित किया है ताकि बचाव कार्य में बाधा न आए। जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी भी मौके की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और रेस्क्यू टीम के संपर्क में हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ऑपरेशन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है और सुबह होते ही अतिरिक्त संसाधनों के साथ सर्चिंग तेज की जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर जिले में खनन क्षेत्रों और पानी से भरी पुरानी खदानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नीट परीक्षा विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, एनटीए और सीबीआई से जवाब तलब किया है। मामले में परीक्षा प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

नई दिल्ली ।देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में शामिल नीट-यूजी को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े विवाद और अनियमितताओं के आरोपों के बीच मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। इस मामले में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी और केंद्रीय जांच एजेंसी से जवाब मांगा है। कोर्ट के इस कदम के बाद लाखों छात्रों और अभिभावकों की नजरें अब आगामी सुनवाई पर टिक गई हैं। नीट परीक्षा से जुड़े मामले पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि परीक्षा की दोबारा प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और न्यायिक निगरानी में कराई जाए ताकि किसी प्रकार की गड़बड़ी या विवाद की संभावना न रहे। इसके साथ ही परीक्षा व्यवस्था की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की भी मांग की गई। याचिका में सुझाव दिया गया कि इस समिति का नेतृत्व न्यायपालिका से जुड़े अनुभवी व्यक्ति के हाथों में हो और इसमें तकनीकी तथा जांच से जुड़े विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाए। इसके पीछे उद्देश्य यह बताया गया कि परीक्षा प्रणाली में सुरक्षा, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को और मजबूत बनाया जा सके। साथ ही यह भी मांग रखी गई कि परीक्षा परिणामों को केंद्रवार सार्वजनिक किया जाए ताकि किसी भी असामान्य पैटर्न या संभावित गड़बड़ी की पहचान आसानी से हो सके। सुनवाई के दौरान अदालत ने परीक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि पहले भी सुधार संबंधी सुझाव दिए जा चुके हैं और कई सिफारिशों पर सहमति भी बनी थी, लेकिन इसके बावजूद यदि ऐसी स्थितियां सामने आती हैं तो यह गंभीर विषय है। अदालत ने संबंधित पक्षों को परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सुधारात्मक कदमों और निगरानी संबंधी उपायों की जानकारी शपथ पत्र के रूप में देने का निर्देश दिया है। गौरतलब है कि नीट परीक्षा देशभर में मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाती है और इसमें लाखों छात्र हिस्सा लेते हैं। ऐसे में परीक्षा से जुड़ा कोई भी विवाद सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। इसी कारण इस मामले को अत्यधिक संवेदनशील माना जा रहा है। मामले में जांच एजेंसियां भी सक्रिय हैं और कथित अनियमितताओं से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच की जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा और निष्पक्षता पर एक बार फिर व्यापक बहस छेड़ दी है। अब अगली सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट हो सकेगा कि आगे की प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ेगी और परीक्षा व्यवस्था में क्या नए बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
दबंगों ने महंत पर किया हमला, गला दबाकर हत्या की कोशिश का आरोप

मध्य प्रदेश । Katni जिले के बड़वारा थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम चिरहुली चांदन में रविवार शाम एक गंभीर हिंसक घटना सामने आई, जहां वेंकटेश्वर मठ की जमीन के सीमांकन के दौरान विवाद इतना बढ़ गया कि मामला मारपीट और जानलेवा हमले तक पहुंच गया। जानकारी के अनुसार, प्रयागराज स्थित वेंकटेश्वर मठ के महंत राजेंद्र प्रसाद शुक्ल अपनी संस्था की लगभग 5 एकड़ जमीन के सीमांकन के लिए राजस्व विभाग की टीम और स्थानीय कर्मचारियों के साथ मौके पर पहुंचे थे। प्रक्रिया शांतिपूर्वक चल रही थी, लेकिन इसी दौरान सटे हुए भूमि मालिकों ने वहां पहुंचकर विवाद शुरू कर दिया। आरोप है कि हरि प्रसाद उर्फ भोला पांडेय और अवधेश पांडेय ने जमीन को लेकर आपत्ति जताई और मौके पर गाली-गलौज शुरू कर दी। इसके बाद विवाद इतना बढ़ा कि उन्होंने फोन कर अपने अन्य परिजनों को भी बुला लिया, जिसके बाद माहौल पूरी तरह हिंसक हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बाबू पांडेय और सचिन पांडेय ने मौके पर पहुंचकर मठ के सेवादार संतलाल विश्वकर्मा पर लाठी-डंडों और लात-घूसों से हमला कर दिया। घटना के दौरान महंत राजेंद्र प्रसाद शुक्ल ने आरोप लगाया कि हमलावरों ने उनका गला दबाकर जान से मारने की कोशिश भी की। इस हमले में सेवादार गंभीर रूप से घायल हो गए, जिनके गले, चेहरे और पैरों पर गंभीर चोटें आई हैं। मौके पर मौजूद अन्य लोगों के हस्तक्षेप के बाद किसी तरह स्थिति को नियंत्रित किया गया और जान बचाई जा सकी। Katni पुलिस ने पीड़ित पक्ष की शिकायत और वीडियो साक्ष्यों के आधार पर तुरंत कार्रवाई करते हुए चार नामजद आरोपियों हरि प्रसाद उर्फ भोला पांडेय, अवधेश पांडेय, बाबू पांडेय और सचिन पांडेय के खिलाफ गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए प्रयास तेज कर दिए गए हैं। वहीं इस घटना ने एक बार फिर जमीन विवादों में बढ़ती हिंसा और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिक्षा और संस्कृति के संगम की ओर बड़ा कदम, सीबीएसई में मैथिली भाषा शामिल होने से बढ़ा भाषाई गौरव

नई दिल्ली । भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा मैथिली भाषा को मातृभाषा विषय के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद शिक्षा और सांस्कृतिक जगत में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इस फैसले को न केवल एक भाषाई उपलब्धि माना जा रहा है, बल्कि इसे क्षेत्रीय भाषाओं को नई पहचान और मजबूती देने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में भी देखा जा रहा है। इस निर्णय के तहत शैक्षणिक सत्र 2026-27 से माध्यमिक स्तर तक मैथिली भाषा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की तैयारी की गई है। इसके बाद कक्षा एक से लेकर आठवीं तक के विद्यार्थियों को मातृभाषा के रूप में मैथिली पढ़ने का अवसर मिलेगा। लंबे समय से क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में बेहतर स्थान देने की मांग उठती रही है और इस फैसले को उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। मैथिली भाषा भारतीय संस्कृति और साहित्य की समृद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। मिथिला क्षेत्र की पहचान केवल उसकी सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं रही, बल्कि भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भी उसका विशेष योगदान रहा है। ऐसे में शिक्षा के शुरुआती स्तर पर बच्चों को अपनी मातृभाषा से जोड़ने का प्रयास भाषा संरक्षण के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। इस फैसले को लेकर बिहार में खुशी का माहौल देखा जा रहा है। इसे मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई गौरव के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक शिक्षा यदि बच्चों की मातृभाषा में दी जाए तो उनकी समझने और सीखने की क्षमता अधिक प्रभावी होती है। यही वजह है कि नई शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा आधारित शिक्षा को लगातार प्राथमिकता दी जा रही है। शिक्षा नीति में भी प्रारंभिक कक्षाओं में मातृभाषा के प्रयोग पर विशेष जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य बच्चों को उनकी जड़ों, संस्कृति और स्थानीय पहचान से जोड़ना है। माना जाता है कि जब बच्चे अपनी परिचित भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं तो उनका बौद्धिक और भावनात्मक विकास अधिक सहज तरीके से होता है। मैथिली भाषा को मिला यह स्थान केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे आने वाली पीढ़ियां अपनी मातृभाषा और परंपराओं के अधिक करीब आ सकेंगी। साथ ही यह कदम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लिए भी प्रेरणा बन सकता है, जिससे भारत की भाषाई विविधता और अधिक मजबूत हो सकती है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि समाज की पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी होती है। ऐसे में मैथिली को शिक्षा व्यवस्था में मिला यह नया स्थान आने वाले समय में भाषाई संरक्षण और सांस्कृतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता है।
कटनी में दुर्लभ कछुओं के गायब होने से हड़कंप, जांच में जुटा प्रशासन

मध्य प्रदेश । Katni में ऐतिहासिक लल्लू भैया की तलैया के गहरीकरण कार्य के दौरान सामने आई एक घटना ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। रविवार को खुदाई के दौरान तीन दुर्लभ प्रजाति के कछुए पाए गए थे, जिन्हें तत्काल मौके पर मौजूद कर्मचारियों ने एक तसले में सुरक्षित रखा था। इस पूरी प्रक्रिया का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें कछुओं को जीवित अवस्था में संभालते हुए देखा जा सकता है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को रहस्यमय बना दिया। कुछ ही समय में ये तीनों दुर्लभ कछुए अचानक लापता हो गए। न तो उनका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध है और न ही यह स्पष्ट जानकारी कि उन्हें वन विभाग को सौंपा गया या कहीं और ले जाया गया। इस घटना के बाद वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी महत्वपूर्ण प्रजाति के जीवों के साथ इस तरह की लापरवाही गंभीर चिंता का विषय है। आशंका जताई जा रही है कि या तो इन कछुओं को अनजाने में कहीं छोड़ दिया गया या फिर उनकी अवैध तस्करी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह घटना सीधे तौर पर वन्यजीव संरक्षण नियमों की अनदेखी को दर्शाती है। Katni में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत कछुओं को संरक्षित श्रेणी में रखा गया है। कानून के अनुसार किसी भी जंगली कछुए को नुकसान पहुंचाना, उसे गायब करना या अवैध रूप से अपने पास रखना एक गंभीर अपराध है, जिसमें 3 से 7 वर्ष तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है। नियमों के मुताबिक, यदि किसी भी निर्माण या रिहायशी क्षेत्र में कोई वन्यजीव मिलता है, तो उसकी तुरंत सूचना वन विभाग को देना और सुरक्षित रूप से उन्हें सौंपना स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। लेकिन इस मामले में प्रक्रिया का पालन नहीं होने से नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। नगर निगम आयुक्त तपस्या परिहार ने स्वीकार किया है कि तलैया की खुदाई के दौरान कछुए मिले थे, लेकिन फिलहाल वे कहां हैं, इसकी जानकारी उनके पास नहीं है। उन्होंने कहा कि मामले की जांच कराई जा रही है और जल्द ही स्थिति स्पष्ट की जाएगी। यह घटना केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं मानी जा रही, बल्कि वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की गंभीर खामियों को भी उजागर करती है। अब सवाल यह है कि आखिर ये दुर्लभ कछुए गए कहां और इसके पीछे जिम्मेदार कौन है।
सूखाराजापुर में आग का कहर, ग्रामीणों की कोशिश के बावजूद नहीं बच सकीं भैंसें

मध्य प्रदेश । Shivpuri जिले के रन्नौद थाना क्षेत्र स्थित ग्राम सूखाराजापुर में रविवार शाम एक दर्दनाक हादसा हो गया, जब एक पशुशाला (खड़ेरा) में अचानक भीषण आग लग गई। इस घटना ने पूरे गांव को दहला दिया और पशुपालक परिवार को भारी नुकसान झेलना पड़ा। जानकारी के अनुसार, पूर्व सरपंच पुष्पेन्द्र सिंह लोधी अपने घर पर मौजूद थे, तभी उन्हें पशुशाला से तेज धुआं उठता दिखाई दिया। जब वे मौके पर पहुंचे तो देखा कि आग तेजी से फैल चुकी थी और अंदर बंधे पशु जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। घटना के तुरंत बाद ग्रामीणों को बुलाया गया और सभी ने मिलकर आग बुझाने की कोशिश की। काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया, लेकिन तब तक दो भैंसों की मौके पर ही मौत हो चुकी थी। वहीं चार गायें गंभीर रूप से झुलस गईं, जिनकी हालत नाजुक बनी हुई है और उनका इलाज जारी है। Shivpuri में इस हादसे के बाद पशुपालक परिवार को करीब 2 लाख रुपये के नुकसान का अनुमान है। घटना के बाद गांव में शोक और चिंता का माहौल है, क्योंकि पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा होते हैं। फिलहाल आग लगने के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। पुलिस ने मामले में आगजनी का प्रकरण दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है। सहायक उप निरीक्षक को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि यह पता लगाया जा सके कि आग किसी तकनीकी कारण से लगी या इसके पीछे कोई अन्य वजह थी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर आग पर काबू नहीं पाया जाता, तो नुकसान और भी बड़ा हो सकता था। इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में पशु सुरक्षा और आपातकालीन व्यवस्था की जरूरत को उजागर कर दिया है।
ओडिशा की सियासत में बड़ा उलटफेर, नवीन पटनायक के भरोसेमंद चेहरे ने छोड़ी पार्टी, नए समीकरणों की अटकलें तेज

नई दिल्ली । ओडिशा की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक माहौल को अचानक गर्म कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी को उस समय बड़ा झटका लगा जब उनके करीबी माने जाने वाले वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद देबाशीष सामंतराय ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। इस राजनीतिक घटनाक्रम ने न केवल पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है बल्कि राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चाओं का दौर भी तेज कर दिया है। देबाशीष सामंतराय लंबे समय से पार्टी के महत्वपूर्ण चेहरों में गिने जाते रहे हैं। संगठन और राजनीतिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए उन्हें नेतृत्व के भरोसेमंद नेताओं में शामिल माना जाता था। ऐसे में उनका अचानक लिया गया यह फैसला राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर रहा है। खासकर ऐसे समय में जब हालिया चुनावों के बाद पार्टी पहले से ही कई चुनौतियों का सामना करती दिखाई दे रही है। अपने इस्तीफे के साथ जारी संदेश में देबाशीष सामंतराय ने पार्टी के भीतर उपेक्षा और असहज माहौल का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि समय के साथ उन्हें ऐसा महसूस होने लगा था कि संगठन में उनकी भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है और उनकी सेवाओं को वह महत्व नहीं मिल रहा जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी। उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने इसे जरूरी समझा। हालांकि पार्टी से अलग होने के बावजूद उन्होंने नेतृत्व के प्रति सम्मान और आभार भी व्यक्त किया। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में मिले अवसरों के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर जनता की सेवा करने का मौका मिला और उन्होंने हमेशा पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। उनके इस बयान को राजनीतिक शिष्टाचार और संतुलन के रूप में भी देखा जा रहा है। इस घटनाक्रम का असर राज्यसभा में पार्टी की स्थिति पर भी पड़ा है। एक सांसद के कम होने के बाद उच्च सदन में पार्टी की ताकत पहले की तुलना में और कमजोर हुई है। ऐसे समय में जब राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दल अपनी उपस्थिति मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, यह बदलाव पार्टी के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया है। ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि आने वाले समय में देबाशीष सामंतराय किसी नए राजनीतिक मंच के साथ नजर आ सकते हैं। हालांकि इस पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन चर्चाओं ने राज्य की सियासत को और दिलचस्प बना दिया है। फिलहाल यह राजनीतिक घटनाक्रम केवल एक इस्तीफा नहीं बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों की एक बड़ी तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह फैसला ओडिशा की राजनीति पर कितना असर डालता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
भारत विरोधी दुष्प्रचार की फिर नाकाम कोशिश: रक्षा मंत्री के नाम पर फैलाए गए झूठे दावे की खुली पोल, फर्जी नैरेटिव पर बड़ा खुलासा

नई दिल्ली।भारत के खिलाफ भ्रामक सूचनाओं और झूठे प्रचार के जरिए माहौल प्रभावित करने की कोशिशें लगातार सामने आती रही हैं। एक बार फिर ऐसा मामला चर्चा में आया, जब सोशल मीडिया पर रक्षा मंत्री के नाम से एक कथित बयान को वायरल कर भारत की छवि को प्रभावित करने की कोशिश की गई। दावा किया गया कि रक्षा मंत्री ने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को लेकर भारत के समर्थन से जुड़ा बयान दिया है। यह खबर तेजी से प्रसारित होने लगी और इसे कई लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। हालांकि जांच पड़ताल के बाद यह स्पष्ट हो गया कि यह दावा पूरी तरह झूठा, मनगढ़ंत और तथ्यों से परे था। इसके बाद पूरे मामले ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैल रही फर्जी खबरों और दुष्प्रचार के गंभीर खतरे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। जांच के दौरान यह सामने आया कि रक्षा मंत्री द्वारा ऐसा कोई बयान कभी दिया ही नहीं गया था। वायरल सामग्री को तथ्यों से जोड़कर देखने पर उसमें कई विसंगतियां दिखाई दीं, जिसके बाद यह स्पष्ट हुआ कि इसके पीछे भ्रम पैदा करने और लोगों को गुमराह करने की मंशा थी। अधिकारियों ने भी साफ कर दिया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित की जा रही जानकारी का वास्तविक तथ्यों से कोई संबंध नहीं है। इस तरह की गतिविधियां केवल अफवाह फैलाने और लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करने का काम करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में डिजिटल माध्यमों पर गलत सूचनाओं का प्रसार पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज हो गया है। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा से जुड़े विषयों को लेकर कई बार इस तरह की फर्जी जानकारियां सामने आई हैं। तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ अब तस्वीरों, वीडियो और ऑडियो में बदलाव कर उन्हें वास्तविक जैसा दिखाना पहले से अधिक आसान हो गया है। यही कारण है कि कई बार सामान्य लोग ऐसी सामग्री को सच मान लेते हैं और बिना जांच किए आगे साझा कर देते हैं। ऐसे मामलों में झूठी सूचनाएं कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंच जाती हैं और भ्रम की स्थिति पैदा कर देती हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर जानकारी पर आंख बंद करके विश्वास करना सही नहीं है। किसी भी संवेदनशील विषय, विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी मामलों से जुड़ी खबरों की पुष्टि करना बेहद आवश्यक हो गया है। गलत सूचना केवल समाज में भ्रम नहीं फैलाती बल्कि कई बार राष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर प्रभाव छोड़ सकती है। इसलिए लोगों को जागरूक रहने और किसी भी संदिग्ध जानकारी को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई की जांच करने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दौर में सूचना जितनी तेजी से लोगों तक पहुंच रही है, उतनी ही तेजी से झूठ और भ्रम भी फैल रहे हैं। ऐसे में जिम्मेदार नागरिक होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सतर्कता, जागरूकता और तथ्यों की जांच ही फर्जी खबरों के खिलाफ सबसे मजबूत हथियार साबित हो सकती है।
मेहराब साहब की तलैया पर जल संरक्षण अभियान, जुटे अधिकारी और नागरिक

मध्य प्रदेश । Gwalior में जल संरक्षण को जन-आंदोलन का रूप देने के उद्देश्य से गंगा दशहरा के अवसर पर आज विशेष महाअभियान का आयोजन किया जा रहा है। ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के तहत शहर और जिलेभर में विभिन्न स्थानों पर श्रमदान, दीपदान और जल स्रोतों की सफाई जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। जिला स्तरीय मुख्य कार्यक्रम लक्ष्मीगंज स्थित मेहराब साहब की तलैया पर सुबह 7:30 बजे से शुरू होगा, जहां जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय नागरिकों की भागीदारी रहेगी। कार्यक्रम में जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश दिया जाएगा। शाम के समय बैजाताल में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा, जिसमें दीपदान, जलाभिषेक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहेंगी। इस अवसर पर जल स्रोतों के महत्व और उनके संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने पर विशेष जोर दिया जाएगा। इस अभियान की खास बात यह है कि प्रशासन ने ईंधन की बचत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए एक प्रतीकात्मक पहल की है, जिसके तहत कलेक्टर सहित वरिष्ठ अधिकारी कार्यक्रम स्थल तक बस से पहुंचेंगे। Gwalior जिले के सभी 66 वार्डों, चारों विकासखंडों और नगर निकायों में भी इसी तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। डबरा में नोन-सिंध नदी, मुरार में झिलमिल नदी, भितरवार में पार्वती नदी और घाटीगांव के 36 अमृत सरोवरों पर विशेष सफाई अभियान चलाया जाएगा। इस महाअभियान के तहत कुएं, बावड़ियां, नहरें और नदी घाटों की सफाई में स्थानीय नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और जल संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी के रूप में अपनाएं। इस पहल का उद्देश्य केवल सफाई या आयोजन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल स्रोतों को सुरक्षित और संरक्षित रखना है। प्रशासन का मानना है कि जनभागीदारी के बिना जल संरक्षण का लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता।