सरकार और जनता के बीच डिजिटल सेतु बना ‘भास्कर समाधान’, सीएम मोहन यादव ने किया शुभारंभ

मध्य प्रदेश । मध्यप्रदेश में आम नागरिकों और प्रशासन के बीच संवाद को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक नई पहल की शुरुआत हुई है। दैनिक भास्कर न्यूज एप पर सोमवार को ‘भास्कर समाधान’ नामक विशेष डिजिटल प्लेटफॉर्म लॉन्च किया गया। इस मंच का उद्देश्य जनता की समस्याओं को सीधे जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचाना और उनके समाधान की प्रक्रिया को पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाना है। इस नई पहल का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया। ‘भास्कर समाधान’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब नागरिक अपनी समस्या सीधे मोबाइल एप पर पोस्ट कर सकेंगे। चाहे सड़क, पानी, बिजली, सफाई, स्ट्रीट लाइट, नाली, यातायात या सरकारी कार्यालयों से जुड़ी कोई समस्या हो, लोग फोटो और पूरी जानकारी के साथ उसे प्लेटफॉर्म पर साझा कर सकते हैं। शिकायत पोस्ट होने के बाद संबंधित विभाग के अधिकारी और कर्मचारी उसी प्लेटफॉर्म पर उसका जवाब दे सकेंगे तथा समाधान की स्थिति भी अपडेट कर सकेंगे। इससे आमजन को यह जानकारी मिलती रहेगी कि उनकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई और समाधान किस स्तर तक पहुंचा। इस पहल की शुरुआत फिलहाल भोपाल और इंदौर शहरों में की गई है। पहले चरण में दोनों नगर निगम क्षेत्रों के नागरिक इस सुविधा का लाभ उठा सकेंगे। सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने के बाद इसे प्रदेश के अन्य शहरों तक विस्तारित करने की योजना बनाई गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस अवसर पर कहा कि ‘भास्कर समाधान’ सरकार और समाज के बीच आवश्यकताओं तथा अपेक्षाओं को जोड़ने वाला एक प्रभावी सेतु साबित होगा। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए और ऐसे डिजिटल नवाचार सुशासन, पारदर्शिता तथा जवाबदेही को मजबूत बनाते हैं। दैनिक भास्कर डिजिटल के मध्यप्रदेश स्टेट एडिटर कपिल भटनागर ने बताया कि यह देश का पहला ऐसा मीडिया आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है जहां नागरिक स्वयं अपनी समस्या पोस्ट कर सकते हैं और संबंधित अधिकारी उसी मंच पर उसका समाधान साझा कर सकते हैं। इससे न केवल शिकायतों का निवारण आसान होगा बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी बढ़ेगी। इस प्लेटफॉर्म की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अधिकारियों को विशेष अथॉरिटी व्यू उपलब्ध कराया गया है। इसके माध्यम से वे अपने विभाग से जुड़ी सभी शिकायतें एक ही स्थान पर देख सकेंगे। साथ ही वे यह भी अपडेट कर सकेंगे कि समस्या का समाधान हो चुका है या उस पर काम चल रहा है। शिकायतकर्ता भी समाधान होने पर इसकी पुष्टि कर सकेंगे। एप में कॉलिंग और लोकेशन जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गई हैं। आवश्यकता पड़ने पर अधिकारी सीधे शिकायतकर्ता से संपर्क कर सकेंगे और समस्या की सटीक लोकेशन तक पहुंच सकेंगे। इसके अलावा नागरिक अपने क्षेत्र की अन्य समस्याओं को भी देख सकेंगे और स्थानीय स्तर पर चल रही कार्रवाई की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। ‘भास्कर समाधान’ का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि जो अधिकारी, कर्मचारी या जनप्रतिनिधि समस्याओं का तेजी से समाधान करेंगे, उन्हें ‘स्टार ऑफिसर’ और ‘पब्लिक स्टार’ के रूप में सम्मानित पहचान दी जाएगी। उनके कार्यों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा ताकि सकारात्मक कार्य संस्कृति को बढ़ावा मिल सके। यह पहल केवल शिकायत दर्ज करने का मंच नहीं बल्कि जनता और प्रशासन के बीच भरोसे, संवाद और समाधान की नई व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। यदि यह मॉडल सफल होता है तो प्रदेश में जनसरोकार से जुड़े मुद्दों के समाधान की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो सकती है।
मोहन सरकार का ट्रांसफर अभियान शुरू, कर्मचारियों-अधिकारियों के तबादलों पर तेज हुई कवायद

मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश में लंबे इंतजार के बाद तबादलों का दौर आखिरकार शुरू हो गया है। राज्य सरकार की नई तबादला नीति लागू होने के साथ ही एक जून से 15 जून तक कर्मचारियों और अधिकारियों के स्थानांतरण किए जाएंगे। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि निर्धारित अवधि के भीतर ही सभी विभागों को स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके बाद जारी होने वाले आदेश अमान्य माने जाएंगे। ऐसे में विभिन्न विभागों में तैयारियां तेज हो गई हैं और प्रशासनिक गतिविधियां भी बढ़ गई हैं। डॉ. मोहन यादव सरकार की कैबिनेट ने हाल ही में तबादला नीति-2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने आधिकारिक तौर पर नई नीति जारी कर सभी विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश भेज दिए। नौ दिनों की तैयारी अवधि के बाद अब विभागों को स्थानांतरण आदेश जारी करने की अनुमति मिल गई है। इसी के साथ प्रदेशभर में कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच तबादलों को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। पुलिस मुख्यालय ने भी इस संबंध में सक्रियता दिखाई है। पीएचक्यू ने पांच जून तक आरक्षक से लेकर उपनिरीक्षक स्तर तक के पुलिसकर्मियों के तबादले करने के निर्देश जारी किए हैं। इसके बाद विभिन्न जिलों में पुलिस अधीक्षकों और पुलिस आयुक्तों ने अपने स्तर पर तबादला प्रक्रिया शुरू कर दी है। वहीं शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और अन्य कई विभागों ने जिलों में पदस्थ कर्मचारियों और अधिकारियों की विस्तृत जानकारी मंगाना शुरू कर दिया है। नई नीति के तहत कर्मचारियों की संख्या के आधार पर तबादलों की सीमा तय की गई है। जिन विभागों में 200 तक कर्मचारी हैं वहां 20 प्रतिशत तक तबादले किए जा सकेंगे। 200 से 1000 कर्मचारियों वाले विभागों में 15 प्रतिशत, 1000 से 2000 कर्मचारियों वाले विभागों में 10 प्रतिशत और 2001 से अधिक कर्मचारियों वाले विभागों में पांच प्रतिशत तक तबादलों की अनुमति दी गई है। सरकार ने कुछ मामलों को तबादला नीति से बाहर रखा है। पति-पत्नी को एक स्थान पर पदस्थ करने और गंभीर बीमारी से जुड़े मामलों में होने वाले स्थानांतरण सामान्य सीमा में नहीं गिने जाएंगे। इसके अलावा स्वयं के खर्च पर और पारस्परिक तबादलों के लिए भी अलग व्यवस्था बनाई गई है। नई नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रथम और द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों को एक जिले में तीन वर्ष पूरा होने पर जिले से बाहर भेजा जा सकता है। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के लिए भी यही नियम लागू होगा। हालांकि तीन वर्ष की अवधि को अनिवार्य शर्त नहीं माना गया है। यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है तो उसका तबादला तय समय से पहले भी किया जा सकता है। महिला कर्मचारियों को विशेष राहत दी गई है। अविवाहित, विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाओं को गृह जिले में पदस्थ करने का प्रावधान रखा गया है। वहीं जिन कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति में एक वर्ष या उससे कम समय शेष है उनका सामान्य परिस्थितियों में तबादला नहीं किया जाएगा। सरकार ने सभी विभागों को निर्देश दिए हैं कि स्थानांतरण आदेश केवल ऑनलाइन जारी किए जाएं। आदेशों में कर्मचारी का ट्रेजरी एम्पलाई कोड दर्ज करना अनिवार्य होगा। 15 जून के बाद जारी किसी भी तबादला आदेश को शून्य माना जाएगा और उसका पालन नहीं किया जाएगा। साथ ही स्थानांतरण के बाद पुराने पदस्थापना स्थल से वेतन आहरण करने पर वित्तीय अनियमितता मानी जाएगी। नई तबादला नीति का उद्देश्य प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ पारदर्शिता सुनिश्चित करना बताया जा रहा है। अब अगले दो सप्ताह तक प्रदेशभर में बड़े पैमाने पर तबादलों की गतिविधियां देखने को मिलेंगी, जिसका असर विभिन्न विभागों की कार्यप्रणाली पर भी नजर आएगा।
चीन के डॉक्टरों ने पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट किए सुअर के लिवर और दोनों किडनी

नई दिल्ली। दुनिया भर में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही मानव अंगों की भारी कमी को दूर करने की दिशा में वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में पहली बार शोधकर्ताओं की एक विशेष टीम ने एक इंसान के शरीर में जेनेटिक रूप से संशोधित यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर का पूरा लिवर और उसकी दोनों किडनियां एक साथ सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित करने का कारनामा कर दिखाया है। इस बेहद जटिल और अत्याधुनिक सर्जरी को अंग प्रत्यारोपण की दुनिया में एक बड़ी संभावित क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। अब तक सुअर के अंगों को इंसानों में लगाने के जितने भी प्रयास किए गए थे, वे केवल किसी एक अंग तक ही सीमित थे। यह पहला मौका है जब डॉक्टरों ने तकनीकी बाधाओं को पार करते हुए एक साथ कई अंगों का बहु-अंग प्रत्यारोपण करने में सफलता पाई है। इस अभूतपूर्व चिकित्सा परीक्षण को अंजाम देने के लिए डॉक्टरों ने एक ऐसे ५३ वर्षीय व्यक्ति को चुना जो पहले से ही पूरी तरह ब्रेन-डेड घोषित हो चुका था। मरीज के परिजनों ने चिकित्सा अनुसंधान के महत्व को समझते हुए इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए अपनी स्वैच्छिक सहमति प्रदान की थी। जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से विशेष रूप से तैयार किए गए सुअर के इन अंगों को जब मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया, तो उन्होंने लगभग पांच दिनों तक बिना किसी बड़ी रुकावट के बेहद प्रभावी तरीके से काम किया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान डॉक्टरों को रियल टाइम में यह देखने और समझने का दुर्लभ अवसर मिला कि जानवरों के अंग किसी मानव शरीर के भीतर किस तरह की जैविक प्रतिक्रियाएं देते हैं। विज्ञान की भाषा में इस तरह के प्रत्यारोपण को जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में पूरे अंग, कोशिकाएं या टिशू ट्रांसप्लांट करना होता है। इस बेहद जटिल सर्जरी के बाद जो परिणाम सामने आए, उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। वर्षों से वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे थे कि क्या सुअर के अंग इंसानों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं, और अब सुअर के डीएनए को एडिट करने की तकनीक ने इसे एक ठोस हकीकत में बदल दिया है। ट्रांसप्लांटेशन के शुरुआती चौबीस घंटों के भीतर मरीज के शरीर में इन बाहरी अंगों को अस्वीकार करने या रिजेक्ट करने के कोई भी लक्षण या संकेत नहीं देखे गए। विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही समय में कई अंगों का प्रत्यारोपण करना तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है और इसमें मरीज की जान जाने का जोखिम भी कई गुना बढ़ जाता है, लेकिन इसके बावजूद अंगों का सुचारू रूप से काम करना बहु-अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी कामयाबी है। डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रत्यारोपण संपन्न होने के महज उन्नीस घंटों के भीतर ही सुअर के लिवर ने मानव शरीर के अनुकूल काम करते हुए पित्त का निर्माण और रिसाव शुरू कर दिया था, जो इसके सामान्य रूप से सक्रिय होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसके अलावा, गंभीर बीमारी के कारण मरीज के शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया का जो स्तर खतरनाक रूप से बढ़ा हुआ था, वह सुअर की दोनों किडनियां लगते ही तेजी से गिरकर बिल्कुल सामान्य स्तर पर लौट आया। इस सकारात्मक बदलाव ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रत्यारोपित की गई दोनों किडनियां मानव शरीर के भीतर अपने महत्वपूर्ण जैविक कार्यों को पूरी तरह से निभाने में सक्षम थीं। इस चमत्कारिक सफलता के बाद भी वैज्ञानिक अभी पूरी तरह से सतर्क हैं और उनका कहना है कि इस तकनीक को जीवित मरीजों पर आजमाने से पहले अभी कई और कड़े परीक्षणों की आवश्यकता होगी। भविष्य में इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अभी ब्रेन-डेड व्यक्तियों और जीवित बंदरों पर और अधिक गहन अध्ययन किए जाएंगे। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सुअर के अंगों के माध्यम से किसी भी प्रकार के अज्ञात या खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया इंसानों के भीतर प्रवेश न कर पाएं। बहरहाल, दुनिया भर में लाखों लोग हर साल किडनी, लिवर और हार्ट जैसे अंगों की प्रतीक्षा में दम तोड़ देते हैं, ऐसे में इस नई तकनीक ने चिकित्सा जगत में चिकित्सा अनुसंधान के एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत कर दी है।
210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?

नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रे को लेकर चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। बालेन शाह ने ब्रिटेन की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के समय से चले आ रहे सीमा विवादों को वह यूनाइटेड किंगडम के सामने भी उठाएंगे। इसके बाद 210 साल पुराने इस विवाद पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। लिपुलेख दर्रा हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक रणनीतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्ग है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले को तिब्बत के पुरांग क्षेत्र से जोड़ता है। यही दर्रा कैलास मानसरोवर यात्रा के प्रमुख मार्गों में से एक माना जाता है। भारत और चीन के बीच हुए समझौतों के तहत वर्षों से इस मार्ग का उपयोग तीर्थयात्रियों और सीमित व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है। इस विवाद की जड़ वर्ष 1816 में हुई ऐतिहासिक सुगौली संधि में छिपी है। यह संधि तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी। संधि के अनुसार काली नदी को भारत और नेपाल की सीमा माना गया था। हालांकि विवाद इस बात को लेकर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कौन सा है। भारत का दावा है कि काली नदी का उद्गम लिपुलेख क्षेत्र के निकट स्थित कालापानी इलाके से होता है। इस आधार पर भारत लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र को अपने भूभाग का हिस्सा मानता है। दूसरी ओर नेपाल का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है। यदि नेपाल के दावे को सही माना जाए तो कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा का इलाका नेपाल के क्षेत्र में आता है। विवाद को और जटिल बनाने वाला एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि वर्ष 1865 के आसपास ब्रिटिश प्रशासन ने सीमा निर्धारण में कुछ बदलाव किए थे। भारत का पक्ष है कि बाद के आधिकारिक नक्शों और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर यह क्षेत्र भारत का हिस्सा रहा है। वहीं नेपाल का आरोप है कि ब्रिटिश शासन के दौरान सीमा निर्धारण में उसके हितों की अनदेखी की गई थी। यह विवाद वर्ष 2020 में तब और तेज हो गया जब भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली रणनीतिक सड़क का उद्घाटन किया। नेपाल ने इसका विरोध करते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया था। भारत का लगातार यही रुख रहा है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और आपसी बातचीत के माध्यम से होना चाहिए। नई दिल्ली किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं रही है। वहीं नेपाल में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दल और नेता इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की वकालत करते रहे हैं। लिपुलेख विवाद केवल सीमा रेखा का सवाल नहीं है बल्कि इसमें ऐतिहासिक दस्तावेज, सामरिक महत्व, धार्मिक आस्था और दोनों देशों के राष्ट्रीय हित भी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि दो सदियों बाद भी यह मुद्दा पूरी तरह सुलझ नहीं सका है और समय-समय पर दोनों पड़ोसी देशों के रिश्तों में चर्चा का विषय बन जाता है।
विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस

नई दिल्ली। अमेरिका की सत्ता और नीति निर्धारण के केंद्र वाशिंगटन में पाकिस्तान की सक्रिय लॉबिंग को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने अमेरिकी विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम यानी एफएआरए के सार्वजनिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर महीने औसतन नौ लाख डॉलर यानी लगभग साढ़े आठ करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान कई कूटनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।एफएआरए के दस्तावेजों के अनुसार पाकिस्तान का वार्षिक लॉबिंग खर्च लगभग एक से 1.2 करोड़ डॉलर के बीच पहुंच चुका है। यह राशि अमेरिकी राजनीतिक गलियारों, सरकारी एजेंसियों और प्रभावशाली नीति निर्माताओं तक पहुंच बनाने के लिए खर्च की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश द्वारा लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लेना असामान्य नहीं है, लेकिन पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा खर्च उसकी मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए काफी बड़ा माना जा रहा है।रोबिंदर सचदेव के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारियों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए कई पेशेवर लॉबिंग फर्मों को अनुबंध पर रखा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी गृह विभाग से जुड़े स्तर पर संपर्क स्थापित करने के लिए एक फर्म को हर महीने 50 हजार डॉलर दिए जा रहे हैं। वहीं व्यापार और आर्थिक मामलों से संबंधित मुद्दों को संभालने वाली एक अन्य कंपनी को लगभग ढाई लाख डॉलर प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है।सबसे ज्यादा चर्चा उस अनुबंध को लेकर है जिसे हाल ही में बढ़ाया गया है। बताया गया है कि एक लॉबिंग फर्म को पहले 25 हजार डॉलर मासिक भुगतान किया जाता था, लेकिन अब उसके साथ लगभग 12 लाख डॉलर का बड़ा समझौता किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिशों को दर्शाता है।रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से चलाया जा रहा यह अभियान उन दावों से अलग तस्वीर पेश करता है जो हाल के महीनों में पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से किए गए थे। विशेष रूप से सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के उन बयानों का उल्लेख किया जा रहा है जिनमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान अमेरिकी मध्यस्थता से जुड़े दावे किए थे।एफएआरए दस्तावेजों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह भी दावा किया गया है कि मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन में अपने संपर्क अभियान को तेज कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक 6 से 9 मई के बीच पाकिस्तानी प्रतिनिधियों और एजेंटों ने अमेरिकी संसद, पेंटागन और ट्रेजरी विभाग से जुड़े अधिकारियों के साथ दर्जनों आपातकालीन बैठकें की थीं। इन बैठकों का उद्देश्य पाकिस्तान के पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और अमेरिकी नीति निर्माताओं तक अपनी बात पहुंचाना बताया गया।अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लॉबिंग एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान के कथित खर्च और गतिविधियों को लेकर सामने आई जानकारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक मंचों पर प्रभाव कायम रखने के लिए देश किस हद तक संसाधन झोंक रहे हैं। आने वाले समय में इन खुलासों पर पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय हलकों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रहेगी।
रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ पर फिर गरमाया मामला: कराची के पूर्व मेयर के दावे ने आलोचकों को दिया करारा जवाब

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत की ब्लॉकबस्टर एक्शन-थ्रिलर फिल्म ‘धुरंधर’ और उसके सीक्वल को लेकर चल रहा वैचारिक विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। अभिनेता रणवीर सिंह और निर्देशक आदित्य धर की इस बेहद चर्चित फिल्म को लेकर जहां भारत के भीतर ही कुछ बुद्धिजीवियों, समीक्षकों और सोशल मीडिया विश्लेषकों द्वारा इसे एक ‘प्रोपेगैंडा फिल्म’ करार दिया जा रहा था, वहीं अब इस पूरे मामले में सरहद पार से आए एक बड़े बयान ने आलोचकों को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है। पाकिस्तान के कराची शहर के पूर्व मेयर और वरिष्ठ पत्रकार आरिफ अजाकिया ने फिल्म के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने एक प्रतिष्ठित वैश्विक पत्रकारिता कार्यक्रम ‘टॉक जर्नलिज्म’ के दौरान यह सनसनीखेज दावा किया कि फिल्म में दिखाई गई पाकिस्तान के ल्यारी इलाके की जमीनी हकीकत और आतंकी नेटवर्क को खत्म करने की जो कहानी पर्दे पर उतारी गई है, वह पूरी तरह से सच पर आधारित है। इस बयान का वीडियो सामने आने के बाद से ही फिल्म की आलोचना करने वाले धड़ों के बीच सन्नाटा पसर गया है। आरिफ अजाकिया ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपनी पुरानी राजनीतिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि जिस दौर की घटनाओं और मिशन को फिल्म ‘धुरंधर’ में फिल्माया गया है, उस समय वह स्वयं कराची के उस विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के मेयर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि उनका जन्म और पालन-पोषण कराची के उसी विवादित ल्यारी इलाके में हुआ है, जहां बलूच गैंग और विभिन्न आतंकी संगठनों का एक समय पर भारी वर्चस्व हुआ करता था। पूर्व मेयर के अनुसार, वह उस दौर के सुरक्षा हालातों और पर्दे के पीछे चलने वाली गतिविधियों के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, इसलिए वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह स्वीकार करते हैं कि फिल्म के भीतर जो कुछ भी दिखाया गया है, उसमें रत्ती भर भी झूठ नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने मंच से अपनी जड़ों के बारे में बात करते हुए यह भी स्वीकार किया कि भले ही उनका जन्म कराची में हुआ हो, लेकिन उनके माता-पिता अविभाजित भारत के जूनागढ़, गुजरात से ताल्लुक रखते थे, इसलिए वह स्वयं को पाकिस्तानी मानने की बजाय भारतीय मूल का नागरिक कहलाना अधिक पसंद करते हैं। मध्य प्रदेश सहित देशभर के सिनेमाघरों में धूम मचाने वाली इस फिल्म की कहानी की बात करें तो ‘धुरंधर’ और इसका हालिया सीक्वल दर्शकों को एक बेहद संजीदा और खतरनाक खुफिया मिशन पर ले जाता है। फिल्म की पटकथा में दिखाया गया है कि किस प्रकार भारतीय खुफिया एजेंसी का एक जांबाज अधिकारी जसकीरत, विषम परिस्थितियों के बीच अपना नाम और पहचान बदलकर हमजा बन जाता है और पाकिस्तान के सबसे संवेदनशील इलाके ल्यारी के एक खतरनाक बलूच गैंग में सफलतापूर्वक घुसपैठ करता है। वहां रहते हुए वह न केवल स्थानीय अपराधियों के तंत्र को ध्वस्त करता है बल्कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन के मंसूबों को भी नेस्तनाबूद कर देता है। रणवीर सिंह के दमदार अभिनय से सजी इस फिल्म में सारा अर्जुन, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन जैसे स्थापित कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। जहाँ एक तरफ इस फिल्म की आलोचना करने वाले इसे केवल एक काल्पनिक और अतिशयोक्तिपूर्ण कहानी बता रहे थे, वहीं अब खुद कराची की कमान संभाल चुके एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी द्वारा इसे सच का आईना बताए जाने के बाद इस फिल्म की प्रामाणिकता पर उठ रहे तमाम सवालों पर पूरी तरह से विराम लग गया है।
णवीर सिंह की 'धुरंधर' को मिला सरहद पार से समर्थन, पूर्व मेयर आरिफ अजाकिया बोले— मैं खुद गवाह हूं, सब कुछ सच दिखाया गया

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत की ब्लॉकबस्टर एक्शन-थ्रिलर फिल्म ‘धुरंधर’ और उसके सीक्वल को लेकर चल रहा वैचारिक विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। अभिनेता रणवीर सिंह और निर्देशक आदित्य धर की इस बेहद चर्चित फिल्म को लेकर जहां भारत के भीतर ही कुछ बुद्धिजीवियों, समीक्षकों और सोशल मीडिया विश्लेषकों द्वारा इसे एक ‘प्रोपेगैंडा फिल्म’ करार दिया जा रहा था, वहीं अब इस पूरे मामले में सरहद पार से आए एक बड़े बयान ने आलोचकों को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है। पाकिस्तान के कराची शहर के पूर्व मेयर और वरिष्ठ पत्रकार आरिफ अजाकिया ने फिल्म के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने एक प्रतिष्ठित वैश्विक पत्रकारिता कार्यक्रम ‘टॉक जर्नलिज्म’ के दौरान यह सनसनीखेज दावा किया कि फिल्म में दिखाई गई पाकिस्तान के ल्यारी इलाके की जमीनी हकीकत और आतंकी नेटवर्क को खत्म करने की जो कहानी पर्दे पर उतारी गई है, वह पूरी तरह से सच पर आधारित है। इस बयान का वीडियो सामने आने के बाद से ही फिल्म की आलोचना करने वाले धड़ों के बीच सन्नाटा पसर गया है। आरिफ अजाकिया ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपनी पुरानी राजनीतिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि जिस दौर की घटनाओं और मिशन को फिल्म ‘धुरंधर’ में फिल्माया गया है, उस समय वह स्वयं कराची के उस विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के मेयर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि उनका जन्म और पालन-पोषण कराची के उसी विवादित ल्यारी इलाके में हुआ है, जहां बलूच गैंग और विभिन्न आतंकी संगठनों का एक समय पर भारी वर्चस्व हुआ करता था। पूर्व मेयर के अनुसार, वह उस दौर के सुरक्षा हालातों और पर्दे के पीछे चलने वाली गतिविधियों के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, इसलिए वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह स्वीकार करते हैं कि फिल्म के भीतर जो कुछ भी दिखाया गया है, उसमें रत्ती भर भी झूठ नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने मंच से अपनी जड़ों के बारे में बात करते हुए यह भी स्वीकार किया कि भले ही उनका जन्म कराची में हुआ हो, लेकिन उनके माता-पिता अविभाजित भारत के जूनागढ़, गुजरात से ताल्लुक रखते थे, इसलिए वह स्वयं को पाकिस्तानी मानने की बजाय भारतीय मूल का नागरिक कहलाना अधिक पसंद करते हैं। मध्य प्रदेश सहित देशभर के सिनेमाघरों में धूम मचाने वाली इस फिल्म की कहानी की बात करें तो ‘धुरंधर’ और इसका हालिया सीक्वल दर्शकों को एक बेहद संजीदा और खतरनाक खुफिया मिशन पर ले जाता है। फिल्म की पटकथा में दिखाया गया है कि किस प्रकार भारतीय खुफिया एजेंसी का एक जांबाज अधिकारी जसकीरत, विषम परिस्थितियों के बीच अपना नाम और पहचान बदलकर हमजा बन जाता है और पाकिस्तान के सबसे संवेदनशील इलाके ल्यारी के एक खतरनाक बलूच गैंग में सफलतापूर्वक घुसपैठ करता है। वहां रहते हुए वह न केवल स्थानीय अपराधियों के तंत्र को ध्वस्त करता है बल्कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन के मंसूबों को भी नेस्तनाबूद कर देता है। रणवीर सिंह के दमदार अभिनय से सजी इस फिल्म में सारा अर्जुन, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन जैसे स्थापित कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। जहाँ एक तरफ इस फिल्म की आलोचना करने वाले इसे केवल एक काल्पनिक और अतिशयोक्तिपूर्ण कहानी बता रहे थे, वहीं अब खुद कराची की कमान संभाल चुके एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी द्वारा इसे सच का आईना बताए जाने के बाद इस फिल्म की प्रामाणिकता पर उठ रहे तमाम सवालों पर पूरी तरह से विराम लग गया है।
बार-बार पड़ते हैं बीमार? समझिए विटामिन-सी और विटामिन-डी में कौन है इम्युनिटी का असली हीरो

नई दिल्ली। मौसम बदलते ही सर्दी-जुकाम होना, बार-बार संक्रमण की चपेट में आना, जल्दी थक जाना और शरीर में कमजोरी महसूस होना अक्सर कमजोर इम्युनिटी के संकेत माने जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है। खासकर कोरोना महामारी के बाद विटामिन-सी और विटामिन-डी को लेकर लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गई। हालांकि आज भी बहुत से लोगों के मन में यह सवाल बना रहता है कि इम्युनिटी मजबूत करने के लिए आखिर सबसे ज्यादा जरूरी कौन है-विटामिन-सी या विटामिन-डी? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसका सीधा जवाब यह है कि दोनों ही विटामिन शरीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक को दूसरे से ज्यादा महत्वपूर्ण मानना सही नहीं होगा। मजबूत इम्यून सिस्टम के लिए दोनों का संतुलित स्तर बनाए रखना आवश्यक है। विटामिन-सी को लंबे समय से प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर माना जाता रहा है। यह शरीर में श्वेत रक्त कोशिकाओं यानी व्हाइट ब्लड सेल्स की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद करता है। ये कोशिकाएं शरीर को वायरस, बैक्टीरिया और अन्य संक्रमणों से बचाने का काम करती हैं। इसके अलावा विटामिन-सी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट भी है जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाता है। कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि पर्याप्त मात्रा में विटामिन-सी का सेवन करने से सर्दी-जुकाम की अवधि और उसकी गंभीरता कुछ हद तक कम हो सकती है। दूसरी ओर विटामिन-डी को भी इम्यून सिस्टम का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। यह शरीर की टी-सेल्स और अन्य प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करने में मदद करता है जो संक्रमण पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया के खिलाफ रक्षा कवच का काम करती हैं। विटामिन-डी शरीर में सूजन को नियंत्रित रखने में भी सहायक होता है जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली संतुलित रूप से कार्य करती है। शोध बताते हैं कि जिन लोगों में विटामिन-डी की कमी होती है उनमें श्वसन संबंधी संक्रमण, फ्लू और अन्य बीमारियों का खतरा अधिक हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सप्लीमेंट्स के भरोसे इम्युनिटी मजबूत नहीं की जा सकती। इसके लिए संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम, तनाव पर नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली भी उतनी ही जरूरी है। यदि शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते रहें तो इम्यून सिस्टम बेहतर तरीके से काम करता है। विटामिन-सी की पूर्ति के लिए आंवला, संतरा, नींबू, अमरूद, कीवी, स्ट्रॉबेरी और शिमला मिर्च जैसे खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल किया जा सकता है। वहीं विटामिन-डी के लिए सुबह की धूप सबसे अच्छा स्रोत मानी जाती है। इसके अलावा अंडे की जर्दी, फैटी फिश, मशरूम और फोर्टिफाइड डेयरी उत्पादों का सेवन भी लाभदायक होता है। कुल मिलाकर इम्युनिटी को मजबूत बनाने के लिए विटामिन-सी और विटामिन-डी दोनों ही जरूरी हैं। एक संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है तो दूसरा इम्यून सिस्टम को सक्रिय और संतुलित बनाए रखता है। इसलिए बेहतर स्वास्थ्य के लिए दोनों पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करना ही सबसे समझदारी भरा कदम है।
पर्दे पर रहे विरोधी, असल जिंदगी में निकले बेहद करीबी रिश्तेदार: जानिए रेखा और अभिनेता तेज सप्रू का अनोखा फैमिली कनेक्शन

नई दिल्ली। बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री की सबसे रहस्यमयी और सदाबहार अभिनेत्रियां में शुमार रेखा के पेशेवर जीवन और उनकी व्यक्तिगत प्रेम कहानी से तो दुनिया भली-भांति वाकिफ है, परंतु उनके पारिवारिक ताने-बाने को लेकर आज भी कई ऐसे अनसुने पहलू हैं जिनसे आम जनमानस पूरी तरह अनजान है। साठ के दशक से सिल्वर स्क्रीन पर राज करने वाली रेखा का हिंदी सिनेमा के एक बेहद लोकप्रिय और खूंखार विलेन का किरदार निभाने वाले अभिनेता तेज सप्रू के साथ बेहद करीबी और सगा पारिवारिक संबंध है। गुजरे जमाने के इस मशहूर खलनायक और रेखा के बीच का यह रिश्ता बेहद गहरा और आत्मीय है, जिसके चलते असल जिंदगी में ये दोनों एक-दूसरे के बेहद खास रिश्तेदार माने जाते हैं। पर्दे पर एक-दूसरे के विपरीत भूमिकाओं में नजर आने वाले इन दोनों उम्दा कलाकारों के बीच जीजा और साली का एक मजबूत पारिवारिक पवित्र रिश्ता है, जिसकी जड़ें रेखा की माता के वैवाहिक जीवन के इतिहास से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। इस पारिवारिक जुड़ाव की पेचीदगियों को समझने के लिए रेखा की माता पुष्पावली के जीवन चक्र को जानना बेहद आवश्यक है। अपने दौर की प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय अभिनेत्री पुष्पावली ने चालीस और पचास के दशक में कई फिल्मों में काम कर अपने बच्चों का भरण-पोषण किया था। वर्ष 1940 में आई. वी. रंगाचारी से विवाह के बाद वर्ष 1946 में उनका अलगाव हो गया, जिसके बाद उनकी नजदीकियां तमिल सिनेमा के दिग्गज अभिनेता जेमिनी गणेशन के साथ बढ़ीं। इस गहरे रिश्ते के चलते रेखा और उनकी बहन राधा का जन्म हुआ, हालांकि जेमिनी गणेशन ने सार्वजनिक तौर पर कभी इस रिश्ते को पूर्ण स्वीकृति नहीं दी। जेमिनी गणेशन से अलग होने के पश्चात पुष्पावली ने अकेले ही अपनी बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी उठाई और इसी संघर्षपूर्ण दौर में उनकी जिंदगी में विख्यात सिनेमेटोग्राफर के. प्रकाश की एंट्री हुई। के. प्रकाश और पुष्पावली के विवाह के बाद उनके घर दो बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें एक बेटा सेशू और एक बेटी धनलक्ष्मी शामिल थीं। रेखा अपनी सभी बहनों और भाई के साथ एक ही छत के नीचे बड़ी हुईं और अपनी सौतेली बहन धनलक्ष्मी के साथ भी उनका बेहद गहरा और अटूट स्नेह रहा है। देशभर के सिनेमा प्रेमियों के लिए यह बेहद दिलचस्प तथ्य है कि रेखा की यही छोटी सौतेली बहन धनलक्ष्मी आगे चलकर मशहूर अभिनेता तेज सप्रू की जीवनसंगिनी बनीं। धनलक्ष्मी और तेज सप्रू के इस विवाह के बाद से ही तकनीकी और पारिवारिक रूप से तेज सप्रू रिश्ते में रेखा के सगे जीजा बन गए। रेखा और तेज सप्रू के इस बेहद करीबी पारिवारिक रिश्ते के बारे में फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों के बीच बहुत ही सीमित लोगों को जानकारी है। इन दोनों कलाकारों ने न केवल पारिवारिक स्तर पर बल्कि पेशेवर मोर्चे पर भी एक-दूसरे का साथ निभाया है और ‘जाल’ तथा ‘इंसाफ का तराजू’ जैसी करीब तीन सुपरहिट फिल्मों में सह-कलाकार के रूप में एक साथ स्क्रीन भी साझा की है। रेखा अपने सभी भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं और आज भी अपनी बहनों के बेहद करीब मानी जाती हैं, जहां उनकी सगी बहन राधा विवाह के बाद अमेरिका में बस चुकी हैं, वहीं सौतेली बहन धनलक्ष्मी और जीजा तेज सप्रू के साथ उन्हें अक्सर पारिवारिक समारोहों में बेहद आत्मीयता के साथ वक्त बिताते हुए देखा जाता है।
बिहार में बंगले पर सियासत तेज, तेज प्रताप ने नीतीश कुमार को भी नोटिस देने की उठाई मांग

नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर घमासान मचा हुआ है। राज्य सरकार द्वारा 10 सर्कुलर रोड स्थित बंगला खाली करने का नोटिस दिए जाने के बाद राष्ट्रीय जनता दल और सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इसी विवाद के बीच राबड़ी देवी के बड़े बेटे और जन जन पार्टी के प्रमुख तेज प्रताप यादव ने भी सरकार पर तीखा हमला बोला है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी निशाने पर लिया है। तेज प्रताप यादव ने साफ कहा कि यदि सरकार पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से सरकारी आवास खाली करवाना चाहती है तो यही नियम पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी लागू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार भी पूर्व मुख्यमंत्री हैं और उन्हें भी सरकारी आवास खाली करने का नोटिस मिलना चाहिए। तेज प्रताप ने तंज कसते हुए कहा कि सबसे पहले नीतीश कुमार अपना आवास छोड़ दें, उसके बाद राबड़ी देवी भी बंगला खाली कर देंगी। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि सरकार ने राबड़ी देवी को 15 दिनों के भीतर बंगला खाली करने का निर्देश दिया है तो उन्होंने जवाब दिया कि सरकार को समान नियम अपनाने चाहिए और इसी तरह का नोटिस नीतीश कुमार को भी जारी करना चाहिए। तेज प्रताप का यह बयान ऐसे समय आया है जब बंगला विवाद बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। इससे पहले राबड़ी देवी की बेटी और राजद नेता रोहिणी आचार्या भी इस मामले में सरकार के खिलाफ खुलकर सामने आ चुकी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर सरकार पर प्रतिशोध की राजनीति करने का आरोप लगाया। रोहिणी ने कहा कि यदि सरकार में हिम्मत है तो वह जबरन बंगला खाली करवाकर दिखाए। उनके अनुसार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और सरकार अपनी प्रशासनिक विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए ऐसे कदम उठा रही है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने 27 मई को एक आदेश जारी कर 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास डेयरी एवं मत्स्य पालन मंत्री नंद किशोर राम को आवंटित कर दिया। इसके साथ ही राबड़ी देवी को आवास खाली करने के निर्देश दिए गए। यह वही बंगला है जिसमें राबड़ी देवी पिछले करीब दो दशकों से रह रही हैं। इस पूरे घटनाक्रम पर राबड़ी देवी ने भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह बंगला खाली नहीं करेंगी। उनका कहना है कि सरकार चाहे जितना दबाव बनाए लेकिन उन्हें जबरन हटाना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार यदि चाहती है तो बलपूर्वक कार्रवाई करके दिखाए। बंगला विवाद अब केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है बल्कि यह बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक तरफ सरकार नियमों का हवाला दे रही है तो दूसरी ओर राजद इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है तथा विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है।