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केरल से शुरू हुआ ट्रेंड, तमिलनाडु-महाराष्ट्र तक फैला AI मंत्रालय का मॉडल, क्या बदल जाएगा भारत में?

नई दिल्ली । भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर सरकारी स्तर पर एक नया मॉडल उभरता दिखाई दे रहा है, जहां कुछ राज्य इसे केवल तकनीकी क्षेत्र नहीं बल्कि आर्थिक विकास और प्रशासनिक भविष्य की रणनीति का प्रमुख हिस्सा मानते हुए अलग जिम्मेदारी या मंत्री स्तर पर ढांचा तैयार कर रहे हैं। इस बदलाव ने नीति निर्माण के स्तर पर तकनीक की भूमिका को और अधिक केंद्रीय बना दिया है। इस पहल की शुरुआत केरल से मानी जा रही है, जहां कैबिनेट स्तर पर AI से जुड़ी जिम्मेदारियों को अलग पहचान दी गई। राज्य सरकार ने वरिष्ठ नेता को उद्योग, आईटी और AI समेत कई तकनीकी विभागों का प्रभार सौंपा है। इस निर्णय को इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि AI अब केवल तकनीकी नवाचार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक और प्रशासनिक विकास की रणनीति का हिस्सा बन चुका है। केरल के बाद तमिलनाडु ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाया है और AI, आईटी तथा डिजिटल सेवाओं के लिए अलग जिम्मेदारी तय की गई है। राज्य में AI आधारित प्रशासन, कौशल विकास और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है। स्वास्थ्य, कृषि और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में AI के उपयोग को विस्तार देने की भी योजना है, जिससे सेवाओं की दक्षता और गुणवत्ता बढ़ाई जा सके। तमिलनाडु सरकार ने पहले ही अपने विजन डॉक्यूमेंट में AI आधारित विश्वविद्यालय और तकनीकी शहर विकसित करने की बात कही थी, जिसे अब धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि राज्य AI को दीर्घकालिक विकास मॉडल के रूप में देख रहा है और इसके लिए संस्थागत ढांचा तैयार किया जा रहा है। वहीं कर्नाटक ने इस मॉडल से अलग दृष्टिकोण अपनाया है। राज्य का मानना है कि AI के लिए अलग मंत्रालय बनाने की बजाय तकनीक-आधारित एकीकृत ढांचा अधिक व्यावहारिक है। वहां पहले से ही AI-ML सेल और जिम्मेदार AI समिति जैसे संस्थागत ढांचे सक्रिय हैं, जो तकनीकी विकास और उसके नैतिक उपयोग पर निगरानी रखते हैं। कर्नाटक का जोर इस बात पर है कि तकनीक लगातार बदलती रहती है, इसलिए प्रशासनिक ढांचे को भी लचीला होना चाहिए। महाराष्ट्र ने भी AI को लेकर व्यापक नीति और विभागीय विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। राज्य में इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी और AI विभाग को एक साथ जोड़कर नई संरचना तैयार की जा रही है। इसके तहत AI इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार सृजन और कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। राज्य में AI नवाचार शहर और उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की योजना भी शामिल है, जिससे स्टार्टअप और शोध को बढ़ावा मिल सके। विशेषज्ञों के बीच इस बात पर मतभेद है कि क्या AI के लिए अलग मंत्री या मंत्रालय वास्तव में आवश्यक है या यह केवल प्रतीकात्मक कदम है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल संरचना बनाने से बदलाव नहीं आता, इसके लिए बजट, शोध और स्पष्ट नीतियों की जरूरत होती है। वहीं कुछ का मानना है कि तकनीक की जटिलता को देखते हुए विशेषज्ञ नेतृत्व जरूरी है ताकि सही दिशा में नीति निर्माण हो सके। राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार AI को लेकर कई योजनाओं पर काम कर रही है और इसे डिजिटल भविष्य का अहम हिस्सा मान रही है। साथ ही वैश्विक स्तर पर भी कई देश पहले से ही AI प्रशासन के लिए विशेष पद और संस्थाएं बना चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में AI शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है।

नया साइबर स्कैम: BSNL यूजर्स को KYC सस्पेंड का डर दिखाकर ठगने की कोशिश, PIB ने नोटिस को बताया पूरी तरह फर्जी

नई दिल्ली । देशभर में BSNL उपभोक्ताओं को निशाना बनाकर एक नया साइबर फ्रॉड सामने आया है, जिसमें KYC अपडेट के नाम पर फर्जी नोटिस भेजकर लोगों को डराने की कोशिश की जा रही है। इस नोटिस में दावा किया जा रहा है कि यूजर की सिम KYC सस्पेंड कर दी गई है और अगले 24 घंटे में सिम ब्लॉक हो सकती है। इसमें BSNL और टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) के लोगो का भी इस्तेमाल किया गया है, ताकि इसे असली दिखाया जा सके। सरकारी एजेंसियों की फैक्ट चेक यूनिट ने इस पूरे मामले पर स्पष्ट किया है कि यह नोटिस पूरी तरह फर्जी है और BSNL की ओर से ऐसा कोई संदेश जारी नहीं किया जाता है। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी अनजान संदेश, ईमेल या कॉल पर भरोसा न करें और न ही उसमें दिए गए नंबर या लिंक पर संपर्क करें। यह फर्जी नोटिस इस तरह तैयार किया गया है कि इसमें उपभोक्ता को तुरंत कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया जाए। इसमें लिखा होता है कि KYC न होने पर सिम सेवाएं बंद कर दी जाएंगी। साइबर ठग इसी डर का फायदा उठाकर लोगों को कॉल करने या लिंक पर क्लिक करने के लिए मजबूर करते हैं। जैसे ही कोई व्यक्ति दिए गए संपर्क माध्यम से जुड़ता है, उससे बैंक डिटेल्स, OTP और अन्य संवेदनशील जानकारी मांग ली जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के स्कैम में सबसे बड़ा हथियार डर और जल्दबाजी होता है। ठग समय सीमा का दबाव बनाकर यूजर को सोचने का मौका नहीं देते। कई मामलों में लोग बिना जांच किए जानकारी साझा कर देते हैं, जिससे उनके बैंक खातों से रकम चोरी होने का खतरा बढ़ जाता है। PIB फैक्ट चेक ने भी अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि BSNL या किसी भी सरकारी दूरसंचार संस्था द्वारा इस तरह के KYC सस्पेंशन नोटिस नहीं भेजे जाते। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी स्थिति में उपयोगकर्ताओं को अपनी निजी जानकारी, बैंक डिटेल या OTP किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में डिजिटल फ्रॉड के मामलों में तेजी आई है और इसमें टेलीकॉम कंपनियों के नाम का दुरुपयोग आम हो गया है। ऐसे में उपयोगकर्ताओं को सतर्क रहने और केवल आधिकारिक माध्यमों से ही जानकारी की पुष्टि करने की सलाह दी जा रही है। सरकारी एजेंसियों ने यह भी कहा है कि यदि किसी उपभोक्ता को ऐसा कोई संदेश मिलता है तो उसे तुरंत रिपोर्ट करना चाहिए और संदेश में दिए गए किसी भी लिंक पर क्लिक नहीं करना चाहिए। साथ ही मोबाइल और एप्लिकेशन को समय-समय पर अपडेट रखना भी साइबर सुरक्षा के लिए जरूरी बताया गया है। डिजिटल भुगतान और मोबाइल सेवाओं के बढ़ते उपयोग के बीच इस तरह के फर्जीवाड़े लोगों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। ऐसे में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव उपाय माना जा रहा है।

भारतीय नौसेना को मिलेगा बड़ा ताकतवर बेड़ा, ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस 8 नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट प्रोजेक्ट को 40,000 करोड़ की मंजूरी का इंतजार

नई दिल्ली । भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता को नई दिशा देने वाला नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट (NGC) प्रोजेक्ट अंतिम मंजूरी के चरण में पहुंच गया है। करीब 40,000 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की मंजूरी मिलना बाकी है। मंजूरी के बाद नौसेना को आठ आधुनिक युद्धपोतों का बेड़ा मिलेगा, जो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और सैन्य उपस्थिति को और मजबूत करेंगे। इस परियोजना के तहत दो प्रमुख सरकारी शिपबिल्डिंग कंपनियों को निर्माण कार्य सौंपे जाने की संभावना है। इनमें Garden Reach Shipbuilders & Engineers (GRSE) को पांच कॉर्वेट और Goa Shipyard Limited (GSL) को तीन युद्धपोत बनाने का दायित्व मिल सकता है। यह कदम देश में स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता को भी मजबूती देगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को आगे बढ़ाएगा। लगभग 3,500 टन विस्थापन वाले ये कॉर्वेट आधुनिक युद्ध तकनीक से लैस होंगे। इन्हें “डिस्ट्रिब्यूटेड लेथैलिटी” अवधारणा के आधार पर डिजाइन किया जा रहा है, जिससे छोटे आकार के बावजूद ये युद्धपोत लंबी दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम होंगे। इनकी अधिकतम गति लगभग 32 नॉट्स होगी और ये बिना किसी बाहरी सहायता के लगभग 30 दिनों तक समुद्र में तैनात रह सकेंगे। इन युद्धपोतों की सबसे बड़ी ताकत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें होंगी। प्रत्येक कॉर्वेट पर आठ एक्सटेंडेड-रेंज ब्रह्मोस मिसाइलें लगाई जाएंगी, जो दुश्मन के ठिकानों पर लंबी दूरी तक सटीक वार करने में सक्षम हैं। इसके साथ ही वर्टिकल लॉन्च सिस्टम आधारित शॉर्ट-रेंज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भी सुरक्षा कवच प्रदान करेंगी। निकट दूरी के खतरों को निष्क्रिय करने के लिए AK-630 क्लोज-इन वेपन सिस्टम भी शामिल होगा। पनडुब्बी रोधी क्षमताओं को मजबूत बनाने के लिए इन जहाजों में हल-माउंटेड सोनार, टोव्ड ऐरे सोनार और टॉरपीडो लॉन्चर लगाए जाएंगे। इससे समुद्र के भीतर छिपे दुश्मन पनडुब्बियों की पहचान और उन पर हमला करना आसान होगा। साथ ही हेलीकॉप्टर संचालन की सुविधा भी दी जाएगी, जिससे निगरानी और मिशन क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। इन कॉर्वेट्स में आधुनिक सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम भी होंगे, जिनमें AESA रडार, इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट सिस्टम और उन्नत ट्रैकिंग तकनीक शामिल है। ये सिस्टम युद्ध के दौरान दुश्मन के रडार और मिसाइल हमलों का मुकाबला करने में अहम भूमिका निभाएंगे। यदि योजना समय पर आगे बढ़ती है, तो 2026 में CCS की मंजूरी के बाद निर्माण अनुबंध पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। 2027 में निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है और पहला युद्धपोत 2028-29 तक लॉन्च किया जा सकता है। पूरी परियोजना 2036 तक चरणबद्ध तरीके से पूरी होने का अनुमान है। इस परियोजना के पूरा होने पर भारत की समुद्री सुरक्षा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। हिंद महासागर क्षेत्र में देश की रणनीतिक स्थिति और निगरानी क्षमता पहले से कहीं अधिक मजबूत हो जाएगी, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

अदालतों में AI के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, ड्राफ्ट रेगुलेशन जारी, 20 जून तक आम जनता से सुझाव आमंत्रित

नई दिल्ली । न्यायिक प्रणाली में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में AI के औपचारिक उपयोग को लेकर “रेगुलेशन्स फॉर यूज ऑफ एआई इन कोर्ट 2026” का ड्राफ्ट जारी किया है और इस पर सभी हितधारकों तथा आम जनता से 20 जून 2026 तक सुझाव मांगे हैं। इस ड्राफ्ट का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के उपयोग को संतुलित और नियंत्रित ढंग से लागू करना है, ताकि आधुनिक तकनीक का लाभ भी मिले और न्यायिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता तथा मानवीय निर्णय की प्रधानता भी बनी रहे। प्रस्तावित ढांचे में यह स्पष्ट किया गया है कि AI सिस्टम केवल सहायक उपकरण के रूप में काम करेंगे और किसी भी स्थिति में न्यायाधीशों का स्थान नहीं लेंगे। ड्राफ्ट में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल न्यायाधीशों के पास रहेगा। AI को किसी भी तरह से सजा सुनाने, कानूनी निष्कर्ष निकालने या मानवीय विवेक की जगह निर्णय देने की अनुमति नहीं होगी। इसका उपयोग केवल सहायता, विश्लेषण और प्रक्रियागत दक्षता बढ़ाने तक सीमित रहेगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा कर रहे हैं, में जस्टिस संजीव सचदेवा, जस्टिस राजा विजयराघवन वी., जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सूरज गोविंदराज शामिल हैं। इस समिति ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद यह ड्राफ्ट तैयार किया है और अब इसे अंतिम रूप देने से पहले व्यापक जनसुझाव की प्रक्रिया शुरू की गई है। ड्राफ्ट में यह भी कहा गया है कि न्यायिक प्रणाली में उपयोग होने वाले सभी AI सिस्टम को इस प्रकार डिजाइन और लागू किया जाएगा कि वे निष्पक्षता को बढ़ावा दें और किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकें। इसमें नस्ल, धर्म, जाति, लिंग, भाषा, आर्थिक स्थिति या किसी भी संवैधानिक रूप से प्रतिबंधित आधार पर भेदभाव को रोकने पर विशेष जोर दिया गया है। साथ ही, महिलाओं, बच्चों, दिव्यांग व्यक्तियों, अल्पसंख्यक समुदायों और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है। यह सुनिश्चित करने की बात कही गई है कि AI आधारित किसी भी प्रणाली से इन समूहों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। प्रस्तावित ढांचे में डेटा सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही को भी प्रमुख स्तंभों के रूप में शामिल किया गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक AI सिस्टम को उच्चतम सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा ताकि संवेदनशील न्यायिक डेटा सुरक्षित रह सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारतीय न्याय प्रणाली में तकनीक के उपयोग को एक नए स्तर पर ले जा सकती है। हालांकि इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक का उपयोग मानव न्यायिक विवेक को प्रभावित न करे और न्याय की मूल भावना सुरक्षित रहे। आने वाले दिनों में प्राप्त सुझावों के आधार पर ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा और फिर इसे न्यायालयों में AI के नियंत्रित उपयोग के लिए लागू किया जा सकता है। यह कदम न्यायिक प्रणाली में तकनीकी सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा रहा है।

डिजिटल यूजर्स के लिए बड़ी राहत, BSNL का 399 रुपये वाला फाइबर प्लान पहले साल में भारी फायदे के साथ उपलब्ध

नई दिल्ली । सरकारी टेलीकॉम कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) ने अपने ब्रॉडबैंड यूजर्स के लिए एक नया और किफायती ऑफर पेश किया है, जो खासतौर पर डिजिटल कनेक्टिविटी को सस्ता और आसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। BSNL के ‘Spark’ पोर्टफोलियो के तहत लॉन्च किया गया यह फाइबर-टू-द-होम (FTTH) प्लान शुरुआती 12 महीनों के लिए केवल 399 रुपये प्रति माह की दर पर उपलब्ध है। कंपनी का दावा है कि इस प्लान में हाई-स्पीड इंटरनेट और पर्याप्त डेटा के साथ उपयोगकर्ताओं को बेहतर अनुभव मिलेगा। इस नए प्लान के तहत ग्राहकों को 50 Mbps तक की इंटरनेट स्पीड दी जा रही है, जो घरेलू और प्रोफेशनल दोनों तरह के उपयोग के लिए उपयुक्त मानी जा रही है। साथ ही इसमें कुल 3300 GB हाई-स्पीड डेटा उपलब्ध कराया जा रहा है, जो सामान्य ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ताओं के लिए काफी बड़ी मात्रा है। डेटा लिमिट खत्म होने के बाद इंटरनेट स्पीड 4 Mbps तक सीमित हो जाती है, जिससे बेसिक कनेक्टिविटी जारी रहती है। BSNL ने इस प्लान में अनलिमिटेड वॉइस कॉलिंग की सुविधा भी शामिल की है, जिससे यूजर्स किसी भी नेटवर्क पर बिना अतिरिक्त शुल्क के कॉल कर सकते हैं। इसके साथ ही कंपनी अपने ग्राहकों को BSNL Secure Pro जैसी डिजिटल सुरक्षा सेवाएं भी उपलब्ध करा रही है, जिससे ऑनलाइन उपयोग को और सुरक्षित बनाने पर जोर दिया गया है। यह पैकेज खासतौर पर उन उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जो घर से काम करते हैं, ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीमिंग का उपयोग करते हैं। हालांकि यह ऑफर शुरुआती एक साल तक ही 399 रुपये प्रति माह की दर पर उपलब्ध है। 12 महीने पूरे होने के बाद, यानी 13वें महीने से इस प्लान की कीमत बढ़कर 499 रुपये प्रति माह हो जाएगी। इसके बावजूद शुरुआती अवधि में यह प्लान बाजार में मौजूद कई निजी कंपनियों के मुकाबले अधिक किफायती विकल्प माना जा रहा है। कनेक्शन बुक करने के लिए कंपनी ने डिजिटल माध्यमों को भी आसान बनाया है। ग्राहक BSNL की WhatsApp सेवा के जरिए 1800 4444 नंबर पर ‘Hi’ संदेश भेजकर कनेक्शन के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह प्रक्रिया नए उपभोक्ताओं के लिए सरल और तेज मानी जा रही है। डिजिटल इंडिया अभियान और बढ़ती इंटरनेट जरूरतों के बीच BSNL का यह कदम ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में किफायती इंटरनेट उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्लान से ब्रॉडबैंड उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ सकती है और डिजिटल सेवाओं की पहुंच और व्यापक हो सकती है। कुल मिलाकर यह नया BSNL Spark FTTH प्लान उन उपभोक्ताओं के लिए आकर्षक विकल्प बनकर सामने आया है, जो कम कीमत में अधिक डेटा, स्थिर स्पीड और अनलिमिटेड कॉलिंग जैसी सुविधाओं की तलाश में हैं।

महिला वकीलों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ा रोडमैप, CJI सूर्यकांत ने 50% प्रतिनिधित्व की वकालत कर दिया स्पष्ट संदेश

नई दिल्ली । भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि इस दिशा में एक मजबूत और दीर्घकालिक संस्थागत व्यवस्था तैयार की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल प्रवेश स्तर पर अवसर उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि महिलाएं अपने पूरे पेशेवर जीवन में आगे बढ़ सकें और नेतृत्वकारी भूमिकाओं तक पहुंच सकें। लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी पेशे में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि न्यायिक और कानूनी संस्थाओं में संतुलित भागीदारी समय की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए अवसरों का विस्तार करने के उद्देश्य से विभिन्न स्तरों पर कई पहलें शुरू की गई हैं और भविष्य में भी इस दिशा में प्रयास जारी रहेंगे। कार्यक्रम के दौरान उनसे यह सवाल पूछा गया कि बड़ी संख्या में छात्राएं कानून की पढ़ाई तो करती हैं, लेकिन करियर के मध्य चरण तक पहुंचते-पहुंचते अनेक महिलाएं इस पेशे से बाहर हो जाती हैं। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह एक वास्तविक समस्या है और इसे केवल नीतिगत घोषणाओं से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए संस्थागत समर्थन, समान अवसर और पेशेवर विकास के अनुकूल वातावरण तैयार करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि पहले भी उन्होंने सुझाव दिया था कि सरकारी पैनलों में लॉ ऑफिसर के पदों पर महिलाओं की नियुक्तियों का अनुपात 50 प्रतिशत तक बढ़ाया जाना चाहिए। उनका मानना है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की पर्याप्त मौजूदगी न केवल प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है बल्कि न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित और समावेशी भी बनाती है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि बार काउंसिल, जिला बार एसोसिएशन और अन्य बार संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। उनका उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जिसमें महिला वकीलों को नेतृत्व के अवसर भी मिल सकें। उन्होंने संकेत दिया कि संस्थागत सुधारों के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी को स्थायी रूप से मजबूत करने की योजना पर कार्य जारी है। महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मुद्दे के अलावा मुख्य न्यायाधीश ने भारत की न्यायिक व्यवस्था के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत को अपने संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक वास्तविकताओं, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप एक स्वदेशी न्यायशास्त्र विकसित करना चाहिए। उनके अनुसार, भारतीय अदालतों को ऐसे कानूनी सिद्धांतों और व्याख्याओं को बढ़ावा देना चाहिए जो देश की विशिष्ट आवश्यकताओं और सामाजिक संदर्भों को प्रतिबिंबित करें। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीकी बदलावों के दौर में न्यायपालिका को आत्मनिर्भर दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसी सोच के तहत भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तंत्र विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। उनका मानना है कि भविष्य की न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की भूमिका बढ़ेगी, इसलिए भारत को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप स्वतंत्र और विश्वसनीय डिजिटल ढांचा तैयार करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश के इन विचारों को न्यायपालिका में लैंगिक समानता, संस्थागत सुधार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। उनका संदेश स्पष्ट था कि न्याय व्यवस्था को अधिक समावेशी, प्रतिनिधिक और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाने के लिए व्यापक स्तर पर सुधारों की आवश्यकता है, जिन पर लगातार कार्य किया जा रहा है।

ऑटो उद्योग की बड़ी चिंता: विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से घट रहा DVA, कंपनियों ने PLI नियमों में संशोधन का सुझाव दिया

नई दिल्ली । वाहन क्षेत्र की उत्पादन-से-जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत मिलने वाले लाभ पर विदेशी मुद्रा विनिमय दरों के उतार-चढ़ाव का असर पड़ने लगा है। इसी को देखते हुए देश की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों ने केंद्र सरकार से घरेलू मूल्य संवर्धन (Domestic Value Addition-DVA) की गणना के लिए एक निश्चित विनिमय दर लागू करने की मांग की है। उद्योग का कहना है कि रुपये में आई हालिया कमजोरी के कारण कई मॉडलों का स्थानीयकरण स्तर वास्तविक स्थिति से कम दिखाई दे रहा है, जिससे वे प्रोत्साहन योजना की पात्रता के दायरे से बाहर हो सकते हैं। 25,938 करोड़ रुपये की ऑटो पीएलआई योजना का उद्देश्य देश में उन्नत ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट निर्माण को बढ़ावा देना है। योजना के तहत किसी पात्र वाहन मॉडल में आयातित पुर्जों और सामग्रियों की हिस्सेदारी निर्धारित सीमा के भीतर रहनी चाहिए। इसके लिए घरेलू मूल्य संवर्धन का एक न्यूनतम स्तर अनिवार्य किया गया है, ताकि स्थानीय विनिर्माण और सप्लाई चेन को प्रोत्साहन मिल सके। उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, DVA की गणना वाहन की एक्स-फैक्ट्री कीमत और उसमें इस्तेमाल आयातित सामग्री की लागत के आधार पर की जाती है। चूंकि आयातित पुर्जों की कीमत विदेशी मुद्राओं में तय होती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने पर उनकी लागत स्वतः बढ़ जाती है। इससे कागजों पर आयातित हिस्सेदारी अधिक और घरेलू मूल्य संवर्धन कम दिखाई देने लगता है, जबकि वास्तविक उत्पादन प्रक्रिया और स्थानीयकरण स्तर में कोई बदलाव नहीं होता। हाल ही में भारी उद्योग मंत्रालय और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) के साथ हुई बैठक में वाहन उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उनका तर्क था कि विनिमय दरों में बदलाव एक बाहरी आर्थिक कारक है, जिस पर वाहन निर्माताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में केवल मुद्रा विनिमय के प्रभाव के कारण कंपनियों की पात्रता प्रभावित होना उचित नहीं माना जा सकता। उद्योग का कहना है कि बीते एक वर्ष के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इससे आयातित पुर्जों की लागत बढ़ गई है और कई मॉडलों के DVA प्रतिशत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कंपनियों का मानना है कि यदि DVA की गणना के लिए एक पूर्व-निर्धारित या स्थिर विनिमय दर को आधार बनाया जाए, तो स्थानीयकरण का वास्तविक स्तर अधिक सटीक रूप से सामने आएगा और योजना का उद्देश्य भी बेहतर तरीके से पूरा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटो उद्योग में वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण योगदान है। कई अत्याधुनिक कंपोनेंट अभी भी विदेशों से आयात किए जाते हैं। ऐसे में मुद्रा विनिमय दरों में तेज बदलाव कंपनियों की लागत संरचना और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इस कारण उद्योग लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग करता रहा है जो विनिमय दरों के अस्थायी उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हो। ऑटो पीएलआई योजना के तहत पात्रता और लाभ निर्धारण में ARAI की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संस्था विभिन्न वाहन मॉडलों के स्थानीयकरण स्तर और अन्य तकनीकी मानकों का सत्यापन करती है। अब उद्योग की मांग पर सरकार और संबंधित एजेंसियां किस प्रकार विचार करती हैं, इस पर वाहन निर्माताओं की नजर बनी हुई है। यदि इस संबंध में कोई नीति संशोधन किया जाता है, तो इससे कई कंपनियों को राहत मिल सकती है और योजना के तहत निवेश तथा उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

Sebi की सख्त कार्रवाई के बाद Rajesh Exports पर संकट गहराया, PLI योजना से बाहर होने की आशंका से शेयरों में भारी बिकवाली

नई दिल्ली । राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में लगातार गिरावट का दौर जारी है और निवेशकों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। सप्ताह के पहले कारोबारी दिन कंपनी का शेयर पांच प्रतिशत के लोअर सर्किट के साथ बंद हुआ। पिछले तीन सत्रों के दौरान शेयर में करीब 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाजार में बढ़ती बेचैनी की मुख्य वजह कंपनी को एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी स्टोरेज से जुड़ी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआई योजना से बाहर किए जाने की आशंका है। सूत्रों के अनुसार, भारी उद्योग मंत्रालय कंपनी की पात्रता की समीक्षा कर रहा है। मंत्रालय के स्तर पर इस बात पर विचार किया जा रहा है कि क्या राजेश एक्सपोर्ट्स को योजना के लाभार्थियों की सूची में बनाए रखा जाए या नहीं। यदि कंपनी को योजना से बाहर किया जाता है, तो इसका असर उसके बैटरी कारोबार और भविष्य की विस्तार योजनाओं पर पड़ सकता है। यही कारण है कि निवेशक इस पूरे घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए हैं। कंपनी से जुड़ी चिंताएं उस समय और बढ़ गईं जब बाजार नियामक ने हाल ही में एक अंतरिम आदेश जारी किया। नियामकीय कार्रवाई में कंपनी पर वित्तीय आंकड़ों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ सहायक कंपनियों के माध्यम से कई वर्षों के दौरान राजस्व को वास्तविक स्थिति से अधिक दिखाया गया। इसके अलावा संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन में पारदर्शिता की कमी और आवश्यक खुलासों से जुड़े मुद्दों की भी जांच की जा रही है। मामले का संबंध कंपनी के लिथियम-आयन बैटरी कारोबार से जुड़ी इकाइयों से भी जोड़ा जा रहा है। यही कारण है कि बैटरी निर्माण क्षेत्र में कंपनी की भूमिका और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं के लिए उसकी पात्रता को लेकर नए सवाल खड़े हुए हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में गंभीर अनियमितताएं सामने आती हैं तो इसका प्रभाव केवल शेयर प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कंपनी की कारोबारी साख पर भी असर पड़ सकता है। नियामकीय कार्रवाई के तहत कंपनी के चेयरमैन और प्रमोटर के खिलाफ भी प्रतिबंधात्मक कदम उठाए गए हैं। उन्हें अगले आदेश तक कंपनी के शेयरों में खरीद-बिक्री करने से रोका गया है। साथ ही कंपनी के खातों की दोबारा फॉरेंसिक जांच कराने का निर्देश भी दिया गया है। इस फैसले ने निवेशकों के बीच अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। हालांकि कंपनी ने सभी आरोपों को खारिज किया है। प्रबंधन का कहना है कि वह जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग कर रहा है और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। कंपनी का तर्क है कि केवल राजस्व बढ़ाकर दिखाने से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता, विशेष रूप से तब जब उससे लाभप्रदता में कोई अतिरिक्त फायदा न हो। कंपनी ने भरोसा जताया है कि जांच पूरी होने के बाद वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। फिलहाल बाजार की नजर दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर टिकी हुई है। पहला, नियामकीय जांच की आगे की दिशा और उसके निष्कर्ष क्या रहते हैं। दूसरा, भारी उद्योग मंत्रालय पीएलआई योजना में कंपनी की पात्रता को लेकर क्या निर्णय लेता है। इन दोनों मामलों का असर आने वाले समय में कंपनी के शेयर मूल्य, निवेशकों के विश्वास और बैटरी कारोबार की संभावनाओं पर पड़ सकता है। शेयर बाजार में मौजूदा उतार-चढ़ाव यह संकेत दे रहा है कि निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। जब तक जांच और सरकारी समीक्षा प्रक्रिया पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक कंपनी के शेयरों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

बाइक, कार, ट्रैक्टर और EV की बढ़ती मांग से ऑटो सेक्टर में उछाल, मई में रिटेल बिक्री 9.55 फीसदी बढ़ी

नई दिल्ली । देश के ऑटोमोबाइल बाजार ने मई 2026 में नई ऊंचाई हासिल करते हुए रिटेल बिक्री का रिकॉर्ड बनाया है। महंगाई, ईंधन कीमतों में उतार-चढ़ाव और भीषण गर्मी जैसी चुनौतियों के बावजूद वाहन खरीदारी की मजबूत मांग देखने को मिली। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ग्राहकों की सक्रिय भागीदारी ने ऑटो सेक्टर को मजबूती प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप कुल रिटेल बिक्री 25 लाख यूनिट के आंकड़े को पार कर गई। ऑटो डीलर नेटवर्क से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में देशभर में कुल 25.31 लाख से अधिक वाहनों की रिटेल बिक्री दर्ज की गई। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 9.55 फीसदी अधिक रही। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि उपभोक्ता मांग में निरंतर सुधार, विवाह सीजन का प्रभाव और बेहतर वित्तपोषण विकल्पों ने बिक्री को गति दी है। मई का महीना आमतौर पर ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए अपेक्षाकृत धीमा माना जाता है, लेकिन इस बार स्थिति अलग रही। दोपहिया वाहनों, यात्री वाहनों, तीन-पहिया वाहनों और ट्रैक्टरों की बिक्री में उल्लेखनीय मजबूती देखने को मिली। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने और कृषि क्षेत्र से जुड़ी सकारात्मक उम्मीदों ने वाहन खरीदारी को प्रोत्साहन दिया। दोपहिया वाहन खंड ने बिक्री में सबसे बड़ा योगदान दिया। मई के दौरान 18 लाख से अधिक बाइक और स्कूटरों की बिक्री हुई। विशेषज्ञों के अनुसार, कम ईंधन खर्च वाले वाहनों और इलेक्ट्रिक विकल्पों की बढ़ती लोकप्रियता ने इस श्रेणी को मजबूत आधार दिया। ईंधन की बढ़ती लागत के बीच उपभोक्ता अब अधिक किफायती और टिकाऊ विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। यात्री वाहन श्रेणी में भी शानदार प्रदर्शन देखने को मिला। कारों और एसयूवी की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। नए मॉडल लॉन्च, बेहतर फीचर्स और इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रति बढ़ती रुचि ने ग्राहकों को आकर्षित किया। उद्योग जगत का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आय और उपभोक्ताओं का भरोसा इस वृद्धि के पीछे प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग में भी लगातार तेजी बनी हुई है। खासकर इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ग्राहकों की ओर से ईंधन बचाने वाले और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों के प्रति बढ़ती रुचि स्पष्ट दिखाई दे रही है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी भारतीय ऑटो बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। कॉमर्शियल वाहन और तीन-पहिया वाहन खंड में भी सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई। माल ढुलाई, छोटे व्यवसायों और शहरी परिवहन गतिविधियों में बढ़ोतरी का असर इन श्रेणियों की बिक्री पर दिखाई दिया। वहीं ट्रैक्टरों की मांग ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत दिया है, जो आगामी कृषि सीजन के प्रति किसानों के सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। उद्योग से जुड़े डीलरों का मानना है कि जून में भी मांग बनी रह सकती है। मानसून की प्रगति, ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी प्रवाह और खरीफ सीजन की तैयारियां बाजार को अतिरिक्त समर्थन दे सकती हैं। हालांकि गर्मी, ईंधन कीमतों में संभावित बदलाव और वैश्विक परिस्थितियों से जुड़े लागत दबाव अभी भी चुनौतियां बने हुए हैं। ऑटो उद्योग के जानकारों का कहना है कि मई के आंकड़े भारतीय बाजार की मजबूत उपभोक्ता क्षमता को दर्शाते हैं। यदि मानसून सामान्य रहता है और आर्थिक गतिविधियां इसी तरह जारी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में भी ऑटोमोबाइल क्षेत्र की विकास गति बरकरार रहने की संभावना है।

2019 और 2024 की नाकामी के बाद फिर विपक्षी एकजुटता की कवायद, बिखरे इंडिया गठबंधन को नई दिशा देने में जुटीं ममता बनर्जी

नई दिल्ली । देश की राजनीति में विपक्षी एकजुटता की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजनीति के सामने प्रभावी चुनौती खड़ी करने के उद्देश्य से विभिन्न विपक्षी दल नए सिरे से साझा मंच तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी में दिल्ली में आयोजित बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें कई प्रमुख विपक्षी दलों के नेता एक साथ रणनीति पर विचार कर रहे हैं। इस पूरी कवायद में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की भूमिका विशेष रूप से चर्चा में है। पिछले एक दशक में विपक्षी दलों ने कई बार एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा बनाने का प्रयास किया है। वर्ष 2019 के आम चुनाव से पहले विपक्षी दलों के बीच तालमेल स्थापित करने की कोशिश हुई थी, जबकि 2024 के चुनावों से पहले भी विभिन्न दलों ने साझा रणनीति पर काम किया। हालांकि इन प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित राजनीतिक सफलता नहीं मिल सकी और भाजपा सत्ता में बनी रही। अब एक बार फिर विपक्षी दलों के बीच संवाद और समन्वय की प्रक्रिया शुरू होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहती हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में बदले हालात और पार्टी के भीतर उभरती चुनौतियों के बीच उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता बढ़ाना भी एक राजनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि वे विपक्षी दलों के बीच संवाद स्थापित करने और साझा रणनीति बनाने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रही हैं। दिल्ली में आयोजित विपक्षी दलों की बैठक को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस बैठक में कांग्रेस सहित कई क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिन राजनीतिक दलों के साथ अतीत में मतभेद प्रमुखता से सामने आते रहे, अब उनके साथ सहयोग और समन्वय की संभावनाओं पर भी चर्चा हो रही है। यह बदलाव विपक्षी राजनीति की बदलती प्राथमिकताओं को भी दर्शाता है। ममता बनर्जी पहले ऐसे राजनीतिक मंच की पक्षधर रही हैं जिसमें कांग्रेस की भूमिका सीमित रहे, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उनका रुख अपेक्षाकृत व्यावहारिक दिखाई दे रहा है। विपक्षी दलों के बीच व्यापक सहयोग के लिए अब कांग्रेस की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि विभिन्न विचारधाराओं और क्षेत्रीय हितों वाले दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश की जा रही है। विपक्षी खेमे के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल एकजुटता प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि साझा राजनीतिक एजेंडा तैयार करना भी है। पिछले अनुभव बताते हैं कि केवल चुनावी गठबंधन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मतदाताओं के सामने स्पष्ट दृष्टिकोण और समन्वित रणनीति भी आवश्यक होती है। ऐसे में दिल्ली की यह बैठक भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि विपक्षी दलों की यह नई पहल केवल राजनीतिक संवाद तक सीमित रहती है या फिर यह एक व्यापक और संगठित राजनीतिक अभियान का रूप लेती है। फिलहाल इतना तय है कि राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष फिर से अपनी सामूहिक ताकत को संगठित करने की कोशिश में जुटा हुआ है और ममता banerjee इस प्रक्रिया के प्रमुख चेहरों में शामिल दिखाई दे रही हैं।