25,938 करोड़ रुपये की ऑटो पीएलआई योजना का उद्देश्य देश में उन्नत ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट निर्माण को बढ़ावा देना है। योजना के तहत किसी पात्र वाहन मॉडल में आयातित पुर्जों और सामग्रियों की हिस्सेदारी निर्धारित सीमा के भीतर रहनी चाहिए। इसके लिए घरेलू मूल्य संवर्धन का एक न्यूनतम स्तर अनिवार्य किया गया है, ताकि स्थानीय विनिर्माण और सप्लाई चेन को प्रोत्साहन मिल सके।
उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, DVA की गणना वाहन की एक्स-फैक्ट्री कीमत और उसमें इस्तेमाल आयातित सामग्री की लागत के आधार पर की जाती है। चूंकि आयातित पुर्जों की कीमत विदेशी मुद्राओं में तय होती है, इसलिए रुपये के कमजोर होने पर उनकी लागत स्वतः बढ़ जाती है। इससे कागजों पर आयातित हिस्सेदारी अधिक और घरेलू मूल्य संवर्धन कम दिखाई देने लगता है, जबकि वास्तविक उत्पादन प्रक्रिया और स्थानीयकरण स्तर में कोई बदलाव नहीं होता।
हाल ही में भारी उद्योग मंत्रालय और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) के साथ हुई बैठक में वाहन उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उनका तर्क था कि विनिमय दरों में बदलाव एक बाहरी आर्थिक कारक है, जिस पर वाहन निर्माताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में केवल मुद्रा विनिमय के प्रभाव के कारण कंपनियों की पात्रता प्रभावित होना उचित नहीं माना जा सकता।
उद्योग का कहना है कि बीते एक वर्ष के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इससे आयातित पुर्जों की लागत बढ़ गई है और कई मॉडलों के DVA प्रतिशत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। कंपनियों का मानना है कि यदि DVA की गणना के लिए एक पूर्व-निर्धारित या स्थिर विनिमय दर को आधार बनाया जाए, तो स्थानीयकरण का वास्तविक स्तर अधिक सटीक रूप से सामने आएगा और योजना का उद्देश्य भी बेहतर तरीके से पूरा होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटो उद्योग में वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण योगदान है। कई अत्याधुनिक कंपोनेंट अभी भी विदेशों से आयात किए जाते हैं। ऐसे में मुद्रा विनिमय दरों में तेज बदलाव कंपनियों की लागत संरचना और सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इस कारण उद्योग लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग करता रहा है जो विनिमय दरों के अस्थायी उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हो।
ऑटो पीएलआई योजना के तहत पात्रता और लाभ निर्धारण में ARAI की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संस्था विभिन्न वाहन मॉडलों के स्थानीयकरण स्तर और अन्य तकनीकी मानकों का सत्यापन करती है। अब उद्योग की मांग पर सरकार और संबंधित एजेंसियां किस प्रकार विचार करती हैं, इस पर वाहन निर्माताओं की नजर बनी हुई है। यदि इस संबंध में कोई नीति संशोधन किया जाता है, तो इससे कई कंपनियों को राहत मिल सकती है और योजना के तहत निवेश तथा उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।