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आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान

नई दिल्ली । भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में व्यापक बदलाव और तेज प्रगति का साक्षी बना है। स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार और नीतिगत सुधारों के बल पर देश ने न केवल अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत किया है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह वृद्धि देश की रक्षा निर्माण क्षमता और वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है। रक्षा क्षेत्र में यह बदलाव आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर लागू की गई विभिन्न नीतियों का परिणाम माना जा रहा है। पिछले वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। रक्षा खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप रक्षा निर्माण से जुड़ी गतिविधियों में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला। आज भारत के रक्षा उत्पादों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है। यह स्थिति उस समय से बिल्कुल अलग है जब देश मुख्य रूप से रक्षा आयात पर निर्भर माना जाता था। अब स्वदेशी रूप से विकसित सैन्य उपकरण, हथियार प्रणालियां और रक्षा तकनीकें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत की तकनीकी क्षमता और उत्पादन गुणवत्ता में बढ़ते विश्वास का संकेत है। रक्षा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ने से नई तकनीकों के विकास को गति मिली है। अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों, निगरानी तकनीकों और आधुनिक सैन्य उपकरणों के निर्माण में अनुसंधान की भूमिका लगातार बढ़ी है। इसी कारण देश की रक्षा आवश्यकताओं को स्वदेशी स्तर पर पूरा करने की क्षमता मजबूत हुई है। रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि ने भी इस परिवर्तन को गति प्रदान की है। पिछले दशक में रक्षा क्षेत्र के लिए वित्तीय आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है, जिससे सैन्य आधुनिकीकरण, अनुसंधान परियोजनाओं और उत्पादन क्षमताओं को मजबूती मिली है। रक्षा उत्पादन का कुल मूल्य भी कई गुना बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है। इससे रक्षा उद्योग से जुड़े हजारों उद्यमों और रोजगार अवसरों को भी लाभ मिला है। सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का एक हिस्सा निजी क्षेत्र और नवाचार आधारित संस्थाओं के लिए खोला गया है। इससे नई तकनीकों के विकास और रक्षा क्षेत्र में उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला है। विशेषज्ञ इसे रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं। इसके साथ ही परीक्षण और अनुसंधान सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाकर निजी कंपनियों को भी रक्षा तकनीकों के विकास में सहयोग प्रदान किया गया है। इससे रक्षा उत्पादन का दायरा केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है। इस मॉडल ने देश में रक्षा निर्माण क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा निर्यात में हुई तेज वृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखती है। इससे भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, सामरिक साझेदारियां और रक्षा कूटनीति को मजबूती मिली है। आने वाले वर्षों में स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और उत्पादन पर आधारित यह मॉडल भारत को वैश्विक रक्षा उद्योग के प्रमुख देशों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उज्जैन में महामंडलेश्वर ज्ञानदास की कार पर हमला: देर रात चार युवकों ने किया पथराव, संत ने जताई सुरक्षा को लेकर चिंता

मध्य प्रदेश । धार्मिक नगरी उज्जैन में मंगलवार और बुधवार की दरमियानी रात एक चिंताजनक घटना सामने आई, जब श्री पंच निर्मोही अणि अखाड़े के महामंडलेश्वर ज्ञानदास महाराज की कार पर अज्ञात युवकों ने पथराव कर दिया। घटना में महामंडलेश्वर सुरक्षित रहे, लेकिन उनकी स्कॉर्पियो वाहन के कांच क्षतिग्रस्त हो गए। घटना के बाद क्षेत्र में चर्चा का माहौल है और पुलिस मामले की जांच में जुट गई है। जानकारी के अनुसार महामंडलेश्वर ज्ञानदास महाराज देवास से अपने सदावल रोड स्थित आश्रम लौट रहे थे। रात करीब साढ़े बारह बजे जब उनका वाहन हनुमानगढ़ी क्षेत्र के पास पहुंचा, तभी कुछ अज्ञात युवकों ने उनकी कार को रोकने का प्रयास किया। बताया जा रहा है कि वाहन चालक ने सुरक्षा कारणों से कार नहीं रोकी और आगे बढ़ने का प्रयास किया। इसी दौरान युवकों ने कार पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। अचानक हुए इस हमले से वाहन के सामने के कांच टूट गए और कार को नुकसान पहुंचा। हालांकि सौभाग्य से महामंडलेश्वर ज्ञानदास महाराज और वाहन में मौजूद अन्य लोगों को कोई शारीरिक चोट नहीं पहुंची। घटना के तुरंत बाद महामंडलेश्वर सीधे महाकाल थाने पहुंचे और पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस को दी। महामंडलेश्वर ज्ञानदास महाराज ने घटना पर गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है और इस प्रकार की घटनाएं संत समाज की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने कहा कि यदि इस तरह की घटनाएं लगातार होती रहीं तो उन्हें उज्जैन छोड़कर किसी अन्य तीर्थस्थल पर जाने या फिर कठोर आध्यात्मिक निर्णय लेने के लिए विवश होना पड़ सकता है। उनके इस बयान ने संत समाज और अनुयायियों के बीच भी चिंता पैदा कर दी है। महामंडलेश्वर के अनुसार हमला करने वाले चार युवक थे। पहले उन्होंने वाहन को रुकवाने का प्रयास किया और जब वाहन नहीं रुका तो पथराव शुरू कर दिया। रात का समय और अंधेरा होने के कारण हमलावरों की स्पष्ट पहचान नहीं हो सकी। यही वजह है कि फिलहाल पुलिस अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच कर रही है। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस सक्रिय हुई और आसपास के क्षेत्रों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालना शुरू कर दिया। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि हमलावरों की पहचान करने और घटना के पीछे की वजह जानने के लिए सभी संभावित पहलुओं की जांच की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि हमला पूर्व नियोजित था या फिर किसी अन्य कारण से यह घटना हुई। उज्जैन जैसे प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र में संतों की सुरक्षा को लेकर यह घटना कई सवाल खड़े कर रही है। संत समाज और स्थानीय लोगों का मानना है कि दोषियों की शीघ्र पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और धार्मिक वातावरण प्रभावित न हो। फिलहाल पुलिस जांच जारी है और सीसीटीवी फुटेज सहित अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है।

कूटनीति के बीच दिखी दोस्ताना गर्मजोशी, G7 सम्मेलन में मोदी-मेलोनी की मुलाकात और ‘मेलोडी’ चर्चा ने खींचा दुनिया का ध्यान

नई दिल्ली । फ्रांस के एवियन शहर में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकात एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बन गई। जहां सम्मेलन में दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ, वहीं दोनों नेताओं के बीच हुई दोस्ताना बातचीत ने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। सम्मेलन के दौरान समूह फोटो सत्र के लिए जब विभिन्न देशों के नेता एकत्र हुए, तब प्रधानमंत्री मोदी और जॉर्जिया मेलोनी ने एक-दूसरे का गर्मजोशी से अभिवादन किया। दोनों नेताओं के बीच बातचीत कुछ ही क्षणों की रही, लेकिन उसके बाद सामने आए वीडियो ने इंटरनेट पर नई चर्चा शुरू कर दी। मुलाकात के दौरान मेलोनी ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि उनसे दोबारा मिलकर खुशी हुई। इसके बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि दोनों इंस्टाग्राम पर सबसे प्रसिद्ध ‘कपल’ हैं। इस टिप्पणी पर दोनों नेताओं के बीच हल्का-फुल्का संवाद देखने को मिला, जिसने उपस्थित लोगों का भी ध्यान खींचा। पिछले कुछ वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी और मेलोनी की सार्वजनिक मुलाकातों ने सोशल मीडिया पर विशेष लोकप्रियता हासिल की है। दोनों नेताओं के नामों को मिलाकर बनाया गया शब्द ‘मेलोडी’ इंटरनेट पर एक चर्चित ट्रेंड बन चुका है। यह शब्द राजनीतिक संवाद से आगे बढ़कर सोशल मीडिया संस्कृति का हिस्सा बन गया है और दुनियाभर के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बीच व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। इस ट्रेंड की शुरुआत वर्ष 2023 में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन के दौरान हुई थी। उस समय जॉर्जिया मेलोनी ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक तस्वीर साझा करते हुए एक विशेष हैशटैग का उपयोग किया था। देखते ही देखते यह पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंची और सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसके बाद ‘मेलोडी’ शब्द लगातार विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर चर्चा का विषय बना रहा। दोनों नेताओं के बीच दिखाई देने वाली सहजता और मित्रवत व्यवहार को भारत और इटली के मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी के क्षेत्रों में लगातार प्रगति हुई है। ऐसे में दोनों नेताओं की व्यक्तिगत समझ और संवाद को भी इन संबंधों को मजबूती देने वाला तत्व माना जाता है। ‘मेलोडी’ की लोकप्रियता केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही। रोम यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने मेलोनी को लोकप्रिय भारतीय टॉफी ‘मेलोडी’ उपहार स्वरूप भेंट की थी। इस अवसर का वीडियो भी इंटरनेट पर व्यापक रूप से साझा किया गया था। वीडियो में दोनों नेताओं के बीच हुई हल्की-फुल्की बातचीत और हंसी-मजाक को लोगों ने काफी पसंद किया था। यह वीडियो कुछ ही घंटों में करोड़ों दर्शकों तक पहुंच गया और लंबे समय तक ऑनलाइन ट्रेंड करता रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक कूटनीति में सार्वजनिक छवि और डिजिटल संवाद की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे क्षण न केवल नेताओं को आम लोगों से जोड़ते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मानवीय और सहज रूप में प्रस्तुत करने का अवसर भी देते हैं। G7 सम्मेलन में सामने आया यह नया वीडियो इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण माना जा रहा है। फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी और जॉर्जिया मेलोनी की यह मुलाकात एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बनी हुई है। कूटनीतिक कार्यक्रमों के बीच दोनों नेताओं की सहज बातचीत ने यह दिखाया कि वैश्विक राजनीति के मंच पर भी व्यक्तिगत संवाद और सौहार्दपूर्ण संबंध लोगों का ध्यान आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।

महाकाल मंदिर में मुस्लिम युवक से मारपीट: आधार कार्ड देखने के बाद हुआ विवाद, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

मध्य प्रदेश । विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे एक युवक के साथ हुई मारपीट की घटना ने उज्जैन में चर्चा का विषय बना दिया है। घटना उस समय हुई जब युवक मंदिर की चलित भस्मारती में शामिल होने के लिए कतार में खड़ा था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कुछ लोग युवक से बहस करते और उसके साथ मारपीट करते दिखाई दे रहे हैं। घटना के बाद पुलिस ने तत्काल हस्तक्षेप कर युवक को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और पूरे मामले की जानकारी जुटानी शुरू की। पुलिस के अनुसार, महाराष्ट्र के पुणे जिले के पिंपरी क्षेत्र का रहने वाला 26 वर्षीय सरफराज शेख एक हिंदू युवती के साथ महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन करने आया था। दोनों देर रात मंदिर पहुंचे और चलित भस्मारती में शामिल होने के लिए श्रद्धालुओं की कतार में लग गए। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक युवक ने माथे पर चंदन का त्रिपुंड लगाया हुआ था और ‘महाकाल’ भी लिखा हुआ था, जिससे वह सामान्य श्रद्धालुओं की तरह दिखाई दे रहा था। बताया जा रहा है कि कतार में खड़े कुछ लोगों को युवक पर संदेह हुआ। इसके बाद उसकी पहचान जानने के लिए आधार कार्ड देखा गया। आधार कार्ड में उसका नाम और पहचान सामने आने के बाद वहां मौजूद कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। इसी दौरान विवाद बढ़ गया और स्थिति तनावपूर्ण हो गई। देखते ही देखते कुछ लोगों ने युवक के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट शुरू कर दी। घटना के दौरान युवक अपनी बात रखने और खुद को छोड़ने की गुहार लगाता रहा, लेकिन माहौल लगातार गर्माता गया। आसपास मौजूद लोगों में भी अफरा-तफरी का माहौल बन गया। इस पूरे घटनाक्रम को वहां मौजूद कुछ लोगों ने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया। बाद में यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया, जिसके बाद मामला सार्वजनिक चर्चा में आ गया। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और युवक को सुरक्षित बाहर निकाला। पुलिस अधिकारियों ने युवक और उसके साथ आई युवती से पूछताछ की। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार दोनों दर्शन करने के उद्देश्य से उज्जैन आए थे। पुलिस ने किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए दोनों के परिजनों को भी उज्जैन बुलाया है। महाकाल थाना पुलिस का कहना है कि फिलहाल किसी भी पक्ष की ओर से लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। हालांकि वायरल वीडियो और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पूरे मामले की जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि यदि कोई शिकायत प्राप्त होती है तो कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। यह घटना एक बार फिर धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था, पहचान को लेकर उत्पन्न होने वाले विवादों और सोशल मीडिया के प्रभाव पर चर्चा का कारण बनी है। प्रशासन का प्रयास है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाए और किसी भी प्रकार की कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न न होने दी जाए। फिलहाल पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच कर रही है और संबंधित लोगों से जानकारी जुटाई जा रही है।

सुरक्षा घटाने के फैसले पर गरमाई सियासत, लालू यादव ने कहा- सब कुछ नीतीश कुमार ने ही करवाया

नई दिल्ली । बिहार की राजनीति में एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की सियासत को नया मुद्दा दे दिया है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने नजर आ रहे हैं। बुधवार को लालू प्रसाद यादव ने अपनी और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सुरक्षा वापस लिए जाने के मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भूमिका रही है। लालू यादव के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है और अब सभी की निगाहें सत्ताधारी दल की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को विशेष सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध थी। सुरक्षा में बदलाव के फैसले के बाद दोनों नेताओं ने उन्हें उपलब्ध कराई गई नई सुरक्षा व्यवस्था स्वीकार करने के बजाय वापस करने का निर्णय लिया। इसके साथ ही परिवार के अन्य प्रमुख सदस्यों ने भी सुरक्षा वापस कर दी। इस फैसले ने मामले को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले ऐसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते जा रहे हैं। सुरक्षा व्यवस्था जैसे प्रशासनिक निर्णयों को भी राजनीतिक दृष्टि से देखा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित है, जबकि सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि सुरक्षा प्रोटोकॉल निर्धारित नियमों और समीक्षा प्रक्रिया के आधार पर तय किए जाते हैं। इस बीच पूर्व मंत्री और जनशक्ति जनता दल के नेता तेज प्रताप यादव ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है कि यदि भविष्य में उनके साथ किसी प्रकार की अप्रिय घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी। उनके इस बयान ने विवाद को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। विपक्षी दल इस मामले को जनता के बीच प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाने की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं। आरजेडी लगातार इस फैसले का विरोध कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह केवल सुरक्षा का मामला नहीं बल्कि राजनीतिक सम्मान और गरिमा से जुड़ा विषय है। पार्टी का आरोप है कि राज्य के वरिष्ठ नेताओं के साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया है, वह उचित नहीं माना जा सकता। आरजेडी नेताओं ने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग भी उठाई है। वहीं दूसरी ओर सरकार से जुड़े नेताओं का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था का निर्धारण निर्धारित मानकों और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है। उनके अनुसार इसमें किसी प्रकार की राजनीतिक भावना या पक्षपात की गुंजाइश नहीं होती। हालांकि विपक्ष इन दलीलों से संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है और लगातार सरकार पर सवाल उठा रहा है। फिलहाल सुरक्षा व्यवस्था का यह मुद्दा बिहार की राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आने वाले दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस विषय पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। साथ ही यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस विवाद पर आगे क्या रुख अपनाती हैं तथा राजनीतिक दल इसे किस तरह जनता के बीच लेकर जाते हैं।

आवास योजना में मकान दिलाने का झांसा, युवक से 5.60 लाख की ठगी: खुद को वकील बताने वाले आरोपी पर केस दर्ज

मध्य प्रदेश । इंदौर में सरकारी आवास योजना के नाम पर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आजाद नगर थाना क्षेत्र में रहने वाले एक युवक ने आरोप लगाया है कि खुद को वकील बताने वाले व्यक्ति ने उसकी मां के नाम पर आवास योजना में मकान दिलाने का झांसा देकर 5 लाख 60 हजार रुपए हड़प लिए। शिकायत के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के अनुसार रामनगर मुसाखेड़ी निवासी कपिल उईके ने नीलगिरी परिसर दूधिया निवासी दीपक शर्मा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। कपिल का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान उसकी पहचान दीपक शर्मा से हुई थी। उस समय दीपक ने स्वयं को पेशे से वकील बताया था और जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता देने का भरोसा दिलाया था। इसी परिचय का फायदा उठाकर उसने परिवार का विश्वास जीत लिया। कपिल के मुताबिक जून 2026 में दीपक शर्मा ने उसकी मां अवंतीबाई के नाम पर सरकारी आवास योजना का लाभ दिलाने की बात कही। आरोपी उन्हें जिला न्यायालय परिसर स्थित कैंटीन में ले गया, जहां एक महिला के माध्यम से आवेदन फार्म भरवाया गया। इसके बाद कुछ राशि भी जमा कराई गई। अगले दिन आरोपी ने अवंतीबाई के मोबाइल में 311 ऐप डाउनलोड कर यह विश्वास दिलाया कि आवास योजना से जुड़ी सारी जानकारी और अपडेट इसी माध्यम से प्राप्त होंगे। कुछ दिनों बाद आरोपी ने दावा किया कि आवंटित होने वाला मकान किसी अन्य व्यक्ति को अधिक कीमत पर बेचा जा सकता है। उसने पूरे सौदे की प्रक्रिया कलेक्टर कार्यालय में पूरी कराने की बात कही। 10 जून को कथित खरीदार पक्ष और पीड़ित परिवार को कलेक्टर कार्यालय बुलाया गया, जहां लगभग 9 लाख 60 हजार रुपए में सौदा तय हुआ। आरोप है कि खरीदार पक्ष ने उसी समय 5 लाख 60 हजार रुपए नकद दिए, जबकि शेष राशि खाते में जमा कराने की बात कही गई। पीड़ित परिवार का कहना है कि यहीं से ठगी का खेल शुरू हुआ। आरोपी दीपक शर्मा उसी शाम उनके घर पहुंचा और रकम गिनने के बहाने नकदी अपने कब्जे में ले ली। अगले दिन वह एक महिला के साथ दोबारा घर आया और नगर निगम द्वारा सत्यापन किए जाने की बात कहकर परिवार को भ्रमित करता रहा। बाद में उसने कहा कि अधिकारी आने वाले हैं, इसलिए रकम तैयार रखी जाए। कपिल के अनुसार आरोपी ने चालाकी से पूरी रकम एक बैग में रखवाई और फिर उसे नाश्ता लेने के बहाने घर से बाहर भेज दिया। इसके बाद वह कपिल को नगर निगम कार्यालय ले गया। वहां बैग लेकर अंदर जाने की बात कहकर वह भवन में प्रवेश कर गया, लेकिन फिर वापस नहीं लौटा। काफी देर इंतजार करने के बाद जब कपिल ने उसे तलाशने की कोशिश की तो उसका कोई पता नहीं चला। घर लौटकर जांच करने पर परिवार को एहसास हुआ कि पूरी नकदी गायब हो चुकी है। इसके बाद आरोपी को लगातार फोन किए गए, लेकिन उसने कॉल उठाना बंद कर दिया। खुद को ठगा महसूस करने के बाद कपिल ने वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की और पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। मामले की जांच के बाद आजाद नगर पुलिस ने आरोपी दीपक शर्मा के खिलाफ चोरी और धोखाधड़ी से जुड़े आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज कर ली है। पुलिस अब आरोपी की तलाश कर रही है और यह भी जांच कर रही है कि कहीं उसने इसी तरह अन्य लोगों को भी सरकारी योजनाओं का झांसा देकर ठगी का शिकार तो नहीं बनाया। यह मामला एक बार फिर लोगों को सावधान करता है कि सरकारी योजनाओं से जुड़े किसी भी काम के लिए केवल अधिकृत माध्यमों और अधिकारियों पर ही भरोसा करें।

NEET UG पुनर्परीक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ, CJI सूर्यकांत बोले- मामला पहले से दूसरी बेंच के समक्ष लंबित

नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट यूजी) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्परीक्षा के खिलाफ दायर एक नई याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। याचिका में कहा गया था कि कथित पेपर लीक की घटनाएं कुछ सीमित परीक्षा केंद्रों और व्यक्तियों तक सीमित थीं, इसलिए पूरे देश के लगभग 22 लाख अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। हालांकि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले पर अलग से सुनवाई करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि नीट से जुड़े सभी मामले पहले से एक अन्य पीठ के समक्ष लंबित हैं और यही याचिका भी उसी पीठ के सामने रखी जा सकती है। इस वर्ष 3 मई को आयोजित नीट यूजी परीक्षा के बाद कई राज्यों से पेपर लीक और परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे। इन आरोपों के बाद परीक्षा की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हुए। मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और कानूनी बहस का रूप ले लिया, जिसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और दोबारा परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया। अब पुनर्परीक्षा 21 जून को आयोजित की जानी है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नई याचिका में तर्क दिया गया कि कथित गड़बड़ियां सीमित दायरे में थीं और पूरे देश के छात्रों को पुनर्परीक्षा के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता ने अदालत से पुनर्परीक्षा के फैसले की समीक्षा करने और प्रभावित छात्रों की स्थिति पर विचार करने की मांग की थी। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस विषय से संबंधित सभी मामलों पर न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ पहले से सुनवाई कर रही है। ऐसे में नई याचिका पर अलग से विचार करना उचित नहीं होगा। नीट परीक्षा विवाद को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में पहले से कई याचिकाएं लंबित हैं। इनमें परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ाने, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली की समीक्षा करने और एजेंसी के पुनर्गठन जैसी मांगें भी शामिल हैं। इन मामलों की सुनवाई आने वाले महीनों में जारी रहने की संभावना है और इनके परिणाम भविष्य की परीक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। इस बीच परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग को लेकर दायर एक अन्य याचिका पर भी अदालत पहले अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। 1 जून को दायर याचिका में पेन-पेपर मोड के बजाय कंप्यूटर आधारित परीक्षा प्रणाली लागू करने की मांग की गई थी। अदालत ने उस याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि परीक्षा आयोजन में अब बहुत कम समय बचा है और अंतिम समय में इतनी बड़ी व्यवस्था परिवर्तन करना व्यावहारिक नहीं होगा। न्यायालय ने यह भी माना था कि परीक्षा रद्द होने के बाद दोबारा आयोजन अपने आप में एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। लाखों छात्रों के लिए नए सिरे से परीक्षा आयोजित करना, केंद्रों की व्यवस्था करना और सुरक्षा सुनिश्चित करना पहले ही परीक्षा अधिकारियों के लिए कठिन कार्य है। ऐसे में अतिरिक्त निर्देश या नए बदलाव तैयारियों को प्रभावित कर सकते हैं। देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा मानी जाने वाली नीट यूजी के माध्यम से लाखों छात्र मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्राप्त करते हैं। इसलिए परीक्षा से जुड़े हर निर्णय का सीधा प्रभाव छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। फिलहाल 21 जून को प्रस्तावित पुनर्परीक्षा की तैयारियां जारी हैं, जबकि परीक्षा रद्द करने, पेपर लीक, परीक्षा प्रबंधन और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की भूमिका से जुड़े व्यापक मुद्दों पर संबंधित पीठ जुलाई में आगे सुनवाई करेगी। छात्रों, अभिभावकों और शैक्षणिक संस्थानों की निगाहें अब उसी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित विवाद की आगे की दिशा तय हो सकती है।

इंदौर की महावीर कॉलोनी में पानी का संकट गहराया: दूषित जल से लोग बीमार, नर्मदा लाइन का अब भी इंतजार

मध्य प्रदेश । इंदौर के वार्ड क्रमांक-16 स्थित महावीर नगर में पेयजल संकट और दूषित पानी की समस्या एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। भागीरथपुरा जलकांड की यादें अभी लोगों के जहन से मिट भी नहीं पाई थीं कि अब महावीर नगर के रहवासियों को भी इसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बोरिंग के पानी में सीवरेज मिलने की शिकायत सामने आने के बाद नगर निगम ने सरकारी बोरिंग बंद कर दी है, जिससे पूरे इलाके के लोग टैंकरों के भरोसे रहने को मजबूर हो गए हैं। महावीर नगर और आसपास की कॉलोनियों के लोग वर्षों से नर्मदा जलापूर्ति योजना का इंतजार कर रहे हैं। क्षेत्र में आज तक नर्मदा की पाइपलाइन नहीं पहुंच सकी है, जिसके कारण लोग बोरिंग और टैंकरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। लेकिन अब जब बोरिंग का पानी भी दूषित होने लगा है, तो लोगों की चिंता और बढ़ गई है। रहवासियों का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया। स्थानीय निवासी बसंत राव निकम बताते हैं कि पिछले 35 वर्षों से वे इस क्षेत्र में रह रहे हैं और अक्सर बोरिंग के पानी में गंदगी तथा सीवरेज की समस्या देखने को मिलती है। शिकायत के बाद निगम की टीम चैंबर साफ कर देती है, लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है। उनका कहना है कि वर्षों से यह समस्या बनी हुई है, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। इसी तरह क्षेत्र की अन्य महिलाओं ने भी अपनी परेशानी साझा की। सीमा साखले और ममता मालवीय का कहना है कि वे कई वर्षों से यहां रह रही हैं, लेकिन आज तक नर्मदा जलापूर्ति का लाभ नहीं मिल पाया। ऐसे में उन्हें मजबूरी में बोरिंग का पानी इस्तेमाल करना पड़ता है, जो कई बार दूषित निकलता है। इस बीच एक मासूम बच्ची की तबीयत बिगड़ने के बाद मामला और गंभीर हो गया। बच्ची के पिता नागेश्वर खालोटिया का दावा है कि दूषित पानी के सेवन के कारण उनकी बेटी अविका खालोटिया गंभीर रूप से बीमार हो गई। उसे लगातार दस्त, कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं होने लगीं। इंदौर के अस्पतालों में उपचार के बाद भी जब स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, तो परिवार उसे बेहतर इलाज के लिए अहमदाबाद लेकर गया। चिकित्सकों ने संक्रमण की पुष्टि की और दूषित भोजन या पानी को संभावित कारण बताया। रहवासियों का कहना है कि केवल एक बच्ची ही नहीं, बल्कि कई अन्य लोग भी उल्टी-दस्त और पेट संबंधी बीमारियों से प्रभावित हुए हैं। इससे पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का माहौल बन गया है। लोगों को डर है कि यदि जल्द समाधान नहीं किया गया तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित बोरिंग को बंद कर दिया गया है और नई बोरिंग कराने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। साथ ही अमृत-2 योजना के तहत 30 लाख लीटर क्षमता की पानी की टंकी और नई जलापूर्ति व्यवस्था विकसित करने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार आगामी कुछ महीनों में इस दिशा में काम शुरू हो सकता है, जिससे क्षेत्र की 30 से 40 कॉलोनियों को लाभ मिलेगा। फिलहाल महावीर नगर के लोग स्वच्छ पानी और नर्मदा लाइन के इंतजार में हैं। उनका कहना है कि विकास के दावों के बीच यदि लोगों को आज भी पीने के सुरक्षित पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

PoK में उबाल बरकरार, मौतों और कार्रवाई के बावजूद नहीं थमा आंदोलन; सीमाओं पर राशन ट्रकों की रोक से बढ़ा विवाद

नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में जारी जनआंदोलन लगातार व्यापक रूप लेता दिखाई दे रहा है। क्षेत्र में विभिन्न मांगों को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब नौवें दिन में प्रवेश कर चुका है और हजारों लोग अब भी आंदोलन स्थलों पर डटे हुए हैं। रावलकोट सहित कई इलाकों में प्रदर्शनकारियों की बड़ी मौजूदगी यह संकेत दे रही है कि प्रशासनिक दबाव और सुरक्षा कार्रवाइयों के बावजूद आंदोलन की तीव्रता कम नहीं हुई है। स्थानीय स्तर पर सक्रिय संगठनों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि क्षेत्र में लोगों पर दबाव बनाने के उद्देश्य से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित की जा रही है। उनका दावा है कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों से आटा, चावल, फल, सब्जियां और अन्य खाद्य सामग्री लेकर आने वाले कई ट्रकों को विभिन्न प्रवेश बिंदुओं पर रोका गया है। आरोप है कि इन वाहनों को क्षेत्र के भीतर प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा रही, जिससे स्थानीय आबादी के बीच चिंता बढ़ रही है। बताया जा रहा है कि विभिन्न सीमावर्ती मार्गों पर बड़ी संख्या में मालवाहक वाहन कई दिनों से खड़े हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित रहती है तो इसका असर आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर पड़ सकता है। हालांकि इन आरोपों को लेकर संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्षेत्र में जारी आंदोलन की पृष्ठभूमि पिछले कुछ सप्ताह की घटनाओं से जुड़ी हुई है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आंदोलन से जुड़े कई लोगों के खिलाफ सुरक्षा बलों द्वारा कठोर कार्रवाई की गई, जिसके बाद स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई। विभिन्न स्थानों पर हुई झड़पों और गोलीबारी की घटनाओं को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। इन घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने की खबरों ने पूरे क्षेत्र में असंतोष को और बढ़ा दिया है। रावलकोट में आयोजित मुख्य प्रदर्शन स्थल आंदोलन का केंद्र बना हुआ है। लगातार बारिश और प्रतिकूल मौसम के बावजूद बड़ी संख्या में लोग वहां मौजूद हैं। महिलाओं, युवाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक स्वरूप प्रदान किया है। प्रदर्शनकारी अपने अधिकारों और मांगों को लेकर लगातार नारेबाजी और सभाएं आयोजित कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही आर्थिक, प्रशासनिक और प्रतिनिधित्व संबंधी शिकायतों ने मौजूदा आंदोलन को गति दी है। यदि संवाद और समाधान की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और जटिल हो सकती है। ऐसे आंदोलनों में जनभागीदारी बढ़ने पर प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ जनभावनाओं को समझने की चुनौती भी खड़ी हो जाती है। दूसरी ओर, क्षेत्र की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर बनी हुई है। मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे मुद्दे ऐसे हालात में प्रमुख चर्चा का विषय बन जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी तनावग्रस्त क्षेत्र में स्थायी समाधान के लिए संवाद, पारदर्शिता और नागरिक हितों को प्राथमिकता देना आवश्यक होता है। फिलहाल रावलकोट और आसपास के क्षेत्रों में आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों पर कायम हैं, जबकि प्रशासनिक स्तर पर स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों पक्षों के बीच किसी संवाद प्रक्रिया की शुरुआत होती है या नहीं, क्योंकि वर्तमान परिस्थितियां क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं।

बरगी क्रूज हादसा जांच अंतिम चरण में, इंजन नष्ट करने से लेकर कलेक्टर की भूमिका तक उठे गंभीर सवाल

 मध्य प्रदेश ।  के जबलपुर जिले में स्थित Bargi Dam में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे की न्यायिक जांच अब अंतिम चरण में पहुंच गई है। इस मामले की जांच राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग, जिसकी अध्यक्षता Justice Sanjay Divedi कर रहे हैं, लगातार विभिन्न पक्षों के बयान दर्ज कर रहा है और जल्द ही अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने की तैयारी में है। 30 अप्रैल को हुए इस हादसे में तेज हवाओं के बीच पर्यटक क्रूज अचानक अनियंत्रित होकर पलट गया था, जिसमें चार बच्चों सहित कुल 13 लोगों की मौत हो गई थी। घटना ने न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि राज्य की आपदा प्रबंधन प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। जांच के दौरान शिकायतकर्ताओं ने कई अहम मुद्दे आयोग के सामने रखे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने आरोप लगाया है कि हादसे के बाद क्रूज और उसके इंजन की स्वतंत्र तकनीकी जांच नहीं कराई गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों में विस्तृत फॉरेंसिक जांच की जाती है। उनका कहना है कि क्रूज के क्षतिग्रस्त हिस्सों को हटाने या नष्ट करने की प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में है, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। शिकायतकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि क्रूज के मेंटेनेंस और संचालन से जुड़े दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई। उनके अनुसार, फिटनेस सर्टिफिकेट, सर्विस रिकॉर्ड और तकनीकी निरीक्षण रिपोर्टों की गहन समीक्षा होनी चाहिए थी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि हादसा तकनीकी खराबी के कारण हुआ या प्रशासनिक लापरवाही के चलते। इसके अलावा, आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं ने कहा कि हादसे के समय एंबुलेंस तो पहुंची थी, लेकिन उसमें पर्याप्त मेडिकल स्टाफ या डॉक्टर मौजूद नहीं थे। राहत और बचाव कार्यों में समन्वय की कमी भी सामने आई, जिससे कई लोगों की जान बचाने में देरी हुई। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सामने आया है। शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि तत्कालीन कलेक्टर और आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के बयान भी दर्ज किए जाएं, क्योंकि आपदा प्रबंधन अधिनियम-2005 के तहत उनकी जिम्मेदारी अहम होती है। उनका कहना है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा के बिना जिम्मेदारी तय करना संभव नहीं होगा। आयोग ने अब तक कई प्रत्यक्षदर्शियों और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज कर लिए हैं। साथ ही घटनास्थल का निरीक्षण, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी पूरी की जा चुकी है। आयोग ने संकेत दिया है कि शेष औपचारिकताओं के बाद रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा और इसमें संभावित लापरवाही और जिम्मेदार पक्षों का उल्लेख किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला राज्य में जल पर्यटन और सुरक्षा मानकों को लेकर एक बड़ा उदाहरण बन सकता है। बरगी बांध क्षेत्र में हुई यह घटना प्रशासनिक व्यवस्थाओं और तकनीकी निगरानी प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है, जिन पर भविष्य में सख्त सुधार की आवश्यकता है।