‘दृश्यम 3’ से ‘धुरंधर 2’ तक, इस वीकेंड OTT पर मनोरंजन का डबल डोज, रिलीज हो रही हैं 7 दमदार फिल्में-सीरीज

नई दिल्ली । वीकेंड का इंतजार कर रहे ओटीटी प्रेमियों के लिए इस बार खुशखबरी है। 19 जून को विभिन्न ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर एक से बढ़कर एक फिल्में और वेब सीरीज रिलीज हो रही हैं। इस सप्ताह दर्शकों को सस्पेंस, थ्रिलर, रोमांस, कॉमेडी और एक्शन का भरपूर मिश्रण देखने को मिलेगा। खास बात यह है कि कई बहुप्रतीक्षित प्रोजेक्ट्स भी इसी शुक्रवार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर दस्तक दे रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा ‘दृश्यम 3’ की हो रही है। मोहनलाल स्टारर यह बहुप्रतीक्षित फिल्म पहले ही दर्शकों के बीच उत्सुकता पैदा कर चुकी है। जीतू जोसेफ के निर्देशन में बनी इस फिल्म में जॉर्जकुट्टी की कहानी एक बार फिर नए मोड़ के साथ आगे बढ़ती नजर आएगी। फिल्म मलयालम के साथ अन्य भाषाओं में भी स्ट्रीम हो रही है और इसे इस सप्ताह की सबसे बड़ी ओटीटी रिलीज माना जा रहा है। स्पाई थ्रिलर पसंद करने वाले दर्शकों के लिए ‘धुरंधर 2: द रिवेंज’ एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। रणवीर सिंह अभिनीत यह फिल्म पहले से ही दर्शकों के बीच चर्चा में है। अब इसका इंटरनेशनल ‘अनम्यूटेड वर्जन’ नेटफ्लिक्स पर रिलीज किया जा रहा है, जिसका लंबे समय से इंतजार किया जा रहा था। फिल्म में दमदार एक्शन, रोमांच और रहस्य का भरपूर तड़का देखने को मिलेगा। इमोशनल और रोमांटिक ड्रामा के शौकीनों के लिए ‘ठुकरा के मेरा प्यार’ का दूसरा सीजन भी इसी सप्ताह आ रहा है। पहले सीजन को दर्शकों ने खूब सराहा था और अब नए सीजन में रिश्तों की उलझनें, अधूरी मोहब्बत, बदला और भावनात्मक संघर्ष की कहानी को आगे बढ़ाया जाएगा। सीरीज में कई नए ट्विस्ट और सरप्राइज दर्शकों को बांधे रखने का काम करेंगे। वहीं, अपराध और सस्पेंस से भरपूर ‘अब होगा हिसाब’ भी इस वीकेंड की खास पेशकश है। शाहीर शेख अभिनीत यह सीरीज एक ऐसे शख्स की कहानी है जो अपने लापता भाई की तलाश में मानव तस्करी के बड़े नेटवर्क तक पहुंच जाता है। पंजाब की पृष्ठभूमि पर बनी यह कहानी अपराध, भ्रष्टाचार और न्याय की लड़ाई को दर्शाती है। तेलुगु दर्शकों के बीच लोकप्रिय ‘सेव द टाइगर्स’ का तीसरा सीजन भी 19 जून को रिलीज हो रहा है। कॉमेडी और पारिवारिक ड्रामा से भरपूर यह सीरीज एक बार फिर दर्शकों को हंसाने और गुदगुदाने के लिए तैयार है। मुख्य कलाकारों की तिकड़ी नए मजेदार हालातों में नजर आएगी। इंटरनेशनल कंटेंट पसंद करने वालों के लिए कोरियन ड्रामा ‘हसबैंड्स इन एक्शन’ एक दिलचस्प विकल्प है। यह कहानी दो ऐसे पुरुषों की है जो एक ही महिला से जुड़े हुए हैं और उसके अपहरण के बाद उसे बचाने के लिए मजबूरी में साथ आते हैं। एक्शन, ड्रामा और हास्य का मिश्रण इसे खास बनाता है। इसके अलावा रोमांटिक फिल्मों के शौकीनों के लिए ‘वॉयसमेल्स फॉर इसाबेल’ भी रिलीज हो रही है। यह एक भावनात्मक प्रेम कहानी है जिसमें गलत पते पर पहुंचे वॉयसमेल दो अनजान लोगों को एक-दूसरे के करीब ले आते हैं। फिल्म रिश्तों, यादों और प्रेम की संवेदनशील कहानी को खूबसूरती से प्रस्तुत करती है। कुल मिलाकर यह वीकेंड ओटीटी दर्शकों के लिए मनोरंजन का पूरा पैकेज लेकर आया है। चाहे आपको सस्पेंस पसंद हो, रोमांस, कॉमेडी या फिर एक्शन, इस शुक्रवार हर स्वाद के लिए कुछ न कुछ मौजूद है।
PhonePe Wallet पर नया चार्ज बना चर्चा का विषय, 12 महीने निष्क्रिय रहने पर लग सकती है फीस; UPI यूजर्स में बढ़ी चिंता

नई दिल्ली । देश में डिजिटल भुगतान का दायरा लगातार बढ़ रहा है और करोड़ों लोग रोजमर्रा के लेनदेन के लिए UPI आधारित प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी बीच PhonePe Wallet से जुड़ी एक जानकारी सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गई है। वायरल दावों के अनुसार, यदि कोई उपयोगकर्ता लंबे समय तक अपने PhonePe Wallet का इस्तेमाल नहीं करता है, तो उस पर निष्क्रियता शुल्क लगाया जा सकता है। इस दावे के सामने आने के बाद डिजिटल भुगतान करने वाले कई उपभोक्ताओं के बीच भ्रम और सवाल पैदा हो गए हैं। हाल के दिनों में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ स्क्रीनशॉट साझा किए गए, जिनमें कथित तौर पर यह जानकारी दिखाई गई कि यदि PhonePe Wallet लगातार 12 महीने तक निष्क्रिय रहता है तो उस पर तिमाही आधार पर शुल्क लगाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि यह शुल्क हर तीन महीने में अधिकतम 100 रुपये तक हो सकता है। इस सूचना के वायरल होते ही बड़ी संख्या में यूजर्स ने इसकी वैधता और प्रभाव को लेकर चर्चा शुरू कर दी। दरअसल, कई उपभोक्ता PhonePe का उपयोग केवल UPI ट्रांजैक्शन के लिए करते हैं और उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि ऐप के भीतर एक अलग डिजिटल वॉलेट सुविधा भी उपलब्ध है। PhonePe Wallet एक प्रीपेड डिजिटल वॉलेट है, जिसमें उपयोगकर्ता पहले से धनराशि जोड़कर विभिन्न भुगतान कर सकते हैं। यह बैंक खाते से सीधे होने वाले UPI भुगतान से अलग व्यवस्था पर काम करता है और विशेष रूप से छोटे तथा त्वरित लेनदेन को आसान बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल वॉलेट सेवाओं में निष्क्रिय खातों के रखरखाव को लेकर शुल्क की व्यवस्था नई बात नहीं है। कई वित्तीय और फिनटेक प्लेटफॉर्म लंबे समय तक उपयोग न होने वाले खातों के लिए प्रशासनिक या रखरखाव शुल्क से संबंधित शर्तें रखते हैं। हालांकि किसी भी शुल्क को लागू करने से पहले संबंधित नियम, शर्तें और उपयोगकर्ता को दी जाने वाली सूचना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने यह भी दावा किया है कि यदि वे PhonePe Wallet को बंद करना चाहते हैं तो उन्हें पहले केवाईसी प्रक्रिया पूरी करनी पड़ सकती है। इसी वजह से कुछ उपभोक्ताओं ने इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी भी व्यक्त की है। हालांकि इस विषय पर अंतिम निर्णय और प्रक्रिया संबंधित प्लेटफॉर्म की आधिकारिक शर्तों पर निर्भर करती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह चर्चा केवल PhonePe Wallet से जुड़ी हुई है। सामान्य UPI भुगतान, जिसमें बैंक खाते से सीधे पैसे भेजे या प्राप्त किए जाते हैं, उस पर इस प्रकार के शुल्क का कोई प्रभाव नहीं बताया गया है। यानी जो उपयोगकर्ता केवल UPI के माध्यम से लेनदेन करते हैं और डिजिटल वॉलेट का उपयोग नहीं करते, उनके लिए नियमित भुगतान सेवाएं पहले की तरह जारी रहेंगी। डिजिटल भुगतान के बढ़ते दौर में उपभोक्ताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे किसी भी वित्तीय प्लेटफॉर्म की शर्तों, शुल्क संरचना और सेवा नियमों को समय-समय पर समझते रहें। इससे अनावश्यक शुल्क, भ्रम और संभावित असुविधा से बचा जा सकता है। फिलहाल PhonePe Wallet से जुड़ी इस चर्चा ने डिजिटल भुगतान क्षेत्र में निष्क्रिय खातों और उनसे जुड़े नियमों पर नई बहस को जन्म दे दिया है।
'देऊळ बंद 2' के लिए फरिश्ता बने शाहरुख खान, बढ़े बजट के बीच माफ कर दिया लाखों का बिल

नई दिल्ली । मराठी सिनेमा की चर्चित फिल्म ‘देऊळ बंद 2’ इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन कर रही है। फिल्म ने कमाई के नए रिकॉर्ड बनाते हुए 80 करोड़ रुपये से अधिक का ग्रॉस कलेक्शन हासिल कर लिया है। दर्शकों से मिल रहे जबरदस्त प्यार के बीच अब फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा सामने आया है, जिसमें बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान की दरियादिली की चर्चा हो रही है। फिल्म के निर्देशक और अभिनेता प्रवीण तरडे ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि ‘देऊळ बंद 2’ के निर्माण के दौरान उन्हें आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। खासतौर पर फिल्म की कलर ग्रेडिंग का खर्च उनके अनुमान से कहीं अधिक बढ़ गया था। उन्होंने बताया कि फिल्म की पोस्ट-प्रोडक्शन प्रक्रिया के लिए शाहरुख खान की कंपनी रेड चिलीज एंटरटेनमेंट की सेवाएं ली गई थीं। प्रवीण तरडे के मुताबिक शुरुआत में कलर ग्रेडिंग का बजट लगभग 12 लाख रुपये तय किया गया था, लेकिन फिल्म की शूटिंग और तकनीकी जरूरतों के बढ़ने के साथ यह खर्च बढ़कर करीब 42 लाख रुपये तक पहुंच गया। मराठी फिल्म इंडस्ट्री के लिहाज से यह एक बड़ी राशि थी और निर्माता-निर्देशक के लिए इसे वहन करना आसान नहीं था। उन्होंने बताया कि जब यह जानकारी शाहरुख खान तक पहुंची तो उन्होंने सबसे पहले अपनी टीम से फिल्म के बारे में पूछा। शाहरुख जानना चाहते थे कि फिल्म कैसी बनी है और दर्शकों पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है। टीम ने उन्हें बताया कि फिल्म बेहद अच्छी है और भावनात्मक रूप से लोगों को जोड़ने वाली कहानी पेश करती है। इसके बाद शाहरुख खान ने अपनी टीम से कहा कि अगर फिल्म इतनी अच्छी है तो पैसों को लेकर ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। प्रवीण तरडे के अनुसार, शाहरुख ने मजाकिया लेकिन भावुक अंदाज में कहा, “बिल माफ करो। पिक्चर अच्छी है ना? दे दो। यह मराठी फिल्म है, पैसों की बात बाद में देख लेंगे।” शाहरुख खान के इस कदम ने न केवल फिल्म की टीम का मनोबल बढ़ाया, बल्कि यह भी दिखाया कि वह क्षेत्रीय सिनेमा और अच्छी कहानियों को कितना महत्व देते हैं। यही वजह है कि यह किस्सा सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी शाहरुख खान की खूब सराहना हो रही है। वहीं, ‘देऊळ बंद 2’ की सफलता की बात करें तो फिल्म ने मराठी सिनेमा में नई मिसाल कायम की है। लगभग 10 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन करते हुए 80 करोड़ रुपये से अधिक का ग्रॉस कलेक्शन हासिल कर लिया है। फिल्म में प्रवीण तरडे, महेश मांजरेकर, मोहन जोशी, स्नेहल तरडे, प्रसाद ओक, ओम भुटकर और मंगेश देसाई जैसे कलाकारों ने अहम भूमिकाएं निभाई हैं। यह फिल्म साल 2015 में आई ‘देऊळ बंद’ का सीक्वल है। पहले भाग को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया था और अब दूसरा भाग उससे भी बड़ी सफलता हासिल करता नजर आ रहा है। फिल्म की रिकॉर्डतोड़ कमाई और शाहरुख खान से जुड़ा यह किस्सा दोनों ही इन दिनों चर्चा का विषय बने हुए हैं।
60 की उम्र में मिला सच्चा प्यार: फेसबुक पर हुई मुलाकात, 75 दिनों में शादी कर सुहासिनी मुले ने सबको चौंकाया

नई दिल्ली । बॉलीवुड और फिल्म जगत में अक्सर सितारों की प्रेम कहानियां चर्चा का विषय बनती हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो उम्र, परंपराओं और सामाजिक धारणाओं को पीछे छोड़कर लोगों के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। ऐसी ही एक दिलचस्प और प्रेरणादायक प्रेम कहानी है मशहूर अभिनेत्री सुहासिनी मुले की, जिन्होंने 60 साल की उम्र में शादी कर यह साबित कर दिया कि प्यार और रिश्तों के लिए कोई तय उम्र नहीं होती। ‘लगान’, ‘दिल चाहता है’, ‘जोधा अकबर’ और कई चर्चित फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकीं सुहासिनी मुले इन दिनों अपनी निजी जिंदगी को लेकर फिर चर्चा में हैं। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी अनोखी प्रेम कहानी का जिक्र किया, जिसने एक बार फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सुहासिनी मुले को उनका जीवनसाथी किसी पार्टी, शूटिंग सेट या पारिवारिक परिचय से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के जरिए मिला। दिलचस्प बात यह है कि जिस शख्स से उन्हें प्यार हुआ, वह मनोरंजन जगत से नहीं बल्कि विज्ञान की दुनिया से जुड़े एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे। उनके पति अतुल गुर्टू विश्व प्रसिद्ध भौतिक वैज्ञानिक हैं और उस समय स्विट्जरलैंड में दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक प्रयोग ‘लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर’ (LHC) प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। सुहासिनी ने बताया कि वह अपने एक सहकर्मी की सलाह पर फेसबुक से जुड़ी थीं। एक दिन फेसबुक पर ‘पीपुल यू मे नो’ सेक्शन में उन्हें अतुल गुर्टू की प्रोफाइल दिखाई दी। विज्ञान में रुचि रखने वाली सुहासिनी को यह जानकर हैरानी हुई कि इतने बड़े वैज्ञानिक भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। उत्सुकतावश उन्होंने अतुल को एक संदेश भेजा और LHC के बारे में जानकारी मांगी। यहीं से दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे मैसेज, ईमेल और नियमित संवाद के माध्यम से दोनों एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने लगे। दोस्ती का यह रिश्ता जल्द ही गहरे भावनात्मक जुड़ाव में बदल गया। बातचीत बढ़ने के साथ दोनों को एहसास हुआ कि उनके विचार और जीवन को देखने का नजरिया काफी हद तक मेल खाता है। कुछ समय बाद अतुल गुर्टू ने सुहासिनी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। सुहासिनी भी उन्हें पसंद करने लगी थीं, इसलिए उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के इस रिश्ते के लिए हामी भर दी। इसके बाद घटनाक्रम इतनी तेजी से आगे बढ़ा कि पहली मुलाकात से लेकर शादी तक का सफर केवल 75 दिनों में पूरा हो गया। 16 जनवरी 2011 को दोनों ने आर्य समाज मंदिर में सादगीपूर्ण तरीके से विवाह किया। यह सुहासिनी मुले की पहली शादी थी, जबकि अतुल गुर्टू की यह दूसरी शादी थी। उनकी पहली पत्नी का कैंसर के कारण निधन हो चुका था। एक इंटरव्यू में सुहासिनी ने कहा कि उन्हें जीवन में सही साथी मिलने में समय लगा, लेकिन जब सही इंसान मिला तो उन्होंने बिना देर किए फैसला कर लिया। उनकी यह प्रेम कहानी आज भी इस बात का उदाहरण मानी जाती है कि सच्चा प्यार उम्र का मोहताज नहीं होता और जीवन में खुशियां किसी भी मोड़ पर दस्तक दे सकती हैं।
VILLAGERS RAILWAY LINE DEMAND: ‘रेल नहीं तो वोट नहीं’ भिंड में ग्रामीणों ने ली शपथ, लहार में रेल लाइन लगाने की मांग

VILLAGERS RAILWAY LINE DEMAND: भिंड। जहां एक ओर मध्यप्रदेश को स्मार्ट सिटी बनाने की तैयारी में वहीं दूसरी ओर अभी भी कुछ गांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ऐसा ही एक मामला भिंड के आलमपुर से सामने आया है, जहां ग्रामीणों ने भिंड-लहार-कोंच-उरई रेल लाइन की मांग को लेकर चंबल अंचल समग्र बुंदेलखण्ड विकास जनमंच द्वारा अभियान चलाया है। ‘रेल नहीं तो वोट नहीं’ अभियान अब गति पकड़ने लगा है। इसी कड़ी में गुरुवार को लहार तहसील के खजूरी और बेहटा गांव में महाहस्ताक्षर अभियान चलाया गया। इस दौरान हजारों ग्रामीणों ने अपनी मांग के समर्थन में दस्तखत किए और रेलवे कनेक्टिविटी न मिलने पर आगामी लोकसभा चुनाव में मतदान का बहिष्कार करने की शपथ ली। G7 से लौटते ही अमित शाह से मिले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर, आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी पर हुई अहम चर्चा 1 से 30 जून तक लगातर जारी रहेगा यह अभियान 1 जून से शुरू किया गया है जो 30 जून तक चलाया जायेगा। इसके तहत अब तक लहार नगर समेत केशवगढ़, अजनार, मड़ोरी, नानपुरा, महुआ, दबरेहा और दो दर्जन से अधिक गांवों में पहुंचकर लोगों के हस्ताक्षर करवाया जा चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि वे चंबल और बुंदेलखंड अंचल के समग्र विकास के लिए राजनीति से ऊपर उठकर इस आंदोलन का पूरा समर्थन करेंगे। सीहोर में ग्रामीणों ने पकड़े रेत से भरे ट्रैक्टर, चालक के पास न रॉयल्टी मिली न लाइसेंस राजनीती छोड़ विकास पर फोकस संयोजक गुलाब सिंह राजावत ने बताया कि 30 जून को हस्ताक्षर अभियान पूरा होने के बाद 1 जुलाई को सैकड़ों युवा दिल्ली जाकर सांसद संध्या राय और रेल मंत्री को रेल लाइन की मांग की मनाग को लेकर ज्ञापन सौपेंगे । उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि मुलाकात के सात दिनों के भीतर रेल मंत्रालय ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो क्षेत्र में बड़ा जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।
कांग्रेस मुक्त’ से आगे बढ़ी भाजपा की राजनीति? क्षेत्रीय दलों में बढ़ती बगावत के बीच ‘विपक्ष मुक्त भारत’ की चर्चा तेज

नई दिल्ली । देश की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलावों की आहट सुनाई दे रही है। लंबे समय तक ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे के साथ आगे बढ़ने वाली भारतीय जनता पार्टी को लेकर अब राजनीतिक गलियारों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के भीतर बढ़ती बगावत, नेताओं और सांसदों के अलग गुट बनाने की कोशिशें तथा सत्ता समीकरणों में लगातार हो रहे बदलावों ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या देश की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। हाल के महीनों में पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने विपक्षी दलों की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई क्षेत्रीय दल अपने ही नेताओं और जनप्रतिनिधियों के असंतोष से जूझते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाओं का प्रभाव केवल राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और भविष्य के गठबंधन समीकरणों पर भी पड़ सकता है। सबसे अधिक चर्चा पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर हो रही है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्षी खेमे के भीतर असंतोष की खबरों ने राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कई सांसदों और नेताओं द्वारा अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने की चर्चाओं ने राज्य की राजनीति को नई दिशा देने का संकेत दिया है। हालांकि इन घटनाओं पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी व्याख्या है, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि क्षेत्रीय दलों के सामने संगठनात्मक एकता बनाए रखना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। महाराष्ट्र में भी राजनीतिक अस्थिरता का दौर थमता नजर नहीं आ रहा। शिवसेना के विभिन्न गुटों के बीच जारी खींचतान के बीच कई सांसदों और नेताओं के रुख ने राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना दिया है। पार्टी अनुशासन, व्हिप के पालन और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर उठे सवालों ने राज्य की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले समय में इन घटनाओं का प्रभाव राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर दिखाई दे सकता है। इसी बीच कुछ राजनीतिक वर्ग यह तर्क दे रहे हैं कि विपक्षी दलों के भीतर बढ़ती टूट-फूट और पुनर्संरेखण की प्रक्रिया भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा सकती है। हालांकि भाजपा नेतृत्व लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि उसका कोई ‘विपक्ष मुक्त भारत’ अभियान चल रहा है। पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की अपनी भूमिका होती है और चुनावी सफलता जनता के समर्थन के आधार पर तय होती है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान परिदृश्य केवल दल-बदल या बगावत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, संगठनात्मक असंतोष और बदलते जनादेश जैसे कई कारण काम कर रहे हैं। यही वजह है कि कई राज्यों में पुराने राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल देश की राजनीति ऐसे दौर से गुजर रही है जहां क्षेत्रीय दलों की आंतरिक चुनौतियां राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं। आने वाले महीनों में यदि यह सिलसिला जारी रहता है तो विपक्षी राजनीति के स्वरूप, गठबंधन की रणनीतियों और सत्ता संतुलन पर इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। राजनीतिक दलों की अगली चाल और नेताओं के फैसले इस बहस की दिशा तय करेंगे।
जंग लगे चाकू और ब्लेड के इस्तेमाल पर एफएसएसएआई सख्त, खाद्य कारोबारियों को जारी किए नए निर्देश

नई दिल्ली । देशभर में खाद्य सुरक्षा मानकों को और अधिक मजबूत बनाने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने खाद्य कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि अब खाद्य पदार्थों की तैयारी, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और अन्य संबंधित कार्यों में केवल फूड-ग्रेड तथा जंग-रोधी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जंग लगे, टूटे-फूटे या क्षतिग्रस्त उपकरणों के उपयोग को खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताते हुए इसे तत्काल बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। एफएसएसएआई के अनुसार हाल के दिनों में ऐसी कई रिपोर्टें सामने आई थीं, जिनमें कुछ खाद्य कारोबारी जंग लगे, खराब, टूटे हुए, पेंट किए गए या अनुपयोगी हो चुके कटिंग टूल्स का उपयोग करते पाए गए। इन उपकरणों के इस्तेमाल से खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीव संबंधी दूषण (कंटैमिनेशन) का खतरा बढ़ जाता है, जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। प्राधिकरण ने कहा कि खाद्य व्यवसायों में उपयोग होने वाले सभी उपकरण, बर्तन और खाद्य संपर्क सतहें फूड-ग्रेड, विषमुक्त और जंग-रोधी सामग्री से निर्मित होना अनिवार्य है। यह व्यवस्था न केवल खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। एफएसएसएआई ने अपने निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया है कि सभी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों की नियमित जांच की जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि उनमें जंग, दरार, टूट-फूट, पेंट उखड़ना या किसी प्रकार की क्षति न हो। यदि किसी उपकरण में ऐसी कोई खराबी पाई जाती है, जिससे खाद्य पदार्थ दूषित होने की आशंका हो, तो उसे तुरंत उपयोग से हटाया जाए और उसकी जगह नया उपकरण लगाया जाए। खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत उपकरणों की नियमित सफाई, सैनिटाइजेशन और आवश्यकता पड़ने पर स्टरलाइजेशन भी अनिवार्य बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य उद्योग में स्वच्छ उपकरणों का उपयोग खाद्य जनित बीमारियों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए यह केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। एफएसएसएआई ने यह भी कहा कि यह निर्देश ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (लाइसेंसिंग एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ फूड बिजनेस) रेगुलेशंस, 2011’ के तहत निर्धारित स्वच्छता और हाइजीन मानकों के अनुरूप हैं। इन नियमों का पालन सभी खाद्य कारोबारियों के लिए अनिवार्य है। प्राधिकरण ने कारोबारियों को चेतावनी दी है कि यदि किसी प्रतिष्ठान में जंग लगे या अनुपयुक्त उपकरणों का उपयोग पाया जाता है तो उसके खिलाफ ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006’ के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें जुर्माना सहित अन्य कानूनी प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं। एफएसएसएआई का मानना है कि इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन से खाद्य सुरक्षा के स्तर में सुधार होगा और उपभोक्ताओं को अधिक सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे।
‘एनिमल वाले किरदार से बाहर निकाला’, तृप्ति डिमरी पर बोले रवि किशन – ‘मां-बहन’ फिल्म को लेकर दिया बयान

नई दिल्ली। नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘मां-बहन’ एक बार फिर चर्चा में आ गई है, लेकिन इस बार वजह फिल्म की कहानी नहीं बल्कि अभिनेता रवि किशन का बयान है। फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे रवि किशन ने अपनी को-स्टार तृप्ति डिमरी की खुलकर तारीफ की है और उनके करियर को लेकर एक दिलचस्प टिप्पणी की है। एक इंटरव्यू के दौरान रवि किशन ने कहा कि भगवान का शुक्र है कि तृप्ति डिमरी के जीवन में ‘मां-बहन’ जैसी फिल्म आई, जिसने उन्हें उनके ‘एनिमल’ वाले किरदार की छवि से बाहर निकलने का अवसर दिया। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इस पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। रवि किशन ने आगे कहा कि इस फिल्म ने तृप्ति डिमरी को एक नई पहचान देने में मदद की है। उनके अनुसार, एक कलाकार के लिए यह जरूरी होता है कि वह एक ही तरह के किरदारों में सीमित न रह जाए, बल्कि अलग-अलग भूमिकाओं के जरिए खुद को साबित करे। ‘मां-बहन’ जैसी फिल्में कलाकार को एक अलग दिशा देने का काम करती हैं। गौरतलब है कि तृप्ति डिमरी को 2023 में रिलीज हुई फिल्म ‘एनिमल’ से काफी लोकप्रियता मिली थी। इस फिल्म में उन्होंने ‘जोया’ का किरदार निभाया था, जो कहानी में एक अहम मोड़ लेकर आता है। इस भूमिका के बाद तृप्ति को दर्शकों के बीच बड़ी पहचान मिली और सोशल मीडिया पर उन्हें काफी चर्चा मिली। हालांकि ‘एनिमल’ के बाद तृप्ति के किरदार को लेकर दर्शकों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। कुछ लोगों ने उनके अभिनय की सराहना की, जबकि कुछ ने किरदार को लेकर आलोचना भी की। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता में लगातार इजाफा हुआ और उन्हें एक नई पहचान मिली। अब ‘मां-बहन’ फिल्म में तृप्ति डिमरी, माधुरी दीक्षित और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर धारणा दुर्गा के साथ नजर आ रही हैं। फिल्म की कहानी एक ऐसी मां और उसकी दो बेटियों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनके जीवन में पिता की अनुपस्थिति और समाज की सोच कई तरह की चुनौतियां पैदा करती है। फिल्म में रवि किशन विलेन की भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं। फिल्म को दर्शकों से मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है, जबकि इसकी आईएमडीबी रेटिंग 5.5 बताई जा रही है। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी द्वारा बनाई गई यह फिल्म सामाजिक विषयों को लेकर चर्चा में बनी हुई है। रवि किशन का यह बयान अब फिल्म से आगे बढ़कर इंडस्ट्री में कलाकारों की छवि और टाइपकास्टिंग पर भी बहस छेड़ रहा है।
मंदसौर में मुहर्रम की पारंपरिक चौकी निकली, इमाम हुसैन की शहादत को किया याद

मध्यप्रदेश । मंदसौर शहर में मुहर्रम के पावन अवसर पर बुधवार रात पारंपरिक चौकी श्रद्धा, अनुशासन और अकीदत के साथ निकाली गई। इस धार्मिक आयोजन में हजारों की संख्या में मुस्लिम समाज के लोग शामिल हुए और हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश की। पूरे मार्ग पर धार्मिक वातावरण देखने को मिला, जहां लोगों ने शांति, भाईचारे और इंसानियत के संदेश को आत्मसात किया। इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम विशेष महत्व रखता है। यह महीना कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है, जिसमें हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने सत्य, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनकी शहादत आज भी त्याग, सब्र, साहस और इंसानियत की मिसाल मानी जाती है। इसी संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए मुहर्रम के दौरान विभिन्न धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। मंदसौर में भी वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार ताजियों के आयोजन से पहले चौकी निकाली जाती है। बुधवार रात यह चौकी शेखा चौक क्षेत्र से प्रारंभ हुई। धार्मिक जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरता हुआ बोराबाखल, सम्राट मार्केट और घंटाघर क्षेत्र पहुंचा। देर रात लगभग 12:30 बजे मंडी गेट पर चौकी का समापन हुआ। पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं का उत्साह और अनुशासन देखने लायक था। चौकी के दौरान अखाड़ों द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक करतब लोगों के आकर्षण का मुख्य केंद्र रहे। युवाओं ने अपनी कला, संतुलन और शारीरिक दक्षता का शानदार प्रदर्शन किया। विभिन्न प्रकार के पारंपरिक खेल और युद्धक कलाओं से जुड़े करतबों को देखने के लिए मार्ग के दोनों ओर बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हुए। दर्शकों ने इन प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया। आयोजन को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। पुलिस विभाग के अधिकारी और जवान पूरे मार्ग पर तैनात रहे। प्रशासनिक अधिकारियों ने भी लगातार व्यवस्थाओं की निगरानी की और यातायात सहित अन्य व्यवस्थाओं को सुचारू बनाए रखा। सुरक्षा व्यवस्था के चलते पूरा आयोजन बिना किसी व्यवधान के संपन्न हुआ। मुस्लिम समाज की ओर से भी स्वयंसेवकों की विशेष टीम तैनात की गई थी। इन स्वयंसेवकों ने भीड़ प्रबंधन, श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन और अन्य व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाज के वरिष्ठजनों ने कहा कि मुहर्रम केवल शोक का पर्व नहीं, बल्कि त्याग, सत्य और इंसानियत के मूल्यों को याद करने का अवसर भी है। चौकी के सफल आयोजन के साथ शहर में धार्मिक सौहार्द और भाईचारे का संदेश भी देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने इमाम हुसैन की शिक्षाओं को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया और समाज में शांति, एकता तथा मानवता के मूल्यों को मजबूत करने की अपील की।
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका, दो विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस की पांचवीं सीट की राह आसान

नई दिल्ली । कर्नाटक विधान परिषद की सात सीटों के लिए जारी चुनावी प्रक्रिया के बीच भारतीय जनता पार्टी को एक अप्रत्याशित राजनीतिक झटका लगा है। मतदान के दौरान भाजपा से निष्कासित दो विधायकों द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किए जाने की खबर ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस घटनाक्रम को कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बढ़त और भाजपा के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। विधान परिषद की सात सीटों के लिए हो रहे चुनाव में कुल आठ उम्मीदवार मैदान में हैं। सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा में मौजूद दलों की संख्या के आधार पर कांग्रेस चार और भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती थी। हालांकि सातवीं सीट को लेकर पहले से ही कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। अब क्रॉस वोटिंग की खबरों ने इस मुकाबले को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा उन दो विधायकों को लेकर हो रही है जिन्होंने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। दोनों नेताओं को पहले भाजपा से निष्कासित किया जा चुका है, लेकिन उनके वोटों का असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। मतदान के दौरान उनकी मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत माना है। कर्नाटक में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन के बाद डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला है। ऐसे में विधान परिषद का यह चुनाव उनके नेतृत्व की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। कांग्रेस की कोशिश है कि उपलब्ध संख्या बल के अलावा निर्दलीय और अन्य समर्थन जुटाकर परिषद में अपनी स्थिति और मजबूत बनाई जाए। दूसरी ओर भाजपा इस चुनाव को अपनी संगठनात्मक मजबूती और विपक्षी भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रही है। निर्वाचन प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक उम्मीदवार को जीत सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम 28 वोटों की आवश्यकता है। विधानसभा में कांग्रेस के पास सबसे अधिक विधायक हैं, जबकि भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) भी अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। सातवीं सीट के लिए आवश्यक अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने रही है। ऐसे में क्रॉस वोटिंग की घटना चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर केवल परिषद चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में राज्य की राजनीतिक दिशा और दलों के भीतर अनुशासन संबंधी सवालों को भी प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से भाजपा के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि पार्टी से अलग हो चुके नेताओं का प्रभाव अभी भी कुछ क्षेत्रों में बना हुआ है। चुनाव मैदान में कांग्रेस, भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला जारी है। कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार उतारे हैं जबकि भाजपा के दो और जेडीएस का एक प्रत्याशी मैदान में है। इस कारण अंतिम सीट को लेकर राजनीतिक रणनीतियां लगातार बदलती रही हैं। मतदान समाप्त होने के बाद मतगणना के साथ ही तस्वीर साफ होगी कि क्रॉस वोटिंग का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा। हालांकि मतदान के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक की राजनीति में अंदरूनी खींचतान और राजनीतिक पुनर्संरेखण की प्रक्रिया अभी भी जारी है। विधान परिषद चुनाव के नतीजे न केवल दलों की वर्तमान ताकत को दर्शाएंगे, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीतिक रणनीतियों और गठबंधनों की दिशा भी तय कर सकते हैं। इसी कारण सभी दलों की नजर अब मतगणना और अंतिम परिणामों पर टिकी हुई है।