नए एफटीए से भारत को मिलेगी नई आर्थिक रफ्तार, मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और युवाओं के लिए खुलेंगे वैश्विक अवसर

नई दिल्ली । भारत के नए मुक्त व्यापार समझौते देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग, नवाचार और रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकार का मानना है कि वैश्विक बाजारों तक बढ़ती पहुंच भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करेगी और युवाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करियर के नए रास्ते खोलेगी। इसी उद्देश्य के तहत छात्रों को तकनीकी दक्षता, व्यावहारिक अनुभव और आधुनिक शिक्षा से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने कहा कि भारत तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। नए मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से देश के उद्योगों को नए बाजार मिल रहे हैं, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ-साथ इनोवेशन को भी प्रोत्साहन मिल रहा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में युवाओं के लिए रोजगार, उद्यमिता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अवसर भी बढ़ाएगा। उन्होंने छात्रों से पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक कौशल विकसित करने का आग्रह किया। उनका कहना था कि केवल सैद्धांतिक ज्ञान आज के प्रतिस्पर्धी दौर में पर्याप्त नहीं है। उद्योगों की बदलती जरूरतों के अनुरूप तकनीकी दक्षता, समस्या समाधान की क्षमता और व्यावहारिक अनुभव ही भविष्य की सफलता का आधार बनेंगे। डिजिटल शिक्षा की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की बड़ी संख्या उच्च शिक्षा को अधिक सुलभ और समावेशी बनाने का अवसर प्रदान करती है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब देश के दूरदराज क्षेत्रों तक भी पहुंचाई जा सकती है, जिससे भौगोलिक और आर्थिक असमानताओं को कम करने में मदद मिलेगी। उन्होंने ऑनलाइन द्विभाषी प्रबंधन शिक्षा कार्यक्रम को शिक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल बताया। उनके अनुसार, इस प्रकार के कार्यक्रम ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के बीच मौजूद अवसरों की खाई को कम करेंगे। अब छोटे शहरों और दूरस्थ इलाकों के छात्र भी घर बैठे उच्च गुणवत्ता वाली प्रबंधन शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और राष्ट्रीय स्तर के शैक्षणिक संसाधनों का लाभ उठा पाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध पाठ्यक्रम देश के विभिन्न वर्गों के विद्यार्थियों को समान अवसर प्रदान करेंगे। इससे भाषा संबंधी बाधाएं कम होंगी और अधिक संख्या में छात्र उच्च शिक्षा से जुड़ सकेंगे। डिजिटल माध्यमों के जरिए पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए पारदर्शी और विश्वसनीय मूल्यांकन प्रणाली सुनिश्चित करने हेतु परीक्षाएं ऑफलाइन आयोजित किए जाने की व्यवस्था भी प्रभावी मानी जा रही है। कार्यक्रम के दौरान हाइब्रिड शिक्षा मॉडल को और मजबूत बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। उनका कहना था कि ऑनलाइन अध्ययन के साथ समय-समय पर शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच प्रत्यक्ष संवाद भी आवश्यक है। इससे छात्रों को टीमवर्क, नेतृत्व क्षमता, विचारों के आदान-प्रदान और नेटवर्किंग जैसे महत्वपूर्ण प्रबंधन कौशल विकसित करने का अवसर मिलेगा। सरकार का मानना है कि मुक्त व्यापार समझौतों, डिजिटल शिक्षा और कौशल विकास की संयुक्त रणनीति भारत को वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगी। उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार होने से देश की उत्पादन क्षमता, नवाचार और आर्थिक विकास को भी दीर्घकालिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।
'सतलुज' हटने पर पंजाब में सियासी संग्राम, दिलजीत दोसांझ की फिल्म की बहाली को BJP, कांग्रेस, AAP और अकाली दल एकजुट

नई दिल्ली । अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद पंजाब में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक बहस छिड़ गई है। रिलीज के कुछ ही समय बाद फिल्म के भारत में उपलब्ध नहीं रहने से विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। कई नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऐतिहासिक तथ्यों से जुड़े विमर्श का विषय बताते हुए फिल्म को तत्काल बहाल करने की मांग की है। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। इसमें पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध हत्याओं से जुड़े मामलों को दर्शाया गया है। इसी कारण फिल्म के अचानक हटने के बाद यह मामला केवल मनोरंजन जगत तक सीमित न रहकर राजनीतिक मुद्दा बन गया है। पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दलों ने इस निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल सहित कई दलों के नेताओं ने अलग-अलग बयान जारी कर फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने की मांग की है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित किसी रचना को सार्वजनिक विमर्श से हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। कांग्रेस नेता सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि फिल्म में जिन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, उनसे जुड़े कई मामलों पर न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। उनके अनुसार इस प्रकार की फिल्म को हटाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने केंद्र सरकार से फिल्म को पुनः उपलब्ध कराने की मांग की। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भी इस कदम पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास से जुड़े संवेदनशील विषयों पर खुली चर्चा लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने भी कहा कि फिल्म एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन पर आधारित है और इस मामले पर संबंधित पक्षों को स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने भी फिल्म हटाने के निर्णय पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति को स्वतंत्र वातावरण मिलना चाहिए तथा ऐसे मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है। वहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रतिनिधियों ने भी ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को सार्वजनिक चर्चा का माध्यम बताते हुए प्रतिबंध के बजाय संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। इस विवाद पर कानूनी क्षेत्र से भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़े मामलों में कार्य कर चुके कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि फिल्म में प्रस्तुत कई घटनाएं न्यायिक और जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड का हिस्सा रही हैं। उनके अनुसार किसी फिल्म को हटाने से इतिहास से जुड़े प्रश्न समाप्त नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक बहस और अधिक तेज हो सकती है। दूसरी ओर कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से भी इस विषय को देखने की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि संवेदनशील विषयों पर आधारित सामग्री के प्रसारण के दौरान सामाजिक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ऐसे विषयों पर तथ्यात्मक चर्चा लोकतांत्रिक समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिल्म की रिलीज से पहले भी इसे लंबी सेंसर प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। बताया जाता है कि शुरुआती चरण में फिल्म के शीर्षक और सामग्री को लेकर कई स्तरों पर विचार-विमर्श हुआ था। बाद में संशोधित शीर्षक के साथ इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जारी किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसकी उपलब्धता समाप्त हो गई, जिससे विवाद और गहरा गया। फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व और उनके संघर्ष से जुड़े विचारों को दबाया नहीं जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम के बाद ‘सतलुज’ एक फिल्म से आगे बढ़कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक विमर्श और सार्वजनिक संवाद से जुड़ा महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।
खामेनेई के जनाजे में हमास, हिज्बुल्लाह और हूती की मौजूदगी, ईरान ने दुनिया को दिया 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' की एकजुटता का संदेश

नई दिल्ली । ईरान में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के जनाजे के दौरान आयोजित अंतिम श्रद्धांजलि समारोह केवल एक धार्मिक और राष्ट्रीय आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पश्चिम एशिया की मौजूदा रणनीतिक और राजनीतिक परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण संदेश लेकर सामने आया। इस अवसर पर हमास, हिज्बुल्लाह और यमन के हूती आंदोलन सहित ईरान के कई क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने स्पष्ट किया कि लंबे समय से चर्चा में रहने वाला ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ अब भी सक्रिय और संगठित बना हुआ है। समारोह में शामिल विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने ईरान के नेतृत्व के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ-साथ क्षेत्रीय सहयोग और साझा रणनीतिक संबंधों को भी दोहराया। इन संगठनों की उपस्थिति को केवल शोक प्रकट करने तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव और उसके सहयोगी नेटवर्क की मजबूती के प्रतीक के रूप में भी समझा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय संघर्ष, इजरायल के साथ बढ़ते तनाव और बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच ईरान और उसके सहयोगी संगठनों की भूमिका लगातार अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है। ऐसे समय में आयोजित यह अंतिम संस्कार समारोह कई देशों और विश्लेषकों की विशेष निगाहों में रहा, क्योंकि इसमें शामिल प्रतिनिधिमंडलों ने सामूहिक उपस्थिति के माध्यम से राजनीतिक और रणनीतिक संदेश देने का प्रयास किया। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ केवल एक राजनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि उन संगठनों का साझा मंच है जो क्षेत्रीय मुद्दों पर ईरान के साथ निकट सहयोग बनाए रखते हैं। इनमें लेबनान का हिज्बुल्लाह, फिलिस्तीनी संगठन हमास और यमन का हूती आंदोलन प्रमुख माने जाते हैं। इन संगठनों के बीच वर्षों से वैचारिक और रणनीतिक समन्वय देखने को मिलता रहा है। जनाजे के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी बेहद कड़ी रखी गई। देश के विभिन्न हिस्सों से आए नागरिकों ने अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की, जबकि विदेशी प्रतिनिधिमंडलों ने भी समारोह में भाग लेकर ईरान के साथ अपने संबंधों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इस आयोजन ने घरेलू स्तर पर राष्ट्रीय एकजुटता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय साझेदारी दोनों को प्रमुखता से सामने रखा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में लगातार बदलते हालात के बीच इस प्रकार के सार्वजनिक आयोजन केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं होते, बल्कि इनके माध्यम से कूटनीतिक और रणनीतिक संकेत भी दिए जाते हैं। ऐसे आयोजनों में सहयोगी देशों और संगठनों की उपस्थिति भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। हाल के वर्षों में इजरायल, गाजा, लेबनान और लाल सागर क्षेत्र में बढ़े तनाव ने पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है। इसी पृष्ठभूमि में ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के बीच समन्वय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। खामेनेई के जनाजे में इन सभी प्रमुख सहयोगियों की एक साथ मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद यह क्षेत्रीय नेटवर्क सक्रिय बना हुआ है और साझा रणनीतिक उद्देश्यों पर आगे भी सहयोग जारी रखने की मंशा रखता है। समारोह से उभरी यह तस्वीर आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों पर होने वाली चर्चाओं में महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखी जा रही है।
रेड लाइट पर इंजन बंद करने वाला फीचर कितना करता है ईंधन की बचत? समझिए पूरा गणित और मासिक फायदा

नई दिल्ली । आधुनिक कारों में अब ऐसे कई फीचर्स दिए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य केवल ड्राइविंग को आसान बनाना ही नहीं, बल्कि ईंधन की बचत और प्रदूषण को कम करना भी है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण तकनीक ऑटो स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम है। यह फीचर ट्रैफिक सिग्नल, जाम या कुछ समय तक वाहन रुकने की स्थिति में इंजन को स्वतः बंद कर देता है और चालक के दोबारा आगे बढ़ने के संकेत मिलते ही इंजन फिर से चालू हो जाता है। हालांकि कई लोग बार-बार इंजन बंद और चालू होने के कारण इस फीचर को बंद कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक लंबे समय में ईंधन की उल्लेखनीय बचत कर सकती है। ऑटो स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम का मुख्य उद्देश्य उस समय होने वाली ईंधन की खपत को रोकना है, जब वाहन पूरी तरह स्थिर होता है और इंजन केवल चालू रहने के कारण पेट्रोल या डीजल खर्च कर रहा होता है। सामान्य परिस्थितियों में यदि कोई वाहन ट्रैफिक सिग्नल या जाम में कई मिनट तक खड़ा रहता है तो इंजन लगातार ईंधन की खपत करता रहता है। यह फीचर ऐसी स्थिति में इंजन को अस्थायी रूप से बंद कर अनावश्यक ईंधन खर्च को कम करता है। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य शहरी परिस्थितियों में इस तकनीक के उपयोग से वाहन की कुल ईंधन दक्षता में लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक सुधार देखा जा सकता है। वहीं जिन शहरों में भारी ट्रैफिक और लंबे समय तक रेड लाइट पर रुकना आम बात है, वहां यह बचत लगभग 12 से 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका सीधा लाभ उन लोगों को अधिक मिलता है जो प्रतिदिन भीड़भाड़ वाले मार्गों पर नियमित रूप से वाहन चलाते हैं। यदि मासिक खर्च के आधार पर इसका अनुमान लगाया जाए तो इसका प्रभाव और स्पष्ट हो जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति महीने में लगभग 1000 किलोमीटर कार चलाता है और वाहन का औसत माइलेज 15 किलोमीटर प्रति लीटर है, तो उसे लगभग 66 लीटर पेट्रोल की आवश्यकता होगी। यदि पेट्रोल की कीमत लगभग 102 रुपये प्रति लीटर मानी जाए तो मासिक ईंधन खर्च करीब 6,700 रुपये से अधिक बैठता है। ऐसी स्थिति में यदि ऑटो स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम केवल 8 प्रतिशत तक भी ईंधन बचाने में सफल रहता है तो लगभग 5 लीटर से अधिक पेट्रोल की बचत हो सकती है, जिससे हर महीने लगभग 500 से 550 रुपये तक का खर्च कम किया जा सकता है। हालांकि यह बचत सभी परिस्थितियों में समान नहीं होती। इसका वास्तविक लाभ वाहन के उपयोग, ट्रैफिक की स्थिति, ड्राइविंग शैली और रुकने के समय पर निर्भर करता है। जिन क्षेत्रों में लगातार हाईवे ड्राइविंग होती है और वाहन कम रुकता है, वहां इस फीचर का प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है। इसके विपरीत महानगरों और घनी आबादी वाले शहरों में जहां बार-बार रुकना पड़ता है, वहां यह तकनीक अधिक उपयोगी साबित होती है। वाहन निर्माता इस सिस्टम को इस तरह विकसित करते हैं कि बार-बार इंजन बंद और चालू होने से इंजन या स्टार्टर मोटर पर अनावश्यक दबाव न पड़े। इसके लिए विशेष प्रकार की बैटरी, मजबूत स्टार्टर और उन्नत इंजन प्रबंधन प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में इस फीचर का नियमित उपयोग वाहन की कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती ईंधन कीमतों और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को देखते हुए ऑटो स्टार्ट-स्टॉप जैसी तकनीकें भविष्य की जरूरत बनती जा रही हैं। यदि चालक इस सुविधा का सही तरीके से उपयोग करे और अनावश्यक रूप से इसे बंद न रखे, तो समय के साथ ईंधन खर्च में अच्छी बचत होने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में भी कमी लाई जा सकती है। यह फीचर छोटी-छोटी बचत के माध्यम से लंबे समय में वाहन मालिकों को आर्थिक लाभ पहुंचाने वाली उपयोगी तकनीकों में शामिल माना जा रहा है।
नीरव मोदी की आखिरी कानूनी उम्मीद भी खत्म, यूरोपीय अदालत से झटका, भारत प्रत्यर्पण का रास्ता लगभग साफ

नई दिल्ली। पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े बहुचर्चित बैंक धोखाधड़ी मामले के मुख्य आरोपी और भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी के भारत प्रत्यर्पण का रास्ता अब लगभग साफ माना जा रहा है। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स से भी राहत नहीं मिलने के बाद उसके पास उपलब्ध सभी प्रमुख कानूनी विकल्प समाप्त हो चुके हैं। अब मामला मुख्य रूप से ब्रिटेन की प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर है, जिसके पूरा होने के बाद उसे भारत लाए जाने की दिशा में अगला कदम उठाया जा सकता है। जानकारी के अनुसार नीरव मोदी ने ब्रिटेन की अदालतों से राहत नहीं मिलने के बाद अप्रैल 2026 में यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स का दरवाजा खटखटाया था। उसने अपने प्रत्यर्पण को रोकने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। हालांकि अदालत ने उसे कोई राहत नहीं दी, जिससे उसके प्रत्यर्पण की राह में मौजूद अंतिम कानूनी बाधा भी समाप्त हो गई है। अब ब्रिटेन की संबंधित एजेंसियां प्रत्यर्पण की औपचारिक प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती हैं। इससे पहले ब्रिटेन की हाई कोर्ट ने भी नीरव मोदी की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने प्रत्यर्पण आदेश को चुनौती देने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने माना था कि भारत की ओर से जेल की सुरक्षा, कैद की परिस्थितियों और कानूनी अधिकारों को लेकर दिए गए आश्वासन पर्याप्त हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि इस मामले में ऐसे असाधारण हालात नहीं हैं, जिनके आधार पर प्रत्यर्पण रोका जाए। नीरव मोदी ने अपनी याचिकाओं में यह तर्क दिया था कि भारत लौटने पर उसे प्रताड़ना और अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि जांच एजेंसियों और भारतीय पक्ष ने इन दावों का विरोध करते हुए अदालत में विस्तृत तथ्य और सुरक्षा संबंधी आश्वासन प्रस्तुत किए। इन्हीं आधारों पर ब्रिटेन की अदालतों ने उसके तर्कों को स्वीकार नहीं किया और प्रत्यर्पण प्रक्रिया को वैध माना। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स में दायर याचिका की सुनवाई गोपनीय रही। अदालत ने प्रक्रिया के दौरान मामले की जानकारी सार्वजनिक नहीं की थी। अब वहां से भी राहत नहीं मिलने के बाद राजनयिक स्तर पर यह माना जा रहा है कि कानूनी दृष्टि से प्रत्यर्पण के खिलाफ कोई बड़ा अवरोध शेष नहीं बचा है। इसके बाद संबंधित प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी होने पर नीरव मोदी को भारत भेजने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। नीरव मोदी मार्च 2019 से लंदन की वैंड्सवर्थ जेल में बंद है। उसके खिलाफ पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े हजारों करोड़ रुपये के कथित बैंक धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में जांच चल रही है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय लंबे समय से उसके प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहे हैं ताकि भारत में उसके खिलाफ लंबित मामलों की सुनवाई आगे बढ़ाई जा सके। ब्रिटेन की अदालतों में नीरव मोदी ने अपने पक्ष में कई कानूनी दलीलें दी थीं। इनमें भारत की जेलों की स्थिति, मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दे और पूर्व के कुछ मामलों का हवाला भी शामिल था। लेकिन अदालत ने प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद उसके तर्कों को पर्याप्त आधार नहीं माना। अब माना जा रहा है कि यदि प्रशासनिक प्रक्रिया तय समय पर पूरी होती है तो नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण जल्द संभव हो सकता है, जिससे देश के सबसे चर्चित आर्थिक अपराध मामलों में कानूनी कार्रवाई को नई गति मिल सकती है।
आमरस बनाम मैंगो शेक: दोनों में किसमें ज्यादा पोषण, कम कैलोरी और बेहतर फायदे? जानिए पूरी तुलना

नई दिल्ली । गर्मियों का मौसम आते ही आम से बने व्यंजनों की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इनमें मैंगो शेक और आमरस सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले विकल्प हैं। दोनों का स्वाद लाजवाब होता है और दोनों ही पके हुए आम से तैयार किए जाते हैं, लेकिन इन्हें बनाने की विधि, पोषण मूल्य और स्वास्थ्य पर प्रभाव एक-दूसरे से काफी अलग होता है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि दोनों में से कौन-सा विकल्प आपके लिए अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है। मैंगो शेक एक ठंडा और क्रीमी पेय है, जिसे आम के गूदे में दूध मिलाकर तैयार किया जाता है। कई लोग इसमें स्वाद बढ़ाने के लिए चीनी, ड्राई फ्रूट्स, आइसक्रीम या क्रीम भी मिलाते हैं। इसकी वजह से यह अधिक गाढ़ा, स्वादिष्ट और ऊर्जा से भरपूर बन जाता है। गर्मी के दिनों में यह शरीर को तुरंत ऊर्जा देने वाला पेय माना जाता है और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराता है। दूसरी ओर, आमरस पारंपरिक भारतीय भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे केवल पके हुए आम के गूदे को अच्छी तरह मसलकर तैयार किया जाता है। कई जगहों पर इसमें इलायची या केसर जैसी प्राकृतिक खुशबू वाली सामग्री मिलाई जाती है, लेकिन इसका मूल स्वाद आम की प्राकृतिक मिठास पर ही आधारित रहता है। आमरस को अक्सर पूरी या अन्य पारंपरिक व्यंजनों के साथ परोसा जाता है। पोषण की दृष्टि से देखें तो दोनों में विटामिन ए, विटामिन सी, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट जैसे कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व मौजूद रहते हैं, क्योंकि दोनों का मुख्य आधार आम ही है। हालांकि मैंगो शेक में दूध और अतिरिक्त चीनी मिलाने से इसकी कैलोरी, फैट और शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। यही कारण है कि यह अधिक ऊर्जा प्रदान करता है, लेकिन वजन नियंत्रित रखने वाले लोगों के लिए सीमित मात्रा में ही उपयुक्त माना जाता है। वहीं बिना अतिरिक्त चीनी या अन्य सामग्री के तैयार किया गया आमरस अपेक्षाकृत हल्का विकल्प माना जाता है। इसमें प्राकृतिक मिठास बनी रहती है और अतिरिक्त फैट नहीं होता। हालांकि इसमें भी आम के कारण प्राकृतिक शर्करा पर्याप्त मात्रा में होती है, इसलिए इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में करना बेहतर रहता है। दोनों विकल्पों का उपयोग अलग-अलग जरूरतों के अनुसार किया जा सकता है। यदि किसी को अधिक ऊर्जा और लंबे समय तक पेट भरा रखने वाला पेय चाहिए तो मैंगो शेक बेहतर विकल्प हो सकता है। वहीं यदि कोई व्यक्ति आम के प्राकृतिक स्वाद का आनंद लेना चाहता है और अतिरिक्त फैट से बचना चाहता है तो आमरस अधिक उपयुक्त माना जा सकता है। खानपान की परंपरा में भी दोनों की अलग पहचान है। आमरस लंबे समय से पारंपरिक भारतीय भोजन का हिस्सा रहा है, जबकि मैंगो शेक आधुनिक जीवनशैली के साथ घरों, कैफे और रेस्तरां में समान रूप से लोकप्रिय हो चुका है। दोनों का स्वाद और उपयोग अलग-अलग परिस्थितियों में पसंद किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों ही विकल्प पौष्टिक हो सकते हैं, बशर्ते इनका सेवन संतुलित मात्रा में किया जाए। अतिरिक्त चीनी, क्रीम या आइसक्रीम से बचकर तैयार किए गए मैंगो शेक और बिना अतिरिक्त मिठास वाला आमरस, दोनों ही गर्मियों में स्वाद और पोषण का अच्छा संतुलन प्रदान कर सकते हैं।
मुंबई-दक्षिण गुजरात में बारिश बनी रेल संकट की वजह, पश्चिम रेलवे की 40 से अधिक ट्रेनें प्रभावित; हजारों यात्रियों को झेलनी पड़ी परेशानी

नई दिल्ली। मुंबई और दक्षिण गुजरात में मानसून की तेज बारिश ने सोमवार को पश्चिम रेलवे के रेल परिचालन को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया। कई स्थानों पर रेल पटरियों पर जलभराव होने से लंबी दूरी की ट्रेनों की आवाजाही बाधित हो गई। इसके चलते 40 से अधिक ट्रेन सेवाएं प्रभावित हुईं और हजारों यात्रियों को देरी, रद्दीकरण तथा मार्ग परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। स्थिति को देखते हुए रेलवे प्रशासन ने राहत एवं सहायता कार्य तेज करते हुए प्रमुख स्टेशनों पर यात्रियों के लिए भोजन, पेयजल और सहायता केंद्रों की व्यवस्था की है। सबसे अधिक असर वसई रोड-विरार तथा सफाले-पालघर रेलखंड पर देखने को मिला, जहां भारी जलभराव के कारण ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हुई। दोपहर तक विरार, वाणगांव, पालघर, दहानू रोड और वलसाड सहित कई स्टेशनों पर लंबी दूरी की अनेक ट्रेनों को रोकना पड़ा। जलभराव के कारण कई रेलगाड़ियों की गति धीमी करनी पड़ी, जबकि कुछ ट्रेनों को सुरक्षा कारणों से निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी गई। रेलवे अधिकारियों के अनुसार, दिनभर में 40 से अधिक ट्रेन सेवाएं किसी न किसी रूप में प्रभावित रहीं। इनमें कई ट्रेनों का समय बदला गया, कुछ को रद्द करना पड़ा और कई रेलगाड़ियों को उनके निर्धारित गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही समाप्त कर दिया गया। इससे देश के विभिन्न हिस्सों से आने-जाने वाले यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। महाराष्ट्र के पालघर जिले में स्थिति सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण रही, जहां सुबह कुछ ही घंटों के भीतर अत्यधिक वर्षा दर्ज की गई। लगातार बारिश के कारण रेल पटरियां जलमग्न हो गईं, जिससे परिचालन सामान्य बनाए रखना मुश्किल हो गया। इसके प्रभाव से कई प्रमुख एक्सप्रेस ट्रेनें रास्ते में फंस गईं। वहीं, गुजरात की ओर से आने वाली कुछ ट्रेनों को एहतियातन वापी और सूरत जैसे स्टेशनों पर रोक दिया गया ताकि प्रभावित रेलखंड पर अतिरिक्त दबाव न बढ़े। यात्रियों की सुविधा के लिए पश्चिम रेलवे ने राहत व्यवस्था भी शुरू की। विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से फंसे यात्रियों को भोजन और पेयजल उपलब्ध कराया गया। प्रमुख स्टेशनों पर सहायता केंद्र स्थापित किए गए, जहां यात्रियों को ट्रेन संचालन से जुड़ी जानकारी और आवश्यक सहयोग दिया जा रहा है। रेलवे अधिकारियों ने बताया कि यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और मौसम की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। भारी बारिश का असर केवल लंबी दूरी की ट्रेनों तक सीमित नहीं रहा। मुंबई की उपनगरीय लोकल रेल सेवाएं भी प्रभावित हुईं। बोरीवली और चर्चगेट के बीच लोकल ट्रेनें निर्धारित समय से देरी से चलीं, जबकि विरार-दहानू खंड पर परिचालन सबसे अधिक प्रभावित रहा। इससे दैनिक यात्रियों को भी कार्यालय और अन्य गंतव्यों तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। रेलवे प्रशासन ने यात्रियों से अपील की है कि वे यात्रा पर निकलने से पहले अपनी ट्रेन की ताजा स्थिति की जानकारी अवश्य प्राप्त करें। अधिकारियों का कहना है कि मौसम की परिस्थितियों के अनुसार परिचालन में आवश्यक बदलाव किए जा रहे हैं और जैसे ही जलभराव की स्थिति सामान्य होगी, ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह बहाल करने का प्रयास किया जाएगा। फिलहाल प्रभावित रेलखंडों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और आवश्यक तकनीकी एवं राहत दल मौके पर तैनात हैं।
इंडोनेशिया पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी का भव्य राजकीय स्वागत, फाइटर जेट्स ने किया एस्कॉर्ट; राष्ट्रपति प्रबोवो ने एयरपोर्ट पर की अगवानी

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को तीन देशों की अपनी आधिकारिक विदेश यात्रा के पहले चरण में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंच गए। इंडोनेशिया पहुंचने पर उनका विशेष राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया गया। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो स्वयं एयरपोर्ट पर मौजूद रहे और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी कर दोनों देशों के बीच मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों का संदेश दिया। प्रधानमंत्री के विशेष विमान के इंडोनेशियाई हवाई क्षेत्र में प्रवेश करते ही वहां की वायुसेना के फाइटर जेट्स ने उसे एस्कॉर्ट किया। राजकीय यात्राओं के दौरान दिया जाने वाला यह सम्मान दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास, सामरिक सहयोग और उच्च स्तरीय कूटनीतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। जकार्ता पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री का औपचारिक स्वागत भी निर्धारित राजकीय प्रोटोकॉल के तहत किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो द्वारा व्यक्तिगत रूप से किए गए स्वागत के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति की उपस्थिति भारत और इंडोनेशिया के बीच गहरी मित्रता तथा परस्पर सम्मान को दर्शाती है। उन्होंने विश्वास जताया कि इस यात्रा के दौरान होने वाली द्विपक्षीय वार्ताएं दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा प्रदान करेंगी। भारत और इंडोनेशिया ने वर्ष 2018 में अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया था। इसके बाद से रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश, डिजिटल सहयोग, ऊर्जा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान सहित अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। मौजूदा यात्रा के दौरान भी इन विषयों पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है, ताकि दोनों देशों के बीच सहयोग को और व्यापक बनाया जा सके। प्रधानमंत्री अपने इंडोनेशिया प्रवास के दौरान वहां रह रहे भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात करेंगे। भारतीय प्रवासी लंबे समय से दोनों देशों के बीच सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इस मुलाकात के दौरान समुदाय के साथ संवाद और द्विपक्षीय संबंधों में उनकी भागीदारी पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो योग्याकार्ता स्थित ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर परिसर का भी दौरा करेंगे। यह स्थल भारत और इंडोनेशिया के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। दोनों नेताओं का यह दौरा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और साझा ऐतिहासिक संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है। इंडोनेशिया दौरे के बाद प्रधानमंत्री मोदी अपनी विदेश यात्रा के अगले चरण में ऑस्ट्रेलिया और फिर न्यूजीलैंड जाएंगे। इस दौरान वे दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। चर्चाओं का मुख्य फोकस व्यापार, निवेश, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, तकनीकी साझेदारी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने पर रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक परिदृश्य के बीच प्रधानमंत्री मोदी का यह तीन देशों का दौरा भारत की क्षेत्रीय कूटनीति को नई मजबूती देने वाला माना जा रहा है। इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ बढ़ता सहयोग न केवल आर्थिक और सामरिक संबंधों को नई दिशा देगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और साझा विकास के एजेंडे को भी आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं पाकिस्तान की ये मनमोहक जगहें, प्रकृति, इतिहास और एडवेंचर का मिलता है अनूठा अनुभव

नई दिल्ली । दक्षिण एशिया का पड़ोसी देश पाकिस्तान अपनी प्राकृतिक विविधता और ऐतिहासिक धरोहरों के कारण पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां ऊंचे बर्फीले पर्वत, हरी-भरी घाटियां, शांत झीलें, विस्तृत समुद्री तट और ऐतिहासिक स्मारक देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। प्रकृति, रोमांच और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम इस देश के कई पर्यटन स्थलों को विशेष पहचान दिलाता है। उत्तरी पाकिस्तान में स्थित हुंजा घाटी सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में गिनी जाती है। ऊंचे पर्वतों, स्वच्छ वातावरण और हरियाली से घिरी यह घाटी प्राकृतिक सौंदर्य का शानदार उदाहरण मानी जाती है। यहां ट्रैकिंग, राफ्टिंग, कयाकिंग और अन्य साहसिक गतिविधियों का भी आनंद लिया जा सकता है। शांत वातावरण और पर्वतीय दृश्य इसे प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनाते हैं। नीलम घाटी भी अपनी मनमोहक प्राकृतिक छटा के लिए प्रसिद्ध है। ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं, बहती नदियां, घने जंगल और शांत वातावरण इसे बेहद आकर्षक बनाते हैं। यहां मौजूद ऐतिहासिक स्थल और प्राकृतिक दृश्य पर्यटकों को अलग अनुभव प्रदान करते हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र फोटोग्राफी और प्रकृति प्रेमियों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय माना जाता है। समुद्री पर्यटन पसंद करने वालों के लिए चूर्णा आइलैंड प्रमुख आकर्षण है। अरब सागर में स्थित यह द्वीप अपने साफ पानी और समुद्री जीवन के लिए जाना जाता है। यहां स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और क्लिफ डाइविंग जैसी रोमांचक गतिविधियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। समुद्र के भीतर की रंग-बिरंगी दुनिया देखने के इच्छुक लोगों के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है। सिंध क्षेत्र का गोरख हिल भी पर्यटन मानचित्र पर तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। ऊंचाई पर स्थित यह इलाका अपने चट्टानी परिदृश्य, ठंडे मौसम और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। यहां से दिखाई देने वाले प्राकृतिक दृश्य पर्यटकों को अलग अनुभव प्रदान करते हैं और एडवेंचर पसंद करने वाले यात्रियों के बीच इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। उत्तर पाकिस्तान के शोगरान और सिरी पाये क्षेत्र भी प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां तक पहुंचने का सफर भी रोमांच से भरपूर माना जाता है। हरे-भरे घास के मैदान, रंग-बिरंगे फूल और बादलों से घिरी पहाड़ियां इस क्षेत्र को बेहद आकर्षक बनाती हैं। गर्मियों के मौसम में बड़ी संख्या में पर्यटक यहां घूमने पहुंचते हैं। कराची के समुद्र तट भी देश के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में शामिल हैं। समुद्र किनारे सूर्यास्त का मनमोहक दृश्य, समुद्री हवाएं और मनोरंजक गतिविधियां पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं। यहां परिवारों और युवा यात्रियों के लिए अवकाश बिताने के कई विकल्प उपलब्ध हैं। इसके अलावा खानपुर डैम साहसिक खेलों के लिए प्रसिद्ध है, जहां जेट स्कीइंग, पैराग्लाइडिंग और अन्य एडवेंचर गतिविधियों का आनंद लिया जा सकता है। वहीं हिंगोल नेशनल पार्क अपनी अनूठी भौगोलिक संरचना, वन्यजीवों और प्राकृतिक दृश्यों के कारण प्रकृति प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले पर्यटक सुक्कुर जैसे शहरों का भी रुख करते हैं, जहां प्राचीन स्थापत्य और ऐतिहासिक धरोहरें क्षेत्र की समृद्ध विरासत की झलक प्रस्तुत करती हैं।
इंडोनेशिया के 1100 साल पुराने प्रम्बानन मंदिर पहुंचेंगे पीएम मोदी, हिंदू विरासत और रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया आयाम

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन देशों की विदेश यात्रा के पहले चरण में इंडोनेशिया पहुंचे हैं। इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव योग्यकर्ता स्थित 9वीं शताब्दी का ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर माना जा रहा है। यह मंदिर न केवल दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे महत्वपूर्ण हिंदू धरोहरों में शामिल है, बल्कि भारत और इंडोनेशिया के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंधों का भी जीवंत प्रतीक है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। प्रम्बानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 ईस्वी के आसपास हुआ माना जाता है। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है, जहां भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं। परिसर का सबसे ऊंचा मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 47 मीटर है। शिव मंदिर के भीतर माता पार्वती, भगवान गणेश और महर्षि अगस्त्य की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं, जो इस परिसर की धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ाती हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण और भागवत पर आधारित विस्तृत शिल्पांकन आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। इन कलाकृतियों में भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपराओं की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। मंदिर परिसर में नियमित रूप से रामायण बैले का मंचन भी किया जाता है, जो स्थानीय संस्कृति और भारतीय महाकाव्य की गहरी ऐतिहासिक कड़ी को दर्शाता है। प्रम्बानन मंदिर को वर्ष 1991 में विश्व धरोहर का दर्जा मिला था। यह स्थल आज भी लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। भारतीय और इंडोनेशियाई विशेषज्ञों के सहयोग से मंदिर परिसर के कुछ पुराने और क्षतिग्रस्त हिस्सों के संरक्षण और जीर्णोद्धार की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान इस सहयोग को आगे बढ़ाने से जुड़े महत्वपूर्ण कदमों की भी घोषणा होने की संभावना है। इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन यहां हिंदू और बौद्ध सभ्यता की विरासत आज भी सुरक्षित है। इस्लाम के आगमन से पहले यहां कई शक्तिशाली हिंदू-बौद्ध राजवंशों का शासन रहा, जिनकी छाप आज भी मंदिरों, स्मारकों और सांस्कृतिक परंपराओं में दिखाई देती है। जावा, बाली, सुमात्रा और अन्य द्वीपों पर स्थित अनेक प्राचीन मंदिर इस ऐतिहासिक विरासत के साक्षी हैं। बाली द्वीप आज भी हिंदू संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में हिंदू आबादी निवास करती है। वहीं इंडोनेशिया की सांस्कृतिक पहचान में रामायण, महाभारत, भगवान हनुमान और गरुड़ जैसे पात्रों का विशेष स्थान है। इनका प्रभाव स्थानीय कला, नृत्य, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल सांस्कृतिक महत्व तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश, डिजिटल सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को भी आगे बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। दोनों देशों के साझा हितों को देखते हुए यह दौरा व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक रणनीतिक सहयोग के इस संतुलन से भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को नई गति मिलेगी। प्रम्बानन मंदिर का दौरा इस बात का भी प्रतीक होगा कि सांस्कृतिक जुड़ाव आज भी दोनों देशों की साझेदारी की मजबूत नींव बना हुआ है।