राम मंदिर दान विवाद पर उद्धव ठाकरे का हिंदुत्व दांव, 'राम रक्षा आंदोलन' से BJP पर साधा निशाना

नई दिल्ली । अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस मुद्दे पर राम रक्षा आंदोलन की शुरुआत करते हुए भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदुत्व के नाम पर सत्ता हासिल करने वालों ने अब मंदिरों और आस्था का भी राजनीतिक इस्तेमाल शुरू कर दिया है। साथ ही उन्होंने कहा कि हिंदुओं को जागरूक करने की जरूरत है क्योंकि उनका वशीकरण किया गया है। मुंबई के दादर स्थित हनुमान मंदिर में उद्धव ठाकरे ने हनुमान चालीसा हनुमान स्तोत्र और राम रक्षा स्तोत्र का पाठ किया। इसके बाद आयोजित सभा में उन्होंने राम मंदिर चढ़ावा मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि यदि किसी मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा धन सुरक्षित नहीं है तो इसकी जांच पूरी पारदर्शिता से होनी चाहिए। उनका कहना था कि जिस पर आरोप लगे हों उसी से जांच नहीं कराई जा सकती क्योंकि इससे निष्पक्ष परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती। उद्धव ठाकरे ने भाजपा पर हिंदुत्व के राजनीतिक उपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि भगवान राम किसी एक दल के नहीं बल्कि पूरे देश के हैं। उन्होंने कहा कि यदि हिंदुत्व के नाम पर मंदिरों और धार्मिक आस्था का दुरुपयोग किया जाएगा तो समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से राम रक्षा आंदोलन को गांव गांव तक ले जाने का आह्वान करते हुए कहा कि यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आस्था और जवाबदेही का विषय है। उधर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि आखिरकार उद्धव ठाकरे को भगवान राम की याद आ गई। उन्होंने कहा कि यदि वे भगवान राम के बताए मार्ग पर चलेंगे तो यह उनके लिए भी अच्छा होगा। फडणवीस ने यह भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उद्धव केवल एक दिन नहीं बल्कि नियमित रूप से राम रक्षा का पाठ करेंगे। राम मंदिर चढ़ावा विवाद का मामला जून में सामने आया था। राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल की शुरुआती जांच के बाद एफआईआर दर्ज की गई और चढ़ावे की सुरक्षा तथा गिनती से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। मामले की जांच अभी जारी है और प्रशासन का कहना है कि सभी तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जाएगी। उद्धव ठाकरे ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि मंदिरों से जुड़े अन्य मामलों में भी पारदर्शिता जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि यदि धार्मिक संस्थानों की गरिमा बनाए रखनी है तो किसी भी तरह की अनियमितता पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शिवसेना ने हमेशा हिंदुत्व को सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों से जोड़ा है और आगे भी उसी विचार के साथ काम करती रहेगी। राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बीच शुरू हुआ राम रक्षा आंदोलन अब महाराष्ट्र की राजनीति में नया मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है जबकि जांच एजेंसियों की रिपोर्ट पर भी सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
घर की दक्षिण-पूर्व दिशा और किचन का है गहरा संबंध, निर्माण में हुई एक छोटी सी चूक बन सकती है भारी आर्थिक नुकसान की वजह

नई दिल्ली । गृह निर्माण और आंतरिक साज-सज्जा में वास्तु शास्त्र के नियमों का अत्यधिक महत्व माना जाता है। वास्तु विज्ञान के अनुसार, घर का प्रत्येक कोना और दिशा एक विशेष ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका सीधा प्रभाव वहां रहने वाले सदस्यों के स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। इसी क्रम में घर की रसोई यानी किचन को सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना गया है, क्योंकि यहीं से पूरे परिवार का पालन-पोषण और स्वास्थ्य नियंत्रित होता है। वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, रसोई घर के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त और दोषरहित स्थान आग्नेय कोण, अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा को माना गया है। इस दिशा को अग्नि देव का स्थान कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति अनजाने में इस दिशा के नियमों की अनदेखी करता है या किसी गलत दिशा में रसोई का निर्माण करवा लेता है, तो उसे गंभीर आर्थिक संकटों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। मध्य प्रदेश । वास्तु सिद्धांतों के मुताबिक, आग्नेय कोण में रसोई घर होने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है, जिससे घर में कभी भी अन्न और धन के भंडार खाली नहीं होते हैं। भोजन बनाने की प्रक्रिया में अग्नि का मुख्य स्थान होता है और चूंकि दक्षिण-पूर्व दिशा का स्वामी अग्नि तत्व है, इसलिए इस कोने में गैस चूल्हा या स्टोव रखना सबसे सटीक माना जाता है। इस दिशा में बनाई गई रसोई न केवल भोजन को सात्विक और स्वास्थ्यवर्धक बनाती है, बल्कि परिवार के सदस्यों के बीच आपसी सामंजस्य और प्रेम को भी बढ़ाती है। इसके विपरीत, यदि रसोई घर को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या किसी अन्य गलत दिशा में निर्मित कर दिया जाए, तो यह एक गंभीर वास्तु दोष बन जाता है। इस प्रकार की गलती सीधे तौर पर घर की संचित पूंजी को नष्ट करती है और व्यापार या नौकरी में लगातार नुकसान की स्थितियां पैदा होने लगती हैं। गलत दिशा में बनी रसोई के कारण घर के मुख्य कमाऊ सदस्य को मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है और परिवार में बिना वजह के क्लेश और बीमारियां बढ़ने लगती हैं। विशेषकर घर की महिलाओं के स्वास्थ्य पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तु शास्त्र में यह स्पष्ट किया गया है कि अग्नि और जल का आपस में बैर होता है, इसलिए आग्नेय कोण की रसोई में भी पानी का स्थान (जैसे सिंक या वॉटर प्यूरीफायर) और अग्नि का स्थान (जैसे गैस चूल्हा) एक दूसरे के बिल्कुल समीप नहीं होने चाहिए। इन दोनों तत्वों के बीच उचित दूरी रखना अनिवार्य है, अन्यथा घर की बरकत रुक जाती है और अनावश्यक खर्चों में तेजी से बढ़ोत्तरी होने लगती हैं। आधुनिक जीवनशैली और फ्लैट संस्कृति के दौर में लोग अक्सर जगह की कमी के कारण वास्तु नियमों की अनदेखी कर देते हैं, जो बाद में उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित होती है। यदि किसी निर्मित मकान में रसोई घर को आग्नेय कोण में स्थानांतरित करना संभव न हो, तो वास्तु विशेषज्ञों की सलाह लेकर उचित उपाय या सुधार अवश्य कर लेने चाहिए। घर में सुख, शांति, समृद्धि और धन-धान्य की निरंतरता बनाए रखने के लिए पंचतत्वों का संतुलन बेहद जरूरी है, जिसमें आग्नेय कोण में रसोई का होना प्राथमिक और सबसे प्रभावशाली कदम माना जाता है।
रवि बिश्नोई का फ्लॉप शो बना हार की बड़ी वजह, स्पिन अटैक और टीम चयन पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली । इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में खेले गए दूसरे टी20 मुकाबले में टीम इंडिया को चार विकेट से हार का सामना करना पड़ा। इस हार के कई कारण रहे लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा युवा लेग स्पिनर रवि बिश्नोई के प्रदर्शन की हो रही है। उन्होंने अपने चार ओवर के स्पेल में बिना कोई विकेट लिए 60 रन खर्च किए और तीन नो बॉल फेंक दीं। टी20 जैसे छोटे प्रारूप में किसी स्पिनर का इतना महंगा साबित होना और लगातार नो बॉल करना भारत की गेंदबाजी रणनीति पर बड़े सवाल खड़े करता है। भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 190 रन का चुनौतीपूर्ण स्कोर बनाया था। लक्ष्य का पीछा करने उतरी इंग्लैंड की शुरुआत बेहद खराब रही और शुरुआती ओवरों में दो विकेट जल्दी गिर गए। ऐसे समय भारतीय टीम के पास मैच पर पकड़ मजबूत करने का सुनहरा मौका था लेकिन बीच के ओवरों में रवि बिश्नोई की गेंदबाजी ने मेजबान टीम को मुकाबले में वापसी का रास्ता दे दिया। सबसे निर्णायक मोड़ उनके 17वें ओवर में आया। इस ओवर में उन्होंने तीन नो बॉल फेंकी जिससे इंग्लैंड को लगातार फ्री हिट मिली। बल्लेबाज जैकब बेथेल ने इन अतिरिक्त मौकों का पूरा फायदा उठाया और तेजी से रन बटोरकर मैच का रुख पूरी तरह बदल दिया। टी20 क्रिकेट में अनुशासन बेहद अहम माना जाता है और किसी स्पिनर से ऐसी गलती की उम्मीद नहीं की जाती। बिश्नोई की गेंदबाजी शैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। उन्हें लेग स्पिनर माना जाता है लेकिन उनकी गेंदबाजी मुख्य रूप से गुगली पर आधारित रहती है। जब बल्लेबाज उनकी गुगली को पढ़ लेते हैं तब उनके पास न तो ज्यादा टर्न का विकल्प बचता है और न ही बल्लेबाजों को चकमा देने वाली विविधता दिखाई देती है। मैनचेस्टर में इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने उनकी रणनीति को आसानी से समझ लिया और खुलकर रन बनाए। हाल के समय में आईपीएल में भी उनका प्रदर्शन लगातार चर्चा का विषय रहा है। लखनऊ सुपर जायंट्स से अलग होने के बाद वह राजस्थान रॉयल्स का हिस्सा बने लेकिन वहां भी उनकी भूमिका पूरी तरह स्थिर नहीं रही। ऐसे में भारतीय टीम में लगातार मौके मिलने को लेकर क्रिकेट विशेषज्ञ और प्रशंसक सवाल उठा रहे हैं। उनका मानना है कि टीम प्रबंधन को प्रदर्शन के आधार पर स्पष्ट चयन नीति अपनानी चाहिए। हालांकि केवल एक खराब मैच के आधार पर किसी खिलाड़ी के करियर पर सवाल उठाना उचित नहीं होगा। रवि बिश्नोई युवा गेंदबाज हैं और उन्होंने पहले भी कई मैचों में टीम को जीत दिलाई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रभावी बने रहने के लिए उन्हें अपनी पारंपरिक लेग ब्रेक पर काम करना होगा और गेंदबाजी में अधिक विविधता लानी होगी। साथ ही नो बॉल जैसी बुनियादी गलतियों से बचना भी बेहद जरूरी होगा। भारत और इंग्लैंड के बीच टी20 सीरीज अभी बाकी है और टीम प्रबंधन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगले मुकाबले में स्पिन विभाग में बदलाव किया जाए या फिर बिश्नोई पर भरोसा बरकरार रखा जाए। आने वाले मैचों में उनका प्रदर्शन ही तय करेगा कि वह आलोचनाओं का जवाब मैदान पर किस तरह देते हैं।
खिताबी मुकाबले में इंग्लैंड पस्त, लॉर्ड्स में ऑस्ट्रेलिया ने सातवीं बार विमेंस टी20 वर्ल्ड कप जीत रचा नया इतिहास

नई दिल्ली । महिला टी20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में ऑस्ट्रेलियाई टीम का एकछत्र साम्राज्य लगातार जारी है। लंदन के ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान पर खेले गए आईसीसी विमेंस टी20 वर्ल्ड कप 2026 के रोमांचक खिताबी मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने मेजबान इंग्लैंड को एकतरफा अंदाज में 7 विकेट से शिकस्त दी। इस ऐतिहासिक जीत के साथ ही ऑस्ट्रेलियाई टीम ने रिकॉर्ड सातवीं बार टी20 विश्व कप की ट्रॉफी पर अपना कब्जा जमाया है। फाइनल मुकाबले में इंग्लैंड की टीम ने टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करते हुए निर्धारित 20 ओवरों में 4 विकेट के नुकसान पर 150 रनों का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया था। जवाब में बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम ने बेथ मूनी और फोएबे लिचफील्ड के बीच हुई शतकीय साझेदारी की बदौलत इस लक्ष्य को महज 17.1 ओवर में 3 विकेट खोकर बेहद आसानी से हासिल कर लिया। मध्य प्रदेश । खिताबी मुकाबले में 151 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी ऑस्ट्रेलिया की शुरुआत बेहद खराब रही थी और टीम ने दूसरे ही ओवर में सलामी बल्लेबाज जॉर्जिया वॉल का विकेट गंवा दिया था। शुरुआती झटके के बाद विकेटकीपर बल्लेबाज बेथ मूनी और फोएबे लिचफील्ड ने मोर्चा संभाला और दूसरे विकेट के लिए 100 रनों की शानदार मैच जिताऊ साझेदारी कर इंग्लिश गेंदबाजों को बैकफुट पर धकेल दिया। लिचफील्ड ने अपनी आक्रामक पारी में 35 गेंदों का सामना करते हुए 6 चौके और 2 छक्कों की मदद से 48 रन बनाए। वहीं दूसरी छोर पर जमीं बेथ मूनी ने कप्तानी पारी खेलते हुए 49 गेंदों पर 64 रनों का बहुमूल्य योगदान दिया, जिसमें 10 शानदार चौके शामिल रहे। मूनी के आउट होने के बाद अनुभवी एलिस पेरी ने नाबाद 13 रन और एश्ले गार्डनर ने नाबाद 3 रन बनाकर टीम को जीत की दहलीज के पार पहुंचाया। इंग्लैंड की ओर से चार्लोट डीन, सोफी एक्लेस्टोन और लॉरेन बेल ने एक-एक विकेट लिया, लेकिन वे अपनी टीम को हार से नहीं बचा सकीं। इससे पहले टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी मेजबान इंग्लैंड की टीम शुरुआत में लड़खड़ा गई थी। एमी जोन्स मात्र 6 रन, डैनी वायट-हॉज 8 रन और हीदर नाइट सिर्फ 2 रन बनाकर सस्ते में पवेलियन लौट गईं। इसके बाद कप्तान नेट साइवर-ब्रंट और फ्रेया केम्प ने पारी को संभाला और पांचवें विकेट के लिए 80 रनों की अटूट साझेदारी कर टीम को 150 के सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया। कप्तान नेट साइवर-ब्रंट ने 53 गेंदों पर 5 चौकों की मदद से नाबाद 58 रनों की जुझारू पारी खेली, जबकि फ्रेया केम्प ने 28 गेंदों पर 4 चौके और 1 छक्के की सहायता से नाबाद 44 रन बनाए। ऑस्ट्रेलिया की ओर से धारदार गेंदबाजी करते हुए किम गार्थ, लुसी हैमिल्टन, सोफी मोलिनक्स और एनाबेल सदरलैंड ने एक-एक सफलता हासिल की। इस टूर्नामेंट में सोफी मोलिनक्स की कप्तानी में उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम का प्रदर्शन बेहद असाधारण रहा, जहां पूरी प्रतियोगिता के दौरान टीम ने एक भी मैच नहीं गंवाया और अजेय रहते हुए विश्व विजेता का खिताब चूमा। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया की महिला टीम ने वर्ष 2010, 2012, 2014, 2018, 2020 और 2023 में भी विश्व कप अपने नाम किया था। क्रिकेट के इस सबसे छोटे प्रारूप के इतिहास में इंग्लैंड, वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड की टीमें केवल एक-एक बार ही यह प्रतिष्ठित खिताब जीतने में सफल रही हैं, जो महिला क्रिकेट जगत में ऑस्ट्रेलियाई टीम के बेजोड़ दबदबे को स्पष्ट रूप से बयां करता है।
अभिनेता राकेश बेदी के एक अनूठे प्रयोग ने बढ़ाया फिल्म का बजट, 'धुरंधर' के इस आइकॉनिक सीन के लिए मेकर्स को कराना पड़ा था भारी वीएफएक्स

नई दिल्ली । बॉलीवुड की ब्लॉकबस्टर फिल्मों में शामिल ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर-2’ की सफलता की कहानियां आज भी सिनेमाई गलियारों में चर्चा का विषय बनी रहती हैं। निर्देशक आदित्य धर के कुशल निर्देशन में बनी इन दोनों फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर नए रिकॉर्ड स्थापित किए, बल्कि कलाकारों के बेमिसाल अभिनय ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इस फिल्म फ्रैंचाइजी में रणवीर सिंह, संजय दत्त और अर्जुन रामपाल जैसे दिग्गज सितारों की मौजूदगी के बावजूद, अभिनेता राकेश बेदी का किरदार ‘जमील जमाली’ सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहा। फिल्म के पहले हिस्से में उनकी भूमिका भले ही सीमित थी, लेकिन दूसरे पार्ट में उनके अभिनय ने दर्शकों को खासा प्रभावित किया। हाल ही में इस फिल्म के एक बेहद लोकप्रिय और मजेदार सीन से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा सामने आया है, जिससे यह पता चलता है कि कैसे राकेश बेदी की एक तात्कालिक सूझबूझ यानी इंप्रोवाइजेशन के कारण मेकर्स को फिल्म का बजट बढ़ाना पड़ गया था। फिल्म ‘धुरंधर’ श्रृंखला में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के दृश्य के दौरान जमील जमाली का किरदार निभा रहे राकेश बेदी एक बेहद अनूठा संवाद बोलते नजर आते हैं। एक इंटरव्यू के दौरान इस बात का खुलासा खुद राकेश बेदी ने किया कि फिल्म की मूल पटकथा में वह संवाद शामिल ही नहीं था। शूटिंग के दौरान उन्होंने अपनी तरफ से ‘योर बटक्स आर वेरी व्हाइट’ वाली लाइन जोड़ दी थी। यह संवाद दरअसल अंग्रेजी के शब्द ‘बटक्स’ और बत्तख के बीच के उच्चारण के साम्य पर आधारित एक फनी तंज था। अभिनेता का यह प्रयोग निर्देशक आदित्य धर को इतना ज्यादा पसंद आया कि उन्होंने इस लाइन को फिल्म से हटाने के बजाय इसे हर हाल में स्क्रीन पर बनाए रखने का फैसला किया। हालांकि, इस एक लाइन को दृश्य के अनुकूल और तर्कसंगत बनाने के लिए पोस्ट-प्रोडक्शन के दौरान भारी तकनीकी बदलाव करने पड़े। अभिनेता राकेश बेदी ने इस संबंध में एक कार्यक्रम के दौरान विस्तार से बताया कि जब उन्होंने सेट पर इस संवाद की डिलीवरी की थी, तब वहां पृष्ठभूमि में न तो कोई जलस्रोत था और न ही कोई बत्तखें मौजूद थीं। यह पूरी तरह से एक खाली फ्रेम था। निर्देशक आदित्य धर ने इस बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग को स्क्रीन पर जीवंत करने के लिए विशेष रूप से वीएफएक्स (विजुअल इफेक्ट्स) टीम की मदद ली। मेकर्स ने महंगे ग्राफिक्स और वीएफएक्स का उपयोग करते हुए दृश्य की पृष्ठभूमि में एक कृत्रिम तालाब और उसमें तैरती हुई बत्तखें तैयार करवाईं। इस तकनीकी काम के चलते फिल्म के बजट में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हुई, क्योंकि यह उस समय के सबसे जटिल और महंगे वीएफएक्स कार्यों में से एक बन गया था। हालांकि, मेकर्स का यह जुआ पूरी तरह सफल रहा और जब यह सीन सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुआ, तो दर्शकों की हंसी रोक पाना नामुमकिन हो गया। इस फिल्म की अप्रत्याशित सफलता और इस खास दृश्य ने राकेश बेदी के करियर ग्राफ को एक नई ऊंचाई प्रदान की। फिल्म की रिलीज के बाद मनोरंजन उद्योग में उनकी मांग तेजी से बढ़ी, जिसके बाद उन्हें कई बड़े विज्ञापनों और लोकप्रिय पॉडकास्ट में आमंत्रित किया जाने लगा। अगर फिल्म के व्यावसायिक प्रदर्शन की बात करें, तो रणवीर सिंह स्टारर ‘धुरंधर-2’ का निर्माण लगभग 250 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट के साथ किया गया था। इस बजट में वीएफएक्स के ऐसे ही कई अन्य बारीक और महंगे काम भी शामिल थे। फिल्म ने अपनी रिलीज के बाद बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए वैश्विक स्तर पर 1850 करोड़ रुपये से अधिक का कलेक्शन किया था। कलात्मक स्वतंत्रता और कलाकारों के हुनर को तवज्जो देने की निर्देशक की इसी सोच ने इस फिल्म को इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया।
PM मोदी का इंडोनेशिया दौरा: मुस्लिम देश के ऐतिहासिक प्रम्बानान मंदिर से दुनिया को मिलेगा सांस्कृतिक एकता का संदेश

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 जुलाई से इंडोनेशिया ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के छह दिवसीय विदेश दौरे पर रवाना हो रहे हैं। इस यात्रा का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव इंडोनेशिया होगा जहां वह 6 से 8 जुलाई तक विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इस दौरे की सबसे खास बात योग्याकार्ता स्थित ऐतिहासिक प्रम्बानान मंदिर की यात्रा मानी जा रही है। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारत और इंडोनेशिया के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों का जीवंत प्रतीक है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों को नई मजबूती देने के साथ वैश्विक स्तर पर साझा विरासत का संदेश भी देगी। इंडोनेशिया भले ही दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश हो लेकिन यहां प्राचीन हिंदू और बौद्ध विरासत को आज भी पूरे सम्मान के साथ संरक्षित किया गया है। योग्याकार्ता में स्थित प्रम्बानान मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। नौवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे विशाल हिंदू मंदिर परिसर माना जाता है। इसकी ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया है। हर वर्ष लाखों पर्यटक और श्रद्धालु इस अद्भुत धरोहर को देखने यहां पहुंचते हैं। प्रम्बानान मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी त्रिमूर्ति आधारित वास्तुकला है। मंदिर परिसर में भगवान शिव भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित तीन प्रमुख मंदिर बनाए गए हैं। इनमें भगवान शिव का मंदिर सबसे विशाल और भव्य है जिसकी ऊंचाई लगभग 47 मीटर है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान शिव की विशाल प्रतिमा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव कराती है। इसके अलावा नंदी गरुड़ और हंस जैसे त्रिमूर्ति के वाहनों के लिए भी अलग मंदिर बनाए गए हैं जो इस परिसर की धार्मिक और स्थापत्य भव्यता को और बढ़ाते हैं। प्रम्बानान मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशी और शिल्पकला के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है। मंदिर की दीवारों पर रामायण और भागवत पुराण की कथाओं को पत्थरों पर बेहद बारीकी से उकेरा गया है। इन कलाकृतियों से स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं का प्रभाव सदियों पहले इंडोनेशिया तक पहुंच चुका था। मंदिर परिसर में प्रतिदिन आयोजित होने वाला रामायण बैले नृत्य कार्यक्रम भी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है और भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि भारत की एक्ट ईस्ट नीति को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ उनकी वार्ता में द्विपक्षीय सहयोग व्यापार निवेश समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय साझेदारी जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। साथ ही प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय को भी संबोधित करेंगे। प्रम्बानान मंदिर की यात्रा इस बात का भी संदेश देती है कि भारत और इंडोनेशिया के संबंध केवल कूटनीतिक और आर्थिक साझेदारी तक सीमित नहीं हैं बल्कि उनकी जड़ें साझा इतिहास संस्कृति और सभ्यता में गहराई से जुड़ी हुई हैं। ऐसे समय में जब दुनिया सांस्कृतिक संवाद और सहयोग की जरूरत महसूस कर रही है तब यह यात्रा दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई देने के साथ वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक एकता और विरासत संरक्षण का मजबूत संदेश भी देगी।
गैर-शैक्षणिक दायित्वों के बोझ तले शिक्षा व्यवस्था

– प्रो. एस.के. सिंहकिसी भी राष्ट्र की प्रगति और विकास का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। शिक्षा न केवल मनुष्यों के निर्माण का आधार है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक उन्नति का प्रतिबिंब भी होती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि शिक्षा राष्ट्र की आत्मा होती है। भारत की शिक्षा परंपरा सदियों तक विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे प्राचीन भारतीय शिक्षा केंद्र केवल ज्ञान के ही नहीं, बल्कि वैश्विक बौद्धिक विमर्श के भी प्रमुख केंद्र थे, जहाँ दुनिया के विभिन्न देशों से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे, क्योंकि भारतीय शिक्षा व्यवस्था ने हमेशा ज्ञान, नैतिकता, चरित्र-निर्माण तथा मानव एवं विश्व-कल्याण के आदर्शों को प्रतिष्ठित किया है, लेकिन मध्यकाल और विशेषकर औपनिवेशिक काल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर गंभीर आघात पहुँचाया गया। भारतीय ज्ञान-परंपरा को हानि पहुँचाने के लिए अनेक पारंपरिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट किया गया। औपनिवेशिक शासन ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की, जिसमें भारतीय भाषाओं एवं भारतीय ज्ञान-संपदा को कमतर आँकते हुए अंग्रेज़ी-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया। औपनिवेशिक काल में भारतीय ज्ञान-परंपरा, गुरुकुल व्यवस्था तथा स्वदेशी शिक्षण संस्थानों को जिस सुनियोजित तरीके से कमजोर किया गया, वैसा उदाहरण भारतीय इतिहास के अनेक पूर्ववर्ती कालखंडों में दिखाई नहीं देता। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा के विस्तार के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की संख्या तो बढ़ी, विभिन्न आयोग भी गठित किए गए, लेकिन शिक्षा के भारतीयकरण, मातृभाषा में शिक्षण एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्स्थापन जैसे विषयों पर ठोस और व्यापक परिवर्तन लंबे समय तक दिखाई नहीं दिया। तत्कालीन सरकारें शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित बुनियादी परिवर्तन करने का साहस ही नहीं जुटा सकीं। परिणामस्वरूप, शिक्षा व्यवस्था काफी हद तक उसी ढाँचे में चलती रही, जिसकी नींव औपनिवेशिक काल में रखी गई थी। ऐसे परिदृश्य में स्वतंत्रता के लगभग 73 वर्ष बाद, 2020 में एनईपी 2020 के माध्यम से देश को एक बेहद लचीली, समावेशी, बहुलतावादी, प्रगतिशील, छात्र-केंद्रित एवं भारतीयता से ओत-प्रोत शिक्षा नीति मिली, जिसमें भारतीय ज्ञान-परंपरा और मातृभाषा को केंद्र में रखते हुए छात्रों के सर्वांगीण विकास तथा उन्हें जीवन के लिए तैयार करने पर जोर दिया गया है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्वतंत्रता के बाद पहली बार किसी नीति में शिक्षा को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की ठोस पहल की गई है। इसलिए इसे सही मायनों में स्वतंत्र भारत की पहली भारतीय शिक्षा नीति कहा जा सकता है। लेकिन शिक्षकों पर प्रशासनिक एवं गैर-शैक्षणिक कार्यों का बढ़ता बोझ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन तथा उसके अपेक्षित परिणामों की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा नजर आ रहा है। महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि सांदीपनि और आचार्य चाणक्य जैसे शिक्षकों की परंपरा इसलिए महान नहीं बनी कि वे प्रशासनिक औपचारिकताओं में दक्ष थे, बल्कि इसलिए बनी कि वे अपने शिष्यों के व्यक्तित्व-निर्माण में पूर्णतः समर्पित थे। उनके आश्रमों में शिक्षा का केंद्र-बिंदु गुरु और शिष्य का जीवंत संवाद था, लेकिन वर्तमान समय में शिक्षकों की गैर-शैक्षणिक कार्यों में बढ़ती व्यस्तता के कारण यह संवाद निरंतर कम होता जा रहा है, जिससे शिक्षण एवं शोध की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा मंडराने लगा है। निरंतर रिपोर्टिंग, पोर्टल प्रबंधन, डेटा अपलोडिंग, निर्वाचन एवं जनगणना संबंधी कार्य, विभिन्न सरकारी सर्वेक्षण, छात्रवृत्ति योजनाओं का संचालन, आधार लिंकिंग, मध्यान्ह भोजन योजना का प्रबंधन, बार-बार माँगी जाने वाली सूचनाओं का संकलन, संस्थान स्तर पर विभिन्न समितियों का गठन एवं संचालन, विशिष्ट व्यक्तियों के कार्यक्रमों में व्यस्तता तथा अनेक गैर-शैक्षणिक दायित्वों के कारण शिक्षकों को अपने मूल दायित्व शिक्षण, अध्ययन एवं शोध के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है। शिक्षक का कार्य केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं होता; उसके अध्यापन की गुणवत्ता उसके सतत अध्ययन, चिंतन, मनन और आत्मविकास पर निर्भर करती है। इसलिए शिक्षक चौबीसों घंटे अपने दायित्वों का निर्वहन करता है। जो लोग यह मानते हैं कि शिक्षण कार्य समाप्त होते ही शिक्षक अपने दायित्वों से मुक्त होकर पूर्णतः स्वतंत्र हो जाता है, वे शिक्षक के वास्तविक उत्तरदायित्व, उसकी भूमिका की प्रकृति तथा शिक्षा की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया को भली-भाँति नहीं समझते और इसी भ्रांति के कारण शिक्षक पर गैर-शैक्षणिक दायित्वों का अनावश्यक बोझ लादने का समर्थन करते हैं। मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसी अनेक नीतियाँ एवं योजनाएँ रही हैं, जिनकी मूल भावना अत्यंत श्रेष्ठ एवं पवित्र रही है, लेकिन उनकी सफलता और अपेक्षित परिणाम काफी हद तक उनके क्रियान्वयन पर निर्भर रहे हैं। देश में 2016 में लागू की गई नोटबंदी इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। नोटबंदी का निर्णय मूलतः काले धन, नकली मुद्रा तथा अवैध आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से उठाया गया एक दूरदर्शी और साहसिक कदम था। नोटबंदी के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा को लेकर न तब कोई संदेह था और न आज है, लेकिन क्रियान्वयन के दौरान उत्पन्न हुई कुछ व्यावहारिक चुनौतियों एवं कठिनाइयों के कारण नोटबंदी से वे अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सके, जिनकी आशा की गई थी। नोटबंदी नरेंद्र मोदी सरकार का ऐसा निर्णय था, जिसने वैश्विक स्तर पर यह धारणा स्थापित की कि भारत में ऐसा नेतृत्व उभर चुका है, जो केवल लोकप्रिय निर्णयों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित में आवश्यक होने पर कठोर, अप्रिय और चुनौतीपूर्ण निर्णय लेने से भी नहीं हिचकेगा। नोटबंदी की सराहना नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर ने भी की थी। इसी प्रकार यदि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते हैं, तो इसका कारण नीति में कोई कमी होना नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की सबसे मजबूत कड़ी शिक्षक का उसके मूल कार्य से विमुख होना होगा। जिस प्रकार एक बेहतर एवं दूरगामी आर्थिक निर्णय, नोटबंदी, के क्रियान्वयन में त्रुटियाँ उसके प्रभाव को सीमित कर सकती हैं, उसी प्रकार एक उत्कृष्ट शिक्षा नीति भी तब तक अपने मूल उद्देश्यों को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकती, जब तक शिक्षकों को अनावश्यक गैर-शैक्षणिक दायित्वों के बोझ से मुक्त न किया जाए। अब तो ऐसा प्रतीत होने लगा है कि शिक्षा व्यवस्था में भी नौकरशाही की प्रवृत्तियाँ प्रवेश कर गई हैं, जहाँ शिक्षण की वास्तविक गुणवत्ता और परिणामों की अपेक्षा प्रक्रियाओं, अभिलेखीकरण तथा औपचारिकताओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि शिक्षकों पर लादे गए प्रशासनिक दायित्व तथा अधिकांश
127 कट्स के विवाद के बाद रिलीज हुई 'सतलुज', 48 घंटों में लगा बैन, खालड़ा की पत्नी बोलीं- यही वो असली फिल्म

नई दिल्ली। लंबे समय से विवादों में रही दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘पंजाब 95’, जिसे बाद में ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया, आखिरकार दर्शकों तक पहुंची। कई वर्षों की देरी और सेंसर संबंधी विवादों के बाद फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज किया गया, लेकिन स्ट्रीमिंग शुरू होने के करीब 48 घंटे के भीतर ही इसे भारत में हटा दिया गया और फिल्म पर रोक लगा दी गई। फिल्म की खास बात यह रही कि इसे बिना किसी कट के मूल संस्करण में रिलीज किया गया था। इसकी जानकारी निर्देशक हनी त्रेहान और अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने साझा की थी। फिल्म को जसवंत सिंह खालड़ा के परिवार का भी समर्थन मिला। उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने कहा कि ओटीटी पर रिलीज हुई ‘सतलुज’ वही मूल फिल्म है, जो सबसे पहले उनके परिवार को दिखाई गई थी और जिसे उन्होंने मंजूरी दी थी। हालांकि, उनका यह बयान फिल्म पर रोक लगाए जाने से पहले का है। परमजीत कौर खालड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर खुशी जताई कि वर्षों की मुश्किलों के बाद उनके पति के जीवन, संघर्ष और न्याय की लड़ाई पर आधारित फिल्म दर्शकों तक पहुंच सकी। उन्होंने लिखा कि यह वही मूल संस्करण है, जिसे सबसे पहले उनके परिवार ने देखा था। उनके मुताबिक, तमाम दबाव और बदलाव की कोशिशों के बावजूद फिल्म की सच्चाई और मूल भावना को बरकरार रखा गया। उन्होंने कहा कि उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह था कि जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी को बिना किसी समझौते और तथ्यों से छेड़छाड़ किए ईमानदारी से प्रस्तुत किया जाए। अपने पोस्ट में परमजीत कौर खालड़ा ने दावा किया कि फिल्म में 25 हजार से अधिक लावारिस शवों के मामले और जसवंत सिंह खालड़ा की कानूनी लड़ाई को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया गया है। उन्होंने निर्देशक हनी त्रेहान की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने भारी दबाव के बावजूद फिल्म की ऐतिहासिक और कलात्मक सत्यता से समझौता नहीं किया। साथ ही उम्मीद जताई कि यह फिल्म लोगों को सच, न्याय, जवाबदेही और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर सोचने के लिए प्रेरित करेगी। यह फिल्म वर्षों तक सेंसर प्रक्रिया में अटकी रही। निर्देशक हनी त्रेहान के मुताबिक, इसे वर्ष 2022 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के पास भेजा गया था, लेकिन करीब तीन साल तक प्रमाणपत्र नहीं मिला। मेकर्स का दावा था कि बोर्ड ने फिल्म में 127 कट लगाने का सुझाव दिया था। इसके अलावा 2023 में टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रस्तावित प्रीमियर भी भारतीय अधिकारियों की आपत्तियों के बाद रद्द कर दिया गया था। <blockquote class=”twitter-tweet”><p lang=”en” dir=”ltr”>On the release of <a href=”https://x.com/hashtag/Punjab95?src=hash&ref_src=twsrc%5Etfw”>#Punjab95</a> under the name of <a href=”https://x.com/hashtag/Satluj?src=hash&ref_src=twsrc%5Etfw”>#Satluj</a> <a href=”https://t.co/QASNh6Y9Fm”>pic.twitter.com/QASNh6Y9Fm</a></p>— Paramjit Kaur Khalra (@KaurKhalra) <a href=”https://x.com/KaurKhalra/status/2073120269271785885?ref_src=twsrc%5Etfw”>July 3, 2026</a></blockquote> <script async src=”https://platform.x.com/widgets.js” charset=”utf-8″></script> On the release of #Punjab95 under the name of #Satluj pic.twitter.com/QASNh6Y9Fm — Paramjit Kaur Khalra (@KaurKhalra) July 3, 2026 हनी त्रेहान ने बताया था कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म के पहले शीर्षक ‘गल्लूघारा’ पर भी आपत्ति जताई थी और शुरुआती क्रेडिट्स से ‘Inspired by True Events’ हटाने के लिए कहा था। इसके बाद फिल्म का नाम बदलकर ‘सतलुज’ रखा गया और इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है। उनके अलावा कंवलजीत सिंह, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यान भी प्रमुख भूमिकाओं में नजर आए हैं। कई वर्षों के विवाद, सेंसर विवाद और लंबी प्रतीक्षा के बाद रिलीज हुई ‘सतलुज’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हालांकि, भारत में रिलीज के कुछ ही समय बाद फिल्म पर लगी रोक ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है।
बुध का राशि परिवर्तन कल, बनेगा दुर्लभ द्विद्वादश योग, इन 4 राशियों को होगा लाभ

नई दिल्ली । ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के राजकुमार माने जाने वाले बुध देव कल यानी 7 जुलाई को अपनी चाल बदलने जा रहे हैं. बुध ग्रह कर्क राशि से उल्टी चाल (वक्री) चलते हुए अपने स्वामित्व वाली राशि मिथुन में गोचर कर जाएंगे. बुध के इस राशि परिवर्तन से अंतरिक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण और दुर्लभ योग का निर्माण होने जा रहा है, जिसे ज्योतिष में द्विद्वादश योग कहा जाता है. दरअसल, इस समय देवगुरु बृहस्पति वृषभ राशि में विराजमान हैं. बुध के मिथुन राशि में आने से गुरु, बुध से दूसरे (द्वितीय) भाव में होंगे, वहीं बुध ग्रह गुरु से बारहवें (द्वादश) भाव में चले जाएंगे. ग्रहों की यह जुगलबंदी कई राशियों के लिए भाग्य के द्वार खोलने वाली साबित होगी. आइए जानते हैं बुध के इस गोचर और द्विद्वादश योग से किन राशियों को सबसे ज्यादा लाभ होने वाला है. मिथुन राशि (Gemini)बुध का गोचर आपकी ही राशि में होने जा रहा है, इसलिए सबसे अधिक प्रभाव आप पर ही देखने को मिलेगा. नौकरीपेशा लोगों को कार्यस्थल पर नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं, जिससे आपके प्रभाव में वृद्धि होगी. व्यापार में अटके हुए सौदे अचानक पूरे हो सकते हैं. आय के नए स्रोत बनेंगे. अगर आपका पैसा कहीं फंसा हुआ था, तो वह इस अवधि में वापस मिल सकता है. कन्या राशि (Virgo)चूंकि बुध आपकी राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस गोचर का आपको सीधा फायदा मिलेगा. जो लोग लंबे समय से नौकरी बदलने या प्रमोशन का इंतजार कर रहे थे, उनकी इच्छा पूरी हो सकती है. कारोबारियों के लिए यह समय कोई नया स्टार्टअप या काम शुरू करने के लिए बेहतरीन है. विदेश से जुड़े व्यापार में बड़ा लाभ होने के संकेत हैं. तुला राशि (Libra)तुला राशि के जातकों के लिए गुरु और बुध की यह स्थिति बेहद शुभ फलदायी रहने वाली है. आपको पैतृक संपत्ति या किसी पुराने निवेश से बड़ा मुनाफा हो सकता है. आपकी वाणी और संचार कौशल (Communication Skills) में गजब का निखार आएगा, जिससे कार्यक्षेत्र और समाज में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी. उच्च अधिकारियों का पूरा सहयोग मिलेगा. धनु राशि (Sagittarius)धनु राशि वालों के लिए द्विद्वादश योग तरक्की के नए रास्ते खोलेगा. जीवनसाथी के साथ चल रहे वैचारिक मतभेद समाप्त होंगे और आपसी प्रेम बढ़ेगा. यदि आप पार्टनरशिप में कोई बिजनेस कर रहे हैं, तो उसमें अप्रत्याशित मुनाफा देखने को मिल सकता है. कोर्ट-कचहरी के मामलों में फैसला आपके पक्ष में आने की पूरी संभावना है.
कच्चा तेल 60 डॉलर तक गिरने का अनुमान, पेट्रोल-डीजल के सस्ते होने की उम्मीद, जानें आज के ताजा रेट

नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर राहत की उम्मीदें बढ़ी हैं। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों इंडियन ऑयल, HPCL और भारत पेट्रोलियम ने 6 जुलाई की सुबह 6 बजे नए रेट जारी किए, जिनमें पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसी तरह सीएनजी के दाम भी स्थिर बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 0.55% की गिरावट के साथ 71.72 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कीमतों में और गिरावट संभव है। सिटीग्रुप इंक ने अनुमान जताया है कि साल के अंत तक कच्चा तेल 60 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है, जिससे ईंधन की कीमतों में राहत मिल सकती है। वैश्विक स्तर पर तेल बाजार में उतार-चढ़ाव के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, ओपेक देशों ने अगले महीने के लिए उत्पादन कोटे में मामूली बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व में सात देशों ने मिलकर उत्पादन में 1,88,000 बैरल प्रति दिन की वृद्धि पर सहमति जताई है। दूसरी ओर, कच्चे तेल की कीमतों में दूसरी तिमाही के दौरान लगभग 30% की गिरावट दर्ज की गई है। बताया जा रहा है कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच एक अंतरिम शांति समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट से तेल परिवहन फिर से शुरू होने का रास्ता साफ हुआ है, हालांकि स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। पेट्रोल-डीजल के ताज़ा रेट (6 जुलाई)सरकारी पंपों पर ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।दिल्ली: पेट्रोल ₹102.12, डीजल ₹95.20लखनऊ: पेट्रोल ₹102.05, डीजल ₹99.28अयोध्या: पेट्रोल ₹102.04, डीजल ₹99.27भोपाल: पेट्रोल ₹114.65, डीजल ₹99.74इंदौर: पेट्रोल ₹114.61, डीजल ₹99.70कोलकाता: पेट्रोल ₹113.51, डीजल ₹99.82पटना: पेट्रोल ₹112.70, डीजल ₹99.87 CNG के रेट भी स्थिरCNG की कीमतों में भी कोई बदलाव नहीं हुआ है। IGL के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में CNG ₹83.09 प्रति किलोग्राम पर स्थिर रही। गुरुग्राम में यह ₹88.12, नोएडा और गाजियाबाद में ₹91.70 प्रति किलोग्राम पर बनी हुई है। अन्य शहरों में भी रेट लगभग स्थिर रहे—मुजफ्फरनगर, मेरठ, शामली: ₹91.58रेवाड़ी: ₹87.70करनाल: ₹87.43कैथल: ₹88.43कानपुर, हमीरपुर, फतेहपुर: ₹94.42अजमेर, पाली, राजसमंद: ₹92.44महोबा, बांदा, चित्रकूट: ₹89.42हापुड़: ₹92.70ग्रेटर नोएडा: ₹91.70 विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरावट जारी रहती है, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी कमी देखने को मिल सकती है।