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सेबी का बड़ा फैसला, विदेशी निवेशकों की पंजीकरण फीस अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगी, छह महीने बाद लागू होंगे नए नियम

नई दिल्ली । भारतीय पूंजी बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) और विदेशी वेंचर कैपिटल निवेशकों (एफवीसीआई) के लिए पंजीकरण शुल्क व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। नए नियमों के तहत अब इन निवेशकों की पंजीकरण फीस अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में निर्धारित की जाएगी। यह बदलाव करीब छह महीने बाद लागू होगा, ताकि सभी संबंधित संस्थाओं और निवेशकों को नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी प्रक्रियाएं व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। नए शुल्क ढांचे के अनुसार अब पहले लागू 1,000 अमेरिकी डॉलर की पंजीकरण फीस के स्थान पर 90,000 रुपये का भुगतान करना होगा। इसी प्रकार कैटेगरी-1 एफपीआई और एफवीसीआई के लिए पहले निर्धारित 2,500 अमेरिकी डॉलर की फीस को बदलकर 2.30 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही विलंब शुल्क और पंजीकरण जारी रखने से संबंधित शुल्कों में भी संशोधन किया गया है, जिससे पूरी शुल्क प्रणाली भारतीय मुद्रा पर आधारित हो जाएगी। सेबी का मानना है कि रुपये में शुल्क निर्धारित करने से विदेशी मुद्रा आधारित भुगतान व्यवस्था से जुड़ी कई व्यावहारिक चुनौतियां समाप्त होंगी। अब तक डॉलर आधारित शुल्क प्रणाली के कारण लेखांकन, बिलिंग, भुगतान मिलान और वित्तीय रिपोर्टिंग जैसी प्रक्रियाओं में अतिरिक्त समय और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन प्रक्रियाओं को अधिक सरल, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा सकेगा। संशोधित नियमों के तहत डिपॉजिटरी संस्थानों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। अब उन्हें एफपीआई और एफवीसीआई से प्राप्त शुल्क पंजीकरण स्वीकृत होने के पांच कार्य दिवसों के भीतर सेबी के पास जमा कराना होगा। इससे शुल्क संग्रह और नियामकीय प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होने की उम्मीद है। नियामक का उद्देश्य पूरी प्रणाली को समयबद्ध और डिजिटल प्रक्रियाओं के अनुरूप बनाना है। सेबी ने पंजीकरण प्रक्रिया को भी पहले की तुलना में अधिक सरल बनाने की दिशा में कदम उठाया है। अब सामान्य आवेदन पत्र में व्यक्तिगत निवेशकों के लिए जन्मतिथि तथा संस्थागत आवेदकों के लिए कंपनी की स्थापना तिथि जैसी आवश्यक जानकारियों को शामिल किया गया है। इससे आवेदन प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित होगी और अन्य नियामकीय औपचारिकताओं को पूरा करना भी आसान हो जाएगा। यह बदलाव कर संबंधी प्रक्रियाओं को सरल बनाने की व्यापक पहल के अनुरूप भी माना जा रहा है। विशेष रूप से स्थायी खाता संख्या (पैन) के आवेदन और उससे जुड़ी औपचारिकताओं को आसान बनाने के उद्देश्य से विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाया गया है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय पूंजी बाजार में प्रवेश और अनुपालन की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक सहज हो सकती है। इसके अतिरिक्त सेबी ने कस्टोडियन संस्थानों के शुल्क भुगतान के तरीके में भी संशोधन किया है। पहले जहां उन्हें वार्षिक आधार पर शुल्क जमा करना पड़ता था, वहीं अब मासिक भुगतान व्यवस्था लागू की गई है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक नियमित और प्रबंधन के लिहाज से सुविधाजनक बनने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रुपये में शुल्क निर्धारण से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, विनिमय दर के उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम होगा और विदेशी निवेशकों के लिए अनुपालन प्रक्रिया अधिक स्पष्ट बनेगी। यह कदम भारतीय पूंजी बाजार को और अधिक पारदर्शी, आधुनिक और निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

बिना बैंड बाजा और बिना दिखावे की शादी पर्यावरण संरक्षण का देगा खास संदेश

  इंदौर । शादियों में बढ़ते दिखावे और फिजूलखर्ची के दौर में इंदौर का एक परिवार समाज के सामने नई मिसाल पेश करने जा रहा है। शहर के व्यवसायी और समाजसेवी अक्षय जैन ने अपने पुत्र पार्थ जैन के 12 जुलाई को होने वाले विवाह समारोह को केवल पारिवारिक आयोजन तक सीमित रखने का फैसला किया है। इस विवाह की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इसमें न बैंड बाजा होगा और न ही भव्य सजावट व दिखावे पर खर्च किया जाएगा। इसके बजाय पूरा आयोजन सादगी संस्कार और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ संपन्न होगा। जैन परिवार ने विवाह में शामिल होने वाले सभी मेहमानों से विशेष आग्रह किया है कि वे किसी भी प्रकार का उपहार लिफाफा या भेंट लेकर न आएं। परिवार का कहना है कि नवदंपती के लिए सबसे बड़ा उपहार बड़ों का आशीर्वाद और अपने लोगों का स्नेह ही है। इसलिए किसी भी तरह की भौतिक भेंट की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही परिवार ने एक अनूठी अपील भी की है। सभी मेहमानों से कहा गया है कि वे नवदंपती को आशीर्वाद देने के लिए अपने घर आंगन खेत या आसपास किसी भी उपयुक्त स्थान पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और उसकी नियमित देखभाल का संकल्प भी लें। उनका मानना है कि यदि हर शुभ अवसर को प्रकृति से जोड़ दिया जाए तो समाज में पर्यावरण संरक्षण को लेकर नई जागरूकता पैदा होगी और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ तथा हराभरा वातावरण मिल सकेगा। अक्षय जैन का कहना है कि इस निर्णय के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समय समय पर दिए गए सादगी मितव्ययता और पर्यावरण संरक्षण के संदेशों से प्रेरणा मिली है। उनका मानना है कि विवाह जैसे सामाजिक आयोजनों में अनावश्यक खर्च के बजाय समाज और प्रकृति के हित में सकारात्मक पहल की जानी चाहिए ताकि ऐसे आयोजन दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन सकें। विवाह समारोह पूरी तरह जैन परंपराओं के अनुसार आयोजित किया जाएगा। सभी धार्मिक अनुष्ठान नवकार महामंत्र और मंगलाचरण के बीच संपन्न होंगे। जैन धर्म की परंपरा का पालन करते हुए किसी भी प्रकार का रात्रिकालीन कार्यक्रम नहीं रखा गया है। विवाह से जुड़ी सभी रस्में दिन के समय पूरी की जाएंगी। मेहमानों के लिए जमीकंद रहित सात्विक भोजन की व्यवस्था भी की गई है। सामाजिक संगठनों और शहर के कई लोगों ने इस पहल की सराहना की है। उनका कहना है कि आज जब शादियां अक्सर दिखावे और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनती जा रही हैं तब इस तरह का आयोजन समाज को सकारात्मक दिशा देने वाला प्रयास है। यदि अधिक से अधिक परिवार इस सोच को अपनाएं तो विवाह समारोह केवल खुशियों का अवसर ही नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का माध्यम भी बन सकते हैं। इंदौर का यह विवाह सादगी संस्कार और हरियाली का संदेश देकर समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बनने जा रहा है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच सोना-चांदी पर दबाव, एमसीएक्स में दोनों कीमती धातुओं के दाम गिरे, कच्चा तेल हुआ महंगा

नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक कमोडिटी बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। बुधवार को घरेलू वायदा बाजार में सोना और चांदी दोनों गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। निवेशकों की ओर से मुनाफावसूली और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच बदले निवेश रुझान के कारण कीमती धातुओं पर दबाव बना रहा। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया, जिससे वैश्विक आर्थिक चिंताएं और बढ़ गई हैं। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के अगस्त डिलीवरी अनुबंध की शुरुआत पिछले कारोबारी सत्र की तुलना में गिरावट के साथ हुई। शुरुआती कारोबार में सोने की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला और कारोबार के दौरान यह अपने शुरुआती स्तर से भी नीचे फिसल गया। इससे संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाते हुए बड़े निवेश से बच रहे हैं। चांदी के वायदा अनुबंध में भी कमजोरी का रुख देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ होने के बाद इसकी कीमत दो लाख तीस हजार रुपये प्रति किलोग्राम के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे पहुंच गई। कारोबार के दौरान चांदी में बिकवाली का दबाव बना रहा, जिससे इसकी कीमतों में और नरमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और निवेशकों की बदलती रणनीति का असर चांदी की कीमतों पर भी पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोना और चांदी दोनों पर दबाव बना रहा। वैश्विक निवेशकों ने जोखिम से जुड़े परिसंपत्तियों के साथ-साथ कीमती धातुओं में भी सतर्क रुख अपनाया। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में निवेशकों की प्राथमिकता लगातार बदल रही है, जिससे कमोडिटी बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। ऐसे समय में विभिन्न वैश्विक घटनाक्रम निवेश निर्णयों को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। बाजार पर सबसे बड़ा प्रभाव मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का माना जा रहा है। क्षेत्र में हालिया घटनाओं के बाद ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऊर्जा कीमतों में यह तेजी वैश्विक महंगाई और उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती है, जिससे वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार, भू-राजनीतिक घटनाओं के दौरान कमोडिटी बाजार में तेज उतार-चढ़ाव सामान्य माना जाता है। निवेशक लगातार बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी निवेश रणनीति में बदलाव करते हैं। यही कारण है कि एक ओर ऊर्जा बाजार में तेजी देखने को मिल रही है, जबकि दूसरी ओर कीमती धातुओं में मुनाफावसूली और बिकवाली का दबाव बना हुआ है। आने वाले दिनों में सोना, चांदी और कच्चे तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। यदि मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है। वहीं स्थिति सामान्य होने पर कमोडिटी बाजार में भी स्थिरता लौटने की संभावना है। फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक आर्थिक संकेतों, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं पर बनी हुई है, जो आने वाले कारोबारी सत्रों की दिशा तय करेंगे।

NEET और भर्ती घोटालों के खिलाफ छात्रों का अनोखा आंदोलन, डिलीवरी बॉय से ड्राइवर तक कर रहे सहयोग

इंदौर । इंदौर के टंट्याभील चौराहे पर 23 सूत्रीय मांगों को लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार आठवें दिन भी जारी रहा। इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे किसी राजनीतिक दल या बड़े संगठन के बजाय आम लोगों का सहयोग मिल रहा है। धरना स्थल पर टेंट, गद्दे, भोजन, पेयजल और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं समाज के लोगों और छात्रों के सहयोग से संचालित की जा रही हैं। कई युवा अपनी रोज की कमाई का हिस्सा भी आंदोलन के लिए दे रहे हैं ताकि प्रदर्शन बिना किसी बाधा के जारी रह सके। प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि जब उन्होंने आंदोलन शुरू किया था तब उनके पास बैठने और बारिश से बचने तक की व्यवस्था नहीं थी। शुरुआती दिनों में बारिश से बचने के लिए उन्हें अपने बैठने वाले गद्दों को ही ओढ़ना पड़ा। इस दौरान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो कई सामाजिक संगठन और स्थानीय नागरिक उनकी मदद के लिए आगे आए। इसके बाद धरना स्थल पर टेंट, गद्दे और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की गई। छात्रों की मांग है कि नीट पेपर लीक मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, रिक्त और बैकलॉग पदों पर जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू हो तथा शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि जब तक उनकी 23 सूत्रीय मांगों पर सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। धरना स्थल पर मौजूद पवन अहिरवार और अरुण बड़ोले ने बताया कि रोजाना टेंट और अन्य व्यवस्थाओं पर करीब 1500 रुपये खर्च होते हैं। यह राशि आम नागरिकों के स्वैच्छिक सहयोग से जुटाई जा रही है। इसके लिए धरना स्थल पर सहयोग पेटी भी रखी गई है, जिसमें लोग अपनी इच्छा से आर्थिक सहायता दे रहे हैं। कई छात्र स्वयं लोगों से संपर्क कर आंदोलन के लिए सहयोग की अपील भी कर रहे हैं। इस आंदोलन में आम लोगों की भागीदारी भी देखने को मिल रही है। पेशे से ड्राइवर दिनेश वास्कले ने बताया कि उनके छोटे बच्चे हैं और वे नहीं चाहते कि भविष्य में उन्हें भी भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं का सामना करना पड़े। उन्होंने अपना जन्मदिन भी धरना स्थल पर मनाया और उस दिन सभी छात्रों के भोजन की व्यवस्था की। वहीं डिलीवरी बॉय चंदन मोवेल ने कहा कि वह अपनी कमाई का एक हिस्सा आंदोलन के लिए नियमित रूप से दे रहे हैं। इसी तरह कई अन्य युवाओं ने भी छात्रों के समर्थन में आर्थिक सहयोग दिया है। धरने में शामिल छात्रों के अनुसार रात के समय भी 15 से 20 छात्र लगातार धरना स्थल पर मौजूद रहते हैं, जबकि सुबह और शाम करीब 100 छात्र आंदोलन में शामिल होते हैं। उनका आरोप है कि अब तक प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी मांगों पर चर्चा करने नहीं पहुंचा है। एलएलएम के छात्र अनिल विद्याराणा ने बताया कि विभिन्न छात्र संगठनों का भी आंदोलन को समर्थन मिल रहा है। कई संगठन धरना स्थल पर पहुंचकर छात्रों का मनोबल बढ़ा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को प्रदेश स्तर तक विस्तारित किया जाएगा।

अमेरिका-ईरान तनाव का भारतीय बाजार पर असर, सेंसेक्स 78 हजार से नीचे फिसला, बढ़ते कच्चे तेल ने बढ़ाई निवेशकों की चिंता

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़े सैन्य तनाव का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। बुधवार को कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती सत्र में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया। सेंसेक्स 78 हजार के स्तर से नीचे फिसल गया, जबकि निफ्टी में भी उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई। वैश्विक अनिश्चितता और ऊर्जा बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूटकर 77 हजार के स्तर के आसपास पहुंच गया। वहीं निफ्टी भी 24,300 के नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। बाजार में बिकवाली केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों पर भी दबाव देखने को मिला। इससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने व्यापक स्तर पर जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई। क्षेत्रवार प्रदर्शन पर नजर डालें तो ऑयल एवं गैस, ऑटो, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया, कमोडिटी और एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली। दूसरी ओर फार्मा, हेल्थकेयर, सूचना प्रौद्योगिकी और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ शेयरों में अपेक्षाकृत मजबूती बनी रही। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अनिश्चित वैश्विक परिस्थितियों में निवेशक ऐसे क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं जिन्हें अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है। वैश्विक बाजारों में भी मिश्रित संकेत देखने को मिले। एशिया के कुछ प्रमुख बाजारों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ सूचकांक सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते रहे। अमेरिकी बाजार भी पिछले कारोबारी सत्र में दबाव के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की निगाहें अब पश्चिम एशिया की स्थिति और उससे जुड़े अगले घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं। विश्लेषकों के अनुसार बाजार पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी का पड़ा है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर महंगाई, आयात बिल और कॉरपोरेट लागत पर पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा कीमतों में उछाल का प्रभाव शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। निवेशक फिलहाल वैश्विक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। दूसरी ओर यदि स्थिति सामान्य होती है तो निवेशकों का भरोसा दोबारा मजबूत होने की संभावना भी बनी रहेगी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों को जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर ध्यान देना चाहिए। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं अक्सर अल्पकालिक अस्थिरता पैदा करती हैं, लेकिन मजबूत आर्थिक आधार वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। आने वाले कारोबारी सत्रों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतें और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

फेसबुक एक्स इंस्टाग्राम पर जरा सी लापरवाही पड़ सकती है भारी सरकारी कर्मचारियों के लिए नई आचार संहिता लागू

मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने नई आचार संहिता जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की गैर जिम्मेदाराना गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार का उद्देश्य शासकीय सेवकों की निष्पक्षता बनाए रखना और सामाजिक सौहार्द को सुरक्षित रखना है। नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है तथा सभी विभागों को इसका कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। नई गाइडलाइन के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी फेसबुक एक्स इंस्टाग्राम व्हाट्सएप यूट्यूब या किसी भी अन्य सोशल मीडिया मंच पर ऐसी पोस्ट टिप्पणी फोटो वीडियो या अन्य सामग्री साझा नहीं करेगा जिससे जातीय धार्मिक सामाजिक या राजनीतिक वैमनस्य फैलने की आशंका हो। सरकार का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साझा की गई सामग्री का व्यापक प्रभाव पड़ता है और इससे समाज में तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए प्रत्येक शासकीय सेवक को सोशल मीडिया पर संयम और जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना होगा। सरकार ने केवल पोस्ट करने पर ही नहीं बल्कि विवादित सामग्री को लाइक शेयर या फॉरवर्ड करने पर भी रोक लगा दी है। यदि कोई कर्मचारी किसी भड़काऊ या विवादित पोस्ट को आगे बढ़ाता है तो उसे भी नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। यानी अब केवल स्वयं सामग्री लिखना ही नहीं बल्कि आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार में सहयोग करना भी अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएगा। राजनीतिक गतिविधियों को लेकर भी सरकार ने स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। आदेश के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी सोशल मीडिया के माध्यम से किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में प्रचार नहीं करेगा। किसी राजनीतिक अभियान पर सार्वजनिक टिप्पणी करना या किसी दल के पक्ष अथवा विपक्ष में सक्रियता दिखाना मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। सरकार का कहना है कि शासकीय सेवकों की निष्पक्षता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है और उसे हर परिस्थिति में बनाए रखना आवश्यक है। नई आचार संहिता में कर्मचारियों को सोशल मीडिया पर होने वाली बहस विवाद और क्रॉस कमेंट से भी दूर रहने की सलाह दी गई है। शासन का मानना है कि सरकारी कर्मचारियों द्वारा की गई सार्वजनिक टिप्पणी को आम लोग सरकार की आधिकारिक सोच से जोड़कर देखते हैं। इसलिए डिजिटल माध्यम पर किसी भी प्रतिक्रिया से पहले पूरी सावधानी बरतना आवश्यक है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ केवल विभागीय कार्रवाई ही नहीं बल्कि आवश्यक होने पर भारतीय न्याय संहिता 2023 तथा अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत वैधानिक कार्रवाई भी की जा सकती है। विभागाध्यक्षों को निर्देश दिए गए हैं कि सभी कर्मचारियों को इन नियमों की जानकारी दें और पालन सुनिश्चित करें। डिजिटल युग में सोशल मीडिया सरकारी कर्मचारियों के लिए संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। नई आचार संहिता का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाना नहीं बल्कि सरकारी सेवा की गरिमा निष्पक्षता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखना है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई व्यवस्था का पालन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाता है और इससे सरकारी कार्यप्रणाली में किस तरह का सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है।

एमपी पुलिस भर्ती का इंतजार खत्म एसआई और सूबेदार परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित जानिए कटऑफ और टॉपर्स की पूरी सूची

मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश में पुलिस विभाग में नौकरी का इंतजार कर रहे हजारों अभ्यर्थियों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल ने सब इंस्पेक्टर और सूबेदार भर्ती परीक्षा का अंतिम परिणाम घोषित कर दिया है। लंबे समय से इस परिणाम का इंतजार कर रहे उम्मीदवार अब अपने चयन की स्थिति देख सकते हैं। इस भर्ती प्रक्रिया के तहत कुल 500 पदों के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी लेकिन विभिन्न न्यायिक और आरक्षण संबंधी प्रावधानों के चलते केवल 436 पदों पर ही अंतिम चयन किया गया है। कर्मचारी चयन मंडल के अनुसार यह भर्ती प्रक्रिया कई चरणों में पूरी की गई। सबसे पहले लिखित परीक्षा आयोजित की गई जिसके परिणाम के आधार पर 5113 अभ्यर्थियों को अगले चरण के लिए पात्र घोषित किया गया। इसके बाद रिक्त पदों की संख्या के तीन गुना यानी 1692 उम्मीदवारों को शारीरिक दक्षता परीक्षा और साक्षात्कार के लिए बुलाया गया। अंतिम मेरिट सूची लिखित परीक्षा शारीरिक दक्षता परीक्षण और साक्षात्कार में प्राप्त अंकों के संयुक्त आधार पर तैयार की गई। इस भर्ती परीक्षा में ओबीसी वर्ग के संजय परमार ने 595.98 अंक प्राप्त कर पूरे प्रदेश में पहला स्थान हासिल किया। टॉप 10 की सूची में ओबीसी वर्ग का दबदबा देखने को मिला जहां पांच उम्मीदवार इसी वर्ग से रहे। इसके अलावा तीन अभ्यर्थी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दो उम्मीदवार अनारक्षित वर्ग से शामिल हुए। यह परिणाम प्रतियोगी परीक्षाओं में कड़ी मेहनत और उत्कृष्ट प्रदर्शन का उदाहरण माना जा रहा है। कर्मचारी चयन मंडल ने बताया कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान हाईकोर्ट के निर्देशों तथा आरक्षण संबंधी नियमों का पालन किया गया। इसी कारण सभी 500 पदों पर नियुक्ति संभव नहीं हो सकी। कुछ पदों का वर्गीकरण नियमानुसार बदला भी गया लेकिन इसके बावजूद रिक्तियां पूरी तरह नहीं भर पाईं। समान अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों की वरीयता आयु और आरक्षण नियमों के अनुसार तय की गई। पूर्व सैनिक अभ्यर्थियों को शासन के प्रावधानों के अनुसार मुख्य चरण की प्रारंभिक परीक्षा में पांच प्रतिशत अतिरिक्त अंक का लाभ भी दिया गया। अंतिम परिणाम के साथ विभिन्न पदों की कटऑफ भी जारी कर दी गई है। सूबेदार पद के लिए कटऑफ 571.16 अंक रही जबकि एसएएफ सब इंस्पेक्टर के लिए 497.27 अंक और जिला पुलिस बल सब इंस्पेक्टर के लिए 505.206 अंक निर्धारित किए गए हैं। इससे अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया की प्रतिस्पर्धा का भी स्पष्ट अंदाजा मिल सकेगा। अब चयनित अभ्यर्थियों के दस्तावेज सत्यापन मेडिकल परीक्षण और नियुक्ति की औपचारिक प्रक्रिया पुलिस विभाग द्वारा पूरी कराई जाएगी। कर्मचारी चयन मंडल ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि परिणाम में किसी प्रकार की तकनीकी त्रुटि सामने आती है तो आवश्यक संशोधन करने का अधिकार मंडल के पास सुरक्षित रहेगा। इस परिणाम के साथ प्रदेश के हजारों युवाओं का लंबे समय से चला आ रहा इंतजार समाप्त हो गया है। चयनित उम्मीदवार अब पुलिस सेवा में शामिल होकर प्रदेश की कानून व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अपनी नई जिम्मेदारी निभाने की तैयारी करेंगे जबकि अन्य अभ्यर्थी आगामी भर्तियों के लिए नए उत्साह के साथ तैयारी में जुटेंगे।

गर्भवती IPS अधिकारियों के प्रशिक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई, 1993 के नियम की वैधता और समानता के अधिकार पर उठे बड़े सवाल

नई दिल्ली । गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारियों के प्रशिक्षण से जुड़े तीन दशक पुराने नियम की वैधता अब सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर है। वर्ष 1993 में जारी गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन को चुनौती देने वाली याचिका पर शीर्ष अदालत सुनवाई कर रही है। इस मामले ने महिला अधिकारियों के अधिकार, सेवा नियमों में समानता और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुरूप प्रशासनिक नीतियों की आवश्यकता पर नई बहस छेड़ दी है। याचिका मध्य प्रदेश कैडर की वर्ष 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने दायर की है। उनका कहना है कि केवल गर्भावस्था के आधार पर प्रशिक्षण रोकना वर्तमान समय की चिकित्सा समझ और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। उनका तर्क है कि प्रत्येक अधिकारी की शारीरिक स्थिति और मेडिकल फिटनेस का अलग-अलग आकलन किया जाना चाहिए, न कि सभी मामलों में एक समान प्रतिबंध लागू किया जाए। उर्वशी सेंगर ने नवंबर 2023 में अपने प्रशिक्षण का पहला चरण पूरा किया था। दूसरे चरण के प्रशिक्षण के दौरान वह गर्भवती हुईं और इसकी जानकारी संबंधित पुलिस अकादमी को दी। इसके बाद उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही रोकने तथा प्रसव के एक वर्ष बाद अगली बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण पूरा करने का निर्देश दिया गया। बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण में दोबारा शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन वर्ष 1993 के नियम का हवाला देते हुए उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने अंतरिम आदेश में आवश्यक चिकित्सकीय औपचारिकताएं पूरी करने की शर्त पर उन्हें प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी थी। हालांकि बाद में संबंधित पुलिस अकादमी ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि संबंधित नियम महिला अधिकारी और उसके होने वाले बच्चे के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाया गया था। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंच गया है, जहां अदालत को यह तय करना है कि क्या केवल गर्भावस्था किसी महिला अधिकारी को प्रशिक्षण से बाहर रखने का पर्याप्त आधार हो सकती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि प्रशिक्षण के दूसरे चरण में मुख्य रूप से कक्षा आधारित अध्ययन, अकादमिक मॉड्यूल और संस्थागत गतिविधियां शामिल होती हैं, जिनमें अत्यधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में बिना व्यक्तिगत मेडिकल मूल्यांकन के प्रशिक्षण से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता। याचिका में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी उठाया गया है कि वर्ष 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने महिला आईएएस अधिकारियों के लिए पुराने नियमों में संशोधन किया था। संशोधित व्यवस्था के तहत महिला आईएएस प्रोबेशनरों को उनकी व्यक्तिगत मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति दी जाती है। ऐसे में आईपीएस अधिकारियों के लिए अब भी 1993 के पुराने प्रावधान लागू रखना समानता के सिद्धांत के विपरीत बताया गया है। वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार यदि कोई महिला आईपीएस प्रोबेशनर प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती हो जाती है तो उसका प्रशिक्षण तत्काल रोक दिया जाता है और प्रसव के एक वर्ष बाद ही उसे दोबारा प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति मिलती है। इस अवधि को असाधारण अवकाश माना जाता है, हालांकि इससे उसकी वरिष्ठता प्रभावित नहीं होती। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में महिला आईपीएस अधिकारियों के प्रशिक्षण, सेवा नियमों और मातृत्व से जुड़े प्रशासनिक प्रावधानों की दिशा भी तय कर सकता है। अदालत का फैसला यह स्पष्ट करेगा कि वर्तमान परिस्थितियों में पुराने सेवा नियमों को आधुनिक चिकित्सा मानकों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप किस प्रकार देखा जाना चाहिए।

ई-अटेंडेंस पर सरकार और शिक्षकों में बढ़ा टकराव वेतन कटौती के आदेश पर मचा बवाल सरकार बोली फैसला वापस नहीं होगा

मध्यप्रदेश। मध्यप्रदेश में ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच विवाद गहराता जा रहा है। सरकार व्यवस्था को हर हाल में लागू करने पर अड़ी है जबकि शिक्षक संगठन तकनीकी समस्याओं और वेतन कटौती जैसे प्रावधानों को अन्यायपूर्ण बताते हुए आदेश वापस लेने की मांग कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग की ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। राज्य सरकार ने साफ कर दिया है कि डिजिटल उपस्थिति प्रणाली को किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा और इसे पूरी तरह लागू किया जाएगा। दूसरी ओर शिक्षक संगठन इस व्यवस्था के उद्देश्य का विरोध नहीं कर रहे हैं बल्कि इसके लागू करने के तरीके और दंडात्मक प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जता रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच जारी यह विवाद अब प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का बड़ा मुद्दा बन चुका है। स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने हाल ही में बैतूल दौरे के दौरान स्पष्ट कहा कि जब शिक्षक पूरे दिन मोबाइल फोन का उपयोग कर सकते हैं तो ई-अटेंडेंस दर्ज करने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि सरकार का उद्देश्य केवल स्कूलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जिन क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या है वहां सरकार लगातार तकनीकी सुधार कर रही है और ऐसे स्थानों पर पदस्थ शिक्षकों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। सरकार के अनुसार प्रदेश में अधिकांश विद्यालयों में ई-अटेंडेंस व्यवस्था सफलतापूर्वक संचालित हो रही है और जहां तकनीकी बाधाएं सामने आई हैं वहां वेतन कटौती जैसी कार्रवाई नहीं की गई है। सरकार का दावा है कि हजारों विद्यालयों में व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है और केवल सीमित स्थानों पर नेटवर्क संबंधी दिक्कतें सामने आई हैं जिनका समाधान किया जा रहा है। उधर मध्यप्रदेश शिक्षक संघ ने सरकार के हालिया आदेशों पर गंभीर आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि ई-अटेंडेंस का विरोध नहीं है लेकिन यदि किसी तकनीकी कारण से उपस्थिति दर्ज नहीं हो पाती तो उसका खामियाजा शिक्षक को नहीं भुगतना चाहिए। संघ ने मांग की है कि ई-अटेंडेंस दर्ज नहीं होने पर वेतन काटने और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश तत्काल वापस लिए जाएं। शिक्षक नेताओं का कहना है कि विभाग स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रदेश के अधिकांश विद्यालयों में ई-अटेंडेंस सफलतापूर्वक दर्ज हो रही है। ऐसे में कुछ प्रतिशत तकनीकी समस्याओं के कारण पूरे शिक्षक वर्ग को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है। उनका कहना है कि शिक्षकों को निजी मोबाइल इंटरनेट और सिम कार्ड का उपयोग करने के लिए बाध्य किया जा रहा है जबकि इस संबंध में सरकार की कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आई है। ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने भी इस व्यवस्था के कई व्यावहारिक पक्षों की ओर ध्यान दिलाया है। संगठन का कहना है कि शिक्षक केवल कक्षा में पढ़ाने का काम नहीं करते बल्कि उन्हें प्रशिक्षण चुनाव सर्वेक्षण परीक्षाओं और अन्य प्रशासनिक दायित्व भी निभाने पड़ते हैं। कई बार सरकारी कार्यों के कारण उन्हें विद्यालय से बाहर रहना पड़ता है। ऐसे में केवल मशीन के आधार पर अनुपस्थित मान लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में तकनीक का उपयोग समय की आवश्यकता है लेकिन इसके साथ मानवीय परिस्थितियों और तकनीकी सीमाओं का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। यदि सरकार और शिक्षक संगठन आपसी संवाद के माध्यम से व्यवहारिक समाधान निकालते हैं तो डिजिटल व्यवस्था अधिक प्रभावी और विवाद मुक्त बन सकती है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर आगे की रणनीति पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

बद्रीनाथ चढ़ावा अनियमितता प्रकरण ने पकड़ी रफ्तार, निलंबन के बाद प्रमोद नौटियाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज, शासन ने शुरू की बहुस्तरीय जांच

नई दिल्ली । उत्तराखंड के प्रसिद्ध बद्रीनाथ मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में जांच का दायरा और व्यापक हो गया है। विभागीय कार्रवाई के तहत पहले निलंबित किए गए श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष कार्यालय में तैनात व्यक्तिगत सहायक प्रमोद नौटियाल के खिलाफ अब पुलिस ने भी मुकदमा दर्ज कर लिया है। इसके साथ ही राज्य सरकार ने मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है, जिससे पूरे घटनाक्रम की गहन पड़ताल की जा सके। बीकेटीसी की ओर से दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर बद्रीनाथ थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। शिकायत मंदिर अधिकारी की लिखित तहरीर पर दर्ज हुई, जिसके बाद मामला विभागीय जांच से आगे बढ़कर आपराधिक जांच के दायरे में पहुंच गया है। पुलिस अब उपलब्ध दस्तावेजों, रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही है। जानकारी के अनुसार, मंदिर में दान और चढ़ावे के प्रबंधन से जुड़ी कथित अनियमितताओं की सूचना मिलने के बाद मंदिर समिति ने प्रारंभिक स्तर पर जांच शुरू की थी। शुरुआती जांच में प्रथम दृष्टया यह सामने आया कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना मंदिर की धनराशि के साथ कथित अनधिकृत हस्तक्षेप हुआ। इसी आधार पर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने गढ़वाल आयुक्त की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की है। समिति को पूरे घटनाक्रम की तथ्यात्मक जांच कर 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने का निर्देश दिया गया है। जांच के दौरान मंदिर की वित्तीय व्यवस्था, चढ़ावे की गिनती, धनराशि के रखरखाव और सुरक्षा व्यवस्था सहित सभी प्रक्रियाओं की विस्तार से समीक्षा की जाएगी। बताया गया है कि प्रारंभिक जांच के दौरान सोशल मीडिया पर सामने आए दावों को भी संज्ञान में लिया गया था। इसके बाद संबंधित दस्तावेजों और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया गया। जांच में प्रथम दृष्टया कुछ ऐसी परिस्थितियां सामने आने का उल्लेख किया गया, जिनके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई आवश्यक समझी गई। इसी प्रक्रिया के तहत पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। बीकेटीसी का कहना है कि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकता है। समिति का मानना है कि यदि संबंधित कर्मचारी को पद पर बनाए रखा जाता तो जांच प्रभावित होने की आशंका बनी रहती। इसी कारण पहले प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए निलंबन किया गया और बाद में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पुलिस में मामला दर्ज कराया गया। अब पुलिस जांच और उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट इस पूरे मामले में आगे की कार्रवाई तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यदि जांच के दौरान अतिरिक्त तथ्य या अन्य संबंधित पहलू सामने आते हैं तो उनके आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है। फिलहाल प्रशासन और मंदिर समिति दोनों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोष तय किए जाएंगे और जांच पूरी होने के बाद नियमों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।