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न्यू मित्र मंडल सहकारी संस्था में लंबे समय से चल रही वित्तीय अनियमितताएं, EOW ने शुरू की जांच


भोपाल:में न्यू मित्र मंडल सहकारी संस्था में 25 वर्षों से चल रही वित्तीय अनियमितताओं और जमीन हेराफेरी का मामला सामने आया है। संस्था का गठन 1981 में आवासीय भूखंड उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था और बाद में ग्राम बागमुगालिया क्षेत्र में लगभग 3.5 एकड़ भूमि खरीदी गई थी। वर्ष 1996 में सड़क निर्माण के लिए करीब 2 एकड़ भूमि अधिग्रहित होने पर संस्था को मुआवजा और अतिरिक्त निर्माण अधिकार (एफएआर) प्राप्त हुए।

आरोप है कि वर्ष 2004 में 45 प्लॉट की स्वीकृति के बावजूद नियमों के विपरीत अतिरिक्त सदस्य जोड़कर भूखंडों की बिक्री की गई। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने जांच के बाद 17 नामजद पदाधिकारियों सहित अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धोखाधड़ी, गबन और आपराधिक साजिश के तहत FIR दर्ज की। प्रारंभिक आकलन के अनुसार बाजार मूल्य पर कुल हानि 40 करोड़ रुपये तक पहुंचती है।

जांच में यह भी सामने आया कि 30 जनवरी 2023 को नक्शे में संशोधन कर कई रिहायशी भूखंडों को व्यावसायिक दर्शाया गया। 28 रजिस्ट्रियों में वास्तविक मूल्य से कम राशि दिखाने के कारण संस्था को लगभग 8.84 करोड़ रुपये और शासन को करीब 4.5 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ। कई मूल सदस्यों को आवंटित भूखंड गैर-पात्र व्यक्तियों को बेच दिए गए।

सदस्यता प्रक्रिया में भी गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। संस्था में 100 सदस्यों की सीमा तय थी, लेकिन 2005-06 से 2007-08 के बीच दर्जनों नए सदस्य कथित रूप से अवैध तरीके से जोड़े गए। विवादित रजिस्ट्रियों में सदस्यता क्रमांक 231 से 264 तक के गैर-पात्र व्यक्तियों को प्लॉट आवंटित किए गए।

जांच के दौरान मीटिंग मिनट्स, लेखा अभिलेख और अन्य प्रशासनिक दस्तावेज अनुपलब्ध पाए गए। न्यायालय और सहकारिता विभाग में लंबित प्रकरणों की जानकारी छिपाकर रजिस्ट्रियां कराए जाने का भी आरोप है। अधिग्रहण मुआवजा राशि के वितरण का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलने के कारण जांच का दायरा और बढ़ गया है।

जिन व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, उनमें संस्था के पूर्व पदाधिकारी और संबंधित पक्ष शामिल हैं। जांच एजेंसी ने संकेत दिया है कि सहकारिता विभाग की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि इतने वर्षों तक अनियमितताओं के दौरान निगरानी व्यवस्था क्यों विफल रही।

इस मामले से उजागर हुआ है कि सहकारी संस्थाओं में लंबी अवधि से चल रही वित्तीय अनियमितताएं और पारदर्शिता की कमी कितनी बड़ी हानि का कारण बन सकती हैं और प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता कितनी जरूरी है।

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