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जब काम खत्म हो जाता है तो कहां जाते हैं सैटेलाइट? समझिए Graveyard Orbit का अनोखा विज्ञान


नई दिल्ली। अंतरिक्ष में आज हजारों उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। ये उपग्रह मौसम की जानकारी प्रदान करते हैं, सौर गैसों का अध्ययन करते हैं, ग्रह-तारों की निगरानी करते हैं और संचार सेवाओं को बेहतर बनाते हैं जैसे कई महत्वपूर्ण काम करते हैं। लेकिन हर मशीन की तरह इन सैटेलाइट की भी एक सीमित आयु होती है। कुछ वर्षों तक काम करने के बाद ये तकनीक रूप से पुरानी या ख़राब हो गई हैं। ऐसे में सबूतों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि इन सैटेलाइट सैटेलाइट का क्या किया जाए ताकि अंतरिक्ष में खतरनाक सामान न बदले।

लो अर्थ ऑर्बिट वाले सैटेलाइट को ऐसे ख़त्म कर दिया गया है
कैथेड्रल के पास के पुराने उपग्रहों को हटाने के लिए दो मुख्य तरीके होते हैं, जो उनकी विचारधारा पर प्रतिबंध लगाते हैं। कम पाइपलाइन वाली कक्षा को लो अर्थ ऑर्बिट कहा जाता है। इस क्लास में मौजूद सैटेलाइट को हटाने का तरीका आसान होता है।
इंजीनियर सैटेलाइट में बैचलर जेल का उपयोग करके अपनी गति को धीरे-धीरे कम कर देते हैं। जैसे ही उसकी गति कम होती है, उपग्रह अपनी कक्षा से नीचे आता हुआ प्रतीत होता है और अंततः पृथ्वी के द्वीपों में प्रवेश कर जाता है। बस्ती में प्रवेश करते समय हवा के झोंके से इतनी तेज़ गर्मी पैदा होती है कि अधिकांश उपग्रह जलकर पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। छोटे उपग्रह के लिए यह विधि सबसे सुरक्षित मानी जाती है, क्योंकि इनका कोई मालबा जमीन तक अवलोकन नहीं है।

बिग स्पेस यानों को ‘स्पेस फ़्रांसीसी कब्रिस्तान’ में स्थापित किया गया है
हालाँकि सभी उपग्रह संपूर्ण प्रकार के जलकर समाप्त नहीं हुए। बड़े अंतरिक्ष यान, पुराने अंतरिक्ष स्टेशन या भारी उपग्रह के कुछ हिस्सों में ज्वालामुखी के बाद भी बच सकते हैं। ऐसे मामलों में वैज्ञानिक उन्हें नियंत्रित तरीके से पृथ्वी पर गिराते हैं ताकि मालबा क्षेत्र पर सुरक्षित रहे।
इसके लिए प्रशांत महासागर में एक खास जगह चुनी गई है, जिसे ‘स्पेस क्राफ्ट कब्रिस्तान’ कहा जाता है। यह क्षेत्र प्वाइंट निमो के आसपास स्थित है। यह पृथ्वी का सबसे घना समुद्री तट माना जाता है, जहां से किसी भी दिशा में लगभग 2,600 किलोमीटर दूर है। यहां विकलांगों और मानव अपराध की संख्या बेहद कम है, इसलिए किसी भी दुर्घटना का खतरा भी बहुत कम रहता है। इतिहास में कई बड़े अंतरिक्ष यान, जैसे मीर स्पेस स्टेशन और सैल्यूट श्रृंखला के स्टेशन इसी क्षेत्र में गिरे हुए थे।

‘ग्रेवयार्ड ऑर्बिट’ में भेजे गए उपग्रह उपग्रह कक्षा वाले हैं
दूसरी ओर, बहुत से कक्षा में मौजूद उपग्रह को पृथ्वी पर वापस लाना आसान नहीं होता। उदाहरण के लिए भूस्थैतिक कक्षा में विद्यमान उपग्रह पृथ्वी से लगभग 36 हजार किमी की भूमि पर स्थित हैं। इतने सारे प्लांट से उन्हें वापस लाने के लिए भारी मात्रा में जंगल की आवश्यकता होती है, जो अक्सर उपलब्ध नहीं होता है।
ऐसे में साइंटिस्ट उन्हें लिटिल और ऊपर भेजते हैं, जिसे ग्रेवयार्ड ऑर्बिट कहा जाता है। यह क्लास सामान्य जियोस्टोरी क्लास से करीब 200 से 300 किमी ऊपर है। यहां पर सैटेलाइट सैटेलाइट हो जाने के बाद सैटेलाइट से कनेक्ट होने का खतरा कम हो जाता है। कई पुराने हज़ारों वर्षों तक इसी तरह के ‘अंतरिक्ष कब्रिस्तान’ में चक्करदार रह सकते हैं।

अंतरिक्ष में जंगल की स्थापना क्यों है चिंता का विषय
पुराने को उपग्रह सेट करना भी जरूरी है क्योंकि पृथ्वी के वर्ग में अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष डेबरी तेजी से बढ़ रही है। नासा के अनुसार आज पृथ्वी के चारों ओर हजारों सक्रिय उपग्रहों के साथ-साथ लाखों छोटे-बड़े टुकड़ों के टुकड़े भी मौजूद हैं।
ये टुकड़े बहुत तेज गति से पाए जाते हैं और अगर कोई सैटेलाइट एक्टिवेटिड या स्पेस यान से अलग हो जाए तो भारी नुकसान हो सकता है। ऐसे टकराव से और अधिक मालबा बनता है और यह एक खतरनाक चेन प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है, जिसे केसलर सिंड्रोम कहा जाता है। यदि यह स्थिति गंभीर हो जाए तो कुछ स्पेस फ़्लोरिडा के उपयोग की गुंजाइश नहीं है, जिनमें से कोई भी नहीं है। इसी कारण से साइंटिफिक पुराने सैटेलाइट को सुरक्षित तरीकों से हटाने के लिए कॉन्स्टैंट नए सैटेलाइट और समुद्र तट पर काम कर रहे हैं, ताकि अंतरिक्ष को साफ और सुरक्षित रखा जा सके।

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