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गैस सिलेंडर की किल्लत ने बदल दी रसोई, पहाड़ों में फिर जगा पारंपरिक चूल्हों का भरोसा


नई दिल्ली:  उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों गैस सिलेंडर की किल्लत ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। सप्लाई में देरी और बढ़ती कीमतों के कारण कई परिवारों के सामने रसोई चलाना मुश्किल हो गया है। लेकिन इस संकट के बीच पहाड़ों के गांवों ने एक बार फिर अपने पुराने और भरोसेमंद तरीके को याद कर लिया है। कई घरों में अब पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे दोबारा जलने लगे हैं। यह दृश्य एक तरह से उस जीवनशैली की वापसी है, जो कभी पहाड़ों की पहचान हुआ करती थी।

पहले के समय में पहाड़ों के लगभग हर घर में मिट्टी और पत्थर से बना चूल्हा होता था। यही चूल्हा रसोई का मुख्य साधन था और पूरे परिवार के मेलजोल का भी केंद्र माना जाता था। सुबह से लेकर शाम तक चूल्हे की आंच के आसपास ही घर की दिनचर्या चलती थी। धीरे-धीरे गैस सिलेंडर आने के बाद इन चूल्हों का इस्तेमाल कम हो गया, लेकिन आज गैस की किल्लत ने लोगों को फिर उसी पुराने रास्ते की ओर मोड़ दिया है।

पहाड़ों में ईंधन के लिए लोगों को ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता था। जंगलों और खेतों के आसपास आसानी से मिलने वाली सूखी लकड़ियां, पिरूल यानी चीड़ के सूखे पत्ते और गोबर के उपले ही ईंधन का काम करते थे। गांव की महिलाएं रोजमर्रा के काम के साथ-साथ इन चीजों को इकट्ठा कर लेती थीं और घर की रसोई आसानी से चल जाती थी। इस व्यवस्था में जहां खर्च लगभग शून्य होता था, वहीं चूल्हे पर धीमी आंच में पकने वाले खाने का स्वाद भी अलग ही होता था। आज भी कई लोग मानते हैं कि लकड़ी के चूल्हे पर बने भोजन की खुशबू और स्वाद गैस पर बने खाने से कहीं ज्यादा अच्छा होता है।

मौजूदा समय में कई परिवारों ने एक नया तरीका अपनाया है, जिसे गांवों में लोग डबल सिस्टम कह रहे हैं। यानी घर में गैस सिलेंडर भी है और साथ ही पारंपरिक चूल्हा भी जलाया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर गैस का इस्तेमाल किया जाता है और बाकी समय चूल्हे पर खाना बनाकर गैस की बचत की जाती है। इससे एक फायदा यह भी है कि अगर सिलेंडर खत्म हो जाए या समय पर न मिले, तो घर की रसोई बंद नहीं होती। इस तरह यह तरीका पहाड़ों के लोगों के लिए सस्ता और सुरक्षित विकल्प बन गया है।

गांव की बुजुर्ग महिला नर्वदा देवी बताती हैं कि पुराने समय के तरीके आज भी उतने ही कारगर हैं जितने पहले थे। उनका कहना है कि पहले गैस का कोई सवाल ही नहीं था। लोग जंगल से सूखी लकड़ी और पिरूल लेकर आते थे और उसी से खाना बनाते थे। अब जब गैस महंगी हो गई है और समय पर नहीं मिल रही है, तो फिर से चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है। उनके अनुसार पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए ये पुराने तरीके आज भी बेहद उपयोगी हैं।

दरअसल पहाड़ों की पारंपरिक जीवनशैली सिर्फ पुरानी यादें नहीं हैं, बल्कि संकट के समय वही सबसे बड़ा सहारा बन जाती हैं। बदलते दौर में भले ही आधुनिक तकनीक ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया हो, लेकिन पहाड़ों में पूर्वजों की समझ और आत्मनिर्भरता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गैस सिलेंडर की इस समस्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ तालमेल ही पहाड़ी जीवन की असली ताकत है।

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