HIGHLIGHTS:
- रुबीना इकबाल खान का वंदे मातरम पर विवादित बयान
- धार्मिक आधार पर गायन से इनकार
- “देश की मिट्टी पर हमारा भी बराबर हक” बयान चर्चा में
- कांग्रेस से नाराजगी खुलकर सामने आई
- मुद्दे पर राजनीति और धर्म की बहस तेज
INDORE VANDE MATRAM ROW : मध्यप्रदेश। इंदौर में वंदे मातरम को लेकर विवाद बढ़ गया है। बता दें कि कांग्रेस की पार्षद रुबीना इकबाल खान ने कहा कि वे जनगणमन और अन्य देशभक्ति गीत गाती हैं, लेकिन वंदे मातरम के एक शब्द को नहीं बोलतीं। उनका कहना है कि इसे लेकर उन्हें दोष देने की कोशिश की जा रही है।
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केवल अल्लाह की इबादत करती हूँ?
रुबीना ने कहा कि वे इस्लाम का पालन करती हैं और केवल अल्लाह की इबादत करती हैं। उन्होंने बताया कि वंदे का अर्थ इबादत और मातरम का अर्थ धरती होता है। इसलिए उनका धार्मिक विश्वास उन्हें इस गीत का पूर्ण रूप से पालन करने से रोकता है।
मिट्टी पर समान अधिकार
उन्होंने आगे कहा कि इस देश की मिट्टी पर उनका उतना ही अधिकार है जितना किसी और का। उनका तर्क था कि जब वे मरती हैं तो उनके अवशेष इसी मिट्टी में रहते हैं, जबकि दूसरों के अवशेष गंगा नदी में बहा दिए जाते हैं।
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कांग्रेस से नाराजगी
रुबीना ने यह भी कहा कि कांग्रेस उन्हें समर्थन नहीं दे रही है। उन्होंने साफ किया कि वे निर्दलीय चुनाव जीतती हैं और किसी राजनीतिक दल पर निर्भर नहीं हैं।
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मंत्री सारंग का कड़ा बयान
मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने वंदे मातरम को लेकर स्पष्ट कहा कि हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम गाना ही होगा। उन्होंने कहा, “खाना यहां का और गाना कहीं और का यह नहीं चलेगा।” उनके अनुसार वंदे मातरम किसी धर्म विशेष का गीत नहीं है।
सारंग ने कहा, हिंदू धर्म में मातृभूमि सबसे ऊपर है, इस्लाम धर्म में भी मातृवतन सबसे ऊपर है। जो अपने मातृवतन की इज्जत नहीं करता, उसे जीने का अधिकार नहीं है। वंदे मातरम नहीं गा सकते तो पाकिस्तान चले जाएं।
बयान के बाद गरमाया माहौल!
रुबीना के बयान के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। जहां एक तरफ इसे राष्ट्रभक्ति से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह धर्म और व्यक्तिगत आस्था के अधिकार की बहस में बदल गया है।