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एकादशी पर चावल खाने की अनोखी परंपरा जगन्नाथ पुरी मंदिर का चमत्कारी रहस्य

नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर अपनी अद्भुत परंपराओं और रहस्यों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां भगवान जगन्नाथ की पूजा भक्ति और आस्था के विशेष नियमों के साथ की जाती है। इन्हीं नियमों में से एक ऐसा अनोखा नियम है जो एकादशी तिथि से जुड़ा हुआ है। आमतौर पर हिंदू धर्म में एकादशी के दिन चावल और अनाज का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित माना जाता है। व्रत रखने वाले भक्त इस दिन केवल फलाहार या निर्जल व्रत का पालन करते हैं। लेकिन जगन्नाथ पुरी मंदिर में इसका नियम बिल्कुल अलग है।

इस मंदिर में एकादशी के दिन भी भगवान को चावल का महाप्रसाद अर्पित किया जाता है और भक्त इसे श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि जो भक्त एकादशी का व्रत रखते हैं वे भी इस महाप्रसाद को स्वीकार करते हैं और इसके बावजूद उनका व्रत टूटता नहीं माना जाता। यह परंपरा श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का विषय है और इसे भगवान की विशेष कृपा के रूप में देखा जाता है।

मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर में भगवान स्वयं अपने भक्तों के नियमों से ऊपर हैं और यहां भक्ति सबसे बड़ा धर्म है। इसलिए यहां प्रसाद को सामान्य भोजन नहीं बल्कि दिव्य आशीर्वाद माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर में अर्पित किया गया भोजन पहले भगवान का हो जाता है और फिर प्रसाद के रूप में वितरित होता है। इसी कारण एकादशी जैसे पवित्र व्रत के नियम भी यहां भक्ति के आगे गौण हो जाते हैं।

पौराणिक कथाओं में इस परंपरा का एक रोचक प्रसंग भी मिलता है। कहा जाता है कि एक बार ब्रह्मा जी को भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करने की इच्छा हुई। जब वे मंदिर पहुंचे तब तक प्रसाद समाप्त हो चुका था। उसी समय उन्होंने एक कुत्ते को पत्तल में बचा हुआ चावल खाते देखा। ब्रह्मा जी ने बिना संकोच उस कुत्ते के साथ बैठकर वही प्रसाद ग्रहण किया। उस दिन एकादशी तिथि थी। यह दृश्य देखकर भगवान जगन्नाथ स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने घोषणा की कि अब से उनके महाप्रसाद पर एकादशी का कोई नियम लागू नहीं होगा।

एक अन्य मान्यता के अनुसार एकादशी के दिन चावल का संबंध महर्षि मेधा से बताया जाता है। कहा जाता है कि वे मां शक्ति के क्रोध से बचने के लिए अपने शरीर का त्याग कर चावल और जौ के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए एकादशी के दिन चावल का सेवन उनके शरीर का भाग माना जाता है और इसे वर्जित किया गया है। लेकिन जगन्नाथ पुरी में भक्ति और प्रसाद की दिव्यता इस नियम से ऊपर मानी जाती है। इसी कारण यह मंदिर आस्था और चमत्कार का अद्भुत केंद्र माना जाता है जहां नियम नहीं बल्कि भक्ति सर्वोपरि है।

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