इस अमर गीत को आवाज दी थी मुकेश ने और इसके संगीतकार थे शंकर जयकिशन। लेकिन इस गीत की आत्मा थे इसके गीतकार शैलेंद्र जिन्होंने अपने जीवन के सबसे कठिन दौर में इसे लिखा। कहा जाता है कि यह गीत उनके निजी दर्द और संघर्ष का आईना है।
दरअसल शैलेंद्र ने अपने करियर में एक फिल्म तीसरी कसम बनाई थी जिसे लेकर उन्हें काफी उम्मीदें थीं। लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इस असफलता ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। कर्ज का बोझ बढ़ता गया और मानसिक तनाव ने उन्हें घेर लिया। इसी दौर में उनके करीबी दोस्त राज कपूर ने उनसे अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का आग्रह किया।
जब शैलेंद्र राज कपूर से मिलने पहुंचे तो वे बेहद शांत और टूटे हुए नजर आए। राज कपूर ने फिल्म की कहानी और भावनाएं साझा कीं। उसी समय शैलेंद्र ने कागज पर गीत की शुरुआती पंक्तियां लिखीं। यह वही पंक्तियां थीं जो आगे चलकर इतिहास बन गईं। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। गीत पूरा होने से पहले ही शैलेंद्र की तबीयत बिगड़ गई और उनका निधन हो गया। उनके जाने से न केवल फिल्म जगत बल्कि राज कपूर भी गहरे सदमे में आ गए।
राज कपूर इस गीत को अधूरा नहीं छोड़ना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने शैलेंद्र के बेटे शैली शैलेंद्र को यह जिम्मेदारी सौंपी। बेटे ने पिता के अधूरे शब्दों को पूरा किया और इस गीत को एक मुकाम तक पहुंचाया। यह सिर्फ एक गीत नहीं रहा बल्कि पिता-पुत्र के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया।
फिल्म खुद भी संघर्ष की कहानी रही। राज कपूर ने इसे बनाने में अपनी पूरी पूंजी लगा दी यहां तक कि अपना घर भी गिरवी रख दिया। फिल्म बनने में करीब छह साल लगे लेकिन रिलीज के बाद यह बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं हो पाई। हालांकि समय के साथ यह फिल्म और इसका संगीत क्लासिक बन गया। आज जीना यहां मरना यहां सिर्फ एक गाना नहीं बल्कि जीवन की सच्चाई और संघर्ष की कहानी बन चुका है। यह हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी सबसे खूबसूरत कला सबसे गहरे दर्द से जन्म लेती है।