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लिपुलेख पर फिर गरमाया विवाद: भारत-चीन ने कैलाश यात्रा शुरू की, बालेन शाह सरकार के सामने कूटनीतिक परीक्षा


नई दिल्ली। लिपुलेख दर्रा एक बार फिर दक्षिण एशिया की कूटनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल 2026 को घोषणा की कि कैलाश मानसरोवर यात्रा इस साल जून से अगस्त के बीच होगी, जिसमें कुल 1,000 तीर्थयात्रियों को 20 बैचों में भेजा जाएगा 10 बैच उत्तराखंड के लिपुलेख पास से और 10 बैच सिक्किम के नाथू ला मार्ग से। यह आयोजन भारत सरकार और चीन सरकार के समन्वय से हो रहा है और ऑनलाइन आवेदन भी शुरू हो चुके हैं।

इसी फैसले ने नेपाल में एक नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। काठमांडू लंबे समय से लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को अपना हिस्सा बताता रहा है और उसका तर्क 1816 की सुगौली संधि, संविधान संशोधन और आधिकारिक नक्शे पर आधारित है। नेपाल ने अगस्त 2025 में भारत-चीन के लिपुलेख मार्ग खोलने के फैसले पर औपचारिक विरोध दर्ज कराया था, और तब भी कहा था कि यह क्षेत्र “नेपाल का अविभाज्य हिस्सा” है।

भारत ने नेपाल की आपत्ति को पहले भी खारिज किया है। नई दिल्ली का कहना है कि लिपुलेख मार्ग से सीमा व्यापार 1954 से जारी रहा है और हालिया व्यवस्था उसी पुरानी परंपरा की बहाली है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल के दावों को ऐतिहासिक रूप से अस्थिर और अवरोध पर आधारित नहीं बताया था, साथ ही सीमाई मुद्दों पर नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत की बात भी कही थी।

अब इस विवाद का राजनीतिक असर काठमांडू में और तेज महसूस हो रहा है। एक चर्चित रिर्पोट के मुताबिक, हरपाल की नई सरकार, जिसकी कमान रैपर-राजनेता बालेन शाह के हाथ में है, पहले ही भ्रष्टाचार और प्रशासनिक सुधार जैसे मुद्दों पर सक्रिय है। ऐसे में लिपुलेख का मामला उसके लिए कूटनीतिक परीक्षा बन गया है एक ऐसा मुद्दा जिसे घरेलू राष्ट्रवाद, चीन-भारत संबंधों और सीमा संप्रभुता, तीनों के चश्मे से देखा जा रहा है।

दरअसल, लिपुलेख सिर्फ एक पहाड़ी दर्रा नहीं, बल्कि हिमालयी भू-राजनीति का चौराहा है। यह भारत, नेपाल और चीन के त्रिकोणीय संवेदनशील क्षेत्र में आता है, और इसके जरिए होने वाला रास्ता धार्मिक यात्रा, व्यापार और सामरिक पहुंच तीनों दृष्टि से अहम है। यही वजह है कि यहां सड़क, तीर्थयात्रा और सीमा व्यापार, हर कदम पर राजनीतिक अर्थ ले लेते हैं।

कुल मिलाकर, लिपुलेख विवाद अब सिर्फ नक्शे का विवाद नहीं रहा। भारत-चीन के बीच यात्रा और व्यापार की बहाली, नेपाल की संप्रभुता संबंधी आपत्तियां और बालेन शाह-नेतृत्व वाली सरकार की प्रतिक्रिया इन सबने इस दर्रे को फिर से दक्षिण एशिया के सबसे गर्म जियो-पॉलिटिकल मोर्चों में बदल दिया है।

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