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ISBT से बसें चलाने का प्लान फिर फंसा, ऑपरेटरों की शर्तों पर बनी नई व्यवस्था


मध्य प्रदेश । ग्वालियर के बहुप्रतीक्षित इंटर स्टेट बस टर्मिनल (ISBT) से भिंड और मुरैना रूट की बसों का नियमित संचालन शुरू करने को लेकर एक बार फिर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। रविवार को बुलाई गई हाईलेवल बैठक में उम्मीद थी कि अंतिम तारीख तय हो जाएगी, लेकिन बस ऑपरेटरों की जिद के आगे प्रशासनिक निर्णय प्रभावित होते नजर आए और बैठक किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी।

बैठक में यह तय किया गया कि 15 जून से भिंड और मुरैना रूट की बसें फिलहाल पुराने बस स्टैंड से ही संचालित होंगी, जबकि नए ISBT को केवल ट्रायल स्टॉपेज के रूप में उपयोग किया जाएगा। इस ट्रायल अवधि में बसों को ISBT पर 10 मिनट रुकना अनिवार्य होगा, ताकि व्यवस्था का परीक्षण किया जा सके।

इसके साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि शहरभर में चलने वाली सभी वीडियो कोच और ई-बसों का संचालन भविष्य में ISBT से किया जाएगा, लेकिन इसे लेकर भी कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की गई है। बैठक में ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर, सांसद भारत सिंह कुशवाह, कलेक्टर रुचिका चौहान, पुलिस अधीक्षक धर्मवीर सिंह और अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

हालांकि बैठक के दौरान प्रशासन ने कई विकल्प सुझाए। ऊर्जा मंत्री और सांसद ने सुझाव दिया कि रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक बसें पुराने बस स्टैंड से और दिन के समय ISBT से संचालित की जाएं, ताकि धीरे-धीरे नई व्यवस्था लागू हो सके। लेकिन बस ऑपरेटरों ने सवारी मिलने की समस्या का हवाला देते हुए इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी।

कलेक्टर रुचिका चौहान ने स्पष्ट किया कि करोड़ों की लागत से बना ISBT शहर की बस व्यवस्था का केंद्र बनेगा और बसों को वहीं से चलाना अनिवार्य होगा। वहीं पुलिस अधीक्षक ने यात्रियों की सुविधा के लिए नए स्टॉपेज बनाने का सुझाव दिया, लेकिन यह भी ऑपरेटरों को स्वीकार नहीं हुआ।

बस ऑपरेटर यूनियन ने दावा किया कि ISBT पर यात्रियों की उपलब्धता कम है, इसलिए फिलहाल वहां से संचालन संभव नहीं है। उनका कहना है कि ट्रायल के दौरान स्थिति का आकलन किया जाएगा, जिसके बाद ही स्थायी निर्णय लिया जा सकेगा।

यह पहला मामला नहीं है जब ISBT से बस संचालन को लेकर समयसीमा तय होने के बावजूद व्यवस्था लागू नहीं हो सकी है। पहले भी कई बार तारीखें घोषित की गईं, लेकिन धरातल पर बदलाव नहीं हो सका। इससे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था और बस संचालन नीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। फिलहाल नई व्यवस्था 15 दिन के ट्रायल पर टिकी है और इसके परिणामों के आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा।

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