नई दिल्ली । भारत में घटती प्रजनन दर ने विशेषज्ञों और वैश्विक स्तर के निवेशकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। टेस्ला के सीईओ और अरबपति एलन मस्क ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस बात को उजागर किया कि भारत का कुल प्रजनन दर (TFR) अब रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे जाकर 1.9 पर आ गया है। उनका कहना है कि विशेष रूप से शिक्षित वर्ग में यह गिरावट कई सालों पहले शुरू हो गई थी और आने वाले समय में यह देश की जनसंख्या संरचना पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) की ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, भारत का TFR 1.9 प्रति महिला है। जनसंख्या को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बनाए रखने के लिए 2.1 का स्तर आवश्यक माना जाता है। 2023 में भारत ने चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने का गौरव हासिल किया था। अब घटती प्रजनन दर इस उपलब्धि के साथ नई चुनौती प्रस्तुत कर रही है।
भारत में राज्यों के बीच प्रजनन दर का असंतुलन भी स्पष्ट है। उच्च TFR वाले राज्यों में बिहार, मेघालय और उत्तर प्रदेश शामिल हैं, जहां 2.7 से 3.0 के बीच प्रजनन दर दर्ज की गई है। वहीं, दिल्ली का TFR 1.2 पर है, जो फिनलैंड जैसे विकसित देशों से भी कम है। तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों में भी प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है। इस असंतुलन ने नीति निर्धारकों के सामने क्षेत्रीय चुनौतियों को बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रजनन दर में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। उच्च शिक्षा के बढ़ते स्तर ने महिलाओं में परिवार नियोजन और जन्म संख्या को लेकर जागरूकता बढ़ाई है। शहरीकरण, शहरों में रहने की महंगी लागत और छोटे घरों की समस्या ने युवा जोड़ों को छोटे परिवार अपनाने के लिए प्रेरित किया है। देर से विवाह, करियर की प्राथमिकताएं और गर्भनिरोधक साधनों की आसान उपलब्धता ने भी परिवार के आकार को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
महिला स्वास्थ्य और मातृ सुरक्षा के मामले में चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। कम उम्र में विवाह और गर्भधारण के कारण 24 वर्ष से कम आयु की महिलाओं में मातृ मृत्यु दर अधिक है। इसके अलावा समाज में महिलाओं की स्थिति और जन्म के समय लिंगानुपात का असंतुलन भी देश के लिए बड़ा सामाजिक मुद्दा बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि घटती प्रजनन दर से भारत की जनसंख्या संरचना में बदलाव आएगा। युवा और श्रमशील आबादी का अनुपात धीरे-धीरे घट सकता है, जिससे आर्थिक विकास और सामाजिक सुरक्षा पर प्रभाव पड़ सकता है। नीति निर्माताओं के लिए यह चुनौती है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संरचना के माध्यम से संतुलन बनाए रखें।
अंतरराष्ट्रीय निवेशक और विशेषज्ञ इस बात पर ध्यान दे रहे हैं कि भारत जैसे तेजी से बढ़ते देश में प्रजनन दर की गिरावट आर्थिक और सामाजिक रणनीतियों को प्रभावित कर सकती है। उच्च शिक्षा, महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और परिवार नियोजन नीतियां अब न केवल सामाजिक सुधार, बल्कि भविष्य की जनसंख्या सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण हो गई हैं।