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मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर


नई दिल्ली ।देश के कई हिस्सों में मानसून की दस्तक के बावजूद अपेक्षित बारिश नहीं होने से चिंता बढ़ रही है। इसी बीच प्रशांत महासागर से सामने आए नए वैज्ञानिक संकेतों ने मौसम विशेषज्ञों और किसानों की बेचैनी और बढ़ा दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली अल नीनो प्रणाली विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो रही है। यदि यह और मजबूत होती है तो इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न के साथ भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कई हिस्सों में समुद्र की सतह सामान्य से अधिक ऊंची दर्ज की गई है। यह स्थिति इस बात का संकेत मानी जाती है कि समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो वह फैलता है और समुद्र की सतह का स्तर बढ़ जाता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर अल नीनो की स्थिति को जन्म देती है।

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। इसके प्रभाव केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते बल्कि यह दुनिया के कई देशों में मौसम के स्वरूप को बदल सकती है। कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी पड़ सकती है तो कुछ स्थानों पर सामान्य से कम या अधिक वर्षा देखने को मिल सकती है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां वर्ष 1997 में बने अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो से कुछ हद तक मेल खाती हैं। उस समय विकसित हुई प्रणाली को गॉडजिला अल नीनो कहा गया था क्योंकि उसके प्रभाव व्यापक और बेहद गंभीर थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं तो आने वाले महीनों में इसका असर और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

विशेषज्ञों ने समुद्र में बनने वाली गर्म पानी की विशाल लहरों पर भी ध्यान दिलाया है। इन्हें केल्विन वेव कहा जाता है जो हजारों किलोमीटर तक फैल सकती हैं और समुद्री तापमान में तेजी से बदलाव लाती हैं। ऐसी गतिविधियां आमतौर पर अल नीनो के मजबूत होने का संकेत मानी जाती हैं।

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। यदि अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है या वर्षा का वितरण असंतुलित होता है तो खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।

हालांकि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रारंभिक संकेतों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। आने वाले हफ्तों में समुद्री तापमान और मौसमीय गतिविधियों की लगातार निगरानी की जाएगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अल नीनो कितना मजबूत होगा और उसका वास्तविक प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ेगा।

फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय की नजर प्रशांत महासागर की बदलती परिस्थितियों पर टिकी हुई है, क्योंकि इनके परिणाम आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम और भारत के मानसून की दिशा तय कर सकते हैं।

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