बताया जाता है कि वर्ष 1958 के दौरान किशोर कुमार आयकर से जुड़े मामलों में उलझे हुए थे। उन पर टैक्स का बड़ा बकाया था और इसी परेशानी से निकलने के लिए उन्होंने एक अलग ही योजना बनाई। उनका विचार था कि यदि वह एक ऐसी फिल्म बनाएंगे जो बॉक्स ऑफिस पर असफल हो जाएगी तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान होगा। इस नुकसान को आय में समायोजित करके टैक्स का बोझ कम किया जा सकेगा।
इसी सोच के साथ उन्होंने निर्देशक सत्येन बोस के साथ मिलकर चलती का नाम गाड़ी का निर्माण शुरू किया। फिल्म में मधुबाला को मुख्य भूमिका दी गई जबकि किशोर कुमार अपने भाइयों के साथ पर्दे पर नजर आए। इस फिल्म का निर्माण हिंदी के साथ साथ बंगाली भाषा में भी किया गया जहां इसे लुकचुरी नाम से रिलीज किया गया।
कहा जाता है कि किशोर कुमार मन ही मन यही चाहते थे कि फिल्म दर्शकों को पसंद न आए और उनकी योजना सफल हो जाए। लेकिन रिलीज के बाद कहानी पूरी तरह बदल गई। फिल्म को दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला और यह उस दौर की सबसे बड़ी सफल फिल्मों में शामिल हो गई। अपनी शानदार कॉमेडी दमदार अभिनय और यादगार गीतों की वजह से फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई की और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चलती रही।
करीब 35 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख रुपये का कारोबार किया जबकि दुनिया भर में इसकी कमाई करीब ढाई करोड़ रुपये तक पहुंच गई। उस समय के हिसाब से यह बेहद बड़ी सफलता मानी गई। फिल्म की अप्रत्याशित कामयाबी ने किशोर कुमार की टैक्स बचाने की पूरी योजना पर पानी फेर दिया क्योंकि नुकसान दिखाने की जगह उन्हें बड़ा मुनाफा हो गया।
बताया जाता है कि आयकर से जुड़ा उनका मामला लंबे समय तक अदालतों में चलता रहा। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का सकारात्मक पहलू यह रहा कि भारतीय सिनेमा को एक ऐसी क्लासिक कॉमेडी फिल्म मिली जिसे आज भी दर्शक पूरे परिवार के साथ देखना पसंद करते हैं। चलती का नाम गाड़ी समय के साथ एक यादगार फिल्म बन गई और इसके गीत तथा किरदार आज भी लोगों की यादों में ताजा हैं। यही वजह है कि किशोर कुमार का यह अनोखा किस्सा आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच मुस्कान बिखेर देता है।