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अब घुटना प्रत्यारोपण नहीं रहा मुश्किल आधुनिक रोबोटिक तकनीक से कम दर्द और तेजी से रिकवरी का दावा


इंदौर । घुटनों के दर्द से परेशान मरीजों के लिए राहत देने वाली खबर इंदौर से सामने आई है। शहर में आयोजित मॉडर्न आर्थ्रोप्लास्टी कोर्स मेक 2026 के दौरान देशभर के जॉइंट रिप्लेसमेंट विशेषज्ञों ने बताया कि यदि मरीज शुरुआती चरण में ही विशेषज्ञ डॉक्टर से उपचार शुरू करा लें तो बड़ी सर्जरी से बचा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 40 से 60 प्रतिशत मामलों में पूरे घुटने को बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि केवल प्रभावित हिस्से का पार्शियल नी रिप्लेसमेंट कर मरीज को सामान्य और सक्रिय जीवन वापस दिया जा सकता है।

एसोसिएशन ऑफ ऑर्थोपेडिक सर्जन्स ऑफ इंदौर के तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में नागपुर दिल्ली भोपाल और इंदौर सहित कई शहरों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान आधुनिक तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की गई और तीन लाइव सर्जरी का प्रदर्शन भी किया गया ताकि चिकित्सकों को नई तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी मिल सके।

कोर्स चेयरमैन और रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ विनय तंतुवाय ने बताया कि अधिकांश मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब घुटनों का दर्द काफी बढ़ चुका होता है। ऐसे में कई बार पूरा घुटना बदलना मजबूरी बन जाता है। यदि शुरुआती अवस्था में इलाज शुरू हो जाए तो केवल खराब हिस्से को बदलकर मरीज को राहत दी जा सकती है। इस प्रक्रिया के बाद मरीज पालथी मारकर बैठने और उकड़ू बैठने जैसी सामान्य गतिविधियां भी आसानी से कर सकता है। उन्होंने बताया कि सही तरीके से किया गया पार्शियल नी रिप्लेसमेंट 20 से 25 वर्षों तक प्रभावी रह सकता है।

नागपुर के रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट विशेषज्ञ डॉ उन्मेष महाजन ने बताया कि रोबोटिक तकनीक ने घुटना प्रत्यारोपण की सटीकता को नई ऊंचाई दी है। रोबोट की मदद से इम्प्लांट को बिल्कुल सही स्थान पर लगाया जाता है जिससे आसपास के लिगामेंट और ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि मरीज को कम दर्द होता है और वह पहले की तुलना में तेजी से स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट सकता है। आधुनिक इम्प्लांट अब 25 से 30 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

दिल्ली के विशेषज्ञ डॉ निखिल वलसंकर ने बताया कि अब ऑपरेशन से पहले मरीज का सीटी स्कैन कर उसका थ्री डी मॉडल तैयार किया जाता है। इससे सर्जरी की पूरी योजना पहले ही बन जाती है और इम्प्लांट को सटीक स्थान पर लगाया जा सकता है। यही कारण है कि वर्तमान समय में घुटना प्रत्यारोपण सर्जरी की सफलता दर 97 से 98 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि बदलती जीवनशैली बढ़ता मोटापा और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण अब कम उम्र के लोगों में भी घुटनों की समस्या तेजी से बढ़ रही है। सामान्य तौर पर 60 से 70 वर्ष की आयु में घुटना प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है लेकिन गंभीर स्थिति होने पर 45 वर्ष की आयु के बाद भी यह सर्जरी की जा सकती है।

डॉ निखिल वलसंकर ने कहा कि शुरुआती चरण में ओजोन थेरेपी और पीआरपी जैसी वैकल्पिक उपचार पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है लेकिन इनके परिणामों को लेकर अभी पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए किसी भी प्रकार का उपचार शुरू करने से पहले विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है।

जीआरएमसी के डीन डॉ आरकेएस धाकड़ ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित योजना रोबोटिक तकनीक और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों ने घुटना प्रत्यारोपण को पहले से अधिक सुरक्षित सटीक और कम दर्द वाला बना दिया है। नई तकनीकों की मदद से मरीजों को तेजी से राहत मिल रही है और उनके जीवन की गुणवत्ता में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल रहा है।

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