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सनसनीखेज हत्याकांड के बाद लोहगढ़ फोर्ट में उमड़ी पर्यटकों की अनियंत्रित भीड़, ऐतिहासिक स्थलों के बदलते स्वरूप पर उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली । महाराष्ट्र के पुणे के निकट स्थित ऐतिहासिक लोहगढ़ किला इन दिनों अपनी गौरवशाली सैन्य विरासत और छत्रपति शिवाजी महाराज व पेशवाओं के शौर्य इतिहास के बजाय एक बेहद विचलित करने वाली वजह से देश भर में चर्चा का विषय बन गया है। हाल ही में इस किले में घटित हुए केतन अग्रवाल हत्याकांड के बाद से यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि किले में पहुँचने वाले इन नए पर्यटकों की रुचि इस ऐतिहासिक स्थल की वास्तुकला या इसके समृद्ध सांस्कृतिक अतीत को जानने में नहीं है, बल्कि वे उस विशिष्ट स्थान और गहरी खाई को देखने के लिए उत्सुक हैं जहाँ कथित तौर पर सिया गोयल ने अपने मंगेतर को धक्का देकर मौत के घाट उतार दिया था। स्थानीय स्तर पर और सोशल मीडिया पर इस त्रासदीपूर्ण स्थान को ‘सिया पॉइंट’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जिसने समाज के एक बड़े वर्ग को चिंता में डाल दिया है।

इस घटना के बाद से लोहगढ़ किले में सप्ताहांत पर पर्यटकों की इतनी भारी भीड़ जमा हो रही है कि किले के संकरे रास्तों पर कई बार घंटों तक जाम की स्थिति बन जाती है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और तस्वीरों से स्पष्ट है कि लोग उस खौफनाक मर्डर स्पॉट पर जाकर तस्वीरें खिंचवाने, सेल्फी लेने और रील बनाने की होड़ में लगे हैं। किसी अपराध स्थल या त्रासदी की जगह को एक पर्यटन स्थल के रूप में देखने की इस बढ़ती प्रवृत्ति को समाजशास्त्री और विशेषज्ञ ‘डार्क टूरिज्म’ (Dark Tourism) का नाम दे रहे हैं। जब लोग किसी ऐसी जगह की यात्रा करते हैं जिसका इतिहास या वर्तमान मृत्यु, विनाश, मानवीय त्रासदी या किसी जघन्य अपराध से जुड़ा हो, तो उसे इस श्रेणी में रखा जाता है। भारत में इस तरह का यह कोई पहला मामला नहीं है; इससे पहले मेघालय के चेरापूंजी में भी एक ऐसी ही पारिवारिक हत्या के बाद उस पहाड़ी को ‘सोनम पॉइंट’ कहा जाने लगा था और दिल्ली का कुख्यात बुराड़ी घर भी इसी तरह की उत्सुकता का केंद्र बना था।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर डार्क टूरिज्म का एक ऐतिहासिक और गंभीर स्वरूप रहा है, जैसे पोलैंड का ऑशविट्ज़ प्रताड़ना शिविर या जलियांवाला बाग, जहाँ लोग इतिहास की त्रासदियों से सीख लेने, शोक संवेदना प्रकट करने और शहीदों को श्रद्धांजलि देने जाते हैं। इसके विपरीत, वर्तमान समय में सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण जो नया डार्क टूरिज्म उभर रहा है, वह बेहद सतही और केवल सनसनीखेज मामलों से प्रेरित है। लोग केवल अपनी जिज्ञासा शांत करने और इंटरनेट पर डिजिटल सामग्री (रील्स और मीम्स) के माध्यम से व्यूज और लाइक्स बटोरने के लिए इन संवेदनशील और दर्दनाक स्थानों का रुख कर रहे हैं। किसी की असामयिक और क्रूर मौत को मनोरंजन या सोशल मीडिया कंटेंट का जरिया बना लेना एक बेहद खतरनाक सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करता है।

इस पूरे प्रकरण ने पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन और इतिहासकारों के सामने भी एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। सदियों पुराना लोहगढ़ किला, जो कभी मराठा साम्राज्य की सामरिक शक्ति का प्रतीक था और जहाँ लोग इतिहास की वीर गाथाओं को महसूस करने आते थे, उसकी पहचान को एक आपराधिक घटना के नाम पर री-ब्रांड करने की कोशिश की जा रही है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि किसी ऐतिहासिक धरोहर के महत्व को इस तरह कमतर करना और उसे एक नकारात्मक छवि के साथ जोड़ना हमारी आने वाली पीढ़ियों के दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है। प्रशासन के लिए भी इस प्रकार की अनियंत्रित और संवेदनहीन भीड़ को संभालना एक बड़ी कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की समस्या बनता जा रहा है।

लोहगढ़ किले की इस बदलती तस्वीर ने अंततः सामूहिक सामाजिक चेतना पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। चंद लाइक्स और कमेंट्स की चाहत में इंसानी संवेदनाओं और किसी परिवार के गहरे दुख का मजाक उड़ाने का यह चलन यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक समाज के रूप में हम कितने असंवेदनशील होते जा रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि न केवल प्रशासन ऐसे संवेदनशील स्थलों पर रील बनाने और अनुचित फोटोग्राफी पर कड़े प्रतिबंध लगाए, बल्कि नागरिक समाज भी यह आत्मनिरीक्षण करे कि मनोरंजन और उत्सुकता की सीमा कहाँ समाप्त होनी चाहिए। किसी भी ऐतिहासिक स्थल की गरिमा को अक्षुण्ण रखना और मानवीय त्रासदियों के प्रति सम्मानजनक मौन बनाए रखना ही एक परिपक्व समाज की पहचान है।

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