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राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग फिर चर्चा में, कानूनी अड़चनें, सामाजिक बहस और राजनीतिक सहमति की चुनौती बरकरार

नई दिल्ली । देश में राष्ट्रीय पुरुष आयोग के गठन की मांग एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है। महिला आयोग, बाल अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और अन्य वैधानिक संस्थाओं की तरह पुरुषों के लिए भी एक अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए जाने की मांग पिछले कई वर्षों से उठती रही है। हालांकि यह मुद्दा समय-समय पर चर्चा में आने के बावजूद अब तक किसी ठोस कानूनी रूप में सामने नहीं आ सका है। इसके पीछे कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई तरह की चुनौतियां बताई जाती हैं।

हाल के वर्षों में पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, आत्महत्या के मामलों और कुछ कानूनों के कथित दुरुपयोग को लेकर कई संगठनों ने अलग आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया है। समर्थकों का कहना है कि पुरुषों से जुड़े ऐसे मामलों की सुनवाई और अध्ययन के लिए एक समर्पित संस्थागत व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे उनकी शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से सुना जा सके और आवश्यक सुझाव सरकार तक पहुंच सकें।

राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग को लेकर न्यायपालिका और संसद दोनों स्तरों पर प्रयास किए गए हैं। इस विषय पर जनहित याचिकाएं दायर हुईं और एक निजी सदस्य विधेयक भी प्रस्तुत किया गया। हालांकि अब तक यह पहल कानून का रूप नहीं ले सकी है। संसदीय प्रक्रिया में निजी सदस्य विधेयकों का कानून बनना अत्यंत दुर्लभ माना जाता है और इस विषय पर सरकार की ओर से भी अब तक कोई आधिकारिक विधेयक पेश नहीं किया गया है।

इस मुद्दे पर सबसे बड़ी बहस यह है कि क्या पुरुष आयोग की स्थापना से मौजूदा महिला आयोग या महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर कोई प्रभाव पड़ेगा। आयोग के समर्थकों का कहना है कि उनका उद्देश्य महिला आयोग का विकल्प तैयार करना नहीं, बल्कि पुरुषों से जुड़े मामलों के लिए एक अतिरिक्त संस्थागत व्यवस्था बनाना है। उनका तर्क है कि दोनों आयोग समानांतर रूप से काम कर सकते हैं और किसी भी वर्ग के अधिकारों को कमजोर किए बिना न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाया जा सकता है।

वहीं दूसरी ओर कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, भेदभाव और असमानता अब भी गंभीर चुनौती बनी हुई है। उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि पुरुष आयोग का गठन किया जाता है तो उसकी भूमिका, अधिकार और दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक होगा, ताकि किसी प्रकार का कानूनी टकराव उत्पन्न न हो।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पुरुषों से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक विवाद, सामाजिक दबाव और आत्महत्या जैसे विषयों पर अधिक शोध और विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता है। यदि भविष्य में इस दिशा में कोई संस्थागत व्यवस्था बनती है तो वह नीति निर्माण, शोध, परामर्श सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उपयोगी भूमिका निभा सकती है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा समान रूप से हो और किसी भी वर्ग के हित प्रभावित न हों।

फिलहाल राष्ट्रीय पुरुष आयोग का गठन केवल प्रस्ताव और बहस के स्तर पर है। इसके कानून बनने के लिए सरकार की पहल, व्यापक राजनीतिक सहमति और संसद की मंजूरी आवश्यक होगी। ऐसे में आने वाले समय में यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है, यह सरकार के रुख, संसदीय प्रक्रिया और समाज में बनने वाली व्यापक सहमति पर निर्भर करेगा।

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