स्थानीय लोगों की मान्यता है कि मां कोटगाड़ी देवी का यह दरबार न्याय का अंतिम स्थान है। जब किसी व्यक्ति को अदालत पुलिस या समाज से न्याय नहीं मिलता तब वह पूरी आस्था के साथ माता के दरबार में अपनी फरियाद लेकर पहुंचता है। श्रद्धालु अपनी समस्या को लिखकर माता के चरणों में अर्पित करते हैं और विश्वास रखते हैं कि मां स्वयं उनके साथ हुए अन्याय का समाधान करती हैं।
इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा लोहे का हथौड़ा चढ़ाने की है। माना जाता है कि हथौड़ा न्याय शक्ति और कठोर निर्णय का प्रतीक है। जिस प्रकार अदालत में न्याय का प्रतीक हथौड़ा माना जाता है उसी तरह यहां भक्त न्याय मिलने के बाद माता का आभार व्यक्त करने के लिए लोहे का हथौड़ा अर्पित करते हैं। कई श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार तांबे का त्रिशूल या पीतल की घंटी भी भेंट करते हैं। मंदिर परिसर में लगे हजारों हथौड़े इस अनूठी परंपरा और भक्तों की अटूट आस्था की गवाही देते हैं।
ग्रामीणों का विश्वास है कि मां कोटगाड़ी देवी के दरबार में झूठ और छल की कोई जगह नहीं है। यदि कोई व्यक्ति झूठी शपथ लेकर किसी निर्दोष को फंसाने का प्रयास करता है तो उसे अपने कर्मों का दंड अवश्य मिलता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में लोग माता के दरबार में असत्य बोलने से भी डरते हैं और न्याय के प्रति गहरी आस्था रखते हैं।
हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु देश के अलग अलग हिस्सों से यहां पहुंचते हैं। कोई पारिवारिक विवाद लेकर आता है तो कोई जमीन के मामले में न्याय की उम्मीद करता है। कई लोग वर्षों बाद अपनी मनोकामना पूरी होने पर फिर मंदिर पहुंचकर माता के चरणों में हथौड़ा अर्पित करते हैं और धन्यवाद देते हैं। यही विश्वास इस मंदिर को देश के सबसे अनोखे धार्मिक स्थलों में शामिल करता है।
चारों ओर फैले शांत पहाड़ और आध्यात्मिक वातावरण इस मंदिर की दिव्यता को और भी विशेष बना देते हैं। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते बल्कि मानसिक शांति और आत्मविश्वास का भी अनुभव करते हैं। मां कोटगाड़ी देवी का यह पवित्र धाम आज भी आस्था न्याय और विश्वास का अद्भुत संगम बना हुआ है। यदि कभी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की यात्रा करें तो इस अनोखे मंदिर के दर्शन अवश्य करें जहां लोगों का विश्वास है कि सच्ची श्रद्धा और निष्कलंक मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।