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आंध्र प्रदेश के नागप्पा परिवार में हैं 83 सदस्य और 6 पीढ़ियां, लेकिन रसोई एक, बना संयुक्त परिवार की मिसाल


नई दिल्‍ली । आजकल संयुक्त परिवार धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं. लोग अब न्यूक्लियर फैमिली की तरफ बढ़ रहे हैं. नौकरी, पढ़ाई और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग अलग-अलग शहरों में बस जाते हैं. ऐसे समय में आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के कुरलपल्ली गांव का नागप्पा परिवार लोगों के लिए एक मिसाल बनकर सामने आया है.

इस परिवार में कुल 83 सदस्य रहते हैं. खास बात यह है कि परिवार छह पीढ़ियों तक फैला हुआ है और आज भी सभी लोग मिल-जुलकर एक परिवार की तरह रहते हैं. भले ही वे चार अलग-अलग मकानों में रहते हों, लेकिन उनकी जिंदगी पूरी तरह एक ही परिवार की तरह चलती है.

परिवार में कौन-कौन हैं?
इस बड़े परिवार की अगुवाई हनुमंतरायुडु और मुथ्यालप्पा करते हैं. परिवार में छह सास, 14 बहुएं, 20 बच्चे, दादा-दादी, नाना-नानी और कई बुजुर्ग सदस्य शामिल हैं. इतने बड़े परिवार को संभालना आसान नहीं होता, लेकिन यहां हर सदस्य की अपनी जिम्मेदारी तय है. घर के छोटे-बड़े सभी लोग एक-दूसरे का सहयोग करते हैं. यही वजह है कि इतने सारे लोगों के साथ रहने के बावजूद परिवार में अनुशासन और तालमेल बना रहता है.

हर सुबह होती है परिवार की मीटिंग
इस परिवार की सबसे खास बात इसकी हर रोज की दिनचर्या है. हर सुबह घर के बड़े सदस्य एक साथ बैठकर चाय या कॉफी पीते हैं और पूरे दिन की योजना बनाते हैं. इसी बैठक में तय होता है कि कौन खेत में जाएगा, कौन घर के काम संभालेगा और उस दिन खाने में क्या बनेगा. सभी जिम्मेदारियां पहले ही बांट दी जाती हैं, जिससे किसी पर जरूरत से ज्यादा बोझ नहीं पड़ता. परिवार के लोग मानते हैं कि दिन की शुरुआत अगर मिलकर की जाए तो बाकी काम भी आसानी से पूरे हो जाते हैं.

चार घर, लेकिन रसोई सिर्फ एक
आज के समय में हर घर की अपनी अलग रसोई होती है, लेकिन नागप्पा परिवार में ऐसा नहीं है. यहां चार मकानों में रहने के बावजूद पूरे परिवार का खाना एक ही रसोई में तैयार होता है. राशन खरीदने से लेकर सब्जियां लाने तक की जिम्मेदारी बड़े सदस्य निभाते हैं. वहीं परिवार की बहुएं मिलकर पूरे परिवार के लिए खाना बनाती हैं. एक साथ बैठकर खाना खाना इस परिवार की पुरानी परंपरा है. उनका मानना है कि साथ बैठकर खाना खाने से रिश्तों में अपनापन बना रहता है.

खेती के साथ बसों का भी कारोबार
इस परिवार की कमाई का जरिया सिर्फ खेती नहीं है. खेती के अलावा परिवार मिलकर ट्रांसपोर्ट का कारोबार भी करता है. परिवार के पास चार बसें हैं, जो कल्याणदुर्गम से कर्नाटक के कई इलाकों के बीच चलती हैं. खेती और बसों से होने वाली पूरी कमाई एक ही जगह जमा होती है. इसके बाद जरूरत के हिसाब से खर्च किया जाता है. इसका मतलब यहां कोई अपनी अलग कमाई नहीं रखता. परिवार की आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह सामूहिक है.

इतने बड़े परिवार में कैसे नहीं होते झगड़े?
83 लोगों के साथ रहने पर मतभेद होना स्वाभाविक है. परिवार के सदस्य भी मानते हैं कि कभी-कभी अलग-अलग राय सामने आती हैं. हालांकि, उनका नियम साफ है कि कोई भी विवाद अगले दिन तक नहीं जाना चाहिए. अगर किसी बात पर बहस होती है तो उसी दिन बैठकर उसका समाधान निकाल लिया जाता है. बुजुर्गों का कहना है कि आपसी सम्मान, धैर्य और बातचीत ही इतने बड़े परिवार को एक साथ जोड़े रखने का सबसे बड़ा कारण है.

बच्चों को भी मिलती है परिवार की सीख
इस संयुक्त परिवार में बड़े-बुजुर्ग सिर्फ फैसले नहीं लेते, बल्कि बच्चों को परिवार की परंपराएं और संस्कार भी सिखाते हैं. बच्चे अपने दादा-दादी और अन्य बुजुर्गों के साथ समय बिताते हैं. उन्हें बचपन से ही मिलकर रहने, जिम्मेदारियां निभाने और बड़ों का सम्मान करने की सीख दी जाती है. परिवार के लोगों का मानना है कि यही वजह है कि नई पीढ़ी भी संयुक्त परिवार की अहमियत समझ रही है.

सोशल मीडिया पर लोग कर रहे तारीफ
इस परिवार की कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग इसकी जमकर तारीफ कर रहे हैं. कई यूजर्स ने लिखा कि आज के समय में जहां छोटी-छोटी बातों पर परिवार टूट जाते हैं, वहां 83 लोगों का एक साथ रहना किसी मिसाल से कम नहीं है. कुछ लोगों ने कहा कि यह परिवार बताता है कि अगर आपसी भरोसा और सहयोग हो तो बड़ा परिवार भी खुशी-खुशी रह सकता है.

बदलते दौर में भी कायम है परंपरा
संयुक्त परिवारों की संख्या लगातार घट रही है. ऐसे समय में नागप्पा परिवार यह साबित करता है कि अगर रिश्तों को महत्व दिया जाए तो पीढ़ियां भी एक साथ रह सकती हैं. यह परिवार सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि सहयोग, अनुशासन और भरोसे की ऐसी मिसाल है, जो आज के दौर में बहुत कम देखने को मिलती है. 83 लोगों का यह परिवार दिखाता है कि खुशहाल जिंदगी सिर्फ बड़े घर से नहीं, बल्कि बड़े दिल और मजबूत रिश्तों से बनती है.

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