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कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आचार्य प्रशांत बोले: जलवायु संकट की जड़ मानव मन की अधूरी समझ

नई दिल्ली, 31 मई। दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने शुक्रवार को यूके के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आयोजित एक विशेष संवाद सत्र में कहा कि मानवता के सामने खड़े सबसे बड़े संकट, विशेषकर जलवायु परिवर्तन, केवल तकनीकी समाधान या नीतिगत हस्तक्षेपों से नहीं सुलझाए जा सकते। उनके अनुसार इन समस्याओं की वास्तविक जड़ मनुष्य के आंतरिक जीवन और उसकी अनियंत्रित इच्छाओं में निहित है।

ऐतिहासिक कैम्ब्रिज यूनियन में आयोजित इस फायर-साइड चैट में बड़ी संख्या में छात्र, शिक्षाविद् और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में आचार्य प्रशांत ने आधुनिक सभ्यता के विकास, उपभोगवाद, जलवायु संकट और आंतरिक शिक्षा की आवश्यकता पर विस्तार से अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि मानवता ने विज्ञान, तकनीक और आर्थिक विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन मनुष्य के भीतर की समझ और आत्मबोध को विकसित करने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। उनके अनुसार बाहरी विकास और आंतरिक अपरिपक्वता का यही असंतुलन आज वैश्विक संकटों का कारण बन रहा है।

आचार्य प्रशांत ने कहा कि शिक्षा संस्थान लोगों को कौशल और ज्ञान तो प्रदान करते हैं, लेकिन जीवन के मूलभूत प्रश्नों—जैसे इच्छा, अहंकार, संतोष और आत्मपहचान—पर गंभीर चिंतन को शायद ही कभी स्थान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक स्वयं समस्या नहीं हैं, बल्कि समस्या उस मानसिकता में है जो उनका उपयोग करती है।

जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि केवल तकनीकी दक्षता बढ़ाने से उपभोग कम नहीं होता। इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि नई तकनीकों ने संसाधनों की खपत को और बढ़ाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उपभोग को संचालित करने वाली मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को नहीं समझा गया, तो कोई भी तकनीकी समाधान स्थायी परिणाम नहीं दे पाएगा।

संवाद के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु संकट का समाधान किसी अतिरिक्त प्रयास में नहीं, बल्कि अनावश्यक गतिविधियों और अत्यधिक उपभोग को रोकने में निहित है। उनके अनुसार मानवता को लगातार अधिक करने की बजाय यह समझने की आवश्यकता है कि क्या करना बंद किया जाना चाहिए।

पूर्व और पश्चिम के बीच संवाद तथा विभिन्न विचारधाराओं के बीच सेतु निर्माण के प्रश्न पर उन्होंने आंतरिक ईमानदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने उपनिषदों में वर्णित ‘विद्या’ और ‘अविद्या’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आधुनिक सभ्यता ने बाहरी ज्ञान में तो उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन आंतरिक बोध की उपेक्षा की है।

अपने व्यक्तिगत जीवन की चर्चा करते हुए आचार्य प्रशांत ने बताया कि तकनीक और प्रबंधन की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि समाज की अधिकांश समस्याओं की जड़ मानवीय चेतना और आंतरिकता से जुड़ी हुई है। इसी समझ ने उन्हें अध्यात्म और आत्मबोध के क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने बताया कि उनके द्वारा संचालित अध्ययन कार्यक्रमों में छात्र उपनिषदों, भगवद्गीता, बौद्ध दर्शन और अन्य वैश्विक ज्ञान परंपराओं के माध्यम से जीवन और मनुष्य की प्रकृति को समझने का प्रयास करते हैं।

कार्यक्रम के अंत में आचार्य प्रशांत ने कहा कि विज्ञान, अर्थशास्त्र, व्यापार और चिकित्सा जैसे सभी क्षेत्र अंततः मानव कल्याण के लिए हैं, लेकिन जब तक निर्णय लेने वाले मनुष्य की चेतना और समझ विकसित नहीं होगी, तब तक व्यवस्थाएँ अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगी। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह मानव मनोविज्ञान, लालच और अनियंत्रित इच्छाओं से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है।

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