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अल नीनो और बदलते मौसम के बीच किसानों के लिए अलर्ट: तैयारी ही बनेगी सबसे बड़ी ताकत


मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश के किसानों के लिए खरीफ सीजन हमेशा उम्मीदों और चुनौतियों का संगम लेकर आता है। खेती की सफलता काफी हद तक मानसून पर निर्भर रहती है और यही वजह है कि भारतीय कृषि को अक्सर मानसून का जुआ कहा जाता है। इस वर्ष भी मौसम का मिजाज सामान्य नहीं दिख रहा है। प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो की स्थिति और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने किसानों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश में मानसून 20 जून के बाद दक्षिण-पूर्वी हिस्सों से प्रवेश कर सकता है, लेकिन बारिश का वितरण सामान्य रहेगा या नहीं, इस पर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।

ऐसे हालात में किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सलाह यही है कि वे जल्दबाजी में बुवाई न करें। मानसून की पहली बारिश होते ही खेतों में बीज डाल देना कई बार भारी नुकसान का कारण बन जाता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खेत में कम से कम तीन से चार इंच अच्छी वर्षा होने और मिट्टी के भीतर पर्याप्त नमी पहुंचने के बाद ही बोनी की जानी चाहिए। यदि मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होगी तो बीज अंकुरित नहीं होंगे या सड़ सकते हैं, जिससे दोबारा बुवाई की नौबत आ सकती है।

किसानों को अपनी मिट्टी की प्रकृति को समझना भी बेहद जरूरी है। मध्य प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में काली मिट्टी पाई जाती है, जो नमी को लंबे समय तक रोककर रख सकती है। अच्छी बारिश के बाद यह मिट्टी 15 से 20 दिनों तक फसल को नमी प्रदान कर सकती है। वहीं दोमट मिट्टी में यह क्षमता 7 से 10 दिनों तक सीमित रहती है, जबकि रेतीली मिट्टी केवल 3 से 5 दिन तक ही नमी बनाए रख पाती है। इसलिए बोनी और सिंचाई की रणनीति मिट्टी की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही बनाई जानी चाहिए।

अल नीनो के प्रभाव वाले इस सीजन में फसल विविधीकरण भी किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पूरे खेत में एक ही किस्म की फसल लगाने के बजाय अलग-अलग अवधि में पकने वाली किस्मों का चयन किया जाए। यदि किसी एक किस्म को मौसम की मार झेलनी पड़े तो दूसरी किस्म उत्पादन देकर नुकसान की भरपाई कर सकती है। सोयाबीन, मक्का और दलहनी फसलों में यह रणनीति विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ लेना भी जरूरी है। मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए बीमा किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। यदि सूखा, कम वर्षा या अन्य प्राकृतिक आपदा के कारण फसल प्रभावित होती है तो बीमा योजना राहत का आधार बन सकती है।

जल संरक्षण भी इस सीजन की सबसे बड़ी जरूरत है। खेतों में मजबूत मेड़बंदी, रिज-फरो पद्धति और मल्चिंग जैसी तकनीकों का उपयोग कर वर्षा जल को खेत में रोका जा सकता है। इससे न केवल मिट्टी में नमी बनी रहती है बल्कि फसल को लंबे समय तक पानी उपलब्ध होता है। सब्जी उत्पादक किसानों के लिए प्लास्टिक मल्च या सूखी घास का उपयोग भी लाभकारी साबित हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम विभाग के पूर्वानुमान, कृषि मौसम सलाह और डिजिटल एप्स की जानकारी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आज के दौर में खेती केवल अनुभव नहीं बल्कि वैज्ञानिक जानकारी और तकनीक पर भी निर्भर है। बदलते मौसम और अल नीनो की चुनौती के बीच वही किसान सफल होगा जो समय रहते तैयारी करेगा और परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बदलेगा। इस खरीफ सीजन में सावधानी, वैज्ञानिक सोच और सही प्रबंधन ही बेहतर उत्पादन की कुंजी साबित होंगे।

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