Supreme Court Notice: क्या पुलिस आरोपियों के फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर डाल सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तार आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो पुलिस सोशल मीडिया पर साझा करने के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है।

Supreme Court Notice: गिरफ्तार आरोपियों की तस्वीरें और वीडियो पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में ऐसे पोस्ट को आरोपी की निजता, गरिमा और सम्मान के अधिकार से जोड़ते हुए सवाल उठाया गया है। इस मामले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
हथकड़ी और हिरासत के वीडियो पर आपत्ति
जानकारी अनुसार, याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल की ओर से वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि कई मामलों में पुलिस अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से ऐसे फोटो और वीडियो साझा करती है, जिनमें आरोपी हथकड़ी लगाए या रस्सियों से बंधे दिखाई देते हैं। याचिका में दावा किया गया है कि इस तरह की तस्वीरें सार्वजनिक होने से आरोपी की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है और उसे अदालत में दोष साबित होने से पहले ही लोगों की नजर में अपराधी के तौर पर पेश किया जा सकता है।
पहचान सामने आने से मीडिया ट्रायल का खतरा
साथ ही याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने यह भी मुद्दा उठाया कि आरोपी की पहचान सार्वजनिक होने से मीडिया ट्रायल की स्थिति बन सकती है। इससे आपराधिक मामलों की जांच और सुनवाई पर भी असर पड़ने की आशंका जताई गई है। जनहित याचिका (PIL) में यह तर्क दिया गया कि आरोपी की पहचान पहले ही सार्वजनिक हो जाने से टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड की प्रक्रिया की निष्पक्षता भी प्रभावित हो सकती है।
चंडीगढ़ पुलिस मॉडल लागू करने की मांग
बता दें जनहित याचिका में चंडीगढ़ पुलिस की व्यवस्था को देशभर में लागू करने की मांग की गई है। इस मॉडल के तहत पुलिस से पीड़ितों, आरोपियों, शिकायतकर्ताओं और गवाहों की पहचान सार्वजनिक करने से बचने की अपेक्षा की जाती है। याचिका के अनुसार, किसी व्यक्ति की पहचान इस तरह सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए जिससे उसकी निजता, गरिमा या सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भी मांगे गए निर्देश
वहीं याचिकाकर्ता ने इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है। जनहित याचिका (PIL) में कहा गया है कि प्लेटफॉर्म पर ऐसा कंटेंट प्रकाशित होने से रोका जाना चाहिए, जिससे किसी अपराध के आरोपी की पहचान उजागर होती हो या उसके साथ अमानवीय, अपमानजनक अथवा गरिमा के खिलाफ व्यवहार दिखाया जाता हो। यदि ऐसा कंटेंट पहले से उपलब्ध है, तो उसे निर्धारित और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत जल्द हटाने की व्यवस्था किए जाने की मांग भी की गई है।
अब सरकारों के जवाब पर नजर
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने के बाद अब केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के जवाब का इंतजार है। मामले की आगे की सुनवाई में अदालत यह देख सकती है कि पुलिस की सोशल मीडिया गतिविधियों के लिए किस तरह के नियम और सुरक्षा उपाय जरूरी हैं।

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