जातिसूचक टिप्पणी के आरोप से गरमाया मामला, प्रशासन पर दबाव

मध्य प्रदेश । कटनी जिले के कोतवाली थाने में दर्ज एक FIR को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि FIR में ड्यूटी पर तैनात एक पुलिसकर्मी ने शिकायत दर्ज करते समय जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। इस मामले के सामने आने के बाद सामाजिक संगठन भीम आर्मी आजाद समाज पार्टी ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। मंगलवार को संगठन के पदाधिकारियों ने कटनी पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपा और दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। साथ ही उन्होंने FIR से आपत्तिजनक शब्दों को हटाने की भी अपील की है। 30 मई की घटना से शुरू हुआ मामलामिली जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला 30 मई का है। कोतवाली थाना क्षेत्र के खरहनी फाटक निवासी अशोक अहिरवार (42) ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके पड़ोसियों मुरेरी चौधरी, उनकी पत्नी, अजुदन चौधरी और संजय चौधरी ने उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की। पीड़ित जब रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुंचे, तो ड्यूटी पर मौजूद प्रधान आरक्षक नितिन जायसवाल ने उनकी शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की। आरोप है कि इसी FIR के विवरण में मोहल्ले के नाम का उल्लेख करते समय अनुचित रूप से जातिसूचक शब्द शामिल कर दिए गए। सामाजिक संगठन का विरोध, कार्रवाई की मांगघटना सामने आने के बाद भीम आर्मी आजाद एकता मिशन ने इसे अनुसूचित जाति समाज का अपमान बताया है। संगठन के जिला उपाध्यक्ष संदीप चौधरी ने कहा कि पुलिस का कार्य निष्पक्ष रूप से पीड़ित की सहायता करना और समानता बनाए रखना है, लेकिन इस तरह के शब्दों का उपयोग गंभीर आपत्ति का विषय है। उन्होंने मांग की कि संबंधित प्रधान आरक्षक पर तत्काल कार्रवाई की जाए और FIR रिकॉर्ड को संशोधित कर आपत्तिजनक शब्द हटाए जाएं। पुलिस अधीक्षक का बयान, जांच के आदेशइस मामले पर पुलिस अधीक्षक अभिनय विश्वकर्मा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संभवतः FIR में वही विवरण दर्ज किया गया होगा जो शिकायतकर्ता द्वारा बताया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि मामले की जांच की जाएगी और तथ्यों के आधार पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। जांच पर टिकी निगाहेंफिलहाल यह मामला जांच के दायरे में है। एक ओर सामाजिक संगठन कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, वहीं पुलिस प्रशासन ने निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
भू-अधिकार की लड़ाई में सड़क पर उतरे ग्रामीण, प्रशासन से जवाब तलब

मध्य प्रदेश । कटनी जिले में मंगलवार को आदिवासी समुदाय के सैकड़ों लोगों ने कलेक्ट्रेट कार्यालय के मुख्य द्वार पर धरना प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी वन विभाग द्वारा उनकी जमीनों के कथित अधिग्रहण की कार्रवाई से नाराज थे। इस दौरान उन्होंने जिला प्रशासन और वन विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी जमीनों पर अधिकार बहाल करने की मांग उठाई। प्रदर्शन का केंद्र रीठी तहसील के अंतर्गत आने वाला ग्राम ललितपुर रहा, जहां के कई आदिवासी परिवार वर्षों से खेती कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। धरने में शामिल ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनके भू-अधिकार पट्टे वापस नहीं किए गए तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। 1989 से काबिज जमीन पर अब विवाद, वन विभाग पर आरोपप्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने बताया कि शासन द्वारा उन्हें वर्ष 1989 में विधिवत भू-अधिकार पट्टे दिए गए थे। इन पट्टों के आधार पर वे लगातार लगभग तीन दशकों से अधिक समय से जमीन पर काबिज हैं और खेती कर अपने परिवारों का भरण-पोषण कर रहे हैं।आदिवासी परिवारों का आरोप है कि अब वन विभाग उनकी इसी जमीन को अपना बताकर जबरन कब्जा करने की कोशिश कर रहा है, जिससे उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। पीड़ितों का दर्द: “रोजी-रोटी छीनी जा रही है”प्रदर्शन में शामिल पीड़ित बृजलाल ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि वे वर्षों से इस जमीन पर मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “हमने इस जमीन पर खून-पसीना बहाया है। शासन ने ही हमें पट्टा दिया था, अब वन विभाग इसे अपनी जमीन बता रहा है। यह हमारे साथ अन्याय है और हमारी रोजी-रोटी छीनी जा रही है।” कलेक्टर के नाम सौंपा ज्ञापन, उच्च स्तरीय जांच की मांगधरना प्रदर्शन के दौरान आदिवासी प्रतिनिधियों ने कलेक्टर के नाम एक ज्ञापन भी सौंपा, जिसे डिप्टी कलेक्टर को दिया गया। ज्ञापन में वन विभाग की कार्रवाई को पूरी तरह से अन्यायपूर्ण बताते हुए पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। साथ ही प्रदर्शनकारियों ने अपने भू-अधिकार पट्टों को यथावत रखने और वन विभाग के हस्तक्षेप पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। ग्रामीणों ने प्रशासन से अपील की कि उन्हें उनकी जमीन पर शांतिपूर्वक खेती करने का अधिकार फिर से सुनिश्चित किया जाए। प्रशासन पर निगाहें, आंदोलन की चेतावनीप्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो वे आंदोलन को और व्यापक रूप देंगे। फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है।
डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया: क्या नए रूप में उभरेगा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ?

सौरभ वार्ष्णेयआज की पत्रकारिता: संघर्ष, जिम्मेदारी और विश्वास की परीक्षा बन कर रह गई है। लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभों में पत्रकारिता को केवल कहने भर को विशेष स्थान प्राप्त है। पत्रकारिता केवल समाचारों का संकलन और प्रसारण भर नहीं है, बल्कि यह समाज को जागरूक करने, सत्ता से प्रश्न पूछने और जनभावनाओं को अभिव्यक्ति देने का सशक्त माध्यम भी है। किंतु वर्तमान समय में पत्रकारिता अनेक चुनौतियों, दबावों और संघर्षों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में पत्रकारिता की भूमिका, जिम्मेदारी और विश्वसनीयता पर गंभीर चिंतन आवश्यक हो गया है। अभी ३० मई पत्रकारिता दिवस बीता है लेकिन सत्ता की तरफ से सिर्फ रस्म अदायगी? क्या वाकई पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ संविधान के तहत बन पायेगा या हम पत्रकार बिरादरी सिर्फ गाहे गवाये ढोल पीटते रह जायेंगे? पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ कहने भर का चौथा स्तंभ रह जायेगा। यह एक ज्वलंत विषय है। आज सूचना क्रांति का युग है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाचारों के प्रसार को अत्यंत तेज बना दिया है। जहां पहले एक समाचार को पाठकों तक पहुंचने में घंटों या दिनों का समय लगता था, वहीं अब कुछ ही सेकंड में खबरें दुनिया भर में पहुंच जाती हैं। लेकिन इस तेजी के साथ एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है—सत्य और असत्य के बीच अंतर करने की चुनौती। फर्जी खबरें, आधी-अधूरी जानकारी और भ्रामक प्रचार पत्रकारिता की विश्वसनीयता को प्रभावित कर रहे हैं। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य निष्पक्षता, सत्यता और जनहित की रक्षा करना है। लेकिन आज कई बार व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, टीआरपी की दौड़ और राजनीतिक प्रभाव के कारण पत्रकारिता अपने मूल सिद्धांतों से भटकती दिखाई देती है। समाचारों की प्रस्तुति में सनसनीखेजता बढ़ रही है, जबकि तथ्यों की गहराई और निष्पक्ष विश्लेषण को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पा रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय है। दूसरी ओर, जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले पत्रकारों का संघर्ष भी कम नहीं है। अनेक पत्रकार सीमित संसाधनों में काम करते हुए जनसमस्याओं को उजागर करने का प्रयास करते हैं। कई बार उन्हें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ता है। दूर-दराज के क्षेत्रों में कार्यरत संवाददाता जनता और प्रशासन के बीच सेतु का कार्य करते हैं, लेकिन उनके योगदान को हमेशा उचित सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पाती। डिजिटल युग ने पत्रकारिता को नए अवसर भी प्रदान किए हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता, वैकल्पिक मीडिया और ऑनलाइन समाचार मंचों ने आम लोगों की आवाज को व्यापक मंच दिया है। अब कोई भी महत्वपूर्ण मुद्दा सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय बहस का विषय बन सकता है। हालांकि, इस स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। बिना सत्यापन के सूचना साझा करना समाज में भ्रम और अविश्वास पैदा कर सकता है। आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी परीक्षा जनता के विश्वास को बनाए रखने की है। पाठक और दर्शक केवल खबर नहीं, बल्कि विश्वसनीय खबर चाहते हैं। पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को यह समझना होगा कि उनका सबसे बड़ा पूंजीगत निवेश जनता का विश्वास है। यदि यह विश्वास कमजोर होता है, तो पत्रकारिता का प्रभाव और महत्व दोनों प्रभावित होंगे। आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों—सत्य, निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनहित—को पुन: केंद्र में स्थापित करे। पत्रकारों को तथ्यपरक रिपोर्टिंग, नैतिक मानकों और सामाजिक जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही सरकारों और समाज को भी स्वतंत्र एवं निर्भीक पत्रकारिता के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को जीवंत रखने का माध्यम है। चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी हों, यदि पत्रकारिता सत्य और जनहित के मार्ग पर अडिग रहती है, तो वह समाज का विश्वास जीतने में सफल होगी। आज की पत्रकारिता वास्तव में संघर्ष, जिम्मेदारी और विश्वास की परीक्षा के दौर से गुजर रही है, और यही परीक्षा उसके भविष्य की दिशा भी तय करेगी। भारतीय पत्रकारिता की गौरवशाली यात्राभारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह जनचेतना, सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संघर्ष की भी कहानी है। वर्ष 1826 में प्रकाशित उदन्त मार्तण्ड से लेकर आज के डिजिटल युग तक पत्रकारिता ने लंबा सफर तय किया है। यह यात्रा अनेक चुनौतियों, संघर्षों, उपलब्धियों और जिम्मेदारियों से भरी रही है। 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल द्वारा कोलकाता से प्रकाशित उदन्त मार्तण्ड हिंदी का पहला समाचार पत्र था। सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों और सरकारी उपेक्षा के बावजूद इस पत्र ने हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। यहीं से हिंदी भाषा में समाचारों और विचारों के प्रसार का एक नया युग प्रारंभ हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता ने देशभक्ति और जनजागरण का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया। अनेक समाचार पत्रों और पत्रकारों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज उठाई। समाचार पत्र केवल सूचना का माध्यम नहीं रहे, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सशक्त हथियार बन गए। उस दौर की पत्रकारिता का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित और जनहित था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पत्रकारिता ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका को और मजबूत किया। सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित करना, जनता की समस्याओं को उठाना और सामाजिक मुद्दों को सामने लाना इसकी प्रमुख जिम्मेदारियां बनीं। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ रेडियो और टेलीविजन ने भी पत्रकारिता के दायरे को व्यापक बनाया। इक्कीसवीं सदी में इंटरनेट और सोशल मीडिया के आगमन ने पत्रकारिता का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया। आज समाचार कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंच जाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने सूचना के प्रसार को तेज और व्यापक बनाया है, लेकिन इसके साथ फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाएं, टीआरपी की प्रतिस्पर्धा और विश्वसनीयता का संकट जैसी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। आज पत्रकारिता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां तकनीकी विकास और नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी आवश्यकता है। पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सत्य, निष्पक्षता और जनहित की रक्षा करना भी है। यदि पत्रकारिता अपनी मूल भावना से भटकती है, तो समाज और लोकतंत्र दोनों कमजोर पड़ सकते हैं। विश्व प्रेस स्वतंत्रता और पत्रकारिता दिवस जैसे अवसर हमें याद दिलाते हैं कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य सत्ता या किसी विशेष विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता की आवाज बनना
सिंहस्थ 2028 की तैयारी में जुटी मंदसौर पुलिस: भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा को लेकर विशेष प्रशिक्षण शुरू

मध्य प्रदेश । उज्जैन में वर्ष 2028 में आयोजित होने वाले विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ महाकुंभ को लेकर मध्यप्रदेश पुलिस ने अभी से व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसी कड़ी में मंदसौर पुलिस द्वारा विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ किया गया है, जिसमें पुलिस अधिकारियों और जवानों को आने वाले महाकुंभ के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण, यातायात प्रबंधन और श्रद्धालुओं से बेहतर संवाद के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ रतलाम रेंज के डीआईजी निमिष अग्रवाल ने किया। इस दौरान उन्होंने पुलिस अधिकारियों और जवानों से संवाद कर तैयारियों की समीक्षा की और प्रशिक्षण की रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम में एसपी विनोद कुमार मीना, एडिशनल एसपी टी.एस. बघेल, सीएसपी जितेंद्र भास्कर सहित जिले के सभी थाना प्रभारी और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी उपस्थित रहे। छह दिवसीय प्रशिक्षण से शुरू हुआ अभियान, आगे बनेगा बड़ा नेटवर्कडीआईजी निमिष अग्रवाल ने जानकारी दी कि पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर यह विशेष प्रशिक्षण अभियान शुरू किया गया है। फिलहाल छह दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग चलाया जा रहा है, लेकिन इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाते हुए अगले छह माह से एक वर्ष तक सभी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सिंहस्थ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन में सामान्य पुलिस ड्यूटी से कहीं अधिक जटिल परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिनसे निपटने के लिए पूर्व तैयारी अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से यह प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया है। मास्टर ट्रेनर्स तैयार होंगे, पूरे जिले में फैलाएंगे प्रशिक्षणकार्यशाला के अंतर्गत मास्टर ट्रेनर्स तैयार किए जा रहे हैं, जो आगे चलकर जिले के अन्य पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण देंगे। इन प्रशिक्षकों को भीड़ प्रबंधन, आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया, यातायात नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने की विशेष तकनीकें सिखाई जा रही हैं।इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सिंहस्थ 2028 के दौरान किसी भी स्थिति में पुलिस बल पूरी तरह सक्षम और प्रशिक्षित रहे। श्रद्धालुओं से व्यवहार पर विशेष जोरप्रशिक्षण में पुलिसकर्मियों को यह भी सिखाया जा रहा है कि महाकुंभ के दौरान उनका व्यवहार केवल सुरक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि श्रद्धालुओं की सहायता और मार्गदर्शन भी उनकी जिम्मेदारी हो। डीआईजी ने विशेष रूप से निर्देश दिए कि पुलिसकर्मी श्रद्धालुओं के साथ विनम्र और सेवा भाव से पेश आएं। यदि किसी को मार्गदर्शन, सहायता या जानकारी की आवश्यकता हो तो उसे तुरंत और सकारात्मक तरीके से मदद उपलब्ध कराई जाए। नगर सुरक्षा समिति को भी मिलेगा प्रशिक्षणजानकारी के अनुसार, सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत नगर सुरक्षा समिति के सदस्यों को भी विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे पुलिस और स्थानीय नागरिकों के बीच समन्वय मजबूत होगा और बड़े आयोजन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और अधिक प्रभावी बन सकेगी। विश्वस्तरीय आयोजन को लेकर पहले से तैयारीएसपी विनोद कुमार मीना ने कहा कि सिंहस्थ महाकुंभ दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति रहती है। ऐसे आयोजन में भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन बड़ी चुनौती होती है। इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए मंदसौर पुलिस ने अभी से प्रशिक्षण अभियान शुरू किया है, ताकि 2028 के सिंहस्थ के दौरान पूरी पुलिस व्यवस्था मुस्तैद और सक्षम नजर आए।
दवा स्टॉक में गड़बड़ी की आशंका, औचक निरीक्षण में रिकॉर्ड खंगाले गए

मध्य प्रदेश । मंदसौर जिले में दवाओं के सुरक्षित, पारदर्शी और नियमानुसार विक्रय को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से औषधि विभाग ने अपनी निगरानी और कार्रवाई को तेज कर दिया है। इसी क्रम में मंगलवार को बीपीएल चौराहा क्षेत्र स्थित कई मेडिकल संस्थानों पर औचक निरीक्षण किया गया, जिससे दवा कारोबारियों में हड़कंप मच गया। निरीक्षण के दौरान टीम ने दुकानों में मौजूद दवाओं के स्टॉक, उनकी एक्सपायरी डेट, तथा नशे के रूप में दुरुपयोग होने वाली दवाओं के क्रय-विक्रय रिकॉर्ड की गहन जांच की। अधिकारियों ने यह भी देखा कि शेड्यूल-एच1 श्रेणी की दवाओं का रिकॉर्ड नियमों के अनुसार संधारित किया जा रहा है या नहीं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. गोविंद सिंह चौहान ने जानकारी देते हुए बताया कि निरीक्षण का उद्देश्य केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि दवा वितरण प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। दवाओं के नमूने जांच के लिए भेजे गए, रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के निर्देशनिरीक्षण के दौरान बीपीएल चौराहा स्थित श्रीजी मेडिकल से दवाओं के नमूने जांच हेतु लिए गए हैं। इसके साथ ही सिटी मेडिकल और वीर फार्मा को निर्देश दिया गया है कि वे शेड्यूल-एच1 दवाओं के क्रय-विक्रय से जुड़े सभी रिकॉर्ड दो दिनों के भीतर विभाग के समक्ष प्रस्तुत करें। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समय सीमा में दस्तावेज प्रस्तुत न करने पर संबंधित संस्थानों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। टीम ने मौके पर मौजूद सभी मेडिकल संचालकों को स्टॉक रजिस्टर नियमित रूप से अद्यतन रखने के निर्देश भी दिए। सीतामऊ में पहले मिली थीं अनियमितताएं, दो मेडिकल फर्मों को नोटिससीएमएचओ डॉ. चौहान ने बताया कि इससे पहले सीतामऊ तहसील में किए गए निरीक्षण के दौरान कुछ अनियमितताएं सामने आई थीं। जांच के आधार पर पूजा मेडिकोज और मां आशापुरा मेडिकल को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इनसे प्राप्त जवाबों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। नशे के रूप में दवाओं के दुरुपयोग पर सख्तीऔषधि विभाग द्वारा सीतामऊ तहसील के सभी मेडिकल संचालकों की एक बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि नशे के रूप में दुरुपयोग होने वाली दवाओं का रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से रखा जाए और बिना चिकित्सकीय परामर्श किसी भी दवा का वितरण न किया जाए। अधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि किसी भी मेडिकल स्टोर पर नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो उसके खिलाफ लाइसेंस निरस्तीकरण सहित कठोर कार्रवाई की जा सकती है। निगरानी और निरीक्षण आगे भी जारी रहेगासीएमएचओ ने कहा कि विभाग का मुख्य उद्देश्य अवैध दवा कारोबार और दवाओं के दुरुपयोग पर रोक लगाना है। साथ ही दवा वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना भी प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिलेभर में इस तरह के औचक निरीक्षण और निगरानी अभियान आगे भी लगातार जारी रहेंगे।
अब कैमरे के सामने आने की ज़रूरत नहीं: Google Gemini Digital Avatar से बदलेगा वीडियो क्रिएशन

नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच Google ने अपने Gemini प्लेटफॉर्म पर एक नया Digital Avatar फीचर पेश किया है, जो वीडियो निर्माण की दुनिया में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। इस फीचर की मदद से यूजर्स अपना एक AI आधारित डिजिटल क्लोन तैयार कर सकते हैं, जो वीडियो में उनकी जगह वास्तविक व्यक्ति की तरह दिखाई देगा और काम करेगा। इस तकनीक को Google के उन्नत AI मॉडल पर आधारित बताया जा रहा है, जो चेहरे की पहचान और आवाज पैटर्न को समझकर एक यथार्थवादी डिजिटल रूप तैयार करता है। इस फीचर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि अब वीडियो बनाने के लिए कैमरे के सामने आने की जरूरत नहीं रह जाएगी। कंटेंट क्रिएटर्स, शिक्षकों, सोशल मीडिया यूजर्स और डिजिटल मार्केटर्स के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यूजर्स केवल एक बार अपनी फेस रिकॉर्डिंग और जरूरी डाटा सिस्टम में अपलोड करेंगे, जिसके बाद AI उनका डिजिटल अवतार तैयार कर देगा। यह अवतार आगे चलकर किसी भी वीडियो में उनकी जगह बोलने और प्रस्तुत करने का काम कर सकता है, जिससे वीडियो प्रोडक्शन की प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक सरल और तेज हो जाएगी। डिजिटल अवतार बनाने की प्रक्रिया भी काफी आसान बताई गई है। यूजर्स को Gemini प्लेटफॉर्म पर लॉगिन करने के बाद दिए गए विकल्पों के माध्यम से अपने चेहरे की अलग-अलग एंगल से रिकॉर्डिंग करनी होती है। इसके बाद सिस्टम उस डेटा को प्रोसेस कर एक यूनिक डिजिटल पहचान तैयार करता है, जिसे यूजर के अकाउंट से लिंक कर दिया जाता है। तैयार अवतार को बाद में प्रॉम्प्ट के जरिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां केवल एक कमांड देकर पूरा वीडियो जनरेट किया जा सकता है। इस तकनीक के इस्तेमाल के लिए फिलहाल सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल लागू किया गया है, जिसमें AI Pro और AI Ultra जैसे प्लान शामिल हैं। हालांकि कुछ टेलीकॉम कंपनियां अपने ग्राहकों को इस सुविधा का सीमित या पूर्ण एक्सेस भी प्रदान कर रही हैं, जिससे अधिक लोग इस नई तकनीक का लाभ उठा सकें। इससे डिजिटल क्रिएशन की दुनिया में AI टूल्स की पहुंच तेजी से बढ़ रही है और आम यूजर्स भी हाई-एंड वीडियो प्रोडक्शन का हिस्सा बन पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में Digital Avatar तकनीक वीडियो कॉलिंग, ऑनलाइन मीटिंग्स, वर्चुअल एजुकेशन और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएशन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। लोग अपने डिजिटल रूप का इस्तेमाल करके बिना कैमरे के सामने आए प्रेजेंटेशन दे सकेंगे और वैश्विक स्तर पर संवाद स्थापित कर पाएंगे। इस तकनीक की तुलना पहले से मौजूद कुछ वर्चुअल सिस्टम्स से की जा रही है, लेकिन Gemini का यह कदम इसे और अधिक उन्नत और सहज बना सकता है। भविष्य में यह तकनीक न केवल समय की बचत करेगी बल्कि डिजिटल कंटेंट निर्माण की लागत को भी कम कर सकती है। हालांकि इसके साथ ही डेटा प्राइवेसी और AI एथिक्स जैसे मुद्दों पर भी चर्चा तेज हो गई है, क्योंकि डिजिटल अवतार का दुरुपयोग भी एक संभावित चुनौती बन सकता है। कुल मिलाकर Gemini का यह नया Digital Avatar फीचर तकनीक की दुनिया में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में डिजिटल इंटरैक्शन और वीडियो क्रिएशन के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है।
झाबुआ में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं, एनएचएम कर्मचारियों की हड़ताल शुरू

मध्य प्रदेश । झाबुआ जिले में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत कार्यरत संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। प्रदेशभर के करीब 32 हजार संविदा कर्मचारियों के कार्य बहिष्कार के बाद स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। संविदा स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष डॉ. वासुदेव पाटीदार ने बताया कि एनएचएम कर्मचारी वर्षों से प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ रहे हैं, लेकिन उनकी मांगों पर लगातार अनदेखी की जा रही है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई का आरोपकर्मचारियों का आरोप है कि पिछले वर्ष मुख्यमंत्री की उपस्थिति में उनकी मांगों पर सहमति बनी थी, लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी उस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया। कर्मचारियों ने कहा कि वे लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं, लेकिन समाधान नहीं हुआ। कर्मचारियों की प्रमुख मांगेंहड़ताल पर गए कर्मचारियों की प्रमुख मांगों में शामिल हैं-30 जनवरी 2026 की मुख्यमंत्री घोषणा के अनुसार नियमितीकरणएनपीएस और स्वास्थ्य बीमा का लाभ (2023 सामान्य प्रशासन विभाग नीति के तहत)अन्य राज्यों की तरह 10% वार्षिक वेतन वृद्धिनियमित कर्मचारियों के समान महंगाई भत्तावेतन विसंगति का निराकरणसमान कार्य के लिए समान वेतननियमित कर्मचारियों के समान अवकाशइसके अलावा कर्मचारियों ने “सार्थक ऐप” के उपयोग को बंद करने का भी निर्णय लिया है। चरणबद्ध आंदोलन के बाद अब अनिश्चितकालीन हड़तालकर्मचारी इससे पहले काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं और प्रशासनिक अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन भी सौंप चुके हैं। अब अनिश्चितकालीन हड़ताल के बाद आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए 8 जून को प्रदेशभर के कर्मचारी भोपाल में मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने की योजना बना रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर असर की आशंकहड़ताल के चलते जिला अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभावित होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे आम मरीजों को परेशानी हो सकती है।
श्योपुर में जनसुनवाई के दौरान व्यापारी का अनोखा विरोध: कनक दंडवत कर कलेक्ट्रेट पहुंचे, आत्मदाह की चेतावनी

मध्य प्रदेश । श्योपुर जिले के कलेक्टर कार्यालय में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई के दौरान एक व्यापारी ने अनोखे तरीके से विरोध दर्ज कराया। शहर निवासी जगदीश प्रसाद अग्रवाल कलेक्ट्रेट परिसर में कनक दंडवत करते हुए पहुंचे और अपनी लंबित राजस्व समस्या के समाधान की मांग की। उन्होंने अधिकारियों के सामने अपनी शिकायत रखते हुए कहा कि यदि उनकी समस्या का जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे दो दिन बाद आत्मदाह करने को मजबूर होंगे। इस बयान से जनसुनवाई में मौजूद अधिकारी भी गंभीर हो गए। 15 साल से लंबित नामांतरण, राजस्व विभाग पर आरोपव्यापारी जगदीश प्रसाद अग्रवाल ने आरोप लगाया कि उनकी पत्नी रानी अग्रवाल के नाम पर वर्ष 2009 में खरीदी गई भूमि का विधिवत विक्रय पत्र होने के बावजूद 15 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी नामांतरण नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि सभी आवश्यक दस्तावेज और कब्जा होने के बावजूद राजस्व न्यायालय में उनकी फाइल को अनावश्यक रूप से लंबित रखा जा रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है और वे भूमि का आगे विक्रय भी नहीं कर पा रहे हैं। रिश्वत लेकर अन्य मामलों में नामांतरण का आरोपअग्रवाल ने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि उसी सर्वे नंबर से जुड़े अन्य मामलों में कथित रूप से रिश्वत लेकर नामांतरण कर दिया गया है, जबकि उनके मामले में जानबूझकर बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं। उन्होंने एक अन्य भूमि रिकॉर्ड में त्रुटिपूर्ण प्रविष्टि किए जाने का भी आरोप लगाया और कहा कि पटवारी से कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं किया गया। प्रशासन से तत्काल समाधान की मांजनसुनवाई के दौरान व्यापारी ने अधिकारियों से मांग की कि उनकी समस्या का शीघ्र निराकरण किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई नहीं होती है तो वे इसके लिए प्रशासन को जिम्मेदार मानेंगे। प्रशासनिक अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग से रिपोर्ट तलब करने की बात कही है।
Child Social Media Policy: 16 वर्ष से कम आयु वालों के लिए सोशल मीडिया बैन, दुनिया में छिड़ी नई बहस

नई दिल्ली । बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच मलेशिया ने एक बड़ा और चर्चित फैसला लिया है। देश में अब 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाना प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह नया नियम 1 जून से लागू हो चुका है और इसके बाद सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यूजर्स की उम्र की जांच करना अनिवार्य बना दिया गया है। इस फैसले ने वैश्विक स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया के संभावित खतरों से बचाने के लिए क्या ऐसे कड़े कदम जरूरी हैं। नए प्रावधान के अनुसार फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और अन्य बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नया अकाउंट बनाने से पहले यूजर की आयु की पुष्टि की जाएगी। इसके लिए कंपनियों को पहचान पत्र, पासपोर्ट या अन्य वैध सरकारी दस्तावेजों का उपयोग करना होगा। सरकार का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच बच्चों को अनुचित सामग्री, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से बचाने के लिए यह कदम आवश्यक हो गया था। इसी उद्देश्य से ऑनलाइन सुरक्षा कानून के तहत यह व्यवस्था लागू की गई है। नियम केवल नए यूजर्स तक सीमित नहीं है। पहले से सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे लोगों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी उम्र का सत्यापन कराना होगा। सरकार ने प्लेटफॉर्म कंपनियों को इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए सीमित समय दिया है। यदि कोई कंपनी निर्धारित मानकों का पालन नहीं करती है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। नए कानून के तहत करोड़ों रुपये के बराबर भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान रखा गया है, जिससे कंपनियों पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ गया है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को केवल आयु सत्यापन तक सीमित जिम्मेदारी नहीं दी है। उन्हें हानिकारक, भ्रामक और फर्जी सामग्री पर भी सख्त निगरानी रखनी होगी। साथ ही विज्ञापनदाताओं की पहचान की पुष्टि करना, संदिग्ध कंटेंट की रिपोर्टिंग व्यवस्था को मजबूत करना और एडिट या कृत्रिम रूप से बदले गए कंटेंट को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना भी आवश्यक होगा। इससे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। मलेशिया से पहले भी कई देश बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठा चुके हैं। ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, फ्रांस, स्पेन, ग्रीस, डेनमार्क और नॉर्वे जैसे देशों में सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े नियमों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। इन देशों का मानना है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक विकास, सामाजिक व्यवहार और पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, इसलिए आयु आधारित नियंत्रण आवश्यक है। भारत में फिलहाल 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कोई राष्ट्रीय प्रतिबंध लागू नहीं है। हालांकि डिजिटल सुरक्षा, डेटा संरक्षण और ऑनलाइन गोपनीयता को लेकर सरकार समय-समय पर नए नियम लाती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर बुलिंग, फर्जी खबरों, ऑनलाइन धोखाधड़ी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए भारत में भी इस विषय पर चर्चा और तेज हो सकती है। दुनिया के कई देशों में लागू हो रहे ऐसे नियम भविष्य में भारतीय नीति निर्माताओं के लिए भी विचार का विषय बन सकते हैं।
मोबाइल बाजार पर संकट: बढ़ती कीमतों के कारण लोग टाल रहे खरीदारी, बिक्री में गिरावट

नई दिल्ली । भारत के स्मार्टफोन बाजार में इस समय कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का सीधा असर उपभोक्ता मांग पर दिखाई देने लगा है। जहां पहले फेस्टिव सीजन को मोबाइल कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बिक्री अवसर माना जाता था, वहीं अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। ताजा रिपोर्ट और उपभोक्ता सर्वे में यह सामने आया है कि बढ़ती कीमतों के कारण बड़ी संख्या में लोग नया फोन खरीदने का फैसला टाल रहे हैं, जिससे बाजार में सुस्ती के संकेत गहराते जा रहे हैं। सर्वे के अनुसार, लगभग 54 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने स्वीकार किया है कि वे मौजूदा महंगे दामों के कारण नया स्मार्टफोन खरीदने की योजना को फिलहाल स्थगित कर सकते हैं। इनमें से एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कीमतों के स्थिर होने का इंतजार कर रहा है। केवल एक छोटा हिस्सा ही सेकेंड हैंड या सस्ते विकल्पों की ओर रुख करने की बात कर रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन फिलहाल उस पर एक स्पष्ट ब्रेक लग गया है। विशेषज्ञों के अनुसार स्मार्टफोन कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव और कंपोनेंट्स की बढ़ती लागत है। मेमोरी चिप्स की कमी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डेटा सेंटर की बढ़ती मांग ने सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका असर सीधे कंज्यूमर डिवाइसेज पर पड़ रहा है, जिसके कारण फोन बनाने की लागत बढ़ गई है और कंपनियां नए मॉडल्स को ऊंची कीमतों पर लॉन्च कर रही हैं। पिछले कुछ महीनों में कई प्रमुख स्मार्टफोन ब्रांड्स ने अपने नए और पुराने दोनों मॉडल्स की कीमतों में बढ़ोतरी की है। जनवरी से मई के बीच औसतन 8 से 12 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ने की बात सामने आई है। इससे मिड-रेंज और बजट सेगमेंट के खरीदार सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जो भारत के स्मार्टफोन बाजार का बड़ा हिस्सा हैं। मार्केट ट्रेंड्स यह भी संकेत दे रहे हैं कि 2026 के फेस्टिव सीजन में भी बिक्री में अपेक्षित तेजी नहीं आ सकती। आमतौर पर इस समय कंपनियां भारी छूट और ऑफर्स के जरिए बिक्री बढ़ाती हैं, लेकिन इस बार महंगे प्राइस पॉइंट के कारण उपभोक्ता खर्च करने से बच सकते हैं। कई रिपोर्ट्स में यह भी अनुमान जताया गया है कि पूरे साल में स्मार्टफोन शिपमेंट में गिरावट देखी जा सकती है, जो पिछले कई वर्षों के मुकाबले एक बड़ा बदलाव होगा। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार की मांग खत्म नहीं हुई है, बल्कि उपभोक्ता फिलहाल कीमतों के स्थिर होने का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही कीमतों में स्थिरता आएगी, बाजार में फिर से खरीदारी बढ़ सकती है। फिलहाल कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कीमत और मांग के बीच संतुलन बनाने की है। यह स्थिति भारत के तेजी से बढ़ते टेक बाजार के लिए एक अहम मोड़ मानी जा रही है, जहां उपभोक्ता व्यवहार और वैश्विक सप्लाई चेन दोनों मिलकर भविष्य की दिशा तय करेंगे।