पीएम मोदी ने बताया आत्म-संयम और दृढ़ निश्चय को सफलता की कुंजी, संस्कृत श्लोक किया साझा

नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए जीवन में दृढ़ निश्चय और आत्म-संयम के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ये दोनों गुण ऐसे आधार हैं, जो किसी भी कठिन परिस्थिति को सरल बना सकते हैं और व्यक्ति को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री का यह संदेश खासतौर पर युवाओं के लिए प्रेरणादायक माना जा रहा है, जो देश के विकास और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए उसके गहरे अर्थ को भी सरल भाषा में समझाया। उन्होंने लिखा कि जो व्यक्ति किसी कार्य को पूरी समझ और दृढ़ निश्चय के साथ शुरू करता है और उसे बीच में अधूरा नहीं छोड़ता, वही वास्तव में बुद्धिमान माना जाता है। इसके साथ ही उन्होंने समय के सदुपयोग और आत्म-नियंत्रण को भी सफलता का मूल आधार बताया। उनका यह संदेश इस बात पर जोर देता है कि केवल इच्छा शक्ति ही नहीं, बल्कि अनुशासन और निरंतर प्रयास भी सफलता की राह को मजबूत बनाते हैं। इससे पहले भी प्रधानमंत्री ने शिक्षा और ज्ञान से जुड़े संस्कृत सुभाषितों को साझा किया था, जिनमें उन्होंने सीखने-सिखाने की प्रक्रिया और शिक्षक की भूमिका पर प्रकाश डाला था। लगातार ऐसे संदेशों के माध्यम से प्रधानमंत्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जीवन मूल्यों के बीच संतुलन को सामने रखने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारतीय संस्कृति में मौजूद ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है और उसे जीवन में अपनाकर व्यक्ति न केवल व्यक्तिगत सफलता हासिल कर सकता है, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी योगदान दे सकता है। प्रधानमंत्री के इस संदेश को युवाओं के लिए एक प्रेरक मार्गदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। आज के समय में जब प्रतिस्पर्धा और चुनौतियां बढ़ रही हैं, ऐसे में आत्म-अनुशासन और दृढ़ निश्चय जैसे गुण और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संदेश युवाओं को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं और उन्हें लक्ष्य के प्रति केंद्रित रहने में मदद करते हैं। प्रधानमंत्री का यह संदेश केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा जा रहा है। उनका यह विचार बार-बार सामने आता है कि यदि देश के युवा अनुशासित, लक्ष्य-उन्मुख और आत्म-नियंत्रित होंगे, तो भारत विकास के नए आयाम हासिल कर सकता है। इसी दृष्टिकोण के तहत उन्होंने संस्कृत सुभाषित के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत किया है। आज के डिजिटल युग में जहां ध्यान भटकाने वाली चीजें लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे में आत्म-संयम और दृढ़ निश्चय का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह संदेश न केवल व्यक्तिगत जीवन में सफलता का मार्ग दिखाता है, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारियों को निभाने की प्रेरणा भी देता है। प्रधानमंत्री का यह विचार इस बात को रेखांकित करता है कि सफलता केवल संसाधनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि मानसिक दृढ़ता और अनुशासन पर आधारित होती है। यही संदेश आगे चलकर युवाओं के व्यवहार और सोच में बदलाव ला सकता है, जिससे वे अधिक जिम्मेदार और लक्ष्य-उन्मुख बन सकें। आत्म-संयम और दृढ़ निश्चय का यह विचार आने वाले समय में समाज में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को नई दिशा दे सकता है।
तेज हवाओं के बाद ठंडक बढ़ी, इंदौर में बारिश का दौर जारी रहने के संकेत

मध्य प्रदेश । इंदौर में जून की शुरुआत के साथ ही प्री-मानसून गतिविधियां जोर पकड़ने लगी हैं। सोमवार शाम अचानक बदले मौसम ने शहरवासियों को गर्मी से बड़ी राहत दी। 93 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चली तेज आंधी और हल्की बारिश के बाद तापमान में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। दिन में जहां अधिकतम तापमान 38.1 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, वहीं रात का तापमान 26 डिग्री से गिरकर 22.1 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच गया। एक ही दिन में रात के तापमान में 4 डिग्री की कमी ने मौसम को पूरी तरह सुहाना बना दिया। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार फिलहाल इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में प्री-मानसून सिस्टम सक्रिय है। टर्फ लाइन और पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से अगले तीन से चार दिनों तक तेज हवाओं, गरज-चमक और बारिश का दौर जारी रह सकता है। इससे तापमान में और गिरावट आने की संभावना है। सोमवार शाम आई तेज आंधी का असर शहर की बिजली व्यवस्था पर भी देखने को मिला। सुरक्षा के मद्देनजर बिजली कंपनी ने 450 फीडर से जुड़ी 132 केवी लाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया था। तेज हवाओं के कारण कई स्थानों पर पेड़ और टहनियां गिर गईं, जिससे बिजली के तार क्षतिग्रस्त हो गए। इसके चलते शहर के कई इलाकों में देर रात तक बिजली आपूर्ति बाधित रही। नगर निगम और बिजली कंपनी की टीमों ने संयुक्त रूप से मरम्मत कार्य कर स्थिति को सामान्य बनाया। मौसम विभाग का कहना है कि इस बार मध्यप्रदेश में मानसून की दस्तक सामान्य से कुछ देर से हो सकती है। आमतौर पर प्रदेश में मानसून 15 जून के आसपास प्रवेश करता है, लेकिन इस वर्ष इसकी गति धीमी बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार मानसून अभी तक केरल नहीं पहुंचा है और सामान्य तौर पर केरल पहुंचने के करीब 15 दिन बाद यह मध्यप्रदेश में प्रवेश करता है। ऐसे में मानसून के आगमन में कुछ दिनों की देरी संभव है। हालांकि मानसून की देरी के बावजूद प्री-मानसून गतिविधियां लोगों को गर्मी से राहत दे रही हैं। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो जून में इंदौर का तापमान अपेक्षाकृत नियंत्रित रहा है। वर्ष 2025 में जून का अधिकतम तापमान 41.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था, जबकि पिछले साल जून में साढ़े पांच इंच से अधिक बारिश हुई थी। इंदौर का मौसम रिकॉर्ड भी काफी रोचक रहा है। वर्ष 1980 में जून महीने में 17 इंच से अधिक बारिश दर्ज की गई थी, जबकि 23 जून 2003 को 24 घंटे में लगभग 5 इंच बारिश का रिकॉर्ड बना था। दूसरी ओर 3 जून 1991 को शहर का तापमान 45.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। फिलहाल मौसम विभाग ने नागरिकों को तेज हवाओं और संभावित बारिश को देखते हुए सतर्क रहने की सलाह दी है। आने वाले दिनों में मौसम के और सुहाना बने रहने की संभावना है।
साबरमती रिवरफ्रंट सफाई अभियान: स्वच्छता अभियान में उतरी जनता, मंत्री ऋषिकेश पटेल ने की अपील

नई दिल्ली । अहमदाबाद में मंगलवार को साबरमती नदी किनारे गांधी आश्रम के पास ‘स्वच्छ साबरमती महाअभियान’ के तहत बड़े स्तर पर सफाई अभियान चलाया गया। इस अभियान की शुरुआत राज्य सरकार की ओर से की गई, जिसमें गुजरात सरकार के कैबिनेट मंत्री ऋषिकेश पटेल के साथ-साथ कई जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल नदी किनारे की सफाई करना था, बल्कि लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश देना भी था। इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री ऋषिकेश पटेल ने कहा कि स्वच्छता केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि सफाई को आदत में शामिल करें और अपने आसपास के क्षेत्रों को साफ-सुथरा रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सरकार कूड़ा प्रबंधन और शहरी सफाई व्यवस्था को मजबूत करने पर लगातार काम कर रही है, लेकिन जब तक नागरिक स्वयं आगे नहीं आएंगे, तब तक स्वच्छता का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और साबरमती रिवरफ्रंट के आसपास के क्षेत्र में सामूहिक सफाई की गई। इस दौरान अधिकारियों और स्वयंसेवकों ने मिलकर कचरा हटाया और नदी किनारे के हिस्सों को साफ किया। अभियान के दौरान उपस्थित लोगों को स्वच्छता की शपथ भी दिलाई गई, जिसमें उन्होंने अपने आसपास साफ-सफाई बनाए रखने और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया। मंत्री ऋषिकेश पटेल ने कहा कि यह अभियान केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसे निरंतर जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान ने देशभर में स्वच्छता को लेकर एक नई सोच विकसित की है, और अब इसे और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी नागरिकों की भी है। उन्होंने यह भी कहा कि जब समाज का हर वर्ग इस अभियान से जुड़ेगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। इस कार्यक्रम में मंत्री दर्शना वाघेला, स्थानीय विधायक, नगर निगम के अधिकारी, पुलिसकर्मी और कई सामाजिक संगठन भी शामिल हुए। सभी ने मिलकर इस पहल को सफल बनाने में योगदान दिया और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया। कार्यक्रम के दौरान रिवरफ्रंट पर विशेष सफाई व्यवस्था की गई और आसपास के इलाकों में भी स्वच्छता अभियान चलाया गया। इस पूरे आयोजन को सरकार की ओर से एक बड़े जन आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता को स्थायी रूप से मजबूत करना है। अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अभियानों से न केवल वातावरण साफ रहता है, बल्कि लोगों में जिम्मेदारी और अनुशासन की भावना भी विकसित होती है। अंत में यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि स्वच्छता केवल प्रशासन का काम नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। ऐसे अभियानों से समाज में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद बढ़ती है और आने वाले समय में अहमदाबाद जैसे शहरों को और अधिक स्वच्छ, सुंदर और व्यवस्थित बनाने में मदद मिलेगी।
अयोध्या साधु-संत बोले—गाय माता है, राष्ट्रीय पशु बहस पर सीएम योगी के बयान का किया समर्थन

नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर दिए गए बयान के बाद धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर अयोध्या के कई प्रमुख साधु-संतों ने मुख्यमंत्री के रुख का समर्थन किया है और गाय को केवल पशु नहीं बल्कि ‘गौमाता’ बताते हुए इसे भारतीय संस्कृति और आस्था का अभिन्न हिस्सा बताया है। संतों का कहना है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग परंपरागत धार्मिक भावनाओं के विपरीत है और इससे समाज में अनावश्यक विवाद पैदा होता है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा था कि गाय हिंदू समाज के लिए केवल एक पशु नहीं बल्कि माता के समान है और माता-पुत्र के संबंध को किसी सरकारी घोषणा की आवश्यकता नहीं होती। उनके इस बयान के बाद अयोध्या में धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आई, जिसमें कई संतों ने इसे सनातन परंपरा के अनुरूप बताया। साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास महाराज ने कहा कि गाय को विश्व माता का दर्जा प्राप्त है और उसमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है। उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को गलत मानसिकता से प्रेरित बताया। तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंसाचार्य ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गाय को लेकर सनातन परंपरा में स्पष्ट सम्मान का भाव है और इसे किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय को माता का स्थान दिया गया है और इसे समझने के लिए सनातन परंपराओं का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में इस तरह के विषयों पर अनावश्यक विवाद पैदा करना उचित नहीं है और इससे सांस्कृतिक असंतुलन उत्पन्न होता है। हनुमानगढ़ी के महंत डॉ. देवेशाचार्य महाराज ने कहा कि गाय को पशु कहने का विचार ही भारतीय आस्था के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि गाय को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाना चाहिए और इसके संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाए जाने चाहिए। उनके अनुसार यह विषय केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसी क्रम में हनुमानगढ़ी के ही महंत हरीश दास ने कहा कि सीएम योगी का बयान समाज में संतुलन और परंपरा के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि गाय भारतीय जीवन मूल्यों का केंद्र है और इसे किसी विवाद में नहीं खींचा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शासन द्वारा कानून-व्यवस्था और सामाजिक अनुशासन पर की जा रही कार्रवाई सराहनीय है और इससे समाज में स्थिरता बनी रहती है। इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर गाय को लेकर देश में चल रही वैचारिक बहस को सामने ला दिया है। एक ओर जहां धार्मिक संत इसे आस्था और परंपरा का विषय मानते हैं, वहीं दूसरी ओर यह विषय सामाजिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अयोध्या के संतों के समर्थन ने इस बहस को और अधिक व्यापक बना दिया है। अंततः यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय समाज में परंपरा, आस्था और आधुनिक संवैधानिक सोच के बीच संतुलन की बड़ी बहस को दर्शाता है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और भी प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है, जिससे यह चर्चा और गहराती दिखाई दे सकती है।
जमीन में गाड़कर छिपाई थीं मूर्तियां, पुलिस ने किया बरामदगी का खुलासा

मध्य प्रदेश । इंदौर के एरोड्रम क्षेत्र में स्थित जैन मंदिर में तीन मई की रात हुई करोड़ों की आस्था से जुड़ी चोरी की वारदात के मामले में पुलिस को एक और बड़ी सफलता मिली है। एरोड्रम और तेजाजी नगर थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने लंबे समय से फरार चल रहे तीन आरोपियों को तेलंगाना से गिरफ्तार कर लिया है। आरोपियों की निशानदेही पर चोरी की गई कुछ मूर्तियां भी बरामद की गई हैं। इस कार्रवाई के बाद मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार चोरी के बाद आरोपी लगातार अपने ठिकाने बदल रहे थे और गिरफ्तारी से बचने के लिए अलग-अलग राज्यों में छिपते फिर रहे थे। डीसीपी जोन-1 नरेन्द्र रावत के निर्देशन में गठित विशेष टीम उनकी तलाश में लगातार जुटी हुई थी। तकनीकी साक्ष्यों और मुखबिर तंत्र की मदद से पुलिस को आरोपियों की लोकेशन तेलंगाना में मिली, जिसके बाद टीम ने वहां दबिश देकर लखन, दीपक चौहान और रामबाबू को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान आरोपियों ने कई महत्वपूर्ण खुलासे किए। उन्होंने बताया कि चोरी की गई मूर्तियों और अन्य सामान को सुरक्षित रखने के लिए जमीन में गाड़ दिया गया था, ताकि पुलिस की नजर से बचा जा सके। आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने बताए गए स्थान से चोरी की गई मूर्तियां बरामद कर लीं। पुलिस अब अन्य चोरी हुए सामान की बरामदगी और पूरे नेटवर्क की जानकारी जुटाने में लगी हुई है। इससे पहले पुलिस ने 13 मई को इस मामले में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया था। इनमें ललित चौहान, विशाल केवट, ओमप्रकाश चौहान और गीताबाई मकवाना शामिल हैं। तीन आरोपी खरगोन जिले के रहने वाले हैं, जबकि महिला आरोपी गीताबाई तेजाजी नगर क्षेत्र की निवासी है। प्रारंभिक पूछताछ में इन्हीं आरोपियों ने फरार साथियों और चोरी की गई मूर्तियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी थी, जिसके आधार पर पुलिस आगे बढ़ी। जांच में सामने आया कि चोरी की वारदात को अंजाम देने के बाद गिरोह के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर बंट गए थे। पुलिस ने लगातार तकनीकी निगरानी और खुफिया सूचना के आधार पर उनका पीछा किया। आखिरकार तेलंगाना में उनकी मौजूदगी की पुष्टि होने पर संयुक्त टीम ने कार्रवाई करते हुए तीनों को गिरफ्तार कर लिया। मामले के खुलासे में सीसीटीवी फुटेज की भी अहम भूमिका रही। मंदिर परिसर में लगे कैमरों में चोरी की पूरी घटना रिकॉर्ड हो गई थी। फुटेज के आधार पर पुलिस ने आरोपियों की पहचान की और धीरे-धीरे पूरे गिरोह तक पहुंचने में सफलता हासिल की। पुलिस का कहना है कि मामले में अभी जांच जारी है और अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जा रही है। मूर्ति चोरी की इस घटना ने धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए थे। हालांकि पुलिस की त्वरित कार्रवाई और लगातार की गई जांच के चलते अब अधिकांश आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है तथा चोरी की गई मूर्तियों की बरामदगी भी शुरू हो गई है। पुलिस को उम्मीद है कि जल्द ही मामले से जुड़े बाकी पहलुओं का भी खुलासा हो जाएगा।
डॉक्टर-कर्मचारियों की उपस्थिति पर रहेगी नजर, रात में भी होंगे निरीक्षण

मध्य प्रदेश । भोपाल में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नया निगरानी तंत्र लागू किया है। अब प्रत्येक अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र के लिए अलग नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, जो स्टाफ की उपस्थिति, दवाओं की उपलब्धता, रात्रिकालीन सेवाओं और फायर सेफ्टी तक पर नजर रखेंगे। भोपाल जिले के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने और मरीजों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग ने निगरानी व्यवस्था को और अधिक मजबूत कर दिया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. मनीष शर्मा द्वारा जारी आदेश के तहत जिले के विभिन्न सिविल अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) के लिए अलग-अलग नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। इन अधिकारियों को संबंधित अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर लगातार नजर रखने और व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि अस्पतालों में नियमित निरीक्षण और जवाबदेही तय होने से स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी और मरीजों को समय पर बेहतर उपचार मिल सकेगा। नोडल अधिकारियों को अस्पतालों में स्टाफ की उपस्थिति की निगरानी करने, कर्मचारियों की समयबद्ध कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने और रात्रिकालीन सेवाओं का निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेष रूप से रात के समय अस्पतालों में उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति का आकलन किया जाएगा ताकि किसी भी प्रकार की लापरवाही को रोका जा सके। नई व्यवस्था के तहत अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की उपलब्धता पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। नोडल अधिकारी दवाओं के स्टॉक और ईडीएल (एसेंशियल ड्रग लिस्ट) के अनुसार जरूरी दवाओं की उपलब्धता की नियमित समीक्षा करेंगे। इसके अलावा बायोमेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निपटान की व्यवस्था और फायर सेफ्टी ऑडिट की निगरानी भी उनकी जिम्मेदारी होगी। स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि अस्पतालों में सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़े मानकों का पालन सुनिश्चित करना प्राथमिकता होगी। कर्मचारियों की उपस्थिति की जांच ‘सार्थक एप’ के माध्यम से की जाएगी। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि अस्पतालों में तैनात डॉक्टर, नर्स और अन्य कर्मचारी निर्धारित समय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं या नहीं। विभाग का मानना है कि डिजिटल मॉनिटरिंग व्यवस्था से अनुशासन और जवाबदेही दोनों में सुधार होगा। आदेश के अनुसार डॉ. केएनके चिकित्सालय की जिम्मेदारी जिला परिवार कल्याण अधिकारी (द्वितीय) को सौंपी गई है। सिविल अस्पताल बैरसिया की निगरानी जिला टीकाकरण अधिकारी करेंगे, जबकि सिविल अस्पताल गोविंदपुरा के लिए जिला कार्यक्रम प्रबंधक को नोडल अधिकारी बनाया गया है। सीएचसी बैरसिया की जिम्मेदारी जिला क्षय अधिकारी, सीएचसी गांधीनगर की जिम्मेदारी जिला परिवार कल्याण अधिकारी (द्वितीय) और सीएचसी कोलार की जिम्मेदारी जिला परिवार कल्याण अधिकारी (प्रथम) को दी गई है। वहीं बैरसिया ब्लॉक के पीएचसी की निगरानी मुख्य खंड चिकित्सा अधिकारी बैरसिया तथा फंदा ब्लॉक के पीएचसी की निगरानी मुख्य खंड चिकित्सा अधिकारी फंदा-गांधीनगर करेंगे। स्वास्थ्य विभाग ने इस आदेश की प्रतिलिपि लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और जिला स्वास्थ्य समिति को भी भेज दी है। विभाग को उम्मीद है कि नई निगरानी व्यवस्था के जरिए अस्पतालों में सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा और मरीजों को अधिक व्यवस्थित, सुरक्षित एवं जवाबदेह स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी।
गारंटी वाली सड़कों को दोबारा बनाने का प्रस्ताव, PWD के 9 इंजीनियरों को नोटिस

मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) में एक बड़ा मामला सामने आया है। विभाग के कुछ इंजीनियरों ने ऐसी सड़कों के पुनर्निर्माण और मरम्मत के प्रस्ताव शासन को भेज दिए, जो अभी भी परफॉर्मेंस गारंटी अवधि में थीं। इस मामले को गंभीर मानते हुए विभाग ने 9 इंजीनियरों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और 15 दिनों के भीतर जवाब मांगा है। क्या है मामला?नियमों के अनुसार किसी सड़क के निर्माण के बाद निर्धारित अवधि तक उसकी मरम्मत और रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित ठेकेदार की होती है। इसे परफॉर्मेंस गारंटी अवधि कहा जाता है। इसके बावजूद अधिकारियों ने भोपाल, रायसेन, ग्वालियर, नर्मदापुरम, मंदसौर और मुरैना जिलों की 19 सड़कों के लिए करीब 140 करोड़ रुपए के नए निर्माण और मरम्मत प्रस्ताव शासन को भेज दिए। जबकि इन सड़कों की देखरेख का खर्च ठेकेदारों को उठाना था। विभागीय जांच में इसे नियमों के विपरीत माना गया है। किन इंजीनियरों पर आरोप?नोटिस के अनुसार विभिन्न अधिकारियों ने निम्न प्रस्ताव भेजे थे-योगेंद्र कुमार : भोपाल-रायसेन क्षेत्र की 8 सड़कों की व्हाइट टॉपिंग के लिए 51.65 करोड़ रुपए का प्रस्ताव।राकेश निगम : 3 सड़कों के लिए 27.50 करोड़ रुपए का प्रस्ताव।एस.आर. परते : 3 सड़कों के पुनर्निर्माण के लिए 19.03 करोड़ रुपए का प्रस्ताव।ए.के. जैन : ग्वालियर में गांधी रोड निर्माण के लिए 13.56 करोड़ रुपए का प्रस्ताव।ओमहरि शर्मा : गांधी रोड से संबंधित समान प्रस्ताव।आदित्य सोनी : मंदसौर जिले की 2 सड़कों के लिए 5.20 करोड़ रुपए का प्रस्ताव।पी.के. झा : रायसेन जिले के छींद मार्ग के लिए 5.12 करोड़ रुपए की मांग।सुभाष पाटिल और संजय रायकवार : नर्मदापुरम क्षेत्र में 4 सड़कों की मरम्मत हेतु 2.23 करोड़ रुपए का प्रस्ताव।विभाग की आपत्ति विभाग का कहना है कि परफॉर्मेंस गारंटी अवधि में आने वाली सड़कों के लिए शासन से नए निर्माण या मरम्मत की राशि मांगना नियमों के विरुद्ध है। ऐसी स्थिति में संबंधित ठेकेदारों से ही सड़क की मरम्मत और रखरखाव कराया जाना चाहिए। PWD ने सभी 9 इंजीनियरों से 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। जवाब संतोषजनक नहीं मिलने पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। मामले को वित्तीय अनुशासन और सरकारी धन के उपयोग से भी जोड़कर देखा जा रहा है। यह मामला सामने आने के बाद विभाग में सड़क निर्माण और रखरखाव से जुड़े प्रस्तावों की जांच और निगरानी को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
ज्योति रात्रे ने रचा इतिहास, पिको डी ओरिजाबा फतह करने वाली एमपी की पहली पर्वतारोही बनीं

मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश की प्रसिद्ध पर्वतारोही Jyoti Ratre ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है। माउंट एवरेस्ट फतह कर चुकीं ज्योति रात्रे ने 30 मई 2026 को मैक्सिको के सबसे ऊंचे और उत्तरी अमेरिका के सर्वोच्च ज्वालामुखी Pico de Orizaba की 5,636 मीटर (18,491 फीट) ऊंची चोटी पर तिरंगा फहराकर नया कीर्तिमान स्थापित किया। इस उपलब्धि के साथ वह उत्तरी अमेरिका के सबसे ऊंचे ज्वालामुखी पर तिरंगा फहराने वाली भारत की सबसे वरिष्ठ महिला पर्वतारोही बन गई हैं। साथ ही वे तीन महाद्वीपों के सर्वोच्च ज्वालामुखीय शिखरों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई करने वाली भारत की सबसे वरिष्ठ महिला भी बन चुकी हैं। मध्य प्रदेश के लिए ऐतिहासिक उपलब्धिBhopal की रहने वाली ज्योति रात्रे इस शिखर को फतह करने वाली मध्य प्रदेश की पहली पर्वतारोही बन गई हैं। यह उपलब्धि प्रदेश के पर्वतारोहण इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है। आधी रात से शुरू हुआ कठिन अभियानज्योति ने बताया कि अंतिम चढ़ाई 30 मई की रात 12:42 बजे शुरू हुई थी। बर्फीले मौसम, तेज हवाओं और घने अंधेरे के बीच उन्होंने लगातार आगे बढ़ते हुए करीब 10 घंटे 28 मिनट में शिखर तक पहुंचने का लक्ष्य हासिल किया। इस दौरान उन्होंने लगभग 1,400 मीटर की सीधी ऊंचाई एक ही प्रयास में तय की, जो पर्वतारोहण की दृष्टि से बेहद कठिन माना जाता है। हर कदम पर था खतराअभियान के दौरान तापमान -15 से -18 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। तेज हवाओं के कारण महसूस होने वाला तापमान लगभग -20 डिग्री सेल्सियस जैसा था। ग्लेशियर, ज्वालामुखीय चट्टानें और बर्फ से ढकी खड़ी ढलानें इस अभियान को और चुनौतीपूर्ण बना रही थीं। ज्योति के अनुसार, शिखर तक पहुंचना जितना कठिन था, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण नीचे सुरक्षित उतरना था। ग्रामीण महिलाओं को समर्पित की सफलताज्योति रात्रे ने अपनी इस उपलब्धि को देश की ग्रामीण महिलाओं को समर्पित किया। उनका कहना है कि यह अभियान उन महिलाओं के संघर्ष, साहस और सपनों का प्रतीक है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य हासिल करने का प्रयास करती हैं। यह सफलता न केवल मध्य प्रदेश बल्कि पूरे भारत के पर्वतारोहण जगत के लिए गर्व का विषय मानी जा रही है।
जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर क्रांति: मक्का-धान छोड़ किसानों की बदलती आर्थिक तस्वीर..

नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का भदेरवाह क्षेत्र इन दिनों कृषि परिवर्तन की एक अनोखी कहानी लिख रहा है, जहां पारंपरिक मक्का और धान जैसी फसलों को छोड़कर किसान लैवेंडर की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह क्षेत्र अब देशभर में “भारत की लैवेंडर राजधानी” के रूप में पहचान बना चुका है, जहां बैंगनी रंग के विशाल खेत न केवल पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रहे हैं। कम पानी की आवश्यकता और अधिक लाभ देने वाली इस फसल ने किसानों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है और कृषि को एक नई पहचान दी है। भदेरवाह के लेलरोट और टिपरी क्षेत्रों में इन दिनों लैवेंडर की कटाई का काम जोरों पर है। खेतों में फैले बैंगनी फूल वातावरण को सुगंधित और आकर्षक बना रहे हैं। किसान सावधानीपूर्वक फूलों की कटाई कर रहे हैं, जिन्हें आगे आवश्यक तेल, इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं, जिससे न केवल किसान बल्कि ग्रामीण मजदूर भी लाभान्वित हो रहे हैं। इस क्षेत्र में लैवेंडर खेती की शुरुआत लगभग 2010 के आसपास एक वैज्ञानिक संस्थान की पहल से हुई थी, जब चुनिंदा किसानों को शुरुआती पौधे उपलब्ध कराए गए थे। बाद में सरकारी योजना के तहत इस पहल को व्यापक समर्थन मिला, जिसमें किसानों को प्रशिक्षण, रोपण सामग्री और आवश्यक तेल निकालने के लिए आसवन इकाइयों की सुविधा दी गई। इसी निरंतर सहयोग के परिणामस्वरूप आज भदेरवाह और आसपास के क्षेत्रों में हजारों किसान परिवार इस खेती से जुड़े हुए हैं और इसे अपनी आय का मुख्य स्रोत बना चुके हैं। स्थानीय किसान रोशन ने बताया कि पहले पारंपरिक खेती से परिवार का गुजारा मुश्किल से होता था, लेकिन लैवेंडर ने उनकी आर्थिक स्थिति बदल दी है। उन्होंने बताया कि उन्होंने शुरुआत में छोटी जमीन से खेती शुरू की थी, जो अब कई गुना बढ़ चुकी है और उनके साथ सैकड़ों किसान भी जुड़ चुके हैं। इसी तरह कुलदीप कुमार जैसे किसानों का कहना है कि जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान और कम मुनाफे के कारण पारंपरिक खेती कठिन हो गई थी, लेकिन लैवेंडर ने स्थायी आय का रास्ता खोल दिया है और साल में दो बार कटाई होने से नियमित आमदनी सुनिश्चित हो रही है। भदेरवाह में लैवेंडर खेती केवल एक कृषि बदलाव नहीं बल्कि ग्रामीण विकास का मॉडल बनकर उभरी है, जहां बंजर पड़ी जमीन भी अब उत्पादन का केंद्र बन रही है। सरकारी सहयोग और योजनाओं के चलते यह मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। लगातार बढ़ती मांग और मूल्यवर्धित उत्पादों के बाजार ने इस फसल को और अधिक लाभकारी बना दिया है, जिससे किसानों का विश्वास इस दिशा में और मजबूत हुआ है। लैवेंडर खेती का यह विस्तार आने वाले वर्षों में जम्मू-कश्मीर की कृषि अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह तकनीकी सहयोग और बाजार उपलब्धता बनी रही तो यह क्षेत्र देश में अरोमा आधारित कृषि का प्रमुख केंद्र बन सकता है और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकता है।
तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था पर सवाल, हत्या मामले ने बढ़ाया राजनीतिक तनाव..

नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई एक बार फिर गंभीर अपराध की घटना को लेकर सुर्खियों में है, जहां टोंडियारपेट इलाके में 24 वर्षीय युवक विष्णु की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जानकारी के अनुसार, विष्णु ने अपने आसपास के इलाके में कथित तौर पर चल रही गांजे की अवैध बिक्री का विरोध किया था, जिसके बाद वह अपराधियों के निशाने पर आ गया। यह घटना पूरे क्षेत्र में दहशत और आक्रोश का कारण बन गई है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को विष्णु का सामना एक ऐसे समूह से हुआ जो इलाके में नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री से जुड़ा बताया जा रहा है। बहस के दौरान स्थिति अचानक हिंसक हो गई और आरोप है कि गिरोह के सदस्यों ने मिलकर उस पर हमला कर दिया। हमलावरों ने बीयर की बोतलों, हथौड़े और अन्य भारी वस्तुओं का इस्तेमाल करते हुए उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस वारदात के बाद इलाके में डर और तनाव का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अवैध नशे का कारोबार लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय है और इसके खिलाफ आवाज उठाना आम लोगों के लिए खतरे से खाली नहीं रह गया है। घटना के बाद लोग प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और इलाके में पुलिस की मौजूदगी बढ़ा दी गई है। जांच एजेंसियां हमलावरों की पहचान करने और पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी हुई हैं। इस हत्या ने राज्य की राजनीति को भी गर्म कर दिया है। विपक्षी दलों के नेताओं ने सरकार पर कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि अगर नशे के कारोबार पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ती रहेगी। इस घटना को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ गया है और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में फैलते अवैध नशे के कारोबार पर कड़ी निगरानी और त्वरित कार्रवाई की जरूरत है, ताकि इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। उनका यह भी कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता जरूरी है ताकि युवा नशे के नेटवर्क से दूर रह सकें। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहन जांच कर रही है और आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आम नागरिक सुरक्षित माहौल में नशे और अपराध के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं या नहीं। आने वाले दिनों में जांच के नतीजे इस मामले की गंभीरता और इसके पीछे छिपे नेटवर्क को सामने ला सकते हैं। यह घटना केवल एक हत्या नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी की तरह सामने आई है, जो दिखाती है कि अवैध नशे का कारोबार किस तरह आम जीवन और कानून-व्यवस्था दोनों को प्रभावित कर रहा है। आगे की कार्रवाई ही तय करेगी कि पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं और ऐसे अपराधों पर कितना अंकुश लगाया जा सकेगा।