समर सुपरफूड खसखस: शरीर को ठंडक के साथ देता है एनर्जी और जरूरी न्यूट्रिएंट्स

नई दिल्ली। गर्मियों की तेज धूप और लू से राहत पाने के लिए लोग कई उपाय अपनाते हैं, लेकिन पारंपरिक देसी नुस्खों की बात ही अलग होती है। ऐसा ही एक असरदार उपाय है खसखस, जो न सिर्फ शरीर को ठंडक देता है, बल्कि ताजगी और ऊर्जा भी प्रदान करता है। दादी-नानी के जमाने से खसखस का शरबत और दूध गर्मियों में खासतौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है, जिसे आयुर्वेद में बेहद गुणकारी माना गया है। आयुर्वेद में खास स्थान, पित्त दोष को करता है शांतखसखस को आयुर्वेद में पित्त दोष को शांत करने वाली जड़ी-बूटी माना जाता है। इसकी ठंडी तासीर शरीर की अतिरिक्त गर्मी को कम करती है और अंदर से राहत पहुंचाती है। गर्मियों में पेट की जलन, पैरों में जलन और त्वचा से जुड़ी समस्याओं में खसखस का सेवन काफी फायदेमंद साबित होता है। पोषक तत्वों का भंडारखसखस छोटे दानों में बड़ा पोषण छुपाए हुए है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जिंक और आयरन जैसे जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये तत्व शरीर को मजबूत बनाने के साथ-साथ इम्युनिटी बढ़ाने और मौसमी बीमारियों से बचाव में भी मदद करते हैं। ठंडक के साथ बेहतर पाचनगर्मियों में डिहाइड्रेशन और एसिडिटी आम समस्या बन जाती है। ऐसे में खसखस का सेवन शरीर के तापमान को संतुलित बनाए रखता है और पेट के एसिड को नियंत्रित करता है। फाइबर से भरपूर होने के कारण यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है और कब्ज की समस्या से भी राहत दिलाता है। अच्छी नींद और मानसिक शांतिखसखस का सेवन मानसिक शांति के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। यह शरीर को रिलैक्स करता है और अच्छी नींद लाने में मदद करता है। आज के तनाव भरे जीवन में यह एक प्राकृतिक उपाय के रूप में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। त्वचा और जोड़ों के लिए भी लाभकारीखसखस का तेल जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करने में मदद करता है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण शरीर को अंदर और बाहर दोनों तरह से फायदा पहुंचाते हैं। इसके अलावा, खसखस को दूध के साथ पीसकर लगाने से त्वचा की जलन, मुंहासे और सनबर्न में भी राहत मिलती है। सीमित मात्रा में करें सेवनहालांकि खसखस बेहद फायदेमंद है, लेकिन इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अगर किसी को एलर्जी या अन्य स्वास्थ्य समस्या हो, तो सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें। देसी नुस्खा, बड़ा फायदागर्मियों में रोजाना खसखस का शरबत या दूध लेने से शरीर ठंडा, स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है। यह एक आसान और प्राकृतिक तरीका है, जिससे आप खुद को गर्मी के असर से बचा सकते हैं। खसखस गर्मियों में शरीर को ठंडक देने, पाचन सुधारने, नींद बेहतर करने और त्वचा व जोड़ों की समस्याओं से राहत दिलाने वाला एक प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर देसी उपाय है।
हेल्थ टिप्स: सुबह उठते ही शरीर में जकड़न दूर करने के लिए अपनाएं ये आयुर्वेदिक उपाय

नई दिल्ली।आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादातर लोग घंटों तक एक ही जगह बैठकर काम करते हैं। इसका सीधा असर शरीर पर पड़ता है। मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, शरीर में अकड़न बढ़ती है और धीरे-धीरे जोड़ों में दर्द की समस्या आम हो जाती है। कई लोगों को सुबह उठते ही शरीर भारी लगना, जकड़न महसूस होना और जोड़ों में दर्द जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में आयुर्वेद में इसका प्राकृतिक समाधान बताया गया है। आमवातारि वटी: जोड़ों के दर्द में कारगर उपायआयुर्वेद के अनुसार जोड़ों के दर्द, सूजन और अकड़न का मुख्य कारण “वात” का बढ़ना और पाचन तंत्र का कमजोर होना है। इसी समस्या से राहत पाने के लिए आमवातारि वटी के सेवन की सलाह दी जाती है। यह आयुर्वेदिक औषधि शरीर में जमा “आम” (टॉक्सिन) को कम करने में मदद करती है और जोड़ों के दर्द से राहत दिलाती है। हालांकि, इसका सेवन हमेशा विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए। ‘आम’ बढ़ने से बढ़ती हैं बीमारियांजब पाचन तंत्र ठीक से काम नहीं करता, तो शरीर में “आम” यानी विषैले तत्व जमा होने लगते हैं।यह आम आंतों में संक्रमण पैदा करता है और धीरे-धीरे जोड़ों में सूजन, दर्द और रूमेटॉइड आर्थराइटिस जैसी समस्याओं को जन्म देता है। इस स्थिति में व्यक्ति के लिए चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का शक्तिशाली मिश्रणआमवातारि वटी कई प्रभावी जड़ी-बूटियों से मिलकर बनी होती है। इसमें शुद्ध गुग्गुलु, चित्रक मूल, त्रिफला (आंवला, हरड़, बहेड़ा), शुद्ध पारद और शुद्ध गंधक जैसे तत्व शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर न सिर्फ जोड़ों के दर्द को कम करते हैं, बल्कि पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाते हैं और शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में मदद करते हैं। जीवनशैली में बदलाव भी जरूरीकेवल दवा लेने से ही पूरी राहत नहीं मिलती, बल्कि जीवनशैली में बदलाव भी बेहद जरूरी है। सुबह की शुरुआत गुनगुने पानी से करें। इसके साथ मेथी के दाने या लहसुन का सेवन करना फायदेमंद हो सकता है। लहसुन में मौजूद गुण जोड़ों के दर्द को कम करने में मदद करते हैं। नियमित व्यायाम से मिलेगा फायदालंबे समय तक एक ही जगह बैठने से मांसपेशियों में खिंचाव और सूजन बढ़ सकती है। इसलिए बीच-बीच में उठकर हल्की स्ट्रेचिंग या वॉक करना जरूरी है। नियमित व्यायाम न सिर्फ जोड़ों को मजबूत बनाता है, बल्कि शरीर को लचीला भी बनाए रखता है। सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरीअगर जोड़ों का दर्द लगातार बना रहता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते सही इलाज और दिनचर्या में बदलाव से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। लंबे समय तक बैठने से जोड़ों में दर्द और अकड़न बढ़ रही है। आयुर्वेदिक औषधि आमवातारि वटी और सही जीवनशैली अपनाकर इस समस्या से राहत पाई जा सकती है।
गर्मियों में त्वचा का खास ख्याल, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से पाएं नैचुरल ग्लो
नई दिल्ली। गर्मियों का मौसम आते ही त्वचा से जुड़ी समस्याएं बढ़ने लगती हैं। तेज धूप, पसीना और धूल-मिट्टी के कारण चेहरा बेजान नजर आने लगता है। ऐसे में त्वचा की देखभाल बेहद जरूरी हो जाती है। आयुर्वेद में कई ऐसी जड़ी-बूटियां बताई गई हैं, जिनका इस्तेमाल करके आप बिना किसी केमिकल के अपने चेहरे को निखार सकते हैं और दाग-धब्बों से छुटकारा पा सकते हैं। नीम: पिंपल्स और एक्ने का दुश्मनआयुर्वेद में नीम को बेहद गुणकारी माना जाता है। इसमें एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। गर्मियों में अगर पिंपल्स या एक्ने की समस्या हो रही है, तो नीम के पत्तों को पीसकर मुल्तानी मिट्टी के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में लगाया जा सकता है। इससे त्वचा साफ होती है और निखार बढ़ता है। मंजिष्ठा: स्किन टोन को बनाए संतुलितमंजिष्ठा को आयुर्वेद में रक्त शुद्ध करने वाली जड़ी-बूटी माना जाता है। यह त्वचा की रंगत को सुधारने में मदद करती है। मंजिष्ठा का सेवन करने के साथ-साथ इसका फेस पैक बनाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे स्किन टोन में निखार आता है। हल्दी: दाग-धब्बों से छुटकाराहर घर में मौजूद हल्दी त्वचा के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसमें एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो दाग-धब्बों को कम करने में मदद करते हैं। मुल्तानी मिट्टी और चंदन के साथ चुटकी भर हल्दी मिलाकर फेस पैक लगाने से त्वचा को ठंडक मिलती है और ग्लो बढ़ता है। चंदन: ठंडक और पोषण का खजानागर्मियों में चंदन का इस्तेमाल बेहद फायदेमंद होता है। इसमें शीतलता के गुण होते हैं, जो त्वचा को ठंडक देने के साथ-साथ उसे पोषण भी देते हैं। यह धूप के कारण होने वाले नुकसान को कम करता है और त्वचा को तरोताजा बनाए रखता है। मुलेठी: टैनिंग और डार्क स्पॉट से राहतमुलेठी का इस्तेमाल सिर्फ खांसी-जुकाम के लिए ही नहीं, बल्कि त्वचा के लिए भी किया जाता है।इसके लेप से डार्क स्पॉट और टैनिंग कम होती है, जिससे चेहरा साफ और चमकदार नजर आता है। नियमित इस्तेमाल से मिलेगा बेहतर रिजल्टइन सभी जड़ी-बूटियों का नियमित और सही तरीके से इस्तेमाल करने पर त्वचा से जुड़ी समस्याओं में काफी हद तक राहत मिल सकती है। हालांकि, किसी भी नई चीज को इस्तेमाल करने से पहले स्किन टेस्ट जरूर करें, ताकि किसी तरह की एलर्जी से बचा जा सके। गर्मियों में नीम, मंजिष्ठा, हल्दी, चंदन और मुलेठी जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां त्वचा को निखारने, दाग-धब्बे कम करने और नैचुरल ग्लो पाने में बेहद असरदार साबित होती हैं।
विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026: स्वस्थ जीवन के लिए जागरूकता और इस बार की खास थीम

नई दिल्ली। हर साल 7 अप्रैल को दुनिया भर में विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 मनाया जाता है। यह दिन न सिर्फ स्वास्थ्य के महत्व को समझाने का अवसर है, बल्कि लोगों को एकजुट होकर बेहतर भविष्य बनाने के लिए प्रेरित भी करता है। साल 2026 में इस दिवस की थीम है -“स्वास्थ्य के लिए एकजुट, विज्ञान के साथ खड़े रहें”, जो आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत को दर्शाती है। 1948 से शुरू हुई जागरूकता की परंपराविश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को हुई थी, और इसी के उपलक्ष्य में हर साल यह दिन मनाया जाता है। इस दिन दुनिया भर में स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होती है और लोगों को जागरूक किया जाता है कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें। इस साल की थीम: विज्ञान और सहयोग पर जोरसाल 2026 की थीम “स्वास्थ्य के लिए एकजुट, विज्ञान के साथ खड़े रहें” के जरिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बेहतर स्वास्थ्य के लिए विज्ञान और सहयोग दोनों जरूरी हैं। यह थीम “वन हेल्थ” सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें इंसान, जानवर और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा माना गया है। सालभर चलेगा वैश्विक अभियानइस बार यह अभियान सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे साल चलेगा। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक खोजों को वास्तविक जीवन में लागू करना और उन्हें आम लोगों तक पहुंचाना है। अभियान के तहत लोगों, सरकारों, वैज्ञानिकों और स्वास्थ्यकर्मियों को साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। दो बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों से शुरुआतइस वैश्विक पहल की शुरुआत 7 अप्रैल को दो प्रमुख आयोजनों के साथ होगी। पहला कार्यक्रम फ्रांस की जी7 अध्यक्षता में आयोजित “वन हेल्थ शिखर सम्मेलन” है। दूसरा एक बड़ा वैश्विक मंच है, जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोगी केंद्रों से जुड़े 80 से अधिक देशों के लगभग 800 वैज्ञानिक संस्थान भाग ले रहे हैं। ये दोनों आयोजन मिलकर दुनिया का एक विशाल वैज्ञानिक नेटवर्क तैयार करेंगे। नई चुनौतियों से निपटने में विज्ञान की भूमिकाआज के दौर में महामारी, जलवायु परिवर्तन और एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस जैसी चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि इन समस्याओं का समाधान केवल विज्ञान और शोध के जरिए ही संभव है। इसलिए लोगों से अपील की गई है कि वे विज्ञान पर भरोसा रखें और उसका समर्थन करें। सोशल मीडिया पर भी जुड़ने का आह्वानइस अभियान के तहत लोगों को अपनी कहानियां साझा करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है कि कैसे विज्ञान ने उनके जीवन को बेहतर बनाया। सोशल मीडिया पर #StandWithScience और #WorldHealthDay जैसे हैशटैग के जरिए वैश्विक स्तर पर चर्चा को बढ़ावा दिया जा रहा है। एकजुटता से ही बनेगा स्वस्थ भविष्यइस साल का संदेश साफ है-स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हमें एकजुट होना होगा और विज्ञान के साथ खड़ा रहना होगा। अगर दुनिया मिलकर प्रयास करे, तो एक स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का निर्माण संभव है।
इंदौर-पीथमपुर उद्योगों पर युद्ध का असर, घटा उत्पादन, सरकार ने मांगी रिपोर्ट, राहत पैकेज की मांग तेज

इंदौर। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव का असर अब मध्यप्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों पर भी साफ दिखने लगा है। इंदौर-पीथमपुर इंडस्ट्रियल बेल्ट में उत्पादन घटने और रोजगार पर असर पड़ने के मामलों को सरकार ने गंभीरता से लिया है। इसी के तहत राज्य सरकार ने उद्योग संगठनों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी जिसे अब प्रस्तुत कर दिया गया है। अधिकारियों ने उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर एमएसएमई और बड़ी इकाइयों की स्थिति पर लगातार निगरानी रखने की बात कही है। एमएसएमई पर सबसे ज्यादा मार पीथमपुर औद्योगिक संगठन ने अपनी रिपोर्ट में हालात को आर्थिक आपातकाल जैसे बताया है। कई छोटे और मध्यम उद्योग बंद होने की कगार पर हैं। भुगतान चक्र बिगड़ने से पूंजी संकट गहराता जा रहा है जिससे उद्योगों की कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) पर भारी दबाव पड़ रहा है। उद्योगों को कच्चे माल गैस और अन्य संसाधनों के लिए अग्रिम भुगतान करना पड़ रहा है जबकि तैयार माल का भुगतान देरी से मिल रहा है। इससे आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है। कच्चे माल की कमी लागत में बढ़ोतरी रिपोर्ट के अनुसार उद्योग करीब 70% कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं। युद्ध के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है जिससे कीमतें बढ़ गई हैं और उत्पादन लागत में इजाफा हुआ है। पीएनजी और एलपीजी की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। एलपीजी की कमी बनी हुई है जबकि पीएनजी के दाम बढ़ गए हैं। पहले दी जा रही रियायतें भी वापस ले ली गई हैं जिससे उद्योगों की परेशानी और बढ़ गई है। निर्यात पर भी पड़ा असर पीथमपुर से होने वाला निर्यात भी प्रभावित हुआ है। बड़ी मात्रा में तैयार माल बंदरगाहों पर फंसा हुआ है जिससे उद्योगों की पूंजी अटक गई है और वित्तीय दबाव बढ़ गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि फ्रेट लागत बढ़कर करीब 2400 डॉलर तक पहुंच गई है जो पहले की तुलना में लगभग दोगुनी है। इसके अलावा युद्ध सरचार्ज भी अतिरिक्त रूप से देना पड़ रहा है। सरकार से राहत की मांग तेज विभिन्न औद्योगिक संगठनों फार्मा प्लास्टिक ऑटो एंसिलरी और पैकेजिंग सेक्टर ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठनों ने एलपीजी और गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण और वैट घटाने की मांग उठाई है। वर्तमान में वैट 14% है जबकि अन्य राज्यों में यह करीब 5% है। इसके अलावा बिजली दरों में बढ़ोतरी रोकने और पावर टैरिफ पर सब्सिडी देने की भी मांग की गई है ताकि उत्पादन लागत कम हो सके। रोजगार बचाने पर जोर उद्योगों ने सरकार से वर्किंग कैपिटल के लिए ब्याज सहायता पूंजी समर्थन और रोजगार बनाए रखने के लिए इम्प्लॉयमेंट सब्सिडी देने की भी मांग की है जिससे उद्योग और श्रमिक दोनों को राहत मिल सके।
KKR की मुश्किलें बढ़ीं! एक नहीं कई समस्याएं, प्लेऑफ की राह हो सकती है कठिन

नई दिल्ली।तीन बार की चैंपियन कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए आईपीएल 2026 की शुरुआत बेहद निराशाजनक रही है। तीन मुकाबलों के बाद भी टीम जीत का खाता नहीं खोल पाई है। ऐसे में टीम के सामने एक नहीं बल्कि कई बड़ी समस्याएं खड़ी हो गई हैं, जिनका समाधान जल्द नहीं निकला तो पूरा सीजन हाथ से निकल सकता है। ओपनिंग जोड़ी बनी चिंताकेकेआर की सलामी जोड़ी इस सीजन उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही। फिन एलन तेज शुरुआत तो दिला रहे हैं, लेकिन बड़ी पारी खेलने में नाकाम रहे हैं। वहीं कप्तान अजिंक्य रहाणे की धीमी बल्लेबाजी टीम के लिए परेशानी बनती जा रही है। पावरप्ले में रन गति बनाए रखना टीम के लिए चुनौती बन चुका है। महंगे खिलाड़ी कैमरून ग्रीन फ्लॉपकेकेआर ने ऑक्शन में कैमरून ग्रीन पर 25.20 करोड़ रुपये खर्च किए थे, लेकिन उनका प्रदर्शन अब तक निराशाजनक रहा है। ग्रीन न तो गेंदबाजी कर पा रहे हैं और न ही बल्ले से योगदान दे पा रहे हैं। तीन मैचों में उनके बल्ले से सिर्फ 24 रन निकले हैं, जिससे टीम का संतुलन बिगड़ गया है। मिडिल ऑर्डर में अनुभव की कमीकेकेआर का मध्यक्रम भी कमजोर कड़ी साबित हो रहा है। अंगकृष रघुवंशी ने जरूर कुछ अच्छी पारियां खेली हैं, लेकिन उन्हें बाकी बल्लेबाजों का साथ नहीं मिला। फिनिशर की भूमिका निभाने वाले रिंकू सिंह ने 68 रन बनाए हैं, लेकिन उनका आक्रामक अंदाज अभी तक नहीं दिखा। इसके अलावा रमनदीप सिंह, अनुकूल रॉय और सुनील नरेन पर लगातार निर्भर रहना टीम के लिए जोखिम भरा साबित हो रहा है। गेंदबाजी बनी सबसे बड़ी कमजोरीकेकेआर की तेज गेंदबाजी शुरुआत से ही सवालों के घेरे में रही है और यह चिंता अब हकीकत बन चुकी है। वैभव अरोड़ा और ब्लेसिंग मुजरबानी काफी महंगे साबित हुए हैं।वहीं कार्तिक त्यागी भी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। स्पिन विभाग में भी वरुण चक्रवर्ती और सुनील नरेन की खराब फॉर्म ने टीम की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आगे की राह मुश्किलपिछले कुछ सीजन में केकेआर की सफलता काफी हद तक वरुण-नरेन की जोड़ी पर निर्भर रही है। ऐसे में इनका खराब प्रदर्शन टीम के लिए बड़ा झटका है। अगर टीम ने जल्द ही अपनी कमजोरियों को दूर नहीं किया, तो प्लेऑफ की दौड़ में बने रहना मुश्किल हो सकता है। आईपीएल 2026 में केकेआर कई समस्याओं से जूझ रही है ओपनिंग, मिडिल ऑर्डर, महंगे खिलाड़ी का फ्लॉप होना और कमजोर गेंदबाजी। अगर जल्द सुधार नहीं हुआ, तो टीम का पूरा गणित बिगड़ सकता है।
टैक्स नहीं बढ़ेगा फिर भी तेज होगा विकास इंदौर नगर निगम के डिजिटल बजट में बड़े ऐलान

इंदौर । मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में नगर निगम ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 8455 करोड़ रुपये का महत्वाकांक्षी बजट पेश किया है जो विकास और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार का बड़ा रोडमैप माना जा रहा है। खास बात यह है कि इतने बड़े बजट के बावजूद न तो कोई नया टैक्स लगाया गया है और न ही मौजूदा करों में किसी तरह की बढ़ोतरी की गई है। निगम ने इस बजट को पूरी तरह डिजिटल स्वरूप में प्रस्तुत किया है जो पारदर्शिता और आधुनिक प्रशासन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। नगर निगम का दावा है कि यह बजट आम जनता को राहत देने के साथ साथ शहर के तेजी से विकास को गति देगा। पिछले वित्तीय वर्ष में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक राजस्व संग्रह का हवाला देते हुए यह विश्वास जताया गया है कि नागरिकों के सहयोग से विकास कार्यों को बिना टैक्स बढ़ाए भी आगे बढ़ाया जा सकता है। बजट में सबसे बड़ा फोकस स्वच्छता पर रखा गया है क्योंकि इंदौर लगातार देश के सबसे स्वच्छ शहर के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है। इस स्थिति को बरकरार रखने के लिए वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को और मजबूत करने की योजना बनाई गई है। बायो सीएनजी प्लांट की क्षमता को 550 टन से बढ़ाकर 800 टन प्रतिदिन करने का लक्ष्य रखा गया है वहीं 200 टन प्रतिदिन क्षमता वाला नया सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट भी स्थापित किया जाएगा। जीरो वेस्ट मॉडल की दिशा में काम करते हुए कचरे से ऊर्जा और उपयोगी उत्पाद बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए भी बड़े स्तर पर निवेश का प्रावधान किया गया है। शहर में सड़कों ड्रेनेज और जल आपूर्ति नेटवर्क को मजबूत करने के लिए व्यापक योजनाएं तैयार की गई हैं। पिछले वर्ष 150 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया था और अब इस रफ्तार को और बढ़ाने की योजना है। करीब 700 किलोमीटर ड्रेनेज लाइन और 150 से 200 किलोमीटर नई पानी की पाइपलाइन बिछाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही नए पुल पुलिया और रोड कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट भी शहर के विस्तार को नई दिशा देंगे। डिजिटल इंदौर के विजन को आगे बढ़ाते हुए नगर निगम ने तकनीकी सुधारों पर भी जोर दिया है। 25 हजार घरों को डिजिटल पहचान देने और करीब 30 लाख दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन की योजना बनाई गई है। निगम का अपना डिजिटल पोर्टल तैयार किया जा रहा है जिससे नागरिक सेवाएं आसान पारदर्शी और तेज हो सकेंगी। बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए जल प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। नर्मदा परियोजना के विस्तार के साथ नई टंकियों और पाइपलाइन नेटवर्क का निर्माण किया जाएगा। वर्ष 2050 तक शहर में 1620 एमएलडी पानी की जरूरत का अनुमान लगाया गया है और उसी के अनुसार दीर्घकालीन योजना तैयार की गई है। स्वास्थ्य खेल और बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए भी कई अहम घोषणाएं की गई हैं। हर वार्ड में संजीवनी क्लीनिक और पॉली क्लीनिक स्थापित किए जाएंगे वहीं स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स खेल मैदान सार्वजनिक शौचालय पार्क और ग्रीन फॉरेस्ट डेवलपमेंट पर भी काम किया जाएगा ताकि नागरिकों को बेहतर जीवन स्तर मिल सके। कुल मिलाकर इंदौर नगर निगम का यह बजट विकास स्वच्छता डिजिटल सिस्टम और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने का संतुलित प्रयास है। बिना टैक्स बढ़ाए इतने बड़े स्तर पर योजनाओं का ऐलान निश्चित रूप से सराहनीय है लेकिन अब सबसे अहम सवाल यही है कि इन योजनाओं को जमीन पर कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है क्योंकि असली सफलता क्रियान्वयन में ही छिपी होती है।
मध्य पूर्व संघर्ष के तेज होने की चिंताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार लाल निशान में खुला, सेंसेक्स 300 अंक टूटा

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान युद्ध के तेज होने की चिंताओं के बीच सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को भी भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ लाल निशान में खुला। इसके पहले सोमवार को भी बाजार लाल रंग में खुला था। इस दौरान, 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 372.49 अंक या 0.50 प्रतिशत गिरकर 73,734.36 पर खुला, तो वहीं निफ्टी 50 129.55 अंक या 0.56 प्रतिशत गिरकर 22,838.70 पर खुला। इसके अलावा, बैंक निफ्टी 350.40 अंक या 0.67 प्रतिशत गिरकर 52,258.70 पर खुला। (सुबह 9:28 बजे के करीब) सेंसेक्स 0.43 प्रतिशत यानी 315.64 अंक गिरकर 73,791.21 पर ट्रेड कर रहा था, तो वहीं निफ्टी50 0.38 प्रतिशत या 87.40 अंक गिरकर 22,880.85 पर कारोबार कर रहा था। व्यापक बाजारों में, निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.47 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 0.23 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। वहीं सेक्टरवार देखें तो निफ्टी आईटी में 0.93 प्रतिशत और निफ्टी एफएमसीजी में 0.15 प्रतिशत की उछाल देखने को मिली। जबकि निफ्टी ऑटो में 1.33 प्रतिशत, निफ्टी बैंक में 0.82 प्रतिशत, निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में 0.61 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी 50 में हिंडाल्को, विप्रो, टेक महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, एचसीएल टेक, ओएनजीसी, आईटीसी और टीसीएस में सबसे ज्यादा तेजी देखने को मिली, जबकि इसके विपरीत मैक्स हेल्थ, इंडिगो, एमएंडएम, इटरनल, आयशर मोटर, एक्सिस बैंक और अल्ट्राटेक सीमेंट के शेयर सबसे ज्यादा गिरावट के साथ कारोबार करते नजर आए। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक बाजार इस समय बेहद सतर्क हैं, क्योंकि एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक समयसीमा नजदीक आ रही है। निवेशकों की नजर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दिए गए अल्टीमेटम पर टिकी हुई है, जिसकी समयसीमा भारतीय समयानुसार बुधवार सुबह 6:30 बजे (अमेरिकी समयानुसार रात 8:00 बजे) है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा नहीं खोलता, तो सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी है और डब्ल्यूटीआई क्रूड ऑयल 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जिसकी मुख्य वजह यह है कि ट्रंप ने अपने अल्टीमेटम को दोहराते हुए ईरान के बिजली संयंत्रों और पुलों पर हमले की चेतावनी दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई गुजरती है, 28 फरवरी से जारी संघर्ष के कारण बाधित है, जिससे इस साल अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 90 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं, ईरान ने अमेरिका समर्थित 45 दिन के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसे पाकिस्तान, मिस्र और तुर्किये जैसे देशों ने समर्थन दिया था। ईरान का कहना है कि वह स्थायी शांति, प्रतिबंधों में राहत और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई चाहता है। एक मार्केट एक्सपर्ट के अनुसार, तकनीकी रूप से निफ्टी के लिए निकट अवधि का रेजिस्टेंस 23,465 पर है, जबकि सपोर्ट लेवल 22,800 और 22,540 पर देखा जा रहा है।
एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स के रिकॉर्ड बिक्री के चलते पहली तिमाही के परिचालन लाभ में 33 प्रतिशत की हुई बढ़ोतरी

नई दिल्ली।दक्षिण कोरिया की दिग्गज कंपनी एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में शानदार प्रदर्शन किया है। मजबूत बिक्री और खासतौर पर होम अप्लायंस बिजनेस की दमदार ग्रोथ के चलते कंपनी का परिचालन लाभ (ऑपरेटिंग प्रॉफिट) साल-दर-साल 33 प्रतिशत बढ़ गया है। ऑपरेटिंग प्रॉफिट में जबरदस्त उछालकंपनी की नियामक फाइलिंग के अनुसार, पहली तिमाही में ऑपरेटिंग प्रॉफिट 1.25 ट्रिलियन वॉन से बढ़कर 1.67 ट्रिलियन वॉन (करीब 1.1 अरब डॉलर) हो गया। यह बढ़ोतरी ऐसे समय आई है, जब पिछली तिमाही में कंपनी को नुकसान उठाना पड़ा था। बिक्री ने बनाया नया रिकॉर्डएलजी इलेक्ट्रॉनिक्स की कुल बिक्री 4.4 प्रतिशत बढ़कर 23.73 ट्रिलियन वॉन तक पहुंच गई, जो पहली तिमाही के लिए अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक शुद्ध लाभ (नेट प्रॉफिट) के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। फाइनल अर्निंग रिपोर्ट इस महीने के अंत में जारी की जाएगी। पिछली तिमाही से शानदार वापसीगौरतलब है कि पिछली (चौथी) तिमाही में कंपनी को 109 बिलियन वॉन का ऑपरेटिंग नुकसान हुआ था। इसकी वजह कमजोर मांग और रिस्ट्रक्चरिंग से जुड़े एकमुश्त खर्च थे। लेकिन नई तिमाही में कंपनी ने शानदार वापसी करते हुए न सिर्फ नुकसान की भरपाई की, बल्कि मजबूत मुनाफा भी दर्ज किया। होम अप्लायंस बिजनेस बना ग्रोथ का इंजन कंपनी के मुताबिक, उसके होम अप्लायंस सॉल्यूशन डिवीजन ने इस ग्रोथ में अहम भूमिका निभाई। सब्सक्रिप्शन मॉडल को मजबूत करने और प्रीमियम प्रोडक्ट्स पर फोकस ने बिक्री को बढ़ावा दिया। इसके अलावा, मीडिया और एंटरटेनमेंट बिजनेस भी पिछली तिमाही के नुकसान से उबरकर मुनाफे में लौट आया है, जिसमें लागत कटौती का बड़ा योगदान रहा। व्हीकल और अन्य सेगमेंट का प्रदर्शनव्हीकल सॉल्यूशन बिजनेस में भी साल-दर-साल मुनाफे में सुधार देखने को मिला। दक्षिण कोरियाई मुद्रा वॉन के कमजोर होने से इस सेगमेंट को फायदा मिला, क्योंकि इसके ज्यादातर ग्राहक विदेशों में हैं। हालांकि, इको सॉल्यूशन बिजनेस में बाजार की अनिश्चितताओं के चलते बिक्री और मुनाफे में गिरावट दर्ज की गई। AI और भविष्य की रणनीति पर फोकसएलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने बताया कि वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर से जुड़ी मांग को पूरा करने पर ध्यान देगी। इसके साथ ही, कंपनी भविष्य के ग्रोथ इंजन के रूप में होम रोबोट और स्मार्ट उपकरणों पर निवेश बढ़ाने की योजना बना रही है। वैश्विक चुनौतियों से निपटने की तैयारीकंपनी ने कहा कि मध्य पूर्व में तनाव, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और कच्चे माल व लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इनसे निपटने के लिए कंपनी लागत में कटौती और लचीली रणनीति अपनाएगी, ताकि आने वाले समय में ग्रोथ को बनाए रखा जा सके। एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने रिकॉर्ड बिक्री के दम पर पहली तिमाही में 33% मुनाफा बढ़ाया। होम अप्लायंस बिजनेस इसकी सबसे बड़ी ताकत रहा, जबकि कंपनी भविष्य में AI और नए टेक्नोलॉजी सेगमेंट पर फोकस बढ़ा रही है।
क्या डिजिटल राजनैतिक प्रचार की कोई नैतिक सीमा है?

– डॉ. शैलेश शुक्ला राजनीतिक प्रचार उतना ही पुराना है जितनी कि राजनीति स्वयं। प्राचीन रोम में दीवारों पर संदेश लिखे जाते थे। मध्यकाल में राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन भव्य स्मारकों और अनुष्ठानों के माध्यम से करते थे। बीसवीं सदी में रेडियो, टेलीविज़न और समाचार पत्र राजनीतिक प्रचार के मुख्य माध्यम बने। लेकिन इन सभी युगों में एक बात साझी थी — प्रचार की एक सार्वजनिक दृश्यता और उसके साथ एक निहित जवाबदेही। आज, डिजिटल राजनीतिक प्रचार ने इस जवाबदेही की अवधारणा को ही उलट दिया है। जब प्रचार अदृश्य हो, व्यक्तिगत हो, तात्कालिक हो, और किसी भी तथ्यात्मक जाँच से मुक्त हो — तो प्रश्न उठता है कि क्या इसकी कोई नैतिक सीमा है? और यदि है, तो उसे कौन तय करेगा और कौन लागू करेगा? नैतिकता के प्रश्न पर विचार करने से पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राजनीतिक प्रचार और राजनीतिक संवाद के बीच की रेखा स्पष्ट नहीं है। हर राजनेता अपने विचारों को श्रेष्ठ और विरोधी के विचारों को निकृष्ट प्रस्तुत करता है — यह राजनीति का स्वाभाविक अंग है। नैतिक समस्या तब शुरू होती है जब प्रचार झूठ पर आधारित हो, जब वह लोगों को हेरफेर करे बजाय सूचित करने के, और जब वह समाज में नफरत, विभाजन, या हिंसा को बढ़ावा दे। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की नैतिक समस्याओं की पहली श्रेणी है — असत्य और भ्रामक जानकारी का जानबूझकर प्रसार। जब कोई राजनीतिक दल या उसका समर्थक यह जानते हुए कि कोई बात असत्य है, उसे सोशल मीडिया पर फैलाता है ताकि मतदाताओं की राय को प्रभावित किया जा सके — यह नैतिक दृष्टि से स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है। एमआईटी के 2018 के अध्ययन ने प्रमाणित किया कि असत्य सूचनाएँ ट्विटर पर 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट होती हैं। यह लोकतंत्र की उस बुनियाद पर सीधा हमला है जिसके अनुसार नागरिक सही जानकारी के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करें। दूसरी नैतिक समस्या है व्यक्तिगत डेटा का बिना सहमति के राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ प्रकरण इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। इस कंपनी ने करीब 87 मिलियन फेसबुक उपयोगकर्ताओं के डेटा का उपयोग करके लोगों के मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाए और उनकी कमज़ोरियों को लक्षित करने वाले राजनीतिक विज्ञापन दिखाए। यह केवल गोपनीयता का उल्लंघन नहीं था — यह मानवीय स्वायत्तता और स्वतंत्र इच्छा पर हमला था। जब एक प्रणाली यह तय करने लगती है कि आपके मन में कौन सा डर है और फिर उसी डर को और गहरा करने वाला राजनीतिक संदेश आप तक पहुँचाती है, तो आपकी ‘स्वतंत्र पसंद’ वास्तव में कितनी स्वतंत्र है? तीसरी नैतिक समस्या है सांप्रदायिक या जातीय विद्वेष को भड़काने के लिए डिजिटल प्रचार का उपयोग। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध 2017 में हुई हिंसा में फेसबुक की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र की तथ्य-अन्वेषण टीम ने अपनी 2018 की रिपोर्ट में ‘निर्णायक’ बताया। 700,000 से अधिक रोहिंग्या को बांग्लादेश भागना पड़ा। 2022 में एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक विस्तृत रिपोर्ट ने भी पुष्टि की कि मेटा के एल्गोरिदम ने रोहिंग्या-विरोधी नफरत भरी सामग्री को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। यह एक चरम उदाहरण है, लेकिन यह दर्शाता है कि डिजिटल राजनीतिक प्रचार में ‘नफरत’ एक हथियार बन सकती है जिसके परिणाम जीवन और मृत्यु की रेखा तक पहुँच सकते हैं। नैतिक सीमाओं के प्रश्न पर तीन मुख्य दृष्टिकोण हैं। पहला ‘बाज़ार-आधारित’ दृष्टिकोण यह मानता है कि सूचना के मुक्त बाज़ार में अच्छे विचार बुरे विचारों को हरा देंगे। दूसरा ‘सरकार-नियंत्रण’ का दृष्टिकोण मानता है कि सरकार को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। तीसरा ‘मंच-उत्तरदायित्व’ का दृष्टिकोण मानता है कि डिजिटल मंचों को स्वयं अपने नैतिक मानक तय करने और लागू करने चाहिए। इन तीनों दृष्टिकोणों की अपनी-अपनी सीमाएँ और जोखिम हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण सत्ताधारी दलों को विपक्षी आवाज़ों को दबाने का अवसर दे सकता है — यह जोखिम भारत जैसे देश में विशेष रूप से प्रासंगिक है। ‘माइक्रोटार्गेटिंग’ की नैतिकता पर विशेष विचार आवश्यक है। ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ के पूर्व सीईओ अलेक्जेंडर निक्स ने 2016 में एक साक्षात्कार में बताया था कि उनकी कंपनी के पास अमेरिका के 230 मिलियन वयस्कों पर 4,000 से 5,000 ‘डेटा पॉइंट’ थे और वे हर व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रोफाइल बनाते थे। यदि इस डेटा का उपयोग केवल लोगों को उनकी पहचानी गई कमज़ोरियों पर प्रहार करके एक निश्चित तरीके से वोट देने के लिए प्रेरित करने में किया जाए, तो यह सूचना नहीं, मनोवैज्ञानिक हेरफेर है — जो नैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य है। डिजिटल मंचों की नैतिक ज़िम्मेदारी भी इस प्रश्न का एक केंद्रीय हिस्सा है। फेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ्रांसेस हाउजेन ने अपनी सीनेट गवाही में कहा था, “फेसबुक ने बार-बार अपने मुनाफे और लोगों की सुरक्षा के बीच टकराव में मुनाफे को चुना। परिणाम एक ऐसी प्रणाली है जो विभाजन, उग्रवाद और ध्रुवीकरण को बढ़ाती है।” जब ये कंपनियाँ राजनीतिक विज्ञापनों से अरबों डॉलर कमाती हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ‘तटस्थ मंच’ का तर्क खोखला है — जब कोई मंच अपने एल्गोरिदम के माध्यम से तय करता है कि कौन सी सामग्री करोड़ों लोगों तक पहुँचेगी, तो वह संपादकीय निर्णय ले रहा है। नागरिक समाज और पत्रकारिता की भूमिका भी नैतिक सीमाओं को परिभाषित और लागू करने में महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र तथ्य-परीक्षण संस्थाएँ, निगरानी समूह, और खोजी पत्रकार डिजिटल प्रचार के दुरुपयोग को उजागर करने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं। भारत में ऑल्ट न्यूज़, बूम, और अन्य संस्थाएँ यह काम करती हैं। यूरोपीय संघ के ‘कोड ऑफ प्रैक्टिस ऑन डिसइन्फर्मेशन’ और यूनेस्को की ‘इंटरनेट यूनिवर्सलिटी इंडिकेटर्स’ जैसे दस्तावेज़ नैतिक सिद्धांतों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को रेखांकित करते हैं — जैसे पारदर्शिता, सत्यता, और नफरत की अपील के लिए कोई स्थान नहीं। अंतिम और शायद सबसे महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न यह है — क्या राजनीतिक दलों में स्वयं नैतिक प्रचार का संकल्प होना चाहिए? कानून और नियामक संस्थाएँ अपना काम करें लेकिन अंततः एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि राजनेता स्वयं यह तय करें कि वे क्या करेंगे और क्या नहीं — केवल इसलिए नहीं कि कानून मना करता है, बल्कि इसलिए कि यह सही है। डिजिटल राजनीतिक प्रचार की कोई भी नैतिक सीमा तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक कि राजनीतिक नेता, दल, और उनके समर्थक