नई दिल्ली। ईरान की सत्ता पर तीन दशक से अधिक समय तक मजबूत पकड़ बनाए रखने वाले अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर ने पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिकी और इजरायली हमलों में उनके मारे जाने की सूचना के बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है और कई देशों में विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिल रहे हैं। 36 वर्षों तक सर्वोच्च नेता रहे खामेनेई का राजनीतिक जीवन जितना प्रभावशाली रहा उतना ही विवादों से भी घिरा रहा। लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा पहलू भी था जिसने उन्हें 45 साल तक अपना दाहिना हाथ सार्वजनिक रूप से छिपाने पर मजबूर कर दिया।
1981 का वह धमाका जिसने बदल दी तकदीर
साल 1981 में जब खामेनेई ईरान के राष्ट्रपति थे और ईरान-इराक युद्ध का दौर चल रहा था तभी उन पर एक जानलेवा हमला हुआ। नमाज के बाद वह लोगों से बातचीत कर रहे थे कि एक व्यक्ति उनकी मेज पर टेप रिकॉर्डर रखकर चला गया। कुछ ही देर बाद उसमें विस्फोट हो गया। इस हमले की जिम्मेदारी फुरकान ग्रुप ने ली और इसे इस्लामिक रिपब्लिक के लिए तोहफा बताया।
विस्फोट में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गए और कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। इस हमले का सबसे बड़ा असर उनके दाहिने हाथ पर पड़ा जो हमेशा के लिए निष्क्रिय हो गया। उसमें लकवा मार गया। बाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें एक हाथ की जरूरत नहीं अगर उनका दिमाग और जुबान काम करते रहें तो वही काफी है। इसके बाद से वह शपथ या सार्वजनिक कार्यक्रमों में बायां हाथ ही उठाते थे।
खोमैनी की विरासत और सत्ता तक सफर
खोमैनी की विरासत और सत्ता तक सफर
1989 में रूहोल्ला खोमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता चुना गया। इससे पहले वह राष्ट्रपति रह चुके थे और क्रांति के शुरुआती दौर से ही सक्रिय थे। 1939 में मशहद में जन्मे खामेनेई ने नजफ और क़ुम के धार्मिक मदरसों में शिक्षा प्राप्त की। किशोरावस्था में ही उन्होंने क्रांतिकारी इस्लामी विचारधारा अपनाई जिसमें नवाब सफावी जैसे धर्मगुरुओं का प्रभाव था।
1958 में उनकी मुलाकात खोमैनी से हुई और उन्होंने उनकी विचारधारा को अपना लिया। खोमैनीवाद का मूल सिद्धांत विलायत-ए-फकीह था जिसके तहत सर्वोच्च धार्मिक नेता को व्यापक राजनीतिक और धार्मिक अधिकार मिलते हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद यही व्यवस्था ईरान की सत्ता संरचना का आधार बनी।
सत्ता सख्ती और विरोध
सर्वोच्च नेता बनने के बाद खामेनेई ने घरेलू राजनीति पर मजबूत नियंत्रण स्थापित किया। उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर आईआरजीसी के साथ करीबी संबंध बनाए जो समय के साथ देश की सबसे प्रभावशाली ताकतों में से एक बन गई। उनके शासनकाल में आंतरिक विरोध को सख्ती से दबाया गया। हाल के वर्षों में हुए जनआंदोलनों को भी कठोरता से नियंत्रित किया गया जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत की खबरें सामने आईं।
हालांकि उनकी नियुक्ति भी विवादों से घिरी रही। कुछ धर्मगुरुओं ने सवाल उठाया कि उनके पास ग्रैंड अयातुल्ला का दर्जा नहीं था जो संवैधानिक रूप से जरूरी माना जाता था। बाद में संविधान संशोधन और जनमत संग्रह के जरिए सर्वोच्च नेता बनने की शर्तों में बदलाव किया गया और उन्हें औपचारिक मान्यता दी गई।
प्रभाव जो दशकों तक कायम रहा
खामेनेई को अक्सर आधुनिक ईरान का सबसे शक्तिशाली नेता माना गया। भले ही इस्लामी क्रांति के जनक खोमैनी थे लेकिन लंबे समय तक सत्ता में बने रहकर खामेनेई ने राजनीतिक सैन्य और धार्मिक संस्थाओं पर गहरी पकड़ स्थापित की। उनका दाहिना हाथ भले ही निष्क्रिय रहा लेकिन सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत बनी रही। उनकी मृत्यु के बाद अब ईरान एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है लेकिन खामेनेई का नाम देश के राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।