प्रेस वार्ता के दौरान खड़गे ने तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति और गठबंधन समीकरणों पर टिप्पणी करते हुए नरेंद्र मोदी और भाजपा की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की नीतियां सामाजिक समानता और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ जा रही हैं। इसी दौरान उनके एक बयान को लेकर विवाद गहरा गया जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के संदर्भ में आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया, जिसके बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया।
खड़गे ने अपने संबोधन में कहा कि केंद्र सरकार विपक्षी दलों को कमजोर करने और राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी तंत्र का उपयोग कर रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया पर इसका असर पड़ सकता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने चाहिए। उनके अनुसार, लोकतंत्र की मजबूती के लिए संस्थाओं की स्वतंत्रता बेहद जरूरी है और किसी भी तरह का राजनीतिक दबाव इस व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।
इसके साथ ही उन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस का गठबंधन डीएमके के साथ आगे भी जारी रहेगा और यह गठबंधन राज्य में विकास और कल्याणकारी योजनाओं को मजबूत करने के लिए काम करेगा। उन्होंने शिक्षा स्वास्थ्य और सामाजिक समानता जैसे मुद्दों को गठबंधन की प्राथमिक प्राथमिकताओं में शामिल बताया।
इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। भाजपा नेताओं ने खड़गे के बयान की आलोचना करते हुए इसे राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताया है। वहीं एनडीए गठबंधन के सहयोगी दलों ने भी इस बयान को अनुचित करार दिया है। दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ नेताओं ने खड़गे के बयान का समर्थन करते हुए इसे राजनीतिक असहमति का हिस्सा बताया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल के बीच इस तरह के बयान राजनीतिक तापमान को और बढ़ा सकते हैं। उनका कहना है कि विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच जारी आरोप प्रत्यारोप की यह श्रृंखला आने वाले समय में और तेज हो सकती है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इस तरह के विवादों से मुद्दों पर आधारित राजनीति की जगह व्यक्तिगत आरोपों की राजनीति को बढ़ावा मिलता है।
इसी बीच खड़गे ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को निष्पक्ष रहकर कार्य करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि संस्थाएं दबाव में काम करेंगी तो इसका असर चुनावी प्रक्रिया और जनता के विश्वास पर पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए सभी संस्थाओं को स्वतंत्र और निष्पक्ष रहना जरूरी है।