भारतीय अर्थव्यवस्था को मिला बूस्ट: मई में सेवा क्षेत्र में मजबूत विस्तार, विदेशी मांग और नए कारोबार ने बढ़ाई रफ्तार

नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सेवा क्षेत्र से एक सकारात्मक संकेत सामने आया है। नए कारोबार में लगातार बढ़ोतरी और डिजिटल, आईटी, ई-कॉमर्स तथा लॉजिस्टिक्स सेक्टर में बढ़ती मांग के चलते मई में भारत के सेवा क्षेत्र का परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) बढ़कर 59.8 पर पहुंच गया है, जो अप्रैल में 58.8 था। यह वृद्धि देश के सेवा आधारित उद्योगों में मजबूत विस्तार और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार को दर्शाती है। एचएसबीसी इंडिया सर्विसेज पीएमआई के ताजा आंकड़ों के अनुसार, माल ढुलाई, डिजिटल सेवाओं, मनोरंजन, ई-कॉमर्स और आईटी सेवाओं की मांग में लगातार वृद्धि दर्ज की गई, जिसके कारण कंपनियों के नए ऑर्डरों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इस बढ़त के चलते सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने अपनी कारोबारी गतिविधियों को तेज किया और उत्पादन क्षमता में विस्तार किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि नए कारोबार में वृद्धि के साथ-साथ रोजगार के अवसरों में भी सुधार हुआ है। सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने मई में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने का सिलसिला जारी रखा, जिससे यह संकेत मिलता है कि मांग में बढ़ोतरी के चलते कंपनियां विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, सर्वे में शामिल अधिकांश कंपनियों ने अपने स्टाफ स्तर में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया, लेकिन एक छोटे हिस्से ने नई भर्तियां की हैं। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, भारत के सेवा क्षेत्र में लागत का दबाव अभी भी बना हुआ है, लेकिन मई में इसमें हल्की कमी देखी गई है। यह पिछले चार महीनों में सबसे निचला स्तर है। लागत दबाव में कमी आने से कंपनियों पर सेवाओं की कीमत बढ़ाने का दबाव भी कम हुआ है। इसी कारण मई में सेवाओं की कीमतों में वृद्धि की गति भी जनवरी के बाद सबसे धीमी रही। एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के अनुसार, मई में सेवा क्षेत्र में विस्तार का मुख्य कारण नए ऑर्डरों की लगातार बढ़ती संख्या रही। उन्होंने कहा कि घरेलू मांग के साथ-साथ विदेशी बाजारों से भी सेवाओं की मांग में सुधार देखने को मिला है। अप्रैल में आई गिरावट के बाद निर्यात आधारित सेवाओं में अच्छी रिकवरी दर्ज की गई, जिससे कुल कारोबार को मजबूती मिली। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि भारत की सेवाओं की मांग कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मजबूत रही, जिनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, हांगकांग, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। हालांकि, विदेशी मांग की वृद्धि दर कुल घरेलू बिक्री की तुलना में थोड़ी कम रही और यह 2025 के औसत से नीचे रही, फिर भी इसमें स्थिरता बनी रही। कुल मिलाकर, सेवा क्षेत्र में इस तेजी को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। आईटी और डिजिटल सेवाओं की मजबूत मांग, ई-कॉमर्स का विस्तार और वैश्विक स्तर पर बढ़ती सेवाओं की जरूरत भारत के सेवा उद्योग को नई ऊंचाइयों की ओर ले जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले महीनों में रोजगार और निवेश दोनों में और अधिक सुधार देखने को मिल सकता है।
चीनी अरबपति झांग यिमिंग बने एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति, मुकेश अंबानी को छोड़ा पीछे

नई दिल्ली। बाइटडांस कंपनी (ByteDance Company) की कीमत बढ़ने और उसके एआई चैटबॉट (AI Chatbot) की सफलता से झांग यिमिंग (Zhang Yiming) मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) को पीछे छोड़कर एशिया के दूसरे सबसे अमीर बन गए हैं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, झांग के पास अब 92.8 अरब डॉलर हैं। वह चीन के सबसे अमीर व्यक्ति हैं। 2019 में उनके पास सिर्फ 13 अरब डॉलर थे। यानी उनकी दौलत सात गुना से भी ज्यादा बढ़ गई है। बता दें 117 अरब डॉलर के नेटवर्थ के साथ गौतम अडानी (Gautam Adani) दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में तो 17वें स्थान पर हैं, लेकिन उनके सिर पर एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति का ताज बरकरार है। पहले मुकेश अंबानी के सिर पर कई वर्षों तक एशिया के सबसे रईस का ताज था। कुछ महीने पहले ही इनसे यह ताज अडानी ने छीन लिया और अंबानी एशिया के दूसरे नंबर के रईस बन गए। अब यह पोजीशन भी उनकी चली गई। दुनिया के अमीरों में घटा अंबानी का रुतबायही नहीं, दुनिया के अरबपतियों की लिस्ट में अंबानी अब 4 पायदान नीचे 25वें स्थान पर चले गए हैं। इसकी वजह एक ही दिन में झांग की दौलत में 24.1 अरब डॉलर की छलांग, जेफ यास की दौलत में 7.56 अरब डॉलर, डेविड सुन की दौलत में 2.75 अरब डॉलर और झान तू की दौलत में 2.75 अरब डॉलर की उछाल है। ये चारों अब अंबानी से ऊपर पहुंच गए हैं। झांग को 24 अरब डॉलर का फायदाब्लूमबर्ग ने ब्लैकरॉक, फिडेलिटी, टी. रो प्राइस, एचएसजी और जनरल अटलांटिक जैसे निवेशकों के मूल्यांकन देखे। इसके बाद झांग की दौलत में 24 अरब डॉलर से अधिक का उछाल आया। टिकटॉक और दोउबाओ ने दिया मौकाझांक के ऊपर अचानक हुई डॉलर की बारिश यूं ही नहीं हुई। इसमें टिकटॉक ऐप की लोकप्रियता और एआई चैटबॉट ‘दोउबाओ’ का बड़ा योगदान है। दोउबाओ हर महीने 30 करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं। यह चीन का सबसे पसंदीदा चैटबॉट है। बाइटडांस ने इसी साल अपने अमेरिका के कुछ कामकाज वहां के निवेशकों को बेच भी दिए थे। चीन की सबसे बड़ी निजी कंपनीबाइटडांस चीन की सबसे चर्चित निजी कंपनी है। दोउबाओ इतना सफल हुआ कि कंपनी अब उसके लिए पैसे लेने की तैयारी कर रही है। चीन में लोग ऑनलाइन सेवाओं के लिए पैसे देने को तैयार नहीं होते, इसलिए यह बड़ी बात है। कंपनी को भविष्य में शेयर बाजार में उतरने की भी उम्मीद है। अमेरिका में टिकटॉक का मामला सुलझाटिकटॉक के अमेरिकी व्यापार को ओरेकल, सिल्वर लेक और अबू धाबी के एमजीएक्स को दे दिया गया। इससे कई सालों से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हुई। आलोचक टिकटॉक को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे थे। एआई पर बड़ा दांवअब बाइटडांस एआई पर जोर लगा रहा है। ब्लूमबर्ग की खबर के अनुसार, कंपनी इस साल 70 अरब डॉलर तक खर्च करने की बात कर रही है। इससे चीन के एआई बाजार में कंपनी सबसे आगे रहेगी और अमेरिकी कंपनियों को टक्कर देगी। यह पैसा 2025 में कंपनी द्वारा कमाए गए करीब 50 अरब डॉलर के मुनाफे से आएगा।
अदाणी समूह का बड़ा दांव: FY26 में सबसे अधिक कैपेक्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी पर फोकस

नई दिल्ली । देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर और यूटिलिटी समूहों में शामिल अदाणी पोर्टफोलियो ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान पूंजीगत निवेश के क्षेत्र में नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। समूह ने इस अवधि में करीब 1.53 लाख करोड़ रुपये का कैपेक्स किया, जिसे किसी भी भारतीय कॉर्पोरेट समूह द्वारा एक वित्तीय वर्ष में किया गया सबसे बड़ा निवेश बताया जा रहा है। इस निवेश के साथ समूह का कुल परिसंपत्ति आधार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 7.85 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है जब देश में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और ऊर्जा परिवर्तन परियोजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। समूह के वित्तीय प्रदर्शन में भी मजबूती देखने को मिली। वित्त वर्ष 2025-26 में ईबीआईटीडीए बढ़कर लगभग 94,834 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। इस आय में ऊर्जा, यूटिलिटी, परिवहन और लॉजिस्टिक्स जैसे मुख्य इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारों की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रही। समूह का मानना है कि मजबूत परिचालन प्रदर्शन और दीर्घकालिक निवेश रणनीति भविष्य में भी विकास की गति बनाए रखने में मदद करेगी। कैपेक्स का बड़ा हिस्सा ऊर्जा और यूटिलिटी सेक्टर में लगाया गया, जहां नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया। वित्त वर्ष के दौरान 5 गीगावाट से अधिक नई रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी गई, जिससे समूह की कुल परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके साथ ही बैटरी ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं को भी विस्तार दिया गया है, जो भविष्य की ऊर्जा जरूरतों और ग्रीन ट्रांजिशन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में यह निवेश आने वाले वर्षों में समूह के राजस्व और नकदी प्रवाह को मजबूत आधार प्रदान कर सकता है। परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं आगे बढ़ीं। नए एयरपोर्ट, एक्सप्रेसवे और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के विकास से समूह ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर पोर्टफोलियो को और व्यापक बनाया है। एयरपोर्ट कारोबार में यात्रियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई, जबकि बंदरगाह कारोबार में कार्गो हैंडलिंग वॉल्यूम ने भी नया स्तर हासिल किया। वैश्विक विस्तार की दिशा में भी कदम बढ़ाते हुए समूह ने विदेशों में रणनीतिक परिसंपत्तियों के अधिग्रहण और विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया है। वित्तीय मोर्चे पर समूह ने नकदी स्थिति और ऋण प्रबंधन को भी मजबूत बनाए रखा है। बेहतर क्रेडिट प्रोफाइल और वित्तीय अनुशासन के कारण उधारी लागत में कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा इक्विटी आधारित वित्तपोषण पर जोर देकर समूह ने अपनी बैलेंस शीट को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने की रणनीति अपनाई है। विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े निवेश चक्र के बावजूद ऋण और नकदी के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर समूह के लिए महत्वपूर्ण होता है और यही पहलू निवेशकों का भरोसा बढ़ाता है। आने वाले वर्षों में इन परियोजनाओं के पूरी तरह परिचालन में आने के बाद समूह की आय, लाभ और नकदी प्रवाह में और वृद्धि देखने को मिल सकती है। भारत में तेजी से बढ़ती ऊर्जा मांग, शहरीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की जरूरतों के बीच इस तरह के बड़े निवेश देश की आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
डिजिटल पेमेंट्स का विस्तार: कंबोडिया के 45 लाख व्यापारिक साझेदारों पर चलेगा भारतीय UPI

नई दिल्ली । भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की अंतरराष्ट्रीय इकाई एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) ने कंबोडिया की राष्ट्रीय क्यूआर कोड भुगतान प्रणाली KHQR के साथ साझेदारी कर वहां UPI भुगतान सेवा शुरू कर दी है। इस पहल के साथ भारतीय यात्री अब कंबोडिया में अपने परिचित डिजिटल भुगतान माध्यम का उपयोग करते हुए आसानी से लेनदेन कर सकेंगे। यह कदम भारत के तेजी से विस्तार कर रहे डिजिटल भुगतान नेटवर्क को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस सेवा की औपचारिक शुरुआत कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान की गई। इस अवसर पर दोनों देशों के वित्तीय और बैंकिंग क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। नई व्यवस्था के तहत भारत के UPI उपयोगकर्ता अपने मोबाइल भुगतान एप्लिकेशन के माध्यम से कंबोडिया में KHQR से जुड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर सीधे भुगतान कर सकेंगे। इससे भारतीय पर्यटकों, व्यापारिक यात्रियों और अन्य आगंतुकों को विदेशी मुद्रा विनिमय या नकद भुगतान की जटिलताओं से काफी राहत मिलेगी। इस परियोजना के पहले चरण में भारतीय ग्राहकों को कंबोडिया के 45 लाख से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर भुगतान की सुविधा मिलेगी। इनमें होटल, रेस्तरां, पर्यटन स्थल, शॉपिंग सेंटर और रिटेल स्टोर जैसे अनेक व्यवसाय शामिल हैं। इससे यात्रियों को न केवल तेज और सुरक्षित भुगतान का अनुभव मिलेगा, बल्कि स्थानीय व्यापारियों को भी भारत के विशाल डिजिटल भुगतान उपभोक्ता आधार तक पहुंचने का अवसर प्राप्त होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों को भी सकारात्मक बढ़ावा मिलेगा। परियोजना का दूसरा चरण और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके तहत भविष्य में कंबोडिया के नागरिक अपने घरेलू बैंकिंग या डिजिटल भुगतान एप्लिकेशन का उपयोग करते हुए भारत में मौजूद लाखों UPI क्यूआर कोड आधारित व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर भुगतान कर सकेंगे। इस प्रकार दोनों देशों के बीच एक द्विपक्षीय और पूरी तरह इंटरऑपरेबल डिजिटल भुगतान नेटवर्क विकसित होगा, जो सीमा-पार लेनदेन को पहले से अधिक सहज और प्रभावी बनाएगा। यह मॉडल भविष्य में अन्य देशों के साथ भी डिजिटल भुगतान सहयोग का आधार बन सकता है। डिजिटल भुगतान क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहल रियल-टाइम भुगतान प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और सुविधाजनक बनेगी। साथ ही स्थानीय व्यापारियों को नकदी प्रबंधन की आवश्यकता कम होगी, परिचालन लागत में कमी आएगी और डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। यह व्यवस्था छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकती है, जो अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंच बनाना चाहते हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में UPI को एक वैश्विक डिजिटल भुगतान ब्रांड के रूप में स्थापित करने की दिशा में लगातार काम किया है। विभिन्न देशों के साथ साझेदारी और सीमा-पार भुगतान नेटवर्क के विस्तार से भारतीय फिनटेक इकोसिस्टम को भी नई पहचान मिल रही है। कंबोडिया में UPI की शुरुआत इसी रणनीति का हिस्सा है, जो भारत को वैश्विक डिजिटल भुगतान नवाचार के अग्रणी देशों में शामिल करने की दिशा में एक और मजबूत कदम साबित हो सकती है।
अमेरिका-ईरान तनाव का असर: एक महीने में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए तक महंगा, एलपीजी भी उछला

नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले एक महीने के दौरान देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हो गया है। ऊर्जा बाजार में बनी अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण ईंधन लागत लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा असर परिवहन, व्यापार और दैनिक जीवन पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। राजधानी दिल्ली में बीते एक महीने के दौरान पेट्रोल की कीमत में कुल 7.35 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। इसके बाद पेट्रोल का दाम 94.77 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 102.12 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया है। इस अवधि में सरकार ने चार अलग-अलग चरणों में ईंधन कीमतों में संशोधन किया। 15 मई को पेट्रोल के दाम में 3 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की गई, जबकि 19 और 23 मई को 0.87-0.87 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद 25 मई को फिर 2.61 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया गया। लगातार हुई इन बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है। डीजल की कीमतों में भी लगभग इसी तरह की वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्ली में डीजल का दाम 87.67 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 95.20 रुपए प्रति लीटर हो गया है। कुल मिलाकर डीजल 7.53 रुपए प्रति लीटर महंगा हुआ है। 15 मई को इसमें 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि 19 और 23 मई को 0.91-0.91 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बाद 25 मई को डीजल के दाम में 2.71 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया गया। डीजल कीमतों में बढ़ोतरी का असर माल ढुलाई, कृषि गतिविधियों और सार्वजनिक परिवहन पर भी पड़ सकता है, जिससे कई वस्तुओं की लागत बढ़ने की संभावना है। ईंधन के साथ-साथ कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हुआ है। दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़कर 3,113.50 रुपए तक पहुंच गई है। एक जून को सिलेंडर के दाम में 42 रुपए की नई बढ़ोतरी की गई। खास बात यह है कि जनवरी से अब तक कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 1,400 रुपए से अधिक की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। वर्ष की शुरुआत में इसकी कीमत 1,691.50 रुपए थी, जो अब दोगुने के करीब पहुंच चुकी है। इसका असर होटल, रेस्तरां, कैटरिंग और छोटे व्यवसायों की लागत पर पड़ सकता है। हालांकि घरेलू बाजार में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत अभी भी कई देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम कीमत पर पेट्रोल और डीजल उपलब्ध करा रहा है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेट्रोल की खुदरा कीमतें 150 रुपए प्रति लीटर से ऊपर बताई जा रही हैं, जबकि कई देशों में यह 180 रुपए प्रति लीटर से भी अधिक है। यूरोपीय संघ के देशों में पेट्रोल और डीजल दोनों की औसत कीमत भारत की तुलना में काफी ज्यादा है। वहीं पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और फिलीपींस में भी पेट्रोल की कीमतें भारतीय स्तर से ऊपर बनी हुई हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता का असर भारत के ईंधन बाजार पर लगातार दिखाई दे रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो आने वाले महीनों में परिवहन लागत और महंगाई पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है।
पेट्रोल की कीमतों का रहस्य: अंतरराष्ट्रीय गिरावट का फायदा क्यों नहीं मिल रहा?

नई दिल्ली । दुनिया भर के बाजारों में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है, लेकिन इसका फायदा भारतीय उपभोक्ताओं को तुरंत नहीं मिल रहा है। यही कारण है कि आम लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जब ब्रेंट क्रूड सस्ता हो रहा है तो देश में पेट्रोल और डीजल महंगा क्यों हो रहा है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल 98 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ चुका है, जिससे यह उम्मीद थी कि भारत में ईंधन सस्ता होगा। लेकिन इसके उलट हाल के हफ्तों में पेट्रोल और डीजल के दामों में कई बार बढ़ोतरी देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर कई रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस स्थिति की एक बड़ी वजह तेल कंपनियों की मूल्य नीति और उनका वित्तीय संतुलन है। भारत की प्रमुख तेल कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum Corporation Limited और Hindustan Petroleum Corporation Limited पहले वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने के बावजूद कीमतें तुरंत नहीं बढ़ा पाईं थीं। उस समय कंपनियों ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए खुद घाटा सहा था। अब माना जा रहा है कि वे उसी पुराने नुकसान की भरपाई कर रही हैं। इसके अलावा भारत की तेल आयात पर भारी निर्भरता भी कीमतों को प्रभावित करती है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वैश्विक बाजार में मामूली उतार-चढ़ाव भी घरेलू कीमतों पर सीधा असर डालता है। एक और अहम कारण है डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी। भारत कच्चे तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में करता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है। इसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता क्यों न हो रहा हो। कीमतों में टैक्स का भी बड़ा योगदान होता है। पेट्रोल और डीजल के दाम सिर्फ कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करते, बल्कि इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के एक्साइज ड्यूटी और वैट जैसे टैक्स भी शामिल होते हैं। यही टैक्स अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने वाली कीमत को काफी बढ़ा देते हैं। इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन खर्च, डीलर कमीशन और लॉजिस्टिक्स लागत भी अंतिम कीमत में जुड़ते हैं। इन सभी कारकों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का असर तुरंत भारतीय बाजार में नहीं दिखता। विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और नीचे नहीं आतीं, रुपया मजबूत नहीं होता और टैक्स संरचना में राहत नहीं मिलती, तब तक पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी कमी की उम्मीद करना मुश्किल है।
भारत में एडटेक ग्रोथ को AI दे रहा नई रफ्तार, डिजिटल विज्ञापन बाजार में बड़ा उछाल

नई दिल्ली । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव ने वैश्विक विज्ञापन उद्योग की संरचना को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, एआई अब केवल एक सहायक तकनीक नहीं रह गया है, बल्कि यह विज्ञापन उद्योग के हर स्तर को अधिक स्वचालित, डेटा-आधारित और परिणाम-केंद्रित मॉडल में बदल रहा है। इस बदलाव के बीच भारत को वैश्विक एडटेक हब के रूप में उभरने की मजबूत संभावना के तौर पर देखा जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक विज्ञापन बाजार पहले ही 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है, जिसमें डिजिटल विज्ञापन की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में कुल विज्ञापन खर्च का लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर केंद्रित है, जबकि इसका बड़ा भाग प्रोग्रामेटिक तकनीक के जरिए संचालित हो रहा है। एआई इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक सटीक, तेज और प्रभावी बना रहा है, जिससे विज्ञापनदाताओं को बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। भारत इस बदलाव में एक अहम भूमिका निभा रहा है। देश में हर साल लाखों इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी छात्र तैयार हो रहे हैं, जिससे एक विशाल तकनीकी प्रतिभा आधार विकसित हो रहा है। इसके साथ ही करोड़ों डेवलपर्स और हजारों ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स भारत में मौजूद हैं, जो वैश्विक कंपनियों के लिए टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं। यह मजबूत इकोसिस्टम एआई आधारित विज्ञापन तकनीक के विकास को गति दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, एआई अब विज्ञापन उद्योग की लगभग हर प्रमुख प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। मीडिया खरीद से लेकर क्रिएटिव कंटेंट निर्माण, ग्राहक टारगेटिंग और परफॉर्मेंस मापन तक, हर स्तर पर एआई आधारित सिस्टम सक्रिय हो चुके हैं। मशीन लर्निंग और ट्रांसफॉर्मर आधारित मॉडल विज्ञापनों को अधिक व्यक्तिगत और प्रभावी बनाने में मदद कर रहे हैं, जिससे कंपनियों की पहुंच और प्रभाव दोनों बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का डिजिटल विज्ञापन बाजार आने वाले वर्षों में तेज गति से बढ़ सकता है। अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025 में यह बाजार लगभग 21 अरब डॉलर का होगा, जो 2030 तक बढ़कर 33 से 42 अरब डॉलर के बीच पहुंच सकता है। इस वृद्धि के पीछे ई-कॉमर्स, मोबाइल इंटरनेट की पहुंच और एआई आधारित विज्ञापन तकनीकों का बढ़ता उपयोग प्रमुख कारण माना जा रहा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारतीय मूल की एडटेक कंपनियां अब केवल सेवा प्रदाता के रूप में सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक उत्पाद कंपनियों के रूप में उभर रही हैं। ये कंपनियां अब सॉफ्टवेयर और प्लेटफॉर्म आधारित बिजनेस मॉडल पर काम कर रही हैं, जिससे उनकी आय और वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता दोनों में वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, जैसे-जैसे एआई का उपयोग बढ़ेगा, मजबूत डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर, विज्ञापनदाताओं और प्रकाशकों के बीच बेहतर नेटवर्क और खुले डिजिटल इकोसिस्टम की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाएगी। भारत के पास इन सभी क्षेत्रों में मजबूत आधार मौजूद है, जिससे वह वैश्विक एडटेक बाजार में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
ग्लोबल इंश्योरेंस इंडस्ट्री के लिए AI सॉल्यूशन, Coforge स्टॉक 5% चढ़ा

नई दिल्ली । ग्लोबल इंश्योरेंस इंडस्ट्री के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित नया प्लेटफॉर्म लॉन्च करने की घोषणा के बाद आईटी और टेक सेक्टर की प्रमुख कंपनी कोफोर्ज के शेयर में मंगलवार को मजबूत तेजी देखने को मिली। कंपनी द्वारा ‘नेक्सा एजेंटिक एआई प्लेटफॉर्म’ पेश किए जाने के बाद निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी और शेयर में 5 प्रतिशत से अधिक की उछाल दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में शेयर ने 1,554 रुपये के उच्च स्तर को भी छुआ, हालांकि बाद में यह कुछ नरमी के साथ कारोबार करता नजर आया। कंपनी का यह नया प्लेटफॉर्म खास तौर पर वैश्विक इंश्योरेंस उद्योग की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य इंश्योरेंस कंपनियों को उनके मौजूदा सिस्टम को बदले बिना आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्षमताओं का लाभ देना है। कोफोर्ज के अनुसार यह प्लेटफॉर्म बीमा कंपनियों को नए प्रोडक्ट और सेवाओं को तेजी से बाजार में लॉन्च करने में मदद करेगा और उनके ऑपरेशनल एफिशिएंसी को भी बढ़ाएगा। इस प्लेटफॉर्म की खासियत यह है कि यह मौजूदा कोर सिस्टम के ऊपर एक अतिरिक्त AI लेयर के रूप में काम करता है, जिससे कंपनियों को भारी तकनीकी बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें 30 से अधिक इंश्योरेंस आधारित एआई एसेट्स का मार्केटप्लेस भी शामिल किया गया है, जो अंडरराइटिंग, क्लेम प्रोसेसिंग, कस्टमर सर्विस और प्रोडक्ट डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों को अधिक स्मार्ट और तेज बनाते हैं। कंपनी का दावा है कि यह सिस्टम मॉड्यूलर और फ्लेक्सिबल है, जिससे कंपनियां अपनी जरूरत के अनुसार इसे अनुकूलित कर सकती हैं। कोफोर्ज का यह नया प्लेटफॉर्म केवल तकनीकी अपग्रेड नहीं बल्कि उसकी वैश्विक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। कंपनी का कहना है कि यह समाधान प्रॉपर्टी एंड कैजुअल्टी इंश्योरेंस, लाइफ इंश्योरेंस, स्पेशलिटी इंश्योरेंस और मैनेजिंग जनरल एजेंट्स सहित पूरे इंश्योरेंस इकोसिस्टम के लिए उपयोगी है। इसमें मानव निगरानी और ऑडिट ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं, जिससे पारदर्शिता और नियंत्रण बनाए रखा जा सके। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के AI आधारित इनोवेशन आईटी कंपनियों के लिए लंबे समय में ग्रोथ के नए अवसर खोल सकते हैं। यही कारण है कि घोषणा के तुरंत बाद निवेशकों की खरीदारी बढ़ी और शेयर में तेज उछाल देखने को मिला। पिछले कुछ हफ्तों में भी कोफोर्ज का प्रदर्शन मजबूत रहा है और एक महीने में यह स्टॉक लगभग 32 प्रतिशत तक चढ़ चुका है, जो निवेशकों के मजबूत भरोसे को दर्शाता है। हालांकि लंबी अवधि के प्रदर्शन पर नजर डालें तो स्टॉक में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। बीते छह महीनों में इसमें गिरावट दर्ज की गई है, जबकि एक साल के आधार पर भी इसमें कमजोरी रही है। इसके बावजूद हालिया तेजी यह संकेत देती है कि कंपनी के नए प्रोडक्ट और टेक्नोलॉजी आधारित रणनीति को बाजार सकारात्मक रूप से देख रहा है। विश्लेषकों का यह भी कहना है कि AI और इंश्योरेंस टेक्नोलॉजी का यह संयोजन आने वाले वर्षों में ग्लोबल इंश्योरेंस सेक्टर में बड़ा बदलाव ला सकता है। यदि यह प्लेटफॉर्म उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन करता है, तो कोफोर्ज को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में और अधिक बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिलने की संभावना बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, कोफोर्ज का यह नया AI प्लेटफॉर्म न केवल कंपनी के शेयर में तेजी का कारण बना है, बल्कि यह भी संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में इंश्योरेंस और टेक्नोलॉजी के मेल से बाजार में नए अवसर तेजी से उभर सकते हैं।
वैश्विक तनाव से शेयर बाजार दबाव में, सेंसेक्स 400 अंक टूटा, आईटी सेक्टर ने संभाली गिरावट

नई दिल्ली । वैश्विक बाजारों में बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के बीच मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत कमजोरी के साथ हुई। शुरुआती कारोबार में निवेशकों के बीच सतर्कता का माहौल देखने को मिला, जिसका सीधा असर प्रमुख बेंचमार्क सूचकांकों सेंसेक्स और निफ्टी पर पड़ा। बाजार खुलते ही सेंसेक्स में 300 से अधिक अंकों की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी भी लाल निशान में कारोबार करता नजर आया। सुबह के सत्र में सेंसेक्स करीब 322 अंक गिरकर 73,945 के स्तर पर खुला, जबकि निफ्टी50 में भी लगभग 150 अंकों की गिरावट देखने को मिली। कुछ ही समय बाद बिकवाली का दबाव और बढ़ गया, जिससे सेंसेक्स 400 अंकों से अधिक टूट गया और निफ्टी भी 23,200 के आसपास फिसल गया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संकेतों और घरेलू आर्थिक चिंताओं के चलते देखने को मिली है। बाजार पर दबाव का प्रमुख कारण पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता में अनिश्चितता माना जा रहा है। इसके साथ ही कमजोर मानसून की आशंका ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। भारतीय मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष सामान्य से कमजोर मानसून का अनुमान जताए जाने के बाद कृषि आधारित शेयरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सेक्टरों पर दबाव बढ़ गया है। सेक्टोरल मोर्चे पर अधिकतर इंडेक्स लाल निशान में नजर आए। ऑटो, रियल्टी और केमिकल सेक्टर में लगभग एक प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। बैंकिंग और सीमेंट सेक्टर में भी बिकवाली का दबाव देखने को मिला, जिससे व्यापक बाजार में कमजोरी बढ़ी। मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स भी लगभग एक प्रतिशत तक टूटकर कारोबार कर रहे थे, जिससे यह संकेत मिला कि गिरावट केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं है। हालांकि इस गिरावट के बीच आईटी सेक्टर ने बाजार को कुछ राहत दी। निफ्टी आईटी इंडेक्स में करीब 2 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली, जिसमें इंफोसिस, टीसीएस, टेक महिंद्रा और एचसीएल टेक जैसे प्रमुख शेयरों ने मजबूती दिखाई। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक मांग और डॉलर की मजबूती के कारण आईटी कंपनियों में निवेशकों की रुचि बनी हुई है, जिससे इस सेक्टर ने बाजार को सपोर्ट दिया। कमोडिटी बाजार में भी हलचल देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, लेकिन यह अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है, जिससे महंगाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई दोनों में हल्की गिरावट के बावजूद वैश्विक आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता कायम है। विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा समय में बाजार वैश्विक घटनाक्रमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। पश्चिम एशिया में यदि तनाव और बढ़ता है तो इसका असर ऊर्जा कीमतों और वैश्विक इक्विटी बाजारों पर और अधिक देखने को मिल सकता है। वहीं, घरेलू स्तर पर मानसून की स्थिति आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। विशेषज्ञ निवेशकों को सलाह दे रहे हैं कि इस अस्थिर माहौल में जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय मजबूत बुनियादी कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करें। बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच दीर्घकालिक निवेश रणनीति अपनाना अधिक सुरक्षित माना जा रहा है। कुल मिलाकर, वैश्विक तनाव और घरेलू आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार फिलहाल दबाव में नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और मानसून से जुड़े अपडेट बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
1 जून से बदलेंगे कई नियम, यूपीआई-ATM और टैक्स सिस्टम में बड़ा बदलाव

नई दिल्ली। नए महीने की शुरुआत के साथ ही देश की वित्तीय व्यवस्था में कई अहम बदलाव लागू हो गए हैं, जिनका असर आम लोगों की रोजमर्रा की बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और टैक्स से जुड़ी गतिविधियों पर पड़ेगा। इन बदलावों का उद्देश्य डिजिटल लेनदेन को अधिक सुरक्षित बनाना और वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाना बताया जा रहा है। डिजिटल पेमेंट सिस्टम में सुरक्षा सख्Unified Payments Interface (UPI) के तहत अब लेनदेन सुरक्षा को और मजबूत किया जा रहा है। बड़े ट्रांजैक्शन के लिए अतिरिक्त वेरिफिकेशन जैसे बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट/फेस रिकग्निशन) और डिवाइस-बेस्ड ऑथेंटिकेशन लागू किए जा सकते हैं।इसके साथ ही अब पेमेंट करने से पहले लाभार्थी का सत्यापित नाम दिखेगा, जिससे गलत खाते में पैसे जाने की आशंका कम होगी। ATM निकासी नियमों में बदलावअब यूपीआई आधारित कार्डलेस ATM निकासी को बैंक की मासिक फ्री लिमिट में शामिल किया जाएगा। लिमिट पार करने पर अतिरिक्त शुल्क देना पड़ सकता है, ठीक वैसे ही जैसे डेबिट कार्ड निकासी पर लागू होता है। टैक्स और पैन से जुड़े नए नियम15 जून तक वित्त वर्ष 2026-27 के लिए एडवांस टैक्स की पहली किस्त जमा करनी होगी। जिनकी टैक्स देनदारी 10,000 रुपये से अधिक है, उन्हें अनुमानित टैक्स का 15% भुगतान करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा नकद लेनदेन और पैन कार्ड नियमों में भी बदलाव किया गया है अब बड़े नकद जमा और संपत्ति लेनदेन के लिए रिपोर्टिंग सीमा को संशोधित किया गया है। LPG और ईंधन कीमतों में बदलाव1 जून से कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली में 19 किलो सिलेंडर की कीमत बढ़कर 3,113.50 रुपये हो गई है। अन्य शहरों में भी 40–50 रुपये तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। RBI की बैठक पर नजरइस महीने होने वाली Reserve Bank of India की मौद्रिक नीति समिति (MPC) बैठक भी महत्वपूर्ण होगी। रेपो रेट और महंगाई पर फैसले का असर होम लोन EMI, FD रिटर्न और बाजार पर पड़ सकता है। अन्य संभावित बदलावरिपोर्ट्स के अनुसार EPFO सिस्टम में भी बदलाव की तैयारी है, जिससे भविष्य में PF निकासी UPI के जरिए संभव हो सकती है।