मई में ऑटो सेक्टर की रफ्तार तेज, हुंडई और महिंद्रा ने दर्ज की मजबूत बिक्री वृद्धि

नई दिल्ली। देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में मई महीने के दौरान मजबूत मांग का असर साफ दिखाई दिया। प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों में Hyundai Motor India Limited और Mahindra & Mahindra ने घरेलू बाजार में बेहतर प्रदर्शन करते हुए बिक्री में अच्छी बढ़त दर्ज की है। हुंडई की बिक्री में 4.1% की वृद्धिहुंडई मोटर इंडिया लिमिटेड ने मई में कुल 61,137 वाहन बेचे। इसमें 47,837 यूनिट घरेलू बिक्री रही, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 9.1 प्रतिशत अधिक है। वहीं कंपनी ने 13,300 वाहनों का निर्यात भी किया। कुल मिलाकर कंपनी की बिक्री में 4.1 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई। महिंद्रा एंड महिंद्रा की 20% की छलांगमहिंद्रा एंड महिंद्रा ने मई में निर्यात सहित कुल 99,636 वाहनों की बिक्री दर्ज की, जो साल-दर-साल आधार पर लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। कंपनी के यूटिलिटी व्हीकल (SUV) सेगमेंट ने इस वृद्धि में सबसे अहम भूमिका निभाई। घरेलू बाजार में 58,021 यूटिलिटी वाहन बिके, जो 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाते हैं। कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी कंपनी ने अच्छा प्रदर्शन किया और 24,079 यूनिट की बिक्री दर्ज की, जिसमें 19 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। निर्यात में भी कंपनी ने 37 प्रतिशत की बढ़त हासिल की। मांग मजबूत, लेकिन सप्लाई चुनौतियां कायममहिंद्रा एंड महिंद्रा के ऑटोमोटिव डिवीजन के सीईओ ने बताया कि पूरे पोर्टफोलियो में मांग मजबूत बनी हुई है, हालांकि कुछ सप्लायरों के यहां श्रमिकों की कमी के कारण सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। शेयर बाजार में हल्की गिरावटबिक्री के सकारात्मक आंकड़ों के बावजूद बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान दोनों कंपनियों के शेयरों में गिरावट देखी गई। हुंडई का शेयर करीब 1.48 प्रतिशत गिरकर 1,900 रुपये के स्तर पर पहुंच गया, जबकि महिंद्रा एंड महिंद्रा का शेयर लगभग 1.9 प्रतिशत गिरकर 2,982 रुपये तक आ गया। SUV सेगमेंट बना ग्रोथ इंजनविश्लेषकों के अनुसार, घरेलू बाजार में SUV और यूटिलिटी वाहनों की लगातार मजबूत मांग ऑटो सेक्टर की ग्रोथ को समर्थन दे रही है। आने वाले महीनों में त्योहारों की मांग और नए मॉडल लॉन्च इस रफ्तार को और बढ़ा सकते हैं।
भारत-ओमान ट्रेड डील से किसानों और व्यापारियों को बड़ा फायदा, गोयल का बयान

नई दिल्ली। भारत और ओमान के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) सोमवार से लागू हो गया है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। इस समझौते को भारत की वैश्विक व्यापार रणनीति के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जिसका सीधा लाभ किसानों, छोटे व्यापारियों, कारीगरों और लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSME) को मिलने की उम्मीद है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक विज़न की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारत के निर्यात को नए बाजार उपलब्ध कराएगा, विदेशी निवेश को आकर्षित करेगा और देश में रोजगार सृजन को गति देगा। CEPA लागू होने के बाद ओमान में भारत के लगभग 99.38 प्रतिशत निर्यात को 98 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर तुरंत शून्य शुल्क (Zero Duty) का लाभ मिल जाएगा। इससे भारतीय उत्पाद ओमान के बाजार में पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। पहले जहां केवल 15.3 प्रतिशत निर्यात पर ही शुल्क-मुक्त पहुंच थी, अब यह दायरा बेहद व्यापक हो गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस समझौते से ओमान को भारत का निर्यात 4.06 अरब डॉलर से बढ़कर आने वाले वर्षों में 6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जबकि मध्य अवधि में यह 10 अरब डॉलर तक जाने की संभावना जताई जा रही है। इसके चलते कपड़ा, चमड़ा, जूते, रत्न-आभूषण, कृषि उत्पाद, इंजीनियरिंग, ऑटो कंपोनेंट्स और फार्मा जैसे क्षेत्रों में बड़ा विस्तार देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे टेक्सटाइल और हैंडीक्राफ्ट सेक्टर को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। तिरुपुर, सूरत, लुधियाना, पानीपत, कोयंबटूर, जयपुर और अहमदाबाद जैसे औद्योगिक केंद्रों में उत्पादन और रोजगार दोनों बढ़ सकते हैं। इस समझौते के तहत भारत ने भी 77.79 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर उदारीकरण की पेशकश की है, जो ओमान से आने वाले 94.81 प्रतिशत आयात को कवर करता है। हालांकि, भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों—जैसे डेयरी, चाय, कॉफी, रबर और तंबाकू—को किसी भी रियायत से बाहर रखा है ताकि घरेलू उद्योगों और किसानों के हित सुरक्षित रह सकें। इसके अलावा सोना-चांदी, आभूषण और कुछ श्रम-प्रधान उत्पादों पर भी सीमित या कोटा आधारित व्यवस्था लागू की गई है। सरकार का मानना है कि यह संतुलित समझौता भारत के हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक व्यापार को मजबूती देगा। विशेषज्ञों के अनुसार, इस समझौते से भारत की सेवाक्षेत्र अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा, क्योंकि ओमान का आयात बाजार बड़ा और विविध है, जो भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर खोल सकता है।
मारुति सुजुकी की रिकॉर्ड बिक्री, मई में 2.43 लाख के करीब पहुंचा आंकड़ा

नई दिल्ली। भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया ने मई में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए कुल 2,42,688 वाहनों की बिक्री दर्ज की है। यह कंपनी के इतिहास में अब तक की सबसे अधिक मासिक बिक्री है, जिसने अप्रैल में बने पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया। कंपनी के अनुसार, मई 2025 की तुलना में इस साल मई में कुल बिक्री में लगभग 34.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 1,80,077 यूनिट्स था। घरेलू बाजार में कंपनी ने 1,93,535 वाहनों की बिक्री की, जो पिछले वर्ष के 1,38,690 यूनिट्स की तुलना में लगभग 39 प्रतिशत अधिक है। वहीं, निर्यात भी बढ़कर 41,914 यूनिट्स तक पहुंच गया। इसके अलावा अन्य ऑटोमोबाइल कंपनियों को 7,239 वाहनों की आपूर्ति की गई। मारुति के पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट, जिसमें हैचबैक, सेडान, वैन और SUV शामिल हैं, ने इस वृद्धि में सबसे अहम भूमिका निभाई। इस श्रेणी में कुल 1,90,337 वाहन बेचे गए, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 1,35,962 था। SUV और यूटिलिटी वाहनों की मांग में भी तेज उछाल देखा गया। ब्रेजा, फ्रॉन्क्स, जिम्नी, ग्रैंड विटारा, अर्टिगा, XL6 और इनविक्टो जैसे मॉडलों की बिक्री 44.4 प्रतिशत बढ़कर 79,267 यूनिट्स तक पहुंच गई। छोटे कार सेगमेंट में भी मजबूत वृद्धि दर्ज हुई, जहां ऑल्टो और एस-प्रेसो की बिक्री दोगुने से अधिक होकर 16,275 यूनिट्स हो गई। कंपनी का निर्यात भी बढ़कर 41,914 यूनिट्स पर पहुंच गया, जो पिछले साल मई में 31,219 यूनिट्स था। कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी मामूली बढ़त दर्ज की गई। मारुति सुजुकी ने इससे पहले अप्रैल में भी रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की थी और लगातार मजबूत मांग के चलते कंपनी का प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। कंपनी भविष्य में लॉजिस्टिक्स को और अधिक कुशल बनाने के लिए रेल परिवहन का उपयोग बढ़ाने की योजना पर भी काम कर रही है। इसके तहत 2030-31 तक वाहनों की ढुलाई में रेल हिस्सेदारी 35 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा कंपनी ने संकेत दिए हैं कि कच्चे माल और उत्पादन लागत बढ़ने के कारण जून 2026 से कई मॉडलों की कीमतों में अधिकतम 30,000 रुपये तक की बढ़ोतरी की जा सकती है।
भारत-ओमान व्यापार समझौते से निर्यात में बड़ा उछाल, 50% बढ़ोतरी की उम्मीद

नई दिल्ली। भारत और ओमान के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) सोमवार से लागू हो गया है, जिसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों में तेज़ी आने की उम्मीद है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य भारत के निर्यात को बढ़ावा देना और द्विपक्षीय व्यापार को नए स्तर पर ले जाना है। सरकारी अनुमान के अनुसार, इस समझौते के लागू होने के बाद भारत का ओमान को वस्तु निर्यात अगले तीन वर्षों में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। वर्तमान में भारत का ओमान को निर्यात करीब 4.06 अरब डॉलर का है, जिसे बढ़ाकर 6 अरब डॉलर तक पहुंचाने और मध्य अवधि में 10 अरब डॉलर का लक्ष्य रखा गया है। समझौते के तहत ओमान ने भारत को अपनी 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शून्य शुल्क (Zero Duty) की सुविधा दी है। इसका लाभ भारत के लगभग 99.38 प्रतिशत निर्यात को मिलेगा। इससे जेम्स एंड ज्वेलरी, टेक्सटाइल, चमड़ा, जूता उद्योग, खेल सामग्री, प्लास्टिक, फर्नीचर, इंजीनियरिंग उत्पाद, फार्मा, मेडिकल डिवाइस और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। वहीं भारत ने भी ओमान के लिए 77.79 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क में रियायत दी है, जो मूल्य के हिसाब से ओमान के भारत को होने वाले आयात का लगभग 94.81 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है। हालांकि, भारत ने अपने संवेदनशील क्षेत्रों जैसे कृषि उत्पाद, डेयरी, चाय, कॉफी, रबर, तंबाकू, सोना-चांदी और कुछ श्रम-प्रधान उत्पादों को इस समझौते से बाहर रखा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस समझौते से भारत के सेवा क्षेत्र (Service Sector) को भी बड़ा लाभ मिल सकता है, क्योंकि ओमान का सेवा आयात लगभग 12.52 अरब डॉलर का है, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर खुलेंगे। भारत और ओमान ने इस समझौते पर पिछले वर्ष दिसंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मस्कट यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा भारत हाल के वर्षों में ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ भी व्यापार समझौतों को आगे बढ़ा चुका है।
मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

नई दिल्ली । मई माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है, जो अर्थव्यवस्था में मांग और कर अनुपालन की मजबूती को दर्शाती है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के बावजूद भारत का सकल जीएसटी संग्रह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के स्तर के करीब पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब कई वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और अनिश्चितता का सामना कर रही हैं। आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 1,94,184 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 1,88,172 करोड़ रुपये की तुलना में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वहीं शुद्ध जीएसटी राजस्व 1,66,904 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जिसमें 3.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हुई है। रिफंड को समायोजित करने के बाद राजस्व वृद्धि लगभग 9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो कर संग्रह प्रणाली की मजबूती का संकेत है। महीने के दौरान रिफंड की राशि भी बढ़कर 27,281 करोड़ रुपये रही, हालांकि इसके बावजूद कुल राजस्व में सकारात्मक रुझान देखने को मिला। घरेलू कर संग्रह में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन आयात से प्राप्त कर राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि ने कुल आंकड़ों को संतुलित बनाए रखा। आयात आधारित जीएसटी संग्रह 19.1 प्रतिशत बढ़कर 59,654 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो वैश्विक व्यापार गतिविधियों में मजबूती और आयात मांग में सुधार का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति घरेलू खपत और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतरता को दर्शाती है। वहीं दूसरी ओर घरेलू जीएसटी संग्रह 1,34,530 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 2.6 प्रतिशत की कमी देखी गई, लेकिन सेवा क्षेत्र और वस्तु श्रेणियों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सेवा क्षेत्र में 22.2 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि और वस्तु श्रेणियों में सकारात्मक रुझान यह दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत आधारित विकास मॉडल मजबूत स्थिति में है। सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों की व्यापकता को दर्शाता है। राज्यों के स्तर पर भी जीएसटी संग्रह में विविध प्रदर्शन देखने को मिला। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, तेलंगाना और हरियाणा जैसे राज्यों में कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से केरल और हरियाणा जैसे राज्यों ने दोहरे अंकों में वृद्धि के साथ बेहतर प्रदर्शन किया है। यह संकेत देता है कि राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं में भी गतिविधियां तेज हो रही हैं और कर आधार का विस्तार हो रहा है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में कुल सकल जीएसटी संग्रह 4.37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक है। इसी अवधि में शुद्ध राजस्व में भी 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल माह में भी रिकॉर्ड संग्रह देखने को मिला था, जो यह दर्शाता है कि लगातार दो महीनों से राजस्व वृद्धि का रुझान मजबूत बना हुआ है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रदर्शन वित्त वर्ष के निर्धारित कर लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित होगा और देश की आर्थिक स्थिरता को और मजबूत करेगा।
भारत का मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई में बढ़कर 55 पर, नए ऑर्डर और उत्पादन में तेज़ी से उद्योग गतिविधियों में मजबूती

नई दिल्ली । मई में भारत के विनिर्माण क्षेत्र ने मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया है, जिसमें एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई के ताजा आंकड़ों के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 55.0 के स्तर पर पहुंच गया है। यह अप्रैल के 54.7 और शुरुआती अनुमान 54.3 से अधिक है, जो औद्योगिक गतिविधियों में लगातार सुधार का संकेत देता है। नए ऑर्डरों, उत्पादन गतिविधियों और खरीद में आई तेज़ वृद्धि ने इस सुधार को प्रमुख रूप से समर्थन दिया है, जिसके चलते कंपनियों ने भविष्य की मांग को देखते हुए स्टॉक जमा करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार मई का प्रदर्शन पिछले तीन महीनों में सबसे मजबूत माना जा रहा है, जो भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर और व्यापक रिकवरी की ओर इशारा करता है। देश के कई हिस्सों, जिनमें मध्य प्रदेश सहित विभिन्न औद्योगिक केंद्र शामिल हैं, वहां भी उत्पादन गतिविधियों में सुधार का रुझान देखा गया है। सर्वेक्षण के अनुसार इंटरमीडिएट और कैपिटल गुड्स सेगमेंट में वृद्धि उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र की तुलना में अधिक तेज रही, जिससे औद्योगिक उत्पादन के बुनियादी ढांचे को मजबूती मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू मांग इस वृद्धि का मुख्य आधार बनी हुई है, जबकि निर्यात ऑर्डरों की वृद्धि दर कुछ धीमी जरूर हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों से नए ऑर्डरों की लगातार प्राप्ति ने संतुलन बनाए रखा है। एशिया, यूरोप और अफ्रीका के कुछ देशों से भी भारतीय उत्पादों की मांग बनी हुई है, जिससे निर्यात आधारित गतिविधियों को समर्थन मिला है। लागत के मोर्चे पर कच्चे माल, ऊर्जा, ईंधन और परिवहन खर्चों में वृद्धि दर्ज की गई है, जो पिछले कई महीनों की तुलना में अधिक है। यह वृद्धि वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव का परिणाम मानी जा रही है। हालांकि तैयार उत्पादों की कीमतों में वृद्धि की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है, जिससे कंपनियों के लाभ मार्जिन पर कुछ दबाव बनने की संभावना जताई जा रही है। उत्पादन और नए ऑर्डरों में आई तेज़ी फरवरी के बाद सबसे अधिक दर्ज की गई है, जो यह दर्शाती है कि उद्योगों में मांग का स्तर मजबूत बना हुआ है। उद्योग जगत के अनुसार यह रुझान आने वाले महीनों में भी जारी रह सकता है, क्योंकि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश और निर्माण गतिविधियों में वृद्धि से औद्योगिक मांग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों का विश्वास स्तर भी मजबूत बना हुआ है, जो उत्पादन क्षमता विस्तार और नई भर्तियों की संभावनाओं को बढ़ा रहा है। हालांकि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण लागत दबाव बना रह सकता है, लेकिन घरेलू मांग इस दबाव को काफी हद तक संतुलित कर रही है। कुल मिलाकर मई के पीएमआई आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र स्थिर गति से विस्तार कर रहा है और आर्थिक गतिविधियों में मजबूती के संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं, जिससे निवेश और उत्पादन दोनों को सकारात्मक दिशा मिल रही है।
एआई युग में केवल तकनीक नहीं, मजबूत बुनियादी ढांचा भी जरूरी; गौतम अदाणी ने रखी दीर्घकालिक विकास की दृष्टि

नई दिल्ली । तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी ने भारत के विकास और भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। वित्त वर्ष 2026 के लिए जारी अपने वार्षिक संदेश में उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में इन्फ्रास्ट्रक्चर और इंटेलिजेंस अब अलग-अलग क्षेत्रों की अवधारणाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं और साथ मिलकर विकास की नई दिशा तय कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास में अक्सर पहले भौतिक बुनियादी ढांचे का निर्माण होता था और उसके बाद तकनीकी प्रगति उस पर आधारित होकर आगे बढ़ती थी। लेकिन वर्तमान समय में यह प्रक्रिया बदल चुकी है। अब ऊर्जा, डेटा, कनेक्टिविटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। किसी भी एआई प्रणाली के प्रभावी संचालन के लिए ऊर्जा, डेटा ट्रांसमिशन और मजबूत नेटवर्किंग अवसंरचना की आवश्यकता होती है। ऐसे में तकनीकी विकास और भौतिक ढांचे का निर्माण एक साथ आगे बढ़ना अनिवार्य हो गया है। गौतम अदाणी ने कहा कि भविष्य में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त केवल उन संस्थानों को मिलेगी जो ऊर्जा, तकनीक, लॉजिस्टिक्स, कनेक्टिविटी और निष्पादन क्षमता को एकीकृत प्रणाली के रूप में विकसित करने में सफल होंगे। उनके अनुसार आने वाला दशक केवल नई तकनीकों का नहीं, बल्कि उन तकनीकों को संचालित करने वाले मजबूत बुनियादी ढांचे का भी होगा। यही कारण है कि दुनिया भर में तकनीकी नेतृत्व की दौड़ अब इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयारियों की दौड़ में भी बदलती दिखाई दे रही है। उन्होंने अपने समूह के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए निवेशों का उल्लेख करते हुए बताया कि ऊर्जा, ट्रांसमिशन, बंदरगाह, हवाई अड्डे, लॉजिस्टिक्स, डेटा सेंटर और विनिर्माण क्षेत्र में बड़े स्तर पर विस्तार किया गया है। उनका कहना था कि इन क्षेत्रों को अलग-अलग व्यवसायों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक ऐसी परस्पर जुड़ी प्रणाली का हिस्सा हैं जो भविष्य की डिजिटल और भौतिक अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान करती है। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया इस समय ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और एआई आधारित तकनीकों की बढ़ती मांग जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में जिन देशों के पास मजबूत ऊर्जा नेटवर्क, विश्वसनीय परिवहन व्यवस्था, उच्च क्षमता वाली डेटा संरचना और औद्योगिक उत्पादन क्षमता होगी, वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे निकल सकेंगे। भारत को लेकर उन्होंने विशेष आशावाद व्यक्त करते हुए कहा कि देश के पास एक अनूठा अवसर मौजूद है। कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत को पुरानी प्रणालियों को बदलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वह सीधे आधुनिक भौतिक और डिजिटल अवसंरचना को समानांतर रूप से विकसित कर सकता है। नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण क्षमता, बंदरगाह, हवाई अड्डे, डेटा सेंटर और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में केवल अधिक निर्माण करना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी मजबूत भौतिक और डिजिटल नींव तैयार करना आवश्यक है जो देश को दीर्घकालिक विकास की दिशा में आगे ले जा सके। उनके अनुसार बुनियादी ढांचा किसी राष्ट्र को शक्ति देता है और इंटेलिजेंस उसे प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान करती है। इन दोनों का प्रभावी संगम ही वैश्विक विकास के अगले चरण को परिभाषित करेगा और भारत इस परिवर्तन का नेतृत्व करने की क्षमता रखता है।
आम जनता को राहत, सरकार ने 30 ड्रग फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमत तय की, कंपनियों की मनमानी पर लगेगा अंकुश

नई दिल्ली । आम जनता को राहत देने और आवश्यक दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। सरकार के इस कदम के तहत 30 जरूरी ड्रग फॉर्मूलेशन की अधिकतम खुदरा कीमत तय कर दी गई है, जिससे अब दवा कंपनियां इन निर्धारित सीमाओं से अधिक कीमत नहीं वसूल सकेंगी। यह फैसला ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 के प्रावधानों के अंतर्गत लागू किया गया है और इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और किफायती बनाना है। इस निर्णय के तहत पैन रिलीफ, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मल्टी-विटामिन और अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्याओं में उपयोग होने वाली दवाओं को शामिल किया गया है। सरकार का मानना है कि इन आवश्यक दवाओं की कीमतों में अनियंत्रित वृद्धि आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ाती है, जिसे नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। इसी दिशा में यह कदम दवा बाजार में पारदर्शिता और संतुलन लाने के लिए उठाया गया है। नए नियमों के अनुसार इन 30 फॉर्मूलेशन की कीमतें अब एक निश्चित सीमा के भीतर रहेंगी और निर्माता कंपनियां इस तय सीमा से अधिक मूल्य नहीं जोड़ सकेंगी। हालांकि इन कीमतों में वस्तु एवं सेवा कर शामिल नहीं होगा, जिसे अलग से जोड़ा जा सकता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि दवाओं के बेस प्राइस में किसी भी प्रकार की मनमानी बढ़ोतरी की अनुमति नहीं दी जाएगी। उदाहरण के तौर पर विटामिन डी3 ओरल सॉल्यूशन की कीमत निर्धारित कर दी गई है, वहीं कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों से जुड़ी संयुक्त टैबलेट्स की कीमत भी नियंत्रित की गई है। इसी तरह डायबिटीज के उपचार में इस्तेमाल होने वाली मेटफॉर्मिन और विल्डाग्लिप्टिन जैसी दवाओं की कीमतों पर भी सीमा तय की गई है, जिससे मरीजों को नियमित उपचार में राहत मिल सके। सरकार की अधिसूचना के अनुसार सभी दवा विक्रेताओं और रिटेलर्स को अपने प्रतिष्ठानों पर दवाओं की मूल्य सूची स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करनी होगी, ताकि उपभोक्ता आसानी से निर्धारित कीमत की जानकारी प्राप्त कर सकें। यह व्यवस्था उपभोक्ता अधिकारों को मजबूत करने और बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। यदि कोई कंपनी या विक्रेता निर्धारित कीमत से अधिक शुल्क वसूलता पाया जाता है, तो उससे अतिरिक्त राशि ब्याज सहित वसूली जाएगी और कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जीवन रक्षक और आवश्यक दवाएं हर नागरिक तक उचित मूल्य पर पहुंच सकें। इस निर्णय को स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखा जा रहा है, जिससे विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के मरीजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कदम दवा बाजार में स्थिरता लाने के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक समावेशी बनाने में भी मदद करेंगे।
देशभर में LPG उपभोक्ताओं को राहत जारी, घरेलू गैस सिलेंडर के दाम मार्च स्तर पर बरकरार, कल हो सकता है बड़ा फैसला

नई दिल्ली । देशभर में घरेलू रसोई गैस उपभोक्ताओं के लिए 31 मई को जारी ताजा अपडेट में 14.2 किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमतों को लेकर कोई बदलाव दर्ज नहीं किया गया है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों की मासिक समीक्षा के बाद यह स्थिति सामने आई है कि फिलहाल घरेलू गैस की दरें मार्च माह के स्तर पर ही स्थिर बनी हुई हैं, जिससे आम उपभोक्ताओं को किसी अतिरिक्त बोझ का सामना नहीं करना पड़ रहा है। हालांकि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बदलाव को देखते हुए आने वाले दिनों में कीमतों पर असर पड़ने की आशंका भी बनी हुई है। देश की राजधानी दिल्ली में 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत 913 रुपये दर्ज की गई है, जबकि मुंबई में यह 912.50 रुपये पर उपलब्ध है। कोलकाता में उपभोक्ताओं को 939 रुपये और चेन्नई में 928.50 रुपये की दर पर सिलेंडर मिल रहा है। इसी तरह मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में घरेलू सिलेंडर की कीमत 918.50 रुपये पर स्थिर बनी हुई है, जो राज्य के उपभोक्ताओं के लिए फिलहाल राहत की स्थिति को दर्शाती है। लखनऊ, पटना और अन्य प्रमुख शहरों में भी दरों में स्थिरता देखी गई है, हालांकि कुछ शहरों में कीमतें 950 रुपये से अधिक के स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे क्षेत्रीय अंतर साफ नजर आता है। कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में हाल के दिनों में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, लेकिन घरेलू उपयोग वाले सिलेंडर में स्थिरता बनाए रखी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में संभावित बाधाएं भविष्य में LPG कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं। तेल कंपनियां हर महीने की पहली तारीख को दरों की समीक्षा करती हैं, और इसी क्रम में कल यानी 1 जून को एक नई समीक्षा की संभावना है, जो उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। पिछले कुछ महीनों में घरेलू LPG की कीमतों में सीमित बदलाव ही देखने को मिला है, जिसमें मार्च में 60 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। इसके बाद से अब तक दरें लगभग स्थिर बनी हुई हैं। वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है, जिससे आने वाले समय में घरेलू गैस की कीमतों पर दबाव बन सकता है। उपभोक्ताओं की नजर अब 1 जून की समीक्षा पर टिकी हुई है, क्योंकि हर महीने की पहली तारीख को तेल विपणन कंपनियां नए रेट जारी करती हैं। यदि वैश्विक बाजार में अस्थिरता जारी रहती है तो घरेलू LPG कीमतों में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल स्थिति यह है कि देशभर में रसोई गैस की कीमतें स्थिर हैं और उपभोक्ताओं को किसी तात्कालिक बढ़ोतरी से राहत मिली हुई है।
शहरों के लिए कौन सी EV बेहतर सौदा? Tata Tiago EV और MG Comet EV की कीमत, EMI और ऑन-रोड खर्च की पूरी तुलना

नई दिल्ली । भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है, जहां बढ़ती ईंधन कीमतों और शहरों में ट्रैफिक के दबाव के कारण लोग अब किफायती और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी बदलते बाजार में Tata Tiago EV और MG Comet EV दो ऐसी कारें हैं जो बजट सेगमेंट में सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। दोनों ही मॉडल कीमत, फीचर्स और फाइनेंस विकल्पों के आधार पर ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं, लेकिन EMI और डाउन पेमेंट के लिहाज से किस कार को खरीदना ज्यादा समझदारी भरा सौदा साबित होगा, यह सवाल खरीदारों के बीच लगातार बना हुआ है। Tata Tiago EV की एक्स-शोरूम कीमत लगभग 6.99 लाख रुपये से शुरू होती है और RTO, इंश्योरेंस व अन्य चार्ज जोड़ने के बाद इसकी ऑन-रोड कीमत करीब 7.41 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। यदि ग्राहक 2 लाख रुपये का डाउन पेमेंट करता है और शेष राशि को 9 प्रतिशत ब्याज दर पर 4 साल के लिए फाइनेंस कराता है तो उसकी मासिक EMI लगभग 13,464 रुपये बनती है। वहीं 5 साल की अवधि चुनने पर यह EMI घटकर करीब 11,231 रुपये प्रति माह हो जाती है, जिससे मासिक बजट पर दबाव कुछ कम हो जाता है। दूसरी ओर MG Comet EV की एक्स-शोरूम कीमत लगभग 7.62 लाख रुपये है और ऑन-रोड कीमत करीब 8.07 लाख रुपये तक पहुंचती है। समान 2 लाख रुपये के डाउन पेमेंट और 9 प्रतिशत ब्याज दर पर 4 साल के लोन विकल्प में इसकी मासिक EMI लगभग 15,118 रुपये बनती है। अगर यही लोन 5 साल के लिए लिया जाए तो EMI घटकर करीब 12,611 रुपये प्रति माह के आसपास आ जाती है, लेकिन फिर भी यह Tiago EV की तुलना में अधिक रहती है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि EMI और कुल फाइनेंसिंग बोझ के मामले में Tata Tiago EV, MG Comet EV की तुलना में ज्यादा किफायती विकल्प साबित होती है। हालांकि, खरीद का निर्णय केवल EMI पर आधारित नहीं होना चाहिए क्योंकि दोनों गाड़ियों की उपयोगिता अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखकर तय की गई है। MG Comet EV एक कॉम्पैक्ट सिटी कार है, जो भीड़भाड़ वाले शहरी इलाकों और सीमित पार्किंग स्पेस के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसका छोटा आकार इसे आसान ड्राइविंग और पार्किंग का फायदा देता है, लेकिन इसमें जगह सीमित होने के कारण यह मुख्य रूप से छोटे परिवार या व्यक्तिगत उपयोग के लिए बेहतर विकल्प है। वहीं Tata Tiago EV एक हैचबैक कार के रूप में अधिक स्पेस, आराम और लंबी दूरी की यात्रा के लिए बेहतर संतुलन प्रदान करती है, जिससे यह फैमिली यूजर्स के बीच ज्यादा लोकप्रिय विकल्प बन जाती है।