RBI कर रहा खाता जमा बीमा के नियम में बदलाव की तैयारी… जोखिम आधारित प्रीमियम मॉडल होगा लागू!

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) अप्रैल 2026 से खाता जमा बीमा (Account Deposit Insurance) के लिए एक बड़ा बदलाव लागू करने जा रहा है। अब तक सभी बैंकों से एक समान दर पर वसूला जाने वाला बीमा प्रीमियम (Insurance Premium) समाप्त होगा और उसकी जगह जोखिम आधारित प्रीमियम मॉडल लागू किया जाएगा। इस व्यवस्था में मजबूत और सुरक्षित बैंकों को कम प्रीमियम देना होगा, जबकि जोखिम वाले बैंकों पर अधिक बोझ पड़ेगा। अब तक भारत में जमा बीमा के लिए समान दर प्रणाली लागू थी, जो 1962 से चला आ रही थी। इसके तहत सभी बैंक अपने जमा पर प्रति 100 रुपये पर 12 पैसे का प्रीमियम जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम को देते थे। बैंक कितना सुरक्षित है या उसकी वित्तीय स्थिति कैसी है, इसका इस दर पर कोई असर नहीं पड़ता था। आरबीआई का मानना है कि यह व्यवस्था बैंकों को बेहतर जोखिम प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित नहीं करती थी, इसलिए इसमें बदलाव जरूरी था। क्या है नया जोखिम आधारित प्रीमियम मॉडलनए मॉडल के तहत बैंकों को उनकी वित्तीय सेहत और जोखिम प्रोफाइल के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाएगा। इसके लिए पूंजी पर्याप्तता, एनपीए, लाभप्रदता, तरलता और पर्यवेक्षण रेटिंग जैसे मानकों को आधार बनाया जाएगा। अप्रैल 2026 से बैंकों को ए, बी, सी और डी-चार जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाएगा। कम जोखिम वाले सुरक्षित बैंक कम प्रीमियम चुकाएंगे, जबकि अधिक जोखिम वाले बैंकों को ज्यादा प्रीमियम देना होगा। कितनी होगी प्रीमियम दरसबसे सुरक्षित बैंकों को अब प्रति 100 रुपये जमा पर सिर्फ आठ पैसे का प्रीमियम देना पड़ सकता है, जो मौजूदा दर से करीब 33 फीसदी कम है। श्रेणी बी के बैंक 10 पैसे, श्रेणी सी के बैंक 11 पैसे और श्रेणी डी (सबसे अधिक जोखिम) के बैंक 12 पैसे प्रीमियम का भुगतान करेंगे। इसका सीधा फायदा मजबूत बैलेंस शीट वाले बैंकों को मिलेगा, जबकि कमजोर बैंकों पर दबाव बढ़ेगा। बैंकों के जोखिम का आकलन कैसे होगाजोखिम आकलन के लिए दो मॉडल अपनाए जाएंगे। टियर-1 मॉडल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) पर लागू होगा, जिसमें पर्यवेक्षी रेटिंग, कैमल्स मानक और जमा बीमा कोष पर संभावित नुकसान को आधार बनाया जाएगा। टियर-2 मॉडल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों के लिए होगा, जिसमें मात्रात्मक संकेतकों और संभावित नुकसान पर ध्यान दिया जाएगा। पुराने और स्थिर बैंकों को अतिरिक्त राहतआरबीआई ने इस व्यवस्था में एक ‘विंटेज इंसेंटिव’ भी जोड़ा है। जिन बैंकों का रिकॉर्ड लंबे समय तक स्थिर रहा है और जिन पर कोई बड़ा नियामकीय प्रतिबंध या पुनर्गठन नहीं हुआ है, उन्हें अतिरिक्त छूट मिलेगी। यह छूट सालाना एक फीसदी तक हो सकती है और अधिकतम 25 फीसदी तक जा सकती है। जो बैंक इस ढांचे से बाहर रहेंगेलोकल एरिया बैंक और पेमेंट्स बैंक जोखिम-आधारित प्रीमियम व्यवस्था से बाहर रहेंगे और पहले की तरह ₹100 जमा पर 12 पैसे की समान दर चुकाते रहेंगे। डेटा सीमाओं के कारण इनके लिए सटीक जोखिम मॉडलिंग संभव नहीं है। कुल प्रीमियम संग्रह में इनका योगदान 1% से भी कम है। जमाकर्ताओं के लिए क्या बदलेगा?इस बदलाव से जमाकर्ताओं की जमा सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जमा बीमा कवर की सीमा और भुगतान प्रक्रिया पहले जैसी ही रहेगी। यानी बैंक डूबने की स्थिति में जमाकर्ताओं को मिलने वाली बीमा राशि में कोई कटौती नहीं होगी। हालांकि, मजबूत बैंकों के लिए लागत घटने से आगे चलकर इसका अप्रत्यक्ष लाभ ग्राहकों तक पहुंच सकता है। जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम क्या हैजमा बीमा और ऋण गारंटी निगम, भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था है। यह भारत में बैंक जमाकर्ताओं को जमा बीमा सुरक्षा प्रदान करता है, जो वर्तमान में प्रति जमाकर्ता ₹पांच लाख तक है। जमा बीमा योजना आरबीआई द्वारा लाइसेंस प्राप्त सभी बैंकों (वाणिज्यिक और सहकारी) के लिए अनिवार्य है। 31 मार्च, 2025 तक पंजीकृत बीमित बैंकों की संख्या 1,982 थी। – आपकी जमा पहले की तरह सुरक्षित रहेगी, जमा बीमा कवर में कोई बदलाव नहीं।– मजबूत बैंकों में भरोसा और बढ़ेगा।– बैंक लागत घटने से बढ़ा सकते हैं ब्याज दर, यानी बेहतर एफडी दर और लोन पर कम ब्याज दर।– कमजोर बैंकों पर बढ़ेगा दबाव।– बैंक चुनते समय सतर्कता बढ़ेगी।– बैंकिंग सिस्टम ज्यादा सुरक्षित होगा।
CIBIL स्कोर खराब है तो क्या नहीं मिलेगा नया क्रेडिट कार्ड? जानिए क्या कहता है नियम

नई दिल्ली। ऑनलाइन शॉपिंग करनी हो फ्लाइट टिकट बुक करनी हो या अचानक आई जरूरत आज के दौर में क्रेडिट कार्ड केवल सुविधा नहीं बल्कि फाइनेंशियल लाइफ का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति नया क्रेडिट कार्ड अप्लाई करता है सबसे पहले जिस चीज की जांच होती है वह है उसका CIBIL स्कोर। ऐसे में जिन लोगों का सिबिल स्कोर खराब है उनके मन में यही सवाल उठता है कि क्या अब उन्हें कभी नया क्रेडिट कार्ड नहीं मिलेगा? चलिए जानते हैं। क्या है CIBIL स्कोर?CIBIL स्कोर एक तीन अंकों की संख्या होती है जो आपकी क्रेडिट हिस्ट्री को दर्शाती है। यह स्कोर 300 से 900 के बीच होता है। आमतौर पर 750 या उससे ज्यादा स्कोर को बैंक अच्छा मानते हैं। वहीं 600 से नीचे का स्कोर यह संकेत देता है कि आपने पहले लोन या क्रेडिट कार्ड के भुगतान में लापरवाही की है। ऐसे में बैंक आपको ‘हाई रिस्क कस्टमर’ मान लेते हैं। क्या RBI ने खराब स्कोर वालों पर रोक लगाई है?यह जानना जरूरी है कि भारतीय रिजर्व बैंक RBIने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है जो खराब CIBIL स्कोर वाले व्यक्ति को क्रेडिट कार्ड देने से रोकता हो। दरअसल क्रेडिट कार्ड जारी करना पूरी तरह बैंकों और कार्ड जारी करने वाली कंपनियों की नीति पर निर्भर करता है। बैंक अपने रिस्क को देखते हुए शर्तें तय करते हैं। खराब CIBIL स्कोर वालों के लिए कोई ऑप्शन?अगर आपका स्कोर कम है तब भी कुछ रास्ते खुले हैं। सबसे सेफ ऑप्शन है सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड। इसमें आपको बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट FDकरानी होती है और उसी के बदले कार्ड मिलता है। इसके अलावा परिवार के किसी सदस्य के कार्ड पर ऐड-ऑन कार्ड भी लिया जा सकता है। कुछ फिनटेक कंपनियां और NBFC सीमित क्रेडिट लिमिट के साथ कार्ड ऑफर करती हैं ताकि यूजर धीरे-धीरे अपनी साख सुधार सके। क्रेडिट कार्ड से कैसे सुधरेगा सिबिल स्कोर?सही तरीके से इस्तेमाल किया गया क्रेडिट कार्ड आपके खराब CIBIL स्कोर को सुधारने में मदद कर सकता है। समय पर बिल भुगतान लिमिट से कम खर्च और नियमित उपयोग से 6 से 12 महीनों में स्कोर में अच्छा सुधार देखा जा सकता है। एक बार स्कोर बेहतर होते ही अनसिक्योर्ड यानी बिना FD वाले क्रेडिट कार्ड के रास्ते भी खुल जाते हैं।
सालाना इनकम 12 लाख रुपये से ज्यादा है तो आज ही करें ये 4 निवेश, रिटायरमेंट भी रहेगा सुरक्षित और टैक्स भी जीरो!

नई दिल्ली । अगर आपकी सालाना आमदनी 12 लाख रुपये से ज्यादा है और हर साल इनकम टैक्स आपकी जेब पर भारी पड़ता है, तो अब चिंता छोड़ दीजिए। सही टैक्स प्लानिंग और स्मार्ट निवेश से न सिर्फ टैक्स का बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है, बल्कि रिटायरमेंट के लिए एक मजबूत फाइनेंशियल फंड भी तैयार किया जा सकता है। खास बात यह है कि कुछ निवेश ऐसे हैं, जो टैक्स बचत और भविष्य की सुरक्षा दोनों का डबल फायदा देते हैं। नेशनल पेंशन सिस्टम नेशनल पेंशन सिस्टम हाई इनकम वालों के लिए सबसे असरदार टैक्स सेविंग टूल माना जाता है। सेक्शन 80CCD के तहत इसमें 50,000 रुपये की अतिरिक्त टैक्स छूट मिलती है, जो 80C की 1.5 लाख रुपये की सीमा से अलग है। यानी सीधे-सीधे टैक्सेबल इनकम कम। NPS में इक्विटी, डेट और सरकारी बॉन्ड में निवेश होता है, जिससे लंबे समय में 10-12% तक रिटर्न की उम्मीद की जाती है। रिटायरमेंट के समय 60% राशि टैक्स-फ्री निकाली जा सकती है, जबकि बाकी रकम से नियमित पेंशन मिलती है। पब्लिक प्रोविडेंट फंड जो लोग रिस्क से दूर रहना चाहते हैं, उनके लिए पब्लिक प्रोविडेंट फंड बेहतरीन ऑप्शन है। इसमें 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिलती है। मौजूदा समय में PPF पर 7.1% का फिक्स्ड और टैक्स-फ्री रिटर्न मिलता है। 15 साल की लंबी अवधि में कंपाउंडिंग का फायदा इसे रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए बेहद मजबूत बनाता है। इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम उन निवेशकों के लिए है, जो टैक्स बचाते हुए ज्यादा रिटर्न चाहते हैं। इसमें भी 80C के तहत 1.5 लाख रुपये तक की छूट मिलती है। 3 साल के लॉक-इन के साथ ELSS फंड्स इक्विटी में निवेश करते हैं और लंबे समय में 12–15% तक रिटर्न दे सकते हैं। हालांकि इसमें बाजार का रिस्क रहता है, इसलिए निवेश से पहले प्रोफाइल समझना जरूरी है। ULIP और पेंशन प्लान ULIP और लाइफ इंश्योरेंस पेंशन प्लान्स भी हाई इनकम वालों के लिए फायदेमंद हैं। 80C/80CCC के तहत टैक्स छूट और 10 के तहत टैक्स-फ्री मैच्योरिटी इन्हें अट्रैक्टिव बनाती है। ULIP में निवेश और इंश्योरेंस दोनों का लाभ मिलता है, जबकि पेंशन प्लान रिटायरमेंट के बाद नियमित आय सुनिश्चित करते हैं।
Business शुरू करने की सोच रहे हैं….तो अब बिना किसी गारंटी के ₹20 लाख तक का लोन

नई दिल्ली। केंद्रीय रिजर्व बेंक (Central Reserve Bank) ने कई अहम ऐलान किए हैं। इसमें एक बड़ा ऐलान उन लोगों से जुड़ा था जो अपना बिजनेस शुरू (Start Business) करने की सोच रहे हैं। दरअसल, आरबीआई (RBI) ने माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) के छोटे बिजनेस के लिए बिना गारंटी वाले लोन की लिमिट 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये करने की घोषणा की है। बिना गारंटी वाले लोन की बढ़ी हुई लिमिट 01 अप्रैल, 2026 को या उसके बाद मंजूर या रिन्यू किए गए छोटे कर्जदारों के सभी लोन पर लागू होगी। कोलैटरल-फ्री लोन क्या है?एक खबर में कोटक महिंद्रा बैंक की वेबसाइट का हवाला देते हुए बताया गया है कि यह एक अनसिक्योर्ड लोन है जो लेंडर आपकी बिजनेस की जरूरतों के लिए देते हैं। इस तरह के लोन में, लोन चुकाए जाने तक अपने घर, कार या प्रॉपर्टी जैसी कोई भी चीज गिरवी रखने की जरूरत नहीं होती। कोलैटरल-फ्री लोन बिजनेस के लिए तुरंत फंड पाने का एक शानदार तरीका है, जिसमें फाइनेंशियल संस्था के पास अपनी संपत्ति को जोखिम में डालने की जरूरत नहीं है। MSME का मतलब क्या है?MSME से मतलब माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज यानी कारोबार से होता है। एक माइक्रो एंटरप्राइज, जिसमें प्लांट और मशीनरी या इक्विपमेंट में इन्वेस्टमेंट 2.5 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं होता है और टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं होता है। वहीं, स्मॉल एंटरप्राइज में इन्वेस्टमेंट 25 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं होता है और टर्नओवर 100 करोड़ रुपये तक होना चाहिए। इसके अलावा, मीडियम एंटरप्राइज में प्लांट और मशीनरी या इक्विपमेंट में इन्वेस्टमेंट 125 करोड़ रुपये से ज्यादा नहीं होता है और टर्नओवर 500 करोड़ रुपये तक का होता है। किसान क्रेडिट कार्ड पर अपडेटइसके साथ ही आरबीआई किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) से संबंधित नये दिशा-निर्देश भी जारी करेगा। इसमें फसल सीजन के मानकीकरण, केसीसी की अवधि बढ़ाकर छह साल करने और हर फसल सीजन के लिए लोन लिमिट तय करने संबंधी प्रावधान होंगे। इसके प्रारूप दिशा-निर्देश जल्द जारी किये जाएंगे।
एक अप्रैल से लागू होंगे इनकम टैक्स के नए रूल्स… विभाग ने जारी किया ड्राफ्ट

नई दिल्ली। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (Income Tax Department) ने इनकम-टैक्स नियम, 2026 (Income-tax Rules, 2026) का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। ये ड्राफ्ट नियम 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने का प्रस्ताव है। इन ड्राफ्ट नियमों में कई दूसरी पहलों के साथ-साथ इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइलिंग फॉर्म को आसान बनाया गया है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) ने एक बयान में कहा कि ड्राफ्ट नियम और फॉर्म करीब 15 दिनों के लिए पब्लिक डोमेन में रहेंगे। सभी स्टेकहोल्डर्स और आम जनता से अनुरोध है कि वे इन ड्राफ्ट नियमों और फॉर्म को देखें और उन पर सोच-समझकर फीडबैक दें ताकि और बेहतर किया जा सके । आपको बता दें कि 15 दिन की अवधि 22 फरवरी, 2026 को पूरी हो रही है। CBDT चेयरमैन ने क्या कहा था?CBDT का कहना है कि ड्राफ्ट नियमों का हिस्सा नए फॉर्म को भी टैक्स देने वालों की आसानी के लिए काफी हद तक आसान बनाया गया है। बीते दिनों CBDT के चेयरमैन रवि अग्रवाल ने बताया था कि इसके अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची भी जारी की जाएगी। अग्रवाल ने कहा था कि CBDT नए कानून पर ‘बार-बार पूछे जाने वाले सवाल’ (एफएक्यू) और एक प्रस्तुति तैयार करने पर भी काम कर रहा है। यह नए अधिनियम के लागू होने के साथ जनता के लिए उपलब्ध होगी ताकि उन्हें चीजों को समझने में आसानी हो। सीबीडीटी प्रमुख ने कहा कि पिछले साल पूरा जोर (आयकर अधिनियम की) भाषा को सरल बनाने पर था और नए कानून को इस तरह से लाने पर था कि करदाता इसे आसानी से पढ़ और समझ सकें। क्या कहते हैं एक्सपर्टनांगिया ग्लोबल के पार्टनर संदीप झुनझुनवाला ने कहा- इनकम टैक्स फॉर्म्स को आसान बनाया गया है। फॉर्म को ज्यादा साफ, आसानी से समझ में आने वाली भाषा में तैयार किया गया है ताकि ऑपरेशनल, एडमिनिस्ट्रेटिव या कानूनी अनिश्चितता से बचा जा सके और उनसे जुड़े नोट्स को भी उसी हिसाब से आसान बनाया गया है। खास बात यह है कि ड्राफ्ट फॉर्म नंबर 26, ऑडिट रिपोर्ट और इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 की धारा 63 के तहत दी जाने वाली जानकारियों का स्टेटमेंट, ICDS एडजस्टमेंट का प्रावधान करता है।
Trade Deal: अगले 5 साल में 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा भारत… क्या US कंपनियां पूरी कर पाएंगी डिमांड?

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका (India and America) के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते (Historic Trade Agreements) के तहत भारत (India) ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर लगभग 41 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के सामान आयात करने की जो प्रतिबद्धता जताई है वह वैश्विक व्यापार की दिशा बदल सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य की सफलता केवल भारतीय कंपनियों (Indian Companies) के ऑर्डर देने पर नहीं, बल्कि अमेरिकी सप्लायर्स की सप्लाई क्षमता पर भी निर्भर करेगी। शनिवार को जारी संयुक्त बयान के बाद अब इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि आखिर किन क्षेत्रों में भारत अपनी खरीदारी बढ़ाएगा और अमेरिका के सामने क्या चुनौतियां होंगी। आयात के इस लक्ष्य को हासिल करने में ऊर्जा क्षेत्र सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा। आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत ने अमेरिका से करीब 40 अरब डॉलर का आयात किया, जिसमें से 11 अरब डॉलर केवल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद थे। यह पिछले साल की तुलना में 35% अधिक है। भारत अब अपनी तेल जरूरतों के लिए रूस के बजाय अमेरिकी तेल को प्राथमिकता देने की ओर बढ़ रहा है। भारत अब इंडोनेशिया से आने वाले ‘कोकिंग कोल’ की जगह अमेरिकी कोयले को तरजीह दे सकता है। अधिकारियों के अनुसार, अमेरिकी कोयला न केवल गुणवत्ता में बेहतर है, बल्कि कीमत में भी प्रतिस्पर्धी है। भारतीय तेल कंपनियों ने पहले ही अधिक तरल प्राकृतिक गैस (LNG) की खरीद के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। हाई-टेक और विमाननवाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, चिप्स, सेमीकंडक्टर और हवाई जहाज जैसे हाई-टेक उत्पाद इस 500 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की कुंजी होंगे। भारत अकेले बोइंग को 70 से 80 अरब डॉलर के नए ऑर्डर देने की तैयारी में है। डेटा सेंटर्स और AI के लिए आवश्यक ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स और हाई-एंड चिप्स की खरीद में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है। सप्लाई चेन और पेंडिंग ऑर्डर्स जैसी अड़चनेंइस भव्य योजना की राह में कुछ तकनीकी अड़चनें भी हैं। उदाहरण के तौर पर, बोइंग जैसी कंपनियों के पास पहले से ही भारी ऑर्डर का बैकलॉग है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अमेरिकी कंपनियां समय पर डिलीवरी दे पाएंगी? इसी तरह, वैश्विक बाजार में सेमीकंडक्टर चिप्स की भारी मांग है। भारतीय खरीदारों को इन उत्पादों को हासिल करने के लिए वैश्विक कतार में लगना होगा। गोयल ने कहा, “यह अमेरिकी विक्रेताओं पर निर्भर करता है कि वे भारतीय खरीदारों को ऐसा प्रस्ताव दें जिसे वे ठुकरा न सकें। 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य पहले ही साल में शायद पूरा न हो, लेकिन हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।” 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का रोडमैपविशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत सालाना 100 अरब डॉलर का आयात अमेरिका से करता है तो अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार होने के साथ-साथ सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी बन सकता है। इससे भारत की रूस पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका के साथ उसके रणनीतिक संबंध और गहरे होंगे। यह समझौता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक दांव है। जहां भारत को 18% कम टैरिफ का लाभ मिल रहा है, वहीं अमेरिका को 500 अरब डॉलर का सुनिश्चित बाजार मिल गया है। अब सफलता इस बात पर टिकी है कि अमेरिकी फैक्ट्रियां और तेल के कुएं भारत की इस विशाल मांग को कितनी तेजी से पूरा करते हैं।
पोस्ट ऑफिस की RD स्कीम में हर महीने 5000 रुपये जमा करेंगे तो 5 साल में कितना फंड होगा तैयार?

नई दिल्ली।महंगाई के दौर में अगर आप बिना जोखिम के सुरक्षित निवेश की तलाश में हैं, तो पोस्ट ऑफिस की रिकरिंग डिपोजिट (RD) स्कीम आपके लिए एक भरोसेमंद ऑप्शन बन सकती है। खासतौर पर वे लोग जो हर महीने थोड़ी-थोड़ी रकम बचाकर भविष्य के लिए एक अच्छा फंड तैयार करना चाहते हैं, उनके लिए यह स्कीम बेहद उपयोगी है। पोस्ट ऑफिस की RD न सिर्फ सरकारी गारंटी के साथ आती है, बल्कि इसमें मिलने वाला ब्याज भी स्थिर होता है, जिससे निवेशक पहले से जान सकता है कि मैच्योरिटी पर उसे कितनी रकम मिलेगी। क्या है पोस्ट ऑफिस RD स्कीम?पोस्ट ऑफिस की RD यानी रिकरिंग डिपोजिट स्कीम में निवेशक को हर महीने एक निश्चित रकम जमा करनी होती है। यह स्कीम उन लोगों के लिए बनाई गई है जो एक साथ बड़ी रकम निवेश नहीं कर सकते, लेकिन नियमित बचत की आदत डालना चाहते हैं। फिलहाल पोस्ट ऑफिस इस स्कीम पर 6.7% सालाना ब्याज दे रहा है, जो तिमाही चक्रवृद्धि के आधार पर जोड़ा जाता है। कितनी रकम से कर सकते हैं शुरुआत?इस स्कीम में खाता खोलने के लिए न्यूनतम मासिक जमा सिर्फ 100 रुपये है। अच्छी बात यह है कि इसमें अधिकतम जमा की कोई सीमा तय नहीं है, यानी आपकी आमदनी जितनी अनुमति दे, आप उतना निवेश कर सकते हैं। यही वजह है कि यह स्कीम नौकरीपेशा लोगों, गृहिणियों और छोटे कारोबारियों के बीच काफी लोकप्रिय है। मैच्योरिटी और अवधिपोस्ट ऑफिस की RD स्कीम की अवधि 5 साल यानी 60 महीने होती है। इस दौरान हर महीने तय तारीख तक राशि जमा करनी होती है। अगर किसी महीने किस्त चूक जाती है, तो मामूली जुर्माने के साथ उसे बाद में भी जमा किया जा सकता है। हर महीने 5000 रुपये जमा करने पर कितना मिलेगा?अगर आप पोस्ट ऑफिस की RD स्कीम में हर महीने 5000 रुपये जमा करते हैं, तो 5 साल में आपकी कुल जमा राशि 3,00,000 रुपये होगी। इस पर मिलने वाले ब्याज को जोड़ दें, तो 60 महीने बाद आपको कुल करीब 3,56,830 रुपये मिलेंगे। यानी आपको लगभग 56,830 रुपये से ज्यादा का ब्याज लाभ होगा। क्यों चुनें पोस्ट ऑफिस RD?पोस्ट ऑफिस की RD स्कीम पूरी तरह सुरक्षित मानी जाती है क्योंकि यह सरकार द्वारा समर्थित है। इसमें बाजार के उतार-चढ़ाव का कोई असर नहीं पड़ता और निवेशक को फिक्स रिटर्न मिलता है। बच्चों की पढ़ाई, शादी या किसी छोटे भविष्य लक्ष्य के लिए यह स्कीम एक मजबूत फाइनेंशियल प्लान बन सकती है।
एसबीआई का मुनाफा तीसरी तिमाही में 13 फीसदी बढ़कर 21,317 करोड़ रुपये

नई दिल्ली। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) (State Bank of India (SBI) ने चालू वित्त वर्ष 2025-26 (Current Financial Year 2025-26) की दिसंबर तिमाही के नतीजे का ऐलान कर दिया है। एसबीआई ने शनिवार को कहा कि 31 दिसंबर को समाप्त अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में उसका मुनाफा 13.06 फीसदी बढ़कर 21,317 करोड़ रुपये रहा। बैंक को पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की इसी अवधि में 18,853 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था। एसबीआई ने बयान में बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 की जुलाई-सितंबर तिमाही में बैंक ने 21,137 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया था। एकल आधार पर अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में शुद्ध लाभ 24.48 फीसदी बढ़कर 21,028 करोड़ रुपये रहा है। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 16,891 करोड़ रुपये रहा था। देश के सबसे बड़े ऋणदाता बैंक का वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही में एकल आधार पर कुल आय बढ़कर 1,40,915 करोड़ रुपये हो गया, जो पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की इसी तिमाही में 1,28,467 करोड़ रुपये थी। इस दौरान बैंक का कुल खर्च 1,04,917 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,08,052 करोड़ रुपये हो गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक की सकल गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) का अनुपात 31 दिसंबर 2025 तक बेहतर होकर 1.57 फीसदी रहा, जो सितंबर 2025 में 1.73 फीसदी था। वहीं, बैंक का कुल प्रावधान 4,507 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 911 करोड़ रुपये रहा था। इसके अलावा बैंक का कुल पूंजी पर्याप्तता अनुपात 31 दिसंबर 2025 तक 14.04 फीसदी रहा।
बदल गया टोल टैक्स चुकाने का तरीका, बिना टोल प्लाजा के कटेगा टोल..

नई दिल्ली। Toll Tax Without Toll Plaza: देश में हाईवे नेटवर्क तेजी से फैल रहा है और रोज लाखों वाहन लंबी दूरी तय करते हैं. लेकिन टोल प्लाजा पर रुकना यात्रियों के सफर को स्लो कर देता है. फास्टैग के बाद भी कई जगह कतारें, जाम और समय की बर्बादी आम है. अब इस परेशानी का समाधान नई तकनीक से किया जा रहा है. देश का पहला बिना बैरियर वाला टोल बूथ गुजरात के सूरत में शुरू किया गया है. यहां वाहन बिना रुके निकल जाएंगे और टोल अपने आप कट जाएगा. इस सिस्टम में हाई रिजोल्यूशन कैमरे, जीपीएस और ऑटोमेटेड नंबर प्लेट रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. यानी अब टोल देने का तरीका पूरी तरह डिजिटल और स्मूथ होने जा रहा है. जान लें पूरी खबर. बिना टोल प्लाजा के टोल कलेक्शननए टोल प्लाजा सिस्टम में टोल प्लाजा पर बैरियर नहीं होगा. सड़क पर लगे हाई रिजोल्यूशन कैमरे हर गुजरने वाले वाहन की नंबर प्लेट पढ़ेंगे. अगर गाड़ी पर फास्टैग नहीं भी है. तब भी नंबर प्लेट के जरिए वाहन की पहचान हो जाएगी. सिस्टम इसे टोल उल्लंघन के तौर पर दर्ज करेगा और वाहन मालिक को ई चालान भेजा जाएगा. हर लेन में रडार और लिडार आधारित कैमरे 360 डिग्री रिकॉर्डिंग करेंगे. पूरा डेटा कंट्रोल रूम और एनएचएआई सर्वर पर रियल टाइम दर्ज होगा. यानी कोई भी वाहन बिना पेमेंट के नहीं निकल सकेगा. यह टेक्नोलॉजी दुबई, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पहले से ही इस्तेमाल की जा रही है फास्टैग है लेकिन बैलेंस कम है तो क्या होगा?अगर आपकी गाड़ी में फास्टैग लगा है लेकिन उसमें बैलेंस कम है या ब्लैकलिस्टेड है. तब भी सिस्टम उसे पहचान लेगा. ऐसे मामलों में वाहन को डिफॉल्टर के रूप में दर्ज किया जाएगा. वाहन मालिक को एसएमएस और ऐप के जरिए अलर्ट मिलेगा. तय समय के भीतर रिचार्ज न करने पर ई चालान जारी होगा. जानबूझकर टोल चोरी करने की कोशिश करने वालों पर भी यह सिस्टम नजर रखेगा. कैमरे हर एंगल से रिकॉर्डिंग करते हैं. इसलिए बच निकलना मुश्किल होगा. आने वाले समय में यह बिना बैरियर वाला टोल सिस्टम देश के बाकी हाईवे पर भी लागू किया जा सकता है. इससे सफर तेज और आसान हो जाएगा.
सोना 14 हजार और चांदी 94 हजार गिरकर रिकॉर्ड स्तर से नीचे, निवेशकों में चिंता

नई दिल्ली। इस हफ्ते सोने और चांदी के दाम में तेज गिरावट देखी गई है। सोना 13,717 रुपये घटकर 1,52,078 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया है, जबकि चांदी 3,39,350 रुपये प्रति किलो से गिरकर 2,44,929 रुपये पर पहुंच गई। इस गिरावट में चांदी करीब 94,421 रुपये प्रति किलो तक नीचे आ गई। विशेषज्ञों का कहना है कि सोना और चांदी में यह गिरावट मुख्य रूप से दो कारणों से हुई। पहला, हाल के दिनों में दोनों धातुओं की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुकी थीं, जिससे निवेशकों ने बड़े पैमाने पर प्रॉफिट बुकिंग की। दूसरा, फिजिकल डिमांड में कमी और औद्योगिक उपयोग को लेकर बढ़ी चिंताओं ने भी दामों पर दबाव डाला। निवेशकों के लिए यह गिरावट चेतावनी का संकेत है। विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि इस समय केवल सर्टिफाइड गोल्ड ही खरीदें और कीमतों की क्रॉस-चेकिंग करें। सोना खरीदते समय हमेशा BIS हॉलमार्क वाला गोल्ड चुनना चाहिए। हॉलमार्क नंबर अल्फान्यूमेरिक होते हैं, जैसे AZ4524, जो सोने की कैरेट वैल्यू बताते हैं। ज्वेलर्स और निवेशकों के लिए दो बातें खासकर महत्वपूर्ण हैं। पहला, सोने का सही वजन और दैनिक कीमत को विभिन्न सोर्सेज जैसे इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) की वेबसाइट से क्रॉस-चेक करें। दूसरा, सोने के भाव 24 कैरेट, 22 कैरेट और 18 कैरेट के अनुसार अलग-अलग होते हैं, इसलिए खरीदते समय सही कैरेट का ध्यान रखें। चांदी की असली पहचान करने के लिए चार आसान तरीके हैं। मैग्नेट टेस्ट: असली सिल्वर चुंबक से नहीं चिपकती। आइस टेस्ट: सिल्वर पर रखी बर्फ तेजी से पिघलेगी। स्मेल टेस्ट: असली सिल्वर में कोई गंध नहीं होती, जबकि नकली में कॉपर जैसी गंध हो सकती है। क्लॉथ टेस्ट: सफेद कपड़े से रगड़ने पर असली चांदी के निशान काले होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में निवेशकों को भाव के उतार-चढ़ाव को समझते हुए ही सोना और चांदी में निवेश करना चाहिए। वहीं, ज्वेलर्स को सावधानी से स्टॉक प्रबंधन करने और ग्राहकों को प्रमाणित उत्पाद देने की सलाह दी जा रही है।इस हफ्ते की गिरावट के बाद, सोने और चांदी के निवेशकों के लिए यह समय सतर्क रहने का है। हालाँकि, अगर वैश्विक मार्केट और घरेलू मांग लंबे समय में स्थिर रहती है, तो इनकी कीमतें फिर से ऊपर जा सकती हैं।