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1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत

नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा। कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा थाइन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था। क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई। कितना सोना इस्तेमाल हुआ?रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया। किसने संभाली जिम्मेदारी?इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले। कैसे भेजा गया सोना?मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली क्या मिला फायदा?इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

नया फ्री-फ्लो टोल सिस्टम शुरू, बिना रुके कटेगा टोल-ईंधन और समय दोनों की होगी बचत

नई दिल्ली ।देश में हाईवे यात्रा को और अधिक आधुनिक और सुगम बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव किया गया है, जिसमें टोल कलेक्शन सिस्टम को पूरी तरह डिजिटल और बैरियर-लेस बनाने की पहल शुरू हो गई है। इस नई व्यवस्था के तहत अब वाहनों को टोल प्लाजा पर रुकने की जरूरत नहीं होगी और पूरा प्रोसेस ऑटोमैटिक तरीके से पूरा हो जाएगा। इस नई तकनीक में वाहन जैसे ही टोल प्लाजा से गुजरेंगे, कैमरे उनके नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे और जुड़े हुए फास्टैग अकाउंट से टोल शुल्क अपने आप कट जाएगा। इस प्रक्रिया के लिए एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है, जिससे ट्रैफिक जाम की समस्या काफी हद तक खत्म होने की उम्मीद है। यह सिस्टम खास तौर पर उन हाईवे सेक्शंस के लिए तैयार किया गया है जहां अक्सर लंबी कतारें और देरी देखने को मिलती है। नई व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यात्रा का समय कम होगा और वाहन लगातार गति में रहेंगे। इससे न सिर्फ यात्रियों को सुविधा मिलेगी, बल्कि ईंधन की खपत भी कम होगी। लगातार रुकने और चलने की स्थिति खत्म होने से वाहनों का माइलेज बेहतर होगा और प्रदूषण में भी कमी आने की संभावना जताई जा रही है। सरकारी अनुमान के अनुसार इस तकनीक के लागू होने से हर साल बड़ी मात्रा में ईंधन की बचत संभव होगी और कार्बन उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स सेक्टर को भी फायदा मिलेगा क्योंकि माल ढुलाई तेज और अधिक प्रभावी हो जाएगी। इससे सप्लाई चेन सिस्टम में भी सुधार देखने को मिलेगा। इस प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से देश के अलग-अलग हिस्सों में लागू किया जा रहा है। शुरुआत कुछ चुनिंदा टोल प्लाजा से की गई है और धीरे-धीरे इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की योजना है। आने वाले समय में बड़ी संख्या में टोल प्लाजा इस डिजिटल सिस्टम से जुड़ जाएंगे। हालांकि इस नई व्यवस्था में फास्टैग बैलेंस को लेकर यात्रियों को अधिक सतर्क रहने की जरूरत होगी। यदि खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं होता है तो ई-नोटिस जारी किया जा सकता है और तय समय सीमा में भुगतान न करने पर अतिरिक्त शुल्क भी देना पड़ सकता है।

ग्लोबल टेंशन और क्रूड की आग से हिला शेयर बाजार, निफ्टी में और गिरावट के संकेत

नई दिल्ली ।शेयर बाजार में इस कारोबारी सत्र की शुरुआत ही कमजोरी के साथ हुई, जहां निवेशकों के रुझान में साफ तौर पर घबराहट दिखाई दी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही इंडेक्स गैपडाउन ओपन हुए और शुरुआती मिनटों से ही दबाव में कारोबार करते नजर आए। बाजार की चाल पूरी तरह से बिकवाली की तरफ झुकी हुई दिखी, जिससे पूरे ट्रेडिंग सेशन में कमजोरी बनी रही। निफ्टी ने 23800 का महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल तोड़ दिया, जो पिछले कई सत्रों से एक मजबूत आधार के रूप में काम कर रहा था। इस लेवल के टूटते ही बाजार में सेलिंग प्रेशर और तेज हो गया और इंडेक्स 23700 के नीचे तक फिसल गया। तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार, जब किसी प्रमुख सपोर्ट लेवल का ब्रेकडाउन होता है, तो बाजार में तेजी से गिरावट का जोखिम बढ़ जाता है और इसी तरह की स्थिति फिलहाल देखने को मिल रही है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव का असर भी घरेलू बाजार पर साफ नजर आ रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण हालात ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है, जो लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी है। क्रूड ऑयल की यह ऊंची कीमतें महंगाई और आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं, जिसका सीधा असर इक्विटी बाजारों पर पड़ रहा है। बाजार में सेक्टोरल प्रदर्शन भी काफी असमान रहा। आईटी सेक्टर में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला, जहां बड़े स्टॉक्स में लगभग तीन प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। टेक्नोलॉजी आधारित कंपनियों पर बिकवाली का दबाव लगातार बना हुआ है, जिससे पूरा आईटी इंडेक्स कमजोर दिखाई दिया। दूसरी ओर, कुछ चुनिंदा शेयरों में हल्की मजबूती जरूर देखने को मिली, लेकिन वह बाजार की समग्र कमजोरी को संभालने में नाकाफी रही। ऑयल और गैस सेक्टर में कुछ स्टॉक्स में तेजी देखने को मिली, जिससे यह संकेत मिला कि ऊर्जा क्षेत्र में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है। वहीं, ऑटो और टेलीकॉम सेक्टर के कुछ शेयरों में भी हल्की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि यह तेजी सीमित दायरे में रही और पूरे बाजार की दिशा को बदल नहीं सकी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में बाजार ‘सेल ऑन राइज’ पैटर्न में काम कर रहा है, जहां हर छोटी तेजी पर बिकवाली देखने को मिल रही है। इसके अलावा, वीकली एक्सपायरी के कारण भी बाजार में अस्थिरता बढ़ी हुई है। इंडिया विक्स का 18 के ऊपर जाना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है। कुल मिलाकर बाजार फिलहाल दबाव में है और निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। निफ्टी का अहम सपोर्ट टूटने के बाद आगे की दिशा अब नए सपोर्ट और रेजिस्टेंस लेवल पर निर्भर करती नजर आ रही है।

Gold नहीं तो क्या? 1 साल में रकम दोगुनी करने के लिए बेस्ट इन्वेस्टमेंट ऑप्शंस

नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और विदेशी मुद्रा बचाने की अपीलों के बीच निवेशकों के सामने बड़ा सवाल है अगर सोना न खरीदें तो पैसा कहां लगाएं? सोना पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन इसकी रिटर्न ग्रोथ सीमित और अस्थिर भी रहती है। इसी वजह से अब लोग ऐसे विकल्प खोज रहे हैं जो बेहतर ग्रोथ और रिटर्न दे सकें। 1. शेयर बाजार – हाई रिस्क, हाई रिटर्न का खेलभारतीय शेयर बाजार लंबे समय में सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाले विकल्पों में माना जाता है।सही स्टॉक्स चुनने पर एक साल में अच्छा मुनाफा संभव है, लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव और जोखिम भी ज्यादा होता है। फायदा: हाई ग्रोथ पोटेंशियल जोखिम: मार्केट वोलैटिलिटी 2. म्यूचुअल फंड – संतुलित और प्रोफेशनल निवेशम्यूचुअल फंड उन लोगों के लिए बेहतर विकल्प है जो डायरेक्ट शेयर मार्केट का जोखिम नहीं लेना चाहते। SIP के जरिए छोटे निवेश से शुरुआत लंबे समय में स्थिर रिटर्न की संभावना एक्सपर्ट मैनेजमेंट का फायदा 3. रियल एस्टेट और REITs – स्थिर आय का जरियाREIT (Real Estate Investment Trust) उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है जो प्रॉपर्टी में सीधे निवेश नहीं कर सकते। कम पैसे में रियल एस्टेट एक्सपोजर किराये जैसी नियमित आय लंबी अवधि में वैल्यू ग्रोथ 4. गोल्ड ETF – सोने का डिजिटल विकल्पगोल्ड ETF उन निवेशकों के लिए सही है जो सोना छोड़ना नहीं चाहते लेकिन फिजिकल गोल्ड से बचना चाहते हैं। स्टोरेज की झंझट नहीं बाजार से जुड़े रिटर्न आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है  क्या सच में 1 साल में पैसा डबल हो सकता है?यह समझना जरूरी है कि कोई भी निवेश चाहे शेयर बाजार हो या म्यूचुअल फंड गारंटीड डबल रिटर्न नहीं देता।उच्च रिटर्न के साथ हमेशा जोखिम भी जुड़ा होता है। इसलिए निवेश सोच-समझकर और विविधता के साथ करना चाहिए। अगर आप सोने में निवेश कम करके अपने पैसे को बढ़ाना चाहते हैं, तो भारतीय शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, REIT (Real Estate Investment Trust) और गोल्ड ETF जैसे विकल्प बेहतर हो सकते हैं लेकिन समझदारी और रिस्क मैनेजमेंट सबसे जरूरी है।

सरकार के रॉयल्टी कट से एनर्जी सेक्टर में हलचल, ONGC और Oil India के शेयरों में 7% तक उछाल, निवेशकों में बढ़ी उम्मीद

नई दिल्ली । शेयर बाजार में इस कारोबारी सत्र की शुरुआत ही कमजोरी के साथ हुई, जहां निवेशकों के रुझान में साफ तौर पर घबराहट दिखाई दी। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही इंडेक्स गैपडाउन ओपन हुए और शुरुआती मिनटों से ही दबाव में कारोबार करते नजर आए। बाजार की चाल पूरी तरह से बिकवाली की तरफ झुकी हुई दिखी, जिससे पूरे ट्रेडिंग सेशन में कमजोरी बनी रही। निफ्टी ने 23800 का महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल तोड़ दिया, जो पिछले कई सत्रों से एक मजबूत आधार के रूप में काम कर रहा था। इस लेवल के टूटते ही बाजार में सेलिंग प्रेशर और तेज हो गया और इंडेक्स 23700 के नीचे तक फिसल गया। तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार, जब किसी प्रमुख सपोर्ट लेवल का ब्रेकडाउन होता है, तो बाजार में तेजी से गिरावट का जोखिम बढ़ जाता है और इसी तरह की स्थिति फिलहाल देखने को मिल रही है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव का असर भी घरेलू बाजार पर साफ नजर आ रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण हालात ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को सतर्क कर दिया है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है, जो लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी है। क्रूड ऑयल की यह ऊंची कीमतें महंगाई और आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंता बढ़ा रही हैं, जिसका सीधा असर इक्विटी बाजारों पर पड़ रहा है। बाजार में सेक्टोरल प्रदर्शन भी काफी असमान रहा। आईटी सेक्टर में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला, जहां बड़े स्टॉक्स में लगभग तीन प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। टेक्नोलॉजी आधारित कंपनियों पर बिकवाली का दबाव लगातार बना हुआ है, जिससे पूरा आईटी इंडेक्स कमजोर दिखाई दिया। दूसरी ओर, कुछ चुनिंदा शेयरों में हल्की मजबूती जरूर देखने को मिली, लेकिन वह बाजार की समग्र कमजोरी को संभालने में नाकाफी रही। ऑयल और गैस सेक्टर में कुछ स्टॉक्स में तेजी देखने को मिली, जिससे यह संकेत मिला कि ऊर्जा क्षेत्र में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है। वहीं, ऑटो और टेलीकॉम सेक्टर के कुछ शेयरों में भी हल्की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि यह तेजी सीमित दायरे में रही और पूरे बाजार की दिशा को बदल नहीं सकी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा समय में बाजार ‘सेल ऑन राइज’ पैटर्न में काम कर रहा है, जहां हर छोटी तेजी पर बिकवाली देखने को मिल रही है। इसके अलावा, वीकली एक्सपायरी के कारण भी बाजार में अस्थिरता बढ़ी हुई है। इंडिया विक्स का 18 के ऊपर जाना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है। कुल मिलाकर बाजार फिलहाल दबाव में है और निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। निफ्टी का अहम सपोर्ट टूटने के बाद आगे की दिशा अब नए सपोर्ट और रेजिस्टेंस लेवल पर निर्भर करती नजर आ रही है।

.मल्टीबैगर स्टॉक बना निवेशकों की लॉटरी, 3 साल में 2400% रिटर्न के बाद अब बोनस शेयर का बड़ा ऐलान

नई दिल्ली । शेयर बाजार में एक बार फिर मल्टीबैगर स्टॉक्स ने निवेशकों का ध्यान खींचा है। स्मॉलकैप कैटेगरी की एक कंपनी वी-मार्क इंडिया ने हाल ही में ऐसा प्रदर्शन किया है जिसने निवेशकों को चौंका दिया है। कंपनी ने 5:1 के अनुपात में बोनस शेयर जारी करने का फैसला लिया है, जिसके बाद इसके शेयरों में जोरदार तेजी देखने को मिली और यह करीब 11 प्रतिशत तक उछल गया। बोनस शेयर का मतलब यह है कि जिन निवेशकों के पास कंपनी का एक शेयर होगा, उन्हें अतिरिक्त पांच शेयर मुफ्त में दिए जाएंगे। इस फैसले से बाजार में सकारात्मक माहौल बना और निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ गई। हालांकि इस प्रस्ताव को अभी शेयरधारकों की मंजूरी मिलना बाकी है। इस कंपनी की सबसे बड़ी खासियत इसका मल्टीबैगर रिटर्न है। पिछले तीन वर्षों में इस स्टॉक ने लगभग 2400 प्रतिशत का रिटर्न दिया है, यानी निवेशकों की पूंजी कई गुना बढ़ चुकी है। अगर किसी ने कुछ साल पहले इसमें निवेश किया होता, तो उसकी रकम आज कई गुना ज्यादा हो सकती थी। यही कारण है कि यह स्टॉक लगातार चर्चा में बना हुआ है। कंपनी वायर और केबल निर्माण के क्षेत्र में काम करती है और इसका उपयोग पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक प्रोजेक्ट्स में बड़े पैमाने पर होता है। इसके उत्पादों की मांग सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में बनी रहती है, जिससे इसका बिजनेस लगातार मजबूत हो रहा है। बीते कुछ वर्षों में कंपनी के शेयरों ने शानदार प्रदर्शन किया है। एक साल के भीतर भी इसमें कई गुना तेजी देखने को मिली है, जबकि एक महीने के अंदर भी इसमें तेज उछाल दर्ज किया गया है। इस मजबूत प्रदर्शन ने इसे स्मॉलकैप से मल्टीबैगर स्टॉक की श्रेणी में ला दिया है। कंपनी का भविष्य विस्तार पर भी जोर है। आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने और नए बाजारों में विस्तार करने की योजना है। इसके साथ ही कंपनी का फोकस पावर ट्रांसमिशन, रिन्यूएबल एनर्जी और निर्यात जैसे क्षेत्रों पर भी है। कुल मिलाकर यह स्टॉक उन निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है जो लंबी अवधि में मजबूत रिटर्न की तलाश में रहते हैं। बोनस शेयर की घोषणा ने इसके प्रति बाजार की उम्मीदों को और बढ़ा दिया है।

अर्थव्यवस्था को बचाने की कवायद… जानें सोना और तेल के इस्तेमाल में कटौती की अपील का क्या है मकसद?

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया (West Asia) में संघर्ष से वैश्विक आपूर्ति शृंखला (Global Supply Chain) में आई रुकावट और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) सुरक्षित रखने के लिए सोने, पेट्रोल-डीजल और खाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती की पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की अपील पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अपील का मुख्य मकसद डॉलर की मांग कम करना, रुपये को मजबूत करना और अर्थव्यवस्था को संभावित झटकों से बचाना है। विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ती आयात लागत और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव से दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत तेल का शुद्ध आयातक है और तेल की 89 फीसदी जरूरतें बाहरी स्रोतों से पूरी करता है और इसके लिए उसे अब ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। 6 अरब डॉलर का सोना हर माह खरीदता है भारतभारत सोने का उत्पादक नहीं है। पिछले वर्ष अकेले सोने पर करीब 72 अरब डॉलर खर्च किए गए। यानी, हर माह छह अरब डॉलर। उपभोक्ता आयात और एक आरक्षित संपत्ति के रूप में सोने की दोहरी भूमिका स्थिति को और जटिल बना देती है। आरबीआई तेजी से सोना जमा कर रहा है। एक साल में उसने लंदन से 168 टन सोना खरीदा है, जिससे मार्च तक उसके पास 880 टन सोना हो गया है। भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की 16% हिस्सेदारी है, जो पिछले वर्ष के 10% से अधिक है। हालांकि, घरेलू सोने की खरीद का आर्थिक असर अलग होता है। आरबीआई के रिजर्व प्रबंधन कार्यों के विपरीत आयातित सोने की उपभोक्ता मांग अर्थव्यवस्था में डॉलर के प्रवाह को सीधे तौर पर बढ़ा देती है। इसलिए, बड़े पैमाने पर सोने के आयात से चालू खाता घाटे पर दबाव बढ़ सकता है और डॉलर की मांग बढ़ सकती है। इससे समय के साथ रुपया कमजोर पड़ सकता है। जैसे-जैसे डॉलर बाहर जाता है, रुपया कमजोर होता जाता है, सोना और भी महंगा हो जाता है। इससे दुष्चक्र पैदा हो जाता है, जिसमें भारतीय उपभोक्ता सोने के लिए अधिक रुपये चुकाता है, क्योंकि सोने की पिछली खरीद ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया होता है। आयात में बढ़ोतरी से बढ़ रहा दबावथिंक टैंक वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल (जीटीआरआई) ने पीएम की अपील का समर्थन करते हुए कहा कि सोने के आयात में हो रही भारी बढ़ोतरी विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रही है और व्यापार असंतुलन को बढ़ा रही है। जीटीआरआई के अनुसार, भारत के गोल्ड बार का आयात 2022 में 36.5 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 58.9 अरब डॉलर हो गया। थिंक टैंक ने सरकार से आग्रह किया है कि विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रखने के लिए, भारत-यूएई मुक्त व्यापार समझौते के तहत कीमती धातुओं पर दी जाने वाली रियायतों की समीक्षा करे। हाल में सोने के आयात में हुई बढ़ोतरी में इसकी बड़ी भूमिका रही है। अमीरात से 2022 में जहां गोल्ड बार का आयात 2.9 अरब डॉलर था, वहीं 2025 में यह बढ़कर 16.5 अरब डॉलर हो गया। 89% तेल का आयात करता है भारत तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भी डॉलर के बाहर जाने में वृद्धि के रूप में सामने आता है। हालांकि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर रखी गई हैं, पर इसकी भरपाई सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने की है। इन कंपनियों को खुदरा कीमत और आयात कीमत के बीच के अंतर का सामना करना पड़ा है और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उछाल के कारण इन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) को एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर भी नुकसान हो रहा है, जिससे उन पर दबाव और बढ़ गया है। इसे देखते हुए कि सरकार ने ओएमसी को इन नुकसानों की भरपाई करने की कोई योजना नहीं होने का संकेत दिया है, कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद है और कंपनियां खुद भी इस तरह के बदलाव के लिए जोर दे रही हैं। हालांकि, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी कुछ ही दिनों में पूरी आपूर्ति शृंखला में फैल जाती है। खाद्य तेल : विकल्प सीमित थाली की बढ़ती जा रही लागतभारत खाने के तेल की जरूरतों के लिए आयात पर बहुत निर्भर है, खासकर इंडोनेशिया और मलयेशिया से पाम तेल तथा रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी का तेल मंगाता है। पीएम मोदी ने कहा था कि यदि हर घर खाने के तेल का इस्तेमाल कम कर दे, तो राष्ट्रीय खजाने के साथ परिवार की सेहत भी सुधरेगी। सोने की खरीद टाला जा सकता है या सैद्धांतिक रूप से ईंधन की बचत की जा सकती है, लेकिन खाने के तेल के विकल्प सीमित हैं। यह रोजमर्रा की आवश्यक चीज है। रुपये की गिरावट से यह समस्या और भी बढ़ गई है। कमजोर रुपया आयातित तेल के हर लीटर की कीमत बढ़ा देता है और खाने के तेल की कीमतों में हुई यह बढ़ोतरी आपूर्ति शृंखला के जरिये तेजी से उपभोक्ता की थाली तक पहुंच जाती है। घरेलू स्तर पर उपलब्ध सरसों के तेल जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इनका उत्पादन इतनी तेजी से नहीं बढ़ाया जा सकता कि ये आयात की जगह ले सकें। रासायनिक उर्वरक : बढ़ रहीं कीमतें, खाने-पीने की वस्तुओं पर असरप. एशिया आपूर्ति मार्गों में भारी रुकावट की वजह से आयात किए गए यूरिया की कीमत फरवरी में 508 डॉलर से बढ़कर 935 डॉलर प्रति टन हो गई है। इसी तरह, डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की कीमत पिछले साल के 680 डॉलर से बढ़कर 925 डॉलर प्रति टन होने की उम्मीद है। अमोनिया की कीमतें भी 435 डॉलर से बढ़कर 850–900 डॉलर प्रति टन हो गई हैं, जो दोगुनी से भी अधिक हैं। यूरिया आयात का लगभग 75% हिस्सा खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों से आता है। खाद के घरेलू उत्पादन को भी झटका लगा है। खाड़ी से एलएनजी की आपूर्ति में रुकावटों के कारण मार्च में यूरिया का उत्पादन 25 लाख टन की सामान्य मासिक दर के मुकाबले घटकर 15 लाख टन रह गया। जून में स्टॉक की पर्याप्त भरपाई नहीं हुई, तो खेती में इस्तेमाल चीजों की बढ़ी लागत का असर खाद्य वस्तुओं पर पड़ेगा। यूरिया आयात का 75% हिस्सा जीसीसी से आता हैघरेलू यूरिया प्लांट फीडस्टॉक के तौर पर एलएनजी पर निर्भर रहते हैं, जिसका 60% से अधिक हिस्सा कतर, यूएई व ओमान से होर्मुज जलडमरूमध्य

नया ग्रामीण रोजगार कानून 2026: गांवों में रोजगार की कानूनी गारंटी और नई व्यवस्था की पूरी डिटेल

नई दिल्ली । ग्रामीण रोजगार और विकास व्यवस्था को नए ढांचे में लाने के लिए सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम की जानकारी साझा की है। विकसित भारत–जी राम जी अधिनियम 2025 के नाम से तैयार यह नया कानून 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार को अधिक सुरक्षित, संगठित और पारदर्शी बनाना बताया जा रहा है। इस व्यवस्था के तहत ग्रामीण परिवारों को हर वर्ष 125 दिनों तक अकुशल कार्य का कानूनी अधिकार दिया जाएगा। यह बदलाव ग्रामीण मजदूरों को स्थिर आय और नियमित रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। साथ ही गांवों में सार्वजनिक संपत्तियों के निर्माण को भी इस योजना का अहम हिस्सा बनाया गया है। नई व्यवस्था पूरे देश में एक साथ लागू की जाएगी और सभी राज्यों को इसके अनुसार अपनी कार्ययोजना तैयार करनी होगी। पहले से चल रहे विकास कार्यों को भी इसी ढांचे के तहत जारी रखा जाएगा ताकि किसी भी स्तर पर काम बाधित न हो। रोजगार मांगने की प्रक्रिया को भी सरल रखा गया है। ग्रामीण परिवार ग्राम पंचायत के माध्यम से रोजगार की मांग कर सकेंगे और इसके बाद 15 दिनों के भीतर उन्हें काम उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। यदि तय समय में रोजगार नहीं मिलता है तो बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है, जिससे श्रमिकों को आर्थिक सहारा मिल सके। मजदूरी भुगतान को सीधे बैंक खातों में भेजने की व्यवस्था की गई है, जिससे पारदर्शिता बनी रहे। भुगतान में देरी होने पर अतिरिक्त मुआवजे का भी प्रावधान रखा गया है, ताकि श्रमिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। काम की उपस्थिति दर्ज करने के लिए आधुनिक डिजिटल प्रणाली का उपयोग किया जाएगा। कार्यस्थलों पर बुनियादी सुविधाओं जैसे पीने का पानी, छाया और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था भी अनिवार्य की गई है, ताकि श्रमिकों को सुरक्षित वातावरण मिल सके। कृषि कार्यों के व्यस्त समय में राज्यों को अस्थायी रूप से काम रोकने की अनुमति भी दी गई है। इस पूरे सिस्टम में ग्राम पंचायत से लेकर जिला स्तर तक जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है, जिससे योजना का क्रियान्वयन सुचारू रूप से हो सके। वित्तीय व्यवस्था में भी केंद्र और राज्यों के बीच तय अनुपात के अनुसार फंडिंग की जाएगी। कुल मिलाकर यह नया कानून ग्रामीण रोजगार प्रणाली को अधिक मजबूत, आधुनिक और प्रभावी बनाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जिससे गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ने और जीवन स्तर में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।

सेंसेक्स-निफ्टी धड़ाम: शेयर बाजार की बड़ी गिरावट से निवेशकों में घबराहट

नई दिल्ली।  घरेलू शेयर बाजार में मंगलवार को भारी उतार-चढ़ाव और बिकवाली का दबाव देखने को मिला। कारोबारी सप्ताह के दूसरे दिन बाजार खुलते ही निवेशकों में हड़कंप मच गया। बैंकिंग, आईटी और मेटल सेक्टर में तेज बिकवाली के कारण सेंसेक्स और निफ्टी दोनों बड़े नुकसान के साथ कारोबार करते नजर आए। शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स सैकड़ों अंक टूट गया, जबकि निफ्टी भी अहम स्तर के नीचे फिसल गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेत, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और आर्थिक अनिश्चितताओं का असर भारतीय बाजार पर साफ दिखाई दिया। मिडिल ईस्ट तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती अस्थिरता ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर किया। इसके चलते निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करना शुरू कर दिया। बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिला। कई दिग्गज बैंकिंग स्टॉक्स लाल निशान में कारोबार करते रहे। आईटी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई, जिससे टेक इंडेक्स पर असर पड़ा। मेटल और ऑटो सेक्टर में भी कमजोरी देखने को मिली। हालांकि कुछ एफएमसीजी शेयरों ने बाजार को संभालने की कोशिश की, लेकिन कुल मिलाकर बाजार का मूड नकारात्मक बना रहा। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में भी उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। निवेशकों को फिलहाल सतर्क रहकर निवेश करने की सलाह दी जा रही है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि लंबी अवधि के निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स को बाजार की चाल पर नजर बनाए रखनी चाहिए। इस गिरावट के चलते निवेशकों के करोड़ों रुपये डूब गए। छोटे निवेशकों में सबसे ज्यादा बेचैनी देखने को मिली। सोशल मीडिया पर भी बाजार की गिरावट को लेकर चर्चा तेज रही। कई निवेशकों ने इसे हाल के महीनों की बड़ी गिरावटों में से एक बताया।

Gold Buying Rules: क्या भारत में सोने की खरीद पर लगेगा बैन? समझिए पूरा मामला

नई दिल्ली। देश में सोने की खरीद पर बैन को लेकर चर्चा तेज हो गई है। जानिए क्या सरकार पूरी तरह गोल्ड बैन लगा सकती है, पहले लागू हो चुके Gold Control Act का इतिहास क्या है और किन परिस्थितियों में सोने के आयात व खरीद पर सख्ती बढ़ सकती है। सोने पर बैन की चर्चा क्यों तेज हुई?हाल ही में Narendra Modi की अपील के बाद देशभर में यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत में भविष्य में सोने की खरीद पर रोक लगाई जा सकती है। भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं बल्कि परंपरा, संस्कृति और भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। शादी-ब्याह, त्योहार और धार्मिक आयोजनों में सोने का विशेष महत्व माना जाता है। क्या सरकार सोने की खरीद पर पूरी तरह बैन लगा सकती हैतकनीकी रूप से सरकार के पास सोने के आयात, व्यापार और खरीद-बिक्री को नियंत्रित करने का अधिकार होता है। सरकार टैक्स, आयात शुल्क और नियमों के जरिए गोल्ड मार्केट को प्रभावित कर सकती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे देश में सोने पर पूरी तरह बैन लगाना बेहद कठिन होगा, क्योंकि यहां सोना सामाजिक और धार्मिक जीवन का अहम हिस्सा माना जाता है। पहले भी लागू हो चुका है Gold Control Acभारत में सोने को लेकर सख्त कानून पहले भी लागू किए जा चुके हैं। साल 1968 में लागू किए गए Gold Control Act के तहत लोगों के पास सोना रखने और व्यापार करने पर कई प्रतिबंध लगाए गए थे। उस समय सरकार ने सोने की खरीद और भंडारण को नियंत्रित करने की कोशिश की थी। बाद में आर्थिक उदारीकरण के दौर में 1990 में इस कानून को समाप्त कर दिया गया। सरकार पहले से लागू कर चुकी है कई सख्त नियपिछले कुछ वर्षों में सरकार ने सोने की खरीद और आयात पर कई नियम कड़े किए हैं, जिनमें शामिल हैं:- सोने के आयात पर भारी कस्टम ड्यूटीहॉलमार्किंग अनिवार्यबड़ी खरीदारी पर PAN कार्ड जरूरी2 लाख रुपये से अधिक कैश ट्रांजैक्शन पर रोकबड़ी खरीद पर आय के स्रोत की जांच इन नियमों का उद्देश्य टैक्स चोरी और काले धन पर नियंत्रण बताई जाती है। किन हालात में बढ़ सकती है सख्ती? भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में शामिल है। देश में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश सोना विदेशों से आता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। अगर भविष्य में:-विदेशी मुद्रा भंडार घटे,व्यापार घाटा बढ़े,आर्थिक संकट गहराए,या डॉलर भुगतान का दबाव बढ़े, तो सरकार सोने के आयात और खरीद पर और ज्यादा सख्ती कर सकती है। क्या पूरी तरह Gold Ban संभव हैआर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार पूरी तरह बैन लगाने की बजाय इन कदमों को प्राथमिकता दे सकती है: आयात शुल्क बढ़ानाबड़े लेन-देन पर निगरानीकैश खरीद पर और सख्तीनिवेश के वैकल्पिक साधनों को बढ़ावा देनालोगों को कम सोना खरीदने के लिए जागरूक करनाआम लोगों पर क्या होगा असर? अगर सरकार गोल्ड खरीद पर नियम और सख्त करती है तो इसका असर ज्वेलरी कारोबार, निवेशकों और आम ग्राहकों पर पड़ सकता है। सोने की कीमतें बढ़ सकती हैंखरीदारी महंगी हो सकती हैशादी और त्योहारों के बाजार प्रभावित हो सकते हैंज्वेलरी इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ सकता हैफिलहाल भारत में सोने की खरीद पर पूरी तरह बैन लगने की संभावना कम मानी जा रही है। लेकिन आर्थिक हालात और विदेशी मुद्रा दबाव को देखते हुए सरकार भविष्य में गोल्ड खरीद और आयात पर सख्ती जरूर बढ़ा सकती है।