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टाटा ट्रस्ट्स में बड़ा प्रशासनिक मोड़, नोएल टाटा ने दो वरिष्ठ ट्रस्टियों की पुनर्नियुक्ति पर जताई असहमति, संगठन में बढ़ी हलचल

नई दिल्ली । टाटा समूह के परोपकारी ढांचे में हाल ही में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संगठन की निर्णय प्रक्रिया और आंतरिक संतुलन पर ध्यान आकर्षित किया है। ट्रस्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव पर असहमति सामने आई है, जिसके बाद चर्चा का माहौल और तेज हो गया है। यह मामला टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट से जुड़ा हुआ है, जहां दो वरिष्ठ ट्रस्टियों की पुनर्नियुक्ति को लेकर अंतिम निर्णय सर्वसम्मति पर आधारित था। जानकारी के अनुसार, ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव पर असहमति जताई और इसके खिलाफ मतदान किया। चूंकि इस प्रक्रिया में सभी सदस्यों की सहमति आवश्यक थी, इसलिए एक मतभेद सामने आने के बाद यह पुनर्नियुक्ति आगे नहीं बढ़ सकी। इसके चलते यह संभावना बन गई है कि दोनों ट्रस्टी अपने मौजूदा कार्यकाल के बाद पद से अलग हो सकते हैं। यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ट्रस्ट के भीतर लंबे समय से निर्णय आम सहमति के आधार पर लिए जाते रहे हैं। ऐसे में किसी प्रमुख प्रस्ताव पर असहमति सामने आना संगठन के भीतर बदलते दृष्टिकोण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में संभावित बदलाव का संकेत माना जा रहा है। टाटा एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ट्रस्ट, टाटा समूह के परोपकारी ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो शिक्षा और सामाजिक विकास से जुड़ी कई पहलें संचालित करता है। इसमें छात्रवृत्ति, शैक्षणिक सहायता और समाज कल्याण से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं। हालांकि यह इकाई सीधे तौर पर व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ी नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव सामाजिक क्षेत्र में काफी व्यापक माना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक प्रशासनिक निर्णय के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे ट्रस्ट के भीतर चल रहे व्यापक बदलावों का हिस्सा माना जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, नेतृत्व संरचना और प्रतिनिधित्व जैसे कई अन्य मुद्दों पर भी विचार-विमर्श जारी है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में संगठनात्मक ढांचे में और बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इसके साथ ही यह भी चर्चा है कि कुछ अन्य नामों और नियुक्तियों पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है, जिससे ट्रस्ट के भीतर रणनीतिक स्तर पर नई दिशा तय होने की संभावना बनती है। पहले जहां कई निर्णय सहज सहमति से हो जाते थे, वहीं अब अलग-अलग मत सामने आने से प्रक्रिया अधिक जटिल होती दिखाई दे रही है। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम टाटा ट्रस्ट्स के भीतर निर्णय लेने की शैली और नेतृत्व संतुलन में एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करता है। नोएल टाटा का यह कदम संगठन के भीतर बढ़ती चर्चा और नए दृष्टिकोण का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले समय में और स्पष्ट रूप से देखने को मिल सकता है।

कच्चे तेल की तेजी और वैश्विक अनिश्चितता से शेयर बाजार में बिकवाली तेज, निफ्टी दबाव में

नई दिल्ली ।सोमवार का सत्र भारतीय शेयर बाजार के लिए बेहद निराशाजनक साबित हुआ, जहां शुरुआत से ही बिकवाली का दबाव देखने को मिला और दिनभर बाजार कमजोर दायरे में कारोबार करता रहा। सुबह के समय जैसे ही कारोबार की शुरुआत हुई, बाजार में तेज गिरावट दर्ज की गई और निवेशकों के बीच घबराहट का माहौल बन गया। निफ्टी ने महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर 24000 को टूटते हुए नीचे की ओर रुख किया, जो बाजार की धारणा के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। दिन की शुरुआत में ही भारी गैपडाउन ओपनिंग ने बाजार की दिशा तय कर दी थी। वैश्विक स्तर पर चल रहे तनाव, विशेष रूप से मध्य पूर्व में बढ़ती अनिश्चितता और बड़े देशों के बीच कूटनीतिक गतिरोध ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित किया है। इसी का असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने महंगाई और लागत बढ़ने की आशंका को मजबूत किया, जिससे निवेशकों ने जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई। कारोबार के दौरान निफ्टी लगातार दबाव में रहा और 23900 के स्तर से भी नीचे चला गया। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि बाजार में फिलहाल खरीदारी की ताकत कमजोर है और निवेशक सतर्क रुख अपना रहे हैं। तकनीकी रूप से 24000 का स्तर एक मजबूत सपोर्ट माना जा रहा था, लेकिन भारी बिकवाली के कारण यह स्तर टूट गया और अब बाजार की दिशा और अधिक संवेदनशील हो गई है। सेक्टोरल मोर्चे पर भी स्थिति कमजोर रही। बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट सेक्टर में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिली। इन क्षेत्रों में निवेशकों ने तेजी से मुनाफावसूली की, जिससे पूरे बाजार पर दबाव बढ़ गया। बड़े और मिडकैप शेयरों में भी समान रूप से कमजोरी देखने को मिली, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि गिरावट किसी एक सेक्टर तक सीमित नहीं है बल्कि व्यापक स्तर पर फैली हुई है। कुछ चुनिंदा कंपनियों में हल्की तेजी जरूर देखने को मिली, लेकिन वह बाजार की बड़ी गिरावट को संतुलित नहीं कर सकी। कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में तिमाही परिणामों के बाद दबाव बना रहा, जिससे निवेशकों की धारणा और अधिक सतर्क हो गई है। बाजार में अस्थिरता के बीच ट्रेडर्स ने सुरक्षित निवेश की ओर रुख किया, जिससे इक्विटी में बिकवाली का दबाव और बढ़ गया। कुल मिलाकर, वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत दे रही हैं कि जब तक वैश्विक तनाव में राहत नहीं मिलती और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। निफ्टी के लिए अब 23800 का स्तर अगला महत्वपूर्ण सपोर्ट माना जा रहा है, जबकि 24000 अब एक मजबूत प्रतिरोध के रूप में काम कर सकता है। बाजार फिलहाल अनिश्चितता के दौर में है और निवेशकों को आगे के रुझान पर नजर बनाए रखने की आवश्यकता है।

बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच टाइटन पर निवेशकों का भरोसा कायम, ब्रोकरेज ने बढ़ाया टारगेट

नई दिल्ली । सोने की कीमतें लगातार रिकॉर्ड स्तर के आसपास बनी हुई हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय ज्वैलरी बाजार की बड़ी कंपनियों की रफ्तार धीमी नहीं हुई है। खासकर Titan Company ने इस चुनौतीपूर्ण माहौल में भी ऐसा प्रदर्शन किया है जिसने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। हालिया तिमाही परिणामों के बाद कंपनी को लेकर निवेशकों की धारणा और मजबूत हुई है। कंपनी ने न केवल मुनाफे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है, बल्कि राजस्व में भी प्रभावशाली वृद्धि दिखाई है। यही कारण है कि इसके शेयर को लेकर बाजार में नई उम्मीदें पैदा हुई हैं। कंपनी का सबसे बड़ा मजबूत पक्ष इसका ज्वैलरी बिजनेस माना जा रहा है, जो लगातार नए ग्राहकों को आकर्षित कर रहा है। इसके अलावा कंपनी अब केवल पारंपरिक सोने और हीरे के आभूषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्टडेड ज्वैलरी, प्रीमियम कलेक्शन, डिजिटल ज्वैलरी और लैब-ग्रोथ डायमंड जैसे आधुनिक सेगमेंट में भी तेजी से विस्तार कर रही है। इस विविधता ने कंपनी की पकड़ को और मजबूत बना दिया है। साथ ही वॉच और अन्य उभरते कारोबार भी कंपनी की कुल ग्रोथ में अहम भूमिका निभा रहे हैं। बदलते उपभोक्ता रुझानों के बीच ब्रांडेड ज्वैलरी की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा फायदा टाइटन को मिल रहा है। हालांकि शेयर बाजार में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है और हाल ही में शेयर में गिरावट भी दर्ज की गई, लेकिन इसके बावजूद दीर्घकालिक दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि मजबूत ब्रांड वैल्यू और स्थिर बिजनेस मॉडल कंपनी को आने वाले वर्षों में और ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय ज्वैलरी सेक्टर में संगठित कंपनियों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है और टाइटन इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभर रहा है। शहरीकरण, बढ़ती आय और ब्रांडेड प्रोडक्ट्स के प्रति झुकाव ने इस सेक्टर को नई गति दी है।

क्रेडिट कार्ड से कैश निकालना क्यों है महंगा सौदा? जानिए पूरी डिटेल

नई दिल्ली । आज के समय में क्रेडिट कार्ड लोगों की वित्तीय जरूरतों का एक अहम हिस्सा बन चुका है। यह “अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें” की सुविधा देकर उपभोक्ताओं को राहत देता है, लेकिन इसी सुविधा के बीच एक ऐसा विकल्प भी मौजूद है जो कई बार आर्थिक रूप से भारी पड़ सकता है क्रेडिट कार्ड से कैश निकासी। विशेषज्ञों के अनुसार, क्रेडिट कार्ड से एटीएम के जरिए नकद निकालना सबसे महंगा वित्तीय निर्णयों में से एक हो सकता है। जहां कार्ड से सामान्य खरीदारी पर 45 से 50 दिनों का ब्याज-मुक्त समय मिलता है, वहीं कैश विड्रॉल पर यह सुविधा लागू नहीं होती। जैसे ही ग्राहक एटीएम से पैसे निकालता है, उसी दिन से ब्याज लगना शुरू हो जाता है, जो सालाना 36% से 48% तक पहुंच सकता है। इसके अलावा, हर बार नकद निकासी पर कैश एडवांस फीस भी देनी होती है, जो आमतौर पर निकाली गई राशि का 2.5% से 3% तक होती है। कई बैंकों में यह न्यूनतम 300 से 500 रुपये तक भी हो सकती है। ऐसे में छोटी रकम निकालना भी महंगा साबित हो जाता है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, लोग आपात स्थिति में क्रेडिट कार्ड से कैश निकालने की प्रवृत्ति दिखा रहे हैं, लेकिन यह आदत लंबे समय में आर्थिक दबाव बढ़ा सकती है। फरवरी 2026 में भी करोड़ों रुपये की नकद निकासी दर्ज की गई, जो इस सुविधा के बढ़ते उपयोग को दर्शाती है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि क्रेडिट कार्ड से कैश निकालना बैंक की नजर में वित्तीय संकट का संकेत माना जाता है। इससे व्यक्ति का क्रेडिट व्यवहार नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है और आगे चलकर CIBIL Score गिर सकता है, जिससे होम लोन, कार लोन या अन्य ऋण लेना कठिन हो सकता है। इसका सीधा असर व्यक्ति की आर्थिक विश्वसनीयता पर पड़ता है। जब बैंक यह देखते हैं कि कोई ग्राहक बार-बार क्रेडिट कार्ड से नकद निकाल रहा है, तो वे उसे उच्च जोखिम वाला उधारकर्ता मान सकते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि आपात स्थिति में क्रेडिट कार्ड कैश विड्रॉल की बजाय अन्य विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए। जैसे कि Emergency Fund का उपयोग, जो 3 से 6 महीने के खर्च के बराबर होना चाहिए। इसके अलावा Personal Loan भी एक बेहतर विकल्प माना जाता है क्योंकि इसकी ब्याज दर अपेक्षाकृत कम होती है। छोटे खर्चों के लिए “बाय नाउ पे लेटर” जैसी सुविधाएं भी उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन इनका भी जिम्मेदारी से उपयोग जरूरी है। कुल मिलाकर, क्रेडिट कार्ड से कैश निकालना सुविधा जरूर देता है, लेकिन इसके पीछे छिपी लागत और जोखिम इसे एक महंगा सौदा बना देते हैं। समझदारी इसी में है कि इस विकल्प का उपयोग केवल अत्यंत आपात स्थिति में ही किया जाए, ताकि वित्तीय स्थिरता बनी रहे और बजट पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

अर्बन कंपनी के नतीजों में भारी गिरावट: 161 करोड़ के घाटे ने जीवों को चौंकाया, बढ़ने के बावजूद बढ़ी चिंता

नई दिल्ली । घर-घर में ब्यूटी, मेंटेनेंस और प्रोफेशनल सर्विसेज उपलब्ध कराने वाली प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनी Urban Company ने मार्च 2026 तिमाही में जहां मजबूत रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज की, वहीं भारी घाटे ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। कंपनी के ताजा वित्तीय नतीजों के बाद शेयर बाजार में इसका सीधा असर देखने को मिला और इसके शेयरों में करीब 10 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट तब आई जब बाजार पहले से ही कंपनी के प्रदर्शन पर नजर बनाए हुए था, लेकिन बढ़ते नुकसान ने उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कंपनी के मुताबिक मार्च तिमाही में उसका कंसोलिडेटेड नेट लॉस बढ़कर 161 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में केवल 2.8 करोड़ रुपये था। यह बढ़ोतरी निवेशकों के लिए बड़ा झटका साबित हुई क्योंकि घाटा कई गुना बढ़ चुका है। इतना ही नहीं, पिछली तिमाही की तुलना में भी नुकसान में तेज उछाल देखा गया, जिससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या कंपनी का तेज विस्तार मॉडल लंबे समय में टिकाऊ साबित हो पाएगा या नहीं। हालांकि दूसरी ओर कंपनी के बिजनेस ग्रोथ के आंकड़े मजबूत दिखाई दे रहे हैं। मार्च तिमाही में ऑपरेशंस से रेवेन्यू 43 प्रतिशत बढ़कर 426 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 298 करोड़ रुपये था। यह वृद्धि दर्शाती है कि कंपनी का ग्राहक आधार लगातार बढ़ रहा है और सेवाओं की मांग मजबूत बनी हुई है। नेट ट्रांजैक्टिंग वैल्यू में भी 42 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की गई, जो 1,148 करोड़ रुपये तक पहुंच गई और पिछले कई तिमाहियों में सबसे उच्च स्तर पर रही। इसके बावजूद खर्चों में तेज बढ़ोतरी ने लाभ की राह को प्रभावित किया है। तकनीकी विस्तार, नए बाजारों में प्रवेश, मार्केटिंग और प्लेटफॉर्म डेवलपमेंट पर भारी निवेश के कारण लागत लगातार बढ़ती जा रही है। इसी वजह से कंपनी का एडजस्टेड EBITDA लॉस 98 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। हालांकि कंपनी ने यह भी बताया कि यदि InstaHelp बिजनेस को अलग रखा जाए तो एडजस्टेड EBITDA सकारात्मक क्षेत्र में दिखाई देता है, जो कुछ हद तक राहत की बात मानी जा सकती है। InstaHelp सेगमेंट ने इस तिमाही में तेज रफ्तार ग्रोथ दिखाई है, जहां ऑर्डर और रेवेन्यू दोनों में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं कंपनी का अंतरराष्ट्रीय कारोबार भी UAE और सिंगापुर जैसे बाजारों में मजबूत प्रदर्शन कर रहा है, जिससे भविष्य की संभावनाओं को बल मिलता है। पूरे वित्त वर्ष 2026 में भी कंपनी ने 31 प्रतिशत की NTV ग्रोथ और 36 प्रतिशत की रेवेन्यू वृद्धि दर्ज की है, जो यह संकेत देता है कि बिजनेस विस्तार जारी है। हालांकि बाजार की सबसे बड़ी चिंता अभी भी यही बनी हुई है कि क्या यह तेज ग्रोथ आने वाले समय में मुनाफे में बदल पाएगी या बढ़ते खर्च और घाटे के बीच निवेशकों का भरोसा और कमजोर होगा।

गिरते Smallcap बाजार में भी चमक रही हैं ये 15 मजबूत कंपनियां, VST, Medicare और UNO Minda में दिख रहा 38% तक का अपसाइड, निवेशकों के लिए बड़ा संकेत

नई दिल्ली । बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव का माहौल बना हुआ है और ऐसे समय में छोटे शेयरों यानी Smallcap सेगमेंट पर सबसे ज्यादा दबाव देखने को मिलता है। जब भी बाजार में गिरावट आती है, निवेशकों के बीच यह डर बढ़ जाता है कि छोटे शेयर कमजोर हो सकते हैं या उनका बिजनेस प्रभावित हो सकता है। लेकिन हर गिरता हुआ स्टॉक कमजोर कंपनी का संकेत नहीं होता। कई बार पूरा सेक्टर या बाजार का सेंटीमेंट दबाव में आ जाता है, जबकि कंपनी का असली बिजनेस और उसकी बुनियाद पहले जैसी मजबूत बनी रहती है। यही वजह है कि निवेशकों के लिए सिर्फ कीमत नहीं, बल्कि कंपनी की क्वालिटी और मैनेजमेंट को समझना ज्यादा जरूरी हो जाता है। वर्तमान स्थिति में कुछ Smallcap और Midcap कंपनियां ऐसी हैं जो गिरते बाजार के बावजूद अपने मजबूत प्रदर्शन और स्थिर मैनेजमेंट के कारण चर्चा में बनी हुई हैं। इनमें कई ऐसी कंपनियां शामिल हैं जिनका बिजनेस मॉडल मजबूत है और जिनके भविष्य में बेहतर प्रदर्शन की संभावना मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में मौजूदा दबाव का असर इन कंपनियों की लंबी अवधि की ग्रोथ पर नहीं पड़ता, बल्कि यह निवेश के नए अवसर भी पैदा कर सकता है। VST Industries, Rainbow Children’s Medicare और UNO Minda जैसी कंपनियों को बाजार में मजबूत स्थिति वाली कंपनियों के रूप में देखा जा रहा है। इन कंपनियों के बिजनेस मॉडल स्थिर हैं और इनके मैनेजमेंट को भी अनुभवी माना जाता है। इसी वजह से इन पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में इनमें करीब 38 प्रतिशत तक की तेजी देखने को मिल सकती है, हालांकि यह पूरी तरह बाजार की स्थिति और कंपनी के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। पिछले कुछ समय से बाजार लगातार उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। वैश्विक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसे कारणों ने निवेशकों की चिंता को और बढ़ा दिया है। इसका सीधा असर शेयर बाजार के छोटे और मध्यम वर्ग के शेयरों पर देखने को मिला है, जहां अक्सर तेज गिरावट दर्ज की जाती है। इसके बावजूद कुछ कंपनियां ऐसी हैं जो अपने मजबूत बिजनेस स्ट्रक्चर के कारण बाजार के दबाव को बेहतर तरीके से संभाल रही हैं। JSW Infra और APL Apollo Tubes जैसी कंपनियां भी इसी श्रेणी में आती हैं, जो अपने सेक्टर में मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। इन कंपनियों की खासियत यह है कि इनके पास लंबे समय का विजन और स्थिर मैनेजमेंट टीम मौजूद है, जो कठिन परिस्थितियों में भी बिजनेस को संभालने की क्षमता रखती है। निवेश विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में निवेशकों को केवल गिरते शेयर देखकर घबराना नहीं चाहिए, बल्कि कंपनी के फंडामेंटल्स को समझकर निर्णय लेना चाहिए। बाजार में अस्थिरता हमेशा अवसर भी लेकर आती है, और जो निवेशक सही कंपनियों की पहचान कर लेते हैं, उन्हें लंबे समय में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना रहती है। कुल मिलाकर, मौजूदा बाजार स्थिति यह संकेत देती है कि हर गिरता हुआ Smallcap कमजोर नहीं होता। कुछ कंपनियां ऐसी होती हैं जो गिरावट के बावजूद अपनी मजबूती बनाए रखती हैं और भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता रखती हैं। ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे सतर्कता के साथ सही कंपनियों का चयन करें और केवल डर के आधार पर निर्णय न लें।

SBI स्टॉक में लगातार दबाव, Q4 नतीजों के बाद 10% की गिरावट, ब्रोकरेज ने घटाए अनुमान और बढ़ाए रिस्क संकेत

नई दिल्ली । देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक के शेयरों में हाल के दिनों में तेज गिरावट देखने को मिली है। यह दबाव खास तौर पर कंपनी के तिमाही नतीजों के बाद बढ़ा है, जहां प्रदर्शन बाजार की उम्मीदों के अनुरूप नहीं माना गया। नतीजों के बाद निवेशकों की धारणा कमजोर हुई और इसका सीधा असर शेयर की कीमत पर दिखाई दिया। लगातार दो कारोबारी सत्रों में स्टॉक करीब दस प्रतिशत तक गिर चुका है, जिससे बाजार में इस बैंकिंग दिग्गज को लेकर चिंता का माहौल बन गया है। शेयर में आई इस गिरावट के बीच कई प्रमुख संस्थागत विश्लेषकों ने अपने अनुमान में बदलाव किया है। कुछ ने स्टॉक की रेटिंग को घटाते हुए इसे लेकर अधिक सतर्क रुख अपनाया है। उनका मानना है कि आने वाले समय में बैंक के रिटर्न प्रोफाइल पर दबाव देखा जा सकता है, खासकर तब जब क्रेडिट कॉस्ट में बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है। इसके अलावा, नए अकाउंटिंग नियमों के प्रभाव से भी बैंक के मुनाफे पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। एक प्रमुख वैश्विक विश्लेषण संस्था ने अपने पहले के सकारात्मक रुख को बदलते हुए अब इसे स्थिर दृष्टिकोण में रखा है। साथ ही शेयर के लिए तय किए गए मूल्य लक्ष्य को भी घटा दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा स्तरों पर वैल्यूएशन में बड़े सुधार की गुंजाइश सीमित दिख रही है। अनुमान यह भी लगाया गया है कि बैंक की संपत्ति पर रिटर्न भविष्य में कुछ दबाव में रह सकता है, जिससे निवेशकों की उम्मीदें थोड़ी कम हो सकती हैं। वहीं दूसरी ओर, कुछ अन्य विश्लेषक अभी भी इस स्टॉक को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए हुए हैं। उनका मानना है कि बैंक की मजबूत लोन ग्रोथ आगे चलकर स्थिति को संतुलित कर सकती है। हालांकि, वे यह भी स्वीकार करते हैं कि निकट भविष्य में मार्जिन और क्रेडिट कॉस्ट जैसे कारक चुनौती पेश कर सकते हैं। उनके अनुसार, बैंक की एसेट क्वालिटी फिलहाल स्थिर बनी हुई है, जो एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो ताजा नतीजों के बाद इस बैंकिंग शेयर में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। एक तरफ जहां कुछ विशेषज्ञ आगे दबाव की आशंका जता रहे हैं, वहीं कुछ इसे लंबी अवधि के नजरिए से स्थिर निवेश मान रहे हैं। फिलहाल बाजार की नजर आने वाले तिमाही प्रदर्शन और आर्थिक संकेतकों पर टिकी हुई है, जो इस स्टॉक की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

सप्ताह में 4 दिन काम…. 3 दिन आराम का रास्ता साफ… सरकार ने नोटिफाई किया नया लेबर कोड

नई दिल्ली। सरकार (Government) ने चारों लेबर कोड (All four Labor Codes) के तहत नियमों को नोटिफाई कर दिया है। इन नए नियमों से कुछ चुनिंदा सेक्टरों में सप्ताह में चार दिन काम और 3 दिन की छुट्टी लागू करने का रास्ता साफ हो गया है। नए केंद्रीय कोड ऑन वेज के अनुसार, किसी भी कर्मचारी के लिए साप्ताहिक काम के घंटे 48 घंटे से अधिक नहीं होंगे। यानी अब कंपनी और कर्मचारी चाहें तो इन 48 घंटों को केवल 4 दिनों में बांट सकते हैं यानी प्रतिदिन 12 घंटे काम करके। बदले में उन्हें 3 दिन की छुट्टी यानी सप्ताह में तीन रेस्ट डे मिल सकती है। हालांकि, यह सुविधा सभी के लिए समान नहीं है। दिहाड़ी मजदूरों के लिए एक सामान्य कार्य दिवस 8 घंटे का ही रहेगा, इससे अधिक काम पर ओवरटाइम मिलेगा। साथ ही, ओवरटाइम की दर अब सामान्य दर की दोगुनी कर दी गई है। नए श्रम कानून कर्मचारियों को अधिक लचीलापन और बेहतर सामाजिक सुरक्षा देने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। हालांकि यह चार-दिवसीय कार्य सप्ताह अभी शुरुआती चरण में है और केवल चुनिंदा सेक्टरों में ही संभव है, फिर भी यह भारत में कामकाज के भविष्य का एक नया मॉडल पेश करता है। किन क्षेत्रों में 4 डे वर्क वीक की संभावना?बिजनेस स्टैंडर्ड की खबरे के अनुसार, जिन क्षेत्रों में शिफ्ट-बेस्ड या प्रोजेक्ट-ड्रिवन काम होता है, वहां इसे आसानी से लागू किया जा सकता है। जैसे, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, IT और शेयर्ड सर्विसेज। हालांकि, जिन सेक्टरों में ग्राहकों की तत्काल जरूरतें और रियल-टाइम डिलीवरी की उम्मीद होती है, जैसे कुछ बैंकिंग, रिटेल या कस्टमर सपोर्ट, उनके लिए यह व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अंतिम नियमों में बड़े बदलावगौरतलब है कि सरकार ने शुक्रवार (10 मई, 2026) को सभी चार लेबर कोड के अंतिम नियम जारी किए। इनमें शामिल हैं। इनमें इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 2020, कोड ऑन वेज 2019, सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 और ऑक्यूपेशन सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड 2020 शामिल हैं। संसद द्वारा ये कानून पारित किए लगभग 6 साल बाद, 30 से अधिक गजेट नोटिफिकेशन के जरिए इन नियमों को अंतिम रूप दिया गया। दिसंबर 2025 में जो ड्राफ्ट जारी किया गया था, उसमें न्यूनतम वेतन तय करने के लिए कैलोरी इनटेक, कपड़े, किराया, ईंधन खर्च आदि के मानदंड थे। लेकिन अंतिम नियमों में इन्हें हटा दिया गया है। अब सरकार बाद में अलग से आदेश जारी करेगी। कर्मचारियों पर क्या क्या होगा असर?कंपनी या संस्थान को अनिवार्य नियुक्ति पत्र हर कर्मचारी को देना होगा। ओवरटाइम भुगतान के स्पष्ट प्रावधान होगा। वर्कर रिस्किलिंग फंड में योगदान करना होगा। एक साल की सेवा के बाद ग्रेच्युटी देनी होगी। इस नए कोड में आश्रित माता-पिता के लिए मासिक आय सीमा ₹9,000 से बढ़ाकर ₹14,000 कर दी गई है। कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियांकंपनियों को अब ओवरटाइम भुगतान और रिस्किलिंग योगदान के कारण लागत में बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, उन्हें एचआर प्रथाओं को औपचारिक रूप देना होगा, काम के घंटे ट्रैक करने होंगे और अनिवार्य स्वास्थ्य लाभ देने होंगे।

कम बजट में SUV खरीदने का सपना होगा पूरा, Kia Syros पर मिल रहा शानदार डिस्काउंट और प्रीमियम फीचर्स का फायदा

नई दिल्ली । एक व्यक्ति लंबे समय से अपनी जरूरतों और बजट के अनुसार एक नई SUV खरीदने की योजना बना रहा था। उसका लक्ष्य था कि उसे एक ऐसा वाहन मिले जो दिखने में स्टाइलिश हो, फीचर्स में आधुनिक हो और कीमत के मामले में भी उसकी पहुंच में हो। लेकिन बाजार में उपलब्ध कई विकल्पों को देखने के बाद भी वह किसी एक मॉडल पर निर्णय नहीं ले पा रहा था। कुछ समय बाद उसे एक ऐसी SUV के बारे में जानकारी मिली जो खास तौर पर बजट और फीचर्स के संतुलन के लिए जानी जाती है। यह SUV उन लोगों के लिए बेहतर विकल्प मानी जा रही है जो कम कीमत में प्रीमियम अनुभव चाहते हैं। इसकी शुरुआती कीमत लगभग 8.40 लाख रुपये के आसपास है, जिससे यह 10 लाख रुपये के बजट में आने वाले खरीदारों के लिए काफी उपयुक्त बन जाती है। दिलचस्प बात यह है कि इस समय इस SUV पर एक विशेष ऑफर भी दिया जा रहा है, जिसने इसे और भी आकर्षक बना दिया है। इस ऑफर के तहत ग्राहकों को कुल मिलाकर लगभग 50,000 रुपये तक का लाभ मिल सकता है। इसमें अलग-अलग प्रकार की छूट शामिल है, जिससे खरीदारी का कुल खर्च कम हो जाता है और ग्राहकों को अतिरिक्त बचत का फायदा मिलता है। यह SUV कई वेरिएंट में उपलब्ध है, जिससे ग्राहक अपनी जरूरत और बजट के अनुसार सही मॉडल चुन सकते हैं। बेस वेरिएंट उन लोगों के लिए बेहतर विकल्प है जो सीमित बजट में एक भरोसेमंद SUV चाहते हैं, जबकि उच्च वेरिएंट में अधिक फीचर्स और प्रीमियम सुविधाएं मिलती हैं। इस वाहन में पेट्रोल और डीजल दोनों प्रकार के इंजन विकल्प दिए गए हैं। पेट्रोल इंजन बेहतर ड्राइविंग अनुभव और स्मूद परफॉर्मेंस प्रदान करता है, जबकि डीजल इंजन अधिक टॉर्क और लंबी दूरी के लिए बेहतर माइलेज देने में सक्षम है। इसके साथ ही इसमें अलग-अलग ट्रांसमिशन विकल्प भी मौजूद हैं, जिससे ड्राइविंग और भी आसान और आरामदायक बन जाती है। फीचर्स के मामले में यह SUV आधुनिक तकनीक से लैस है। इसमें बड़ा डिजिटल डिस्प्ले, पैनोरमिक सनरूफ, वेंटिलेटेड सीट्स और कई स्मार्ट कनेक्टेड फीचर्स शामिल हैं। इसके अलावा इसका डिजाइन भी काफी आकर्षक और प्रीमियम फील देता है, जो इसे अपने सेगमेंट में एक अलग पहचान दिलाता है।

छोटी-छोटी वित्तीय गलतियां कैसे बिगाड़ सकती हैं आपकी आर्थिक सेहत, जानें सही निवेश और बचत की जरूरी रणनीति

नई दिल्ली । एक सामान्य नौकरीपेशा व्यक्ति हर महीने अपनी कमाई से संतुष्ट महसूस करता था। उसकी आमदनी समय के साथ बढ़ रही थी और उसे लगता था कि वह आर्थिक रूप से सुरक्षित दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि बचत उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी उम्मीद थी। खर्च लगातार बढ़ रहे थे और महीने के अंत में बचत लगभग वही रहती थी या कभी-कभी कम भी हो जाती थी। शुरुआत में उसने इसे सामान्य माना, लेकिन समय के साथ स्थिति बदलने लगी। महंगाई ने धीरे-धीरे उसके रोजमर्रा के खर्चों को प्रभावित करना शुरू कर दिया। किराना, यात्रा, इलाज और अन्य आवश्यक चीजों की कीमतें बढ़ती रहीं, लेकिन उसकी बचत उसी गति से नहीं बढ़ पाई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कमाई बढ़ने के बावजूद आर्थिक दबाव क्यों महसूस हो रहा है। कुछ समय बाद उसने ध्यान दिया कि उसका अधिकांश पैसा बैंक खाते में ही पड़ा रहता था। उसे यह तरीका सुरक्षित लगता था, इसलिए वह निवेश करने से बचता था। लेकिन इसी आदत ने उसकी असली समस्या पैदा की थी। पैसा सुरक्षित तो था, लेकिन उसकी वृद्धि नहीं हो रही थी। धीरे-धीरे उसकी क्रय शक्ति कम होती जा रही थी, जिसका असर उसके भविष्य की योजनाओं पर पड़ने लगा। फिर उसने एक और आदत पर गौर किया। जब भी बाजार में किसी तरह की गिरावट या अनिश्चितता की खबर आती, तो वह घबरा जाता और अपने छोटे निवेश भी निकाल लेता। बाद में उसे समझ आया कि यह भावनात्मक निर्णय था, जिसने उसे लंबे समय में नुकसान पहुंचाया। निवेश में स्थिरता और धैर्य की कमी ने उसकी आर्थिक वृद्धि को बाधित कर दिया था। समय के साथ एक और बदलाव सामने आया। जैसे-जैसे उसकी आय बढ़ी, वैसे-वैसे उसके खर्च भी बढ़ने लगे। वह पहले से अधिक आरामदायक जीवन जीने लगा, लेकिन अनजाने में उसकी बचत की क्षमता कम होती गई। उसे लगा कि वह बेहतर जीवन जी रहा है, लेकिन असल में उसकी वित्तीय नींव कमजोर हो रही थी। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि सिर्फ कमाई बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती पैसे को सही तरीके से संभालने में है। बिना योजना के खर्च, भावनात्मक निवेश निर्णय और केवल बचत पर निर्भर रहना उसकी सबसे बड़ी गलतियां थीं। उसने अपनी आदतें बदलनी शुरू कीं। खर्चों पर नियंत्रण लाया, निवेश को लंबे समय के नजरिए से समझा और छोटी अवधि के लाभ के बजाय स्थिर वृद्धि पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी और उसे समझ आया कि वित्तीय सफलता किसी एक बड़े फैसले से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी सही आदतों से बनती है।