जन-जन को मिले जलाधिकार

– डॉ.वेदप्रकाशकुछ लोग जल का व्यापार करें और कुछ लोग बूंद बूंद को तरसें। क्या यह जन-जन के जलाधिकार का हनन नहीं है? शासन- प्रशासन मौन क्यों है? क्या हम नहीं जानते कि जल जीवन तत्व है,अमृत है और प्रत्येक जीवधारी के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया उपहार है। जल के बिना न तो जीवन संभव है और न ही प्रकृति-संस्कृति की संकल्पना साकार हो सकती है। पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत जल होने पर भी पेयजल लगभग 03 प्रतिशत ही है। आज जब जनसंख्या की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। नदी, कुएं ,तालाब, बावड़ियां, झरनें और भूजल निरंतर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। तब क्या हमें जल के संरक्षण- संवर्धन और सदुपयोग पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए? ध्यातव्य है कि विगत दिनों इंदौर सहित देश में कई स्थानों पर प्रदूषित पानी पीने से कई लोग असमय मृत्यु के शिकार हो गए। यदि उन्हें स्वच्छ जल का अधिकार मिला होता तो आज वे जीवित होते। भारत की त्यागपूर्वक भोग की संस्कृति ने सर्वे भवंतु सुखिन: के माध्यम से सबके सुख की कामना की है। कुएं, हैंडपंप, झरने और बावड़ियों से उतना ही जल लिया जाता था, जितनी आवश्यकता होती थी। सभी की चिंता करते हुए सभी को पर्याप्त और स्वच्छ जल की उपलब्धता हेतु धनी लोग जगह-जगह कुंए और प्याऊ बनवाते थे। पानी खरीदने और बेचने का विचार ही नहीं था। आज भारत में मानक व अमानक, वैध एवं अवैध से परे सैकड़ों नामों से पैकेज्ड पानी बिक रहा है। पैकेज्ड पानी का व्यापार करने वाली 10 शीर्ष कंपनियों में बिसलेरी, किनले,एक्वाफिना, रेल नीर, टाटा वाटर प्लस, ऑक्सीरिच, किंगफिशर, हिमालयन, बेले एवं नेस्ले प्रमुख हैं। इन कंपनियों का वार्षिक व्यापार लगभग 20 हजार करोड़ रुपए है जिसमें 32 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ बिसलेरी सबसे ऊपर है। बाजार में एक लीटर पानी की कीमत लगभग 20 रुपये है। एक स्वस्थ व्यक्ति को दिन में लगभग 3 लीटर पानी पीना चाहिए, यानी एक व्यक्ति दिन में लगभग 60-70 रुपये का पानी पीता है। परिवार के हिसाब से यह खर्च लगभग 300-400 रुपये प्रति परिवार हो जाता है। क्या यह परिवार की आर्थिकी को प्रभावित नहीं करता? क्या किसी गरीब व्यक्ति के लिए खरीद कर पानी पीना संभव है? जानकारी के अनुसार भारत में पैकेज्ड पानी का चलन 1960 के दशक में शुरू हुआ। कुएं, तालाब, बावड़ी और प्याऊ आदि पर उपलब्ध जल में सभी का अधिकार होता था लेकिन धीरे-धीरे औद्योगीकरण एवं भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषणों से ये जल स्रोत प्रदूषित होने लगे। प्याऊ खत्म कर दी गई और विज्ञापनों के माध्यम से बोतल बंद पानी पीने वालों को ही स्वस्थ और सभ्य दिखाया जाने लगा। प्रश्न यह है कि जब जल पर मानव सहित सभी जीवधारियों का अधिकार है तो उसे भूगर्भ से निकालकर, नदी- झरनों से लेकर व्यावसायिक प्रयोग के लिए कुछ कंपनियां अथवा लोग कैसे दोहन कर सकते हैं? देश के अनेक हिस्सों में अवैध रूप से नदियों, झरनों और भूगर्भ से जल निकालकर खुलेआम बेचा जा रहा है। नदियां और झरनें सूख रहे हैं। उनके बहाव क्षेत्र में रहने वाले लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ये लोग आवश्यकता के लिए पानी खरीदने को मजबूर हैं। क्या यह इन लोगों के जलाधिकार का हनन नहीं है? क्या व्यवसाय के लिए दोहन कर रहे लोग इस जल के बदले किसी को कोई कीमत दे रहे हैं? देश के कई हिस्सों में और विशेष रूप से महानगरों व पर्वतीय क्षेत्रों में शासन- प्रशासन की मिलीभगत से जल माफिया पनप रहे हैं। नहर, बांध एवं पाइपलाइन से स्थानांतरित किए जाने वाले जल का बड़ा हिस्सा लीकेज के कारण बर्बाद होता है। विभिन्न स्थानों पर घरों में सप्लाई हेतु बिछाई गई पाइपलाइन जर्जर हैं। कई स्थानों पर उन्हें अवैध रूप से तोड़कर पानी लिया जाता है और बाकी व्यर्थ बहता रहता है। इसकी निगरानी हेतु कोई व्यवस्था भी दिखाई नहीं देती। क्या यह जिन्हें जल नहीं मिल पा रहा है और पानी के लिए सरकार को पैसा भी दे रहे हैं उनके जलाधिकार का हनन नहीं है? 23 मार्च 2026 को छपा एक समाचार बताता है कि भूजल के अवैध दोहन के कारण राष्ट्रीय राजधानी डे जीरो की तरफ बढ़ रही है, अर्थात् राजधानी में वर्षा जल संचयन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। न ही उपचारित पानी के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है और न ही पानी की बर्बादी रुक रही है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का अवैध दोहन हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार राजधानी में लगभग 1250 मिलियन गैलन पानी की प्रतिदिन आवश्यकता है। इसकी तुलना में केवल 1000 मिलियन गैलन पानी ही उपलब्ध है। जितना उपलब्ध है उसमें से भी लगभग आधा चोरी या रिसाव के कारण बर्बाद हो जाता है जबकि समय-समय पर पाइप लाइन की मरम्मत एवं रखरखाव के लिए करोड़ों रुपया आवंटित किया जाता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व के कई शहर डे जीरो की स्थिति में पहुंच सकते हैं। जिसमें भारत के दिल्ली, जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद व बेंगलूर जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। चिंताजनक यह भी है कि राष्ट्रीय राजधानी जैसे स्थान पर वर्षा जल संचयन की विभिन्न योजनाएं होने पर भी उचित व्यवस्था न होने के कारण प्रतिवर्ष वर्षा जल का लगभग 85 प्रतिशत नालों में बेकार बह जाता है। क्या इस प्रकार की स्थिति जन-जन के जलाधिकार हेतु एक बड़ी समस्या नहीं है? नदियां सिंचाई पेयजल एवं औद्योगिक आपूर्ति की एक बड़ी स्रोत हैं। देश की छोटी बड़ी कई नदियां भयानक रूप से प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। कई नदियों में अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट एवं सीवेज खुलेआम बहाया जा रहा है। कई नदियों पर बांध बना दिए गए हैं, जिससे नदी को उसके जीवन के लिए बहाव हेतु जल ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में नदी का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। नदियां दम तोड़ रही हैं। इन नदियों के आसपास रहने वाले लोग विस्थापन को मजबूर हैं। नदियों को जोड़ने से सभी को पेयजल की सुनिश्चितता संभव है। चिंताजनक है कि विगत दिनों जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में नदी जोड़ो परियोजना के
सिविल सेवा : देश की प्रशासनिक व्यवस्था की “रीढ़”

– प्रदीप कुमार वर्मा भारतीय संवैधानिक प्रावधानों में तीसरी स्तंभ कहे जाने वाले कार्यपालिका के तहत सिविल सर्विस वह सेवा है, जो देश की सरकार के सार्वजनिक प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। भारत में सिविल सेवा में भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा ,भारतीय विदेश सेवा और अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवा समूह शामिल हैं। हमारे देश में भारतीय सिविल सेवक न केवल नीतियों के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होते हैं, बल्कि वे नीतियों को आकार देने, निर्णय लेने और स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी जिम्मेदारियों में प्रशासनिक संचालन,विकास योजनाओं का क्रियान्वयन,कानून व्यवस्था बनाए रखने,प्राकृतिक आपदाओं से निपटने तथा नागरिक सेवाओं की डिलीवरी सुनिश्चित करना शामिल है। देश की विभिन्न सार्वजनिक सेवा विभागों में लगे सिविल सेवा के इन्ही अधिकारियों के काम को “स्वीकार” करने के लिए हर साल 21 अप्रैल को राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिविल सेवकों के लिए देश की प्रशासनिक मशीनरी को सामूहिक रूप से और नागरिकों की सेवा के प्रति “समर्पण” के साथ चलाने की भी याद दिलाता है। सिविल सेवा शब्द सबसे पहले ब्रिटिश काल में आया था, जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नागरिक कर्मचारी प्रशासनिक नौकरियों में शामिल थे। तब उन्हें “लोक सेवक” के रूप में जाना जाता था। इस व्यवस्था की नींव ब्रिटश अधिकारी वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा रखी गई। लेकिन बाद में चार्ल्स कॉर्नवॉलिस द्वारा और अधिक सुधार किए गए, इसलिए उन्हें “भारत में नागरिक सेवाओं के “पिता” के रूप में जाना जाता है। तत्कालीन भारतीय इतिहास में सिविल सेवा की शुरुआत मूल रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा वाणिज्यिक कार्यों को संभालने के लिए की गई थी। कंपनी का उद्देश्य व्यापारिक हितों की रक्षा करना था, लेकिन धीरे-धीरे यह सेवा प्रशासनिक मशीनरी के रूप में भी विकसित हुई। कालांतर में जैसे-जैसे कंपनी के क्षेत्रीय प्रभाव में विस्तार हुआ, वैसे-वैसे सिविल सेवकों की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ीं और प्रशासनिक कामकाज के संचालन के लिए उन्हें तैयार किया गया। धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में “प्रशासन” का उल्लेख मनुस्मृति और कौटिल्य के अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों में राजधर्म, प्रशासनिक ढांचे, अधिकारियों की नियुक्ति और उनके कर्तव्यों के रूप में मिलता है। तब शासन में न्याय, कर-संग्रह, जनकल्याण, और दंड नीति पर विशेष बल दिया गया था। हमारे प्राचीन महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में राजधर्म, दंडनीति और राज्य व्यवस्था के उच्च आदर्शों का भी उल्लेख मिलता है। यही नहीं भारतीय सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में प्रशासनिक संचालन के लिए राजुक एवं महामात्र आदि अधिकारियों की नियुक्ति की थी। यह अधिकारी न्याय, कर संग्रह, जन-कल्याण और राज्य की निगरानी जैसे कार्य करते थे। प्राचीन शिलालेखों में “धम्म नीति” का उल्लेख मिलता है, जो शासन में नैतिकता और लोकहित को प्रमुखता देता है। वहीं,गुप्त काल की प्रशासनिक व्यवस्था में विकेन्द्रीकरण की प्रवृत्ति देखी गई। प्रशासनिक पदों में उपरिक, विषयपति, नगरपति, और ग्रामिक जैसे पदाधिकारी नियुक्त होते थे।स्थानीय प्रशासन को अधिक अधिकार प्राप्त थे, जिससे शासन सुगठित रूप से चलता था। मध्यकालीन भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में दक्षिण भारत के साम्राज्य चोल, चेर, पाण्ड्य और विजयनगर साम्राज्य में संगठित प्रशासनिक तंत्र था। प्राचीन भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के इतिहास में चोलों के काल में स्थानीय स्वशासन प्रणाली अत्यंत विकसित थी। तब ग्राम सभाएं सक्रिय रूप से कर संग्रह, न्याय और विकास कार्यों में लगी रहती थीं। आज की प्रशासनिक व्यवस्था में काल की प्रशासनिक व्यवस्था परिलक्षित होती है। इसी प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक संगठित प्रशासनिक ढांचा स्थापित किया जिसे “अष्टप्रधान मंडल” कहा जाता था, जिसमें आठ मंत्री विभिन्न विभागों का संचालन करते थे।इनमें पेशवा, अमात्य, सुमंत, सचिव, पंडितराव, सेनापति, नायक एवं न्यायाधीश शामिल थे। उस काल में भी आज की ही तरह “गांव” प्रशासन की सबसे छोटी इकाई होती थी, जिसका संचालन ग्रामसभा करती थी। इसके बाद में तब के मुगल शासन में प्रशासनिक ढांचे को व्यवस्थित किया गया। जिसमे न्यायपालिका, पुलिस और राजस्व प्रशासन को अलग-अलग विभागों में बांटा गया। राजस्व नीति में टोडरमल की व्यवस्था को ऐतिहासिक माना जाता है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद देश के सिविल सेवकों के पहले बैच को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संबोधित किया था। देश के सिविल सेवकों को समर्पित इस प्रेरक भाषण में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें भारत का स्टील फ्रेम कहा था। सरदार पटेल ने उस ऐतिहासिक भाषण में सिविल सेवकों से आग्रह किया था कि वे राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर निष्पक्षता, निष्ठा और पारदर्शिता के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने घोषणा की कि देश के लिए सिविल सेवकों के योगदान का सम्मान करने के लिए हर साल राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया जाएगा. 21 अप्रैल 2006 को विज्ञान भवन में पहला राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस मनाया गया। तब से, यह दिन हर साल एक ही दिन मनाया जाता है। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान निर्माताओं ने सिविल सेवा को एक गैर-राजनीतिक, निष्पक्ष और सक्षम संस्था के रूप में बनाए रखने का निर्णय लिया।भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, और भारतीय विदेश सेवा जैसी अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना की गई। राजनीतिक विश्लेषण भारत में युवाओं का सिविल सेवा की ओर रुझान लगातार बढ़ रहा है। भारत में सिविल सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी में पिछले एक दशक में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। भारतीय सिविल सेवा में सफलता के झंडे गाड़ने वाली दो बहनों टीना डाबी और रिया डाबी के नाम से आज कौन परिचित नहीं है। वहीं,देश की पहली महिला आईपीएस किरण बेदी आज भी इन युवा महिलाओं के लिए प्रेरणा की स्रोत है। अप्रैल 2026 की रिपोर्टों के अनुसार सिविल सेवा में महिलाओं की हिस्सेदारी अब 31 प्रतिशत से अधिक हो गई है और कुल सफल उम्मीदवारों के एक तिहाई की ओर लगातार बढ़ रही है। लगभग एक दशक पहले सफल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत थी। यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है। सिविल सेवाओं में युवाओं की बढ़ती संख्या और इस बढ़ते आकर्षण के पीछे प्रतिष्ठा, सुरक्षा, और समाज सेवा जैसे कई महत्वपूर्ण कारक हैं। आज के डिजिटल युग में सिविल सेवकों की भूमिका और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। उन्हें ‘ई-गवर्नेंस’, ‘समावेशी विकास’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे लक्ष्यों को जमीनी
वात्सल्य पीठ: करुणा, साधना और आत्मोन्नति का दिव्य तीर्थ

-ललित गर्ग दिल्ली जैसे महानगर की आपाधापी भागदौड़ और संवेदनहीनता के बीच यदि कोई ऐसा स्थान निर्मित हो जहाँ पहुंचते ही मन शांत हो जाए आत्मा को विश्राम मिले और जीवन को एक नई दिशा का बोध हो तो निश्चय ही वह स्थान साधारण नहीं बल्कि दिव्यता का स्पंदित केन्द्र होता है। वात्सल्य पीठ ऐसा ही एक अनुपम आध्यात्मिक तीर्थ बनकर उभरा है जो शासनमाता साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी की स्मृतियों को संजोए हुए न केवल तेरापंथ धर्मसंघ के अनुयायियों के लिए बल्कि समस्त मानवता के लिए शांति साधना और आत्मिक उन्नति का केन्द्र बनने जा रहा है। 19 अप्रैल 2026 को इसके उद्घाटन का पावन अवसर केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक युगीन चेतना के जागरण एवं आध्यात्मिक अनुभवों का प्रतीक है। यह वही पावन भूमि है जहाँ साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी ने अपने तप त्याग और आत्म-साधना के अनेक अमूल्य क्षण व्यतीत किए एवं यह वही सिद्ध भूमि है जहां उन्होंने देह से विदेह होने की यानी निर्वाण यात्रा की है और इसी भूमि पर उनका दाह-संस्कार हुआ। आज वही भूमि वात्सल्य पीठ के रूप में एक ऐसे जीवंत तीर्थ में परिवर्तित हो चुकी है जहाँ हर कण में वात्सल्य की मधुरता और साधना की गंभीरता अनुभव की जा सकती है। यहाँ का वातावरण मानो स्वयं बोलता है यहाँ शांति केवल शब्द नहीं बल्कि अनुभूति है यहाँ अध्यात्म केवल विचार नहीं बल्कि जीवन का साक्षात् स्पर्श है। इस स्थल पर पहुंचकर ऐसा लगता है कि जीवन की समस्त अशांति व्याकुलता और तनाव धीरे-धीरे विलीन हो रहे हैं और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर लौट रही है। वात्सल्य पीठ की संरचना और सज्जा भी अपने आप में अत्यंत अद्वितीय और आकर्षक है। इसकी वास्तुकला में आधुनिकता और आध्यात्मिकता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। खुले आकाश की ओर उन्मुख इसकी रचना प्राकृतिक प्रकाश के लिए बनाए गए स्काईलाइट्स स्वच्छ वायु के संचार के लिए संतुलित वेंटिलेशन और सादगी में निहित गरिमामयी भव्यता-ये सभी तत्व इसे एक सजीव ध्यान-स्थली का रूप प्रदान करते हैं। यहाँ की प्रत्येक दीवार प्रत्येक मार्ग और प्रत्येक कोना जैसे एक मौन संदेश देता है कि जीवन का उद्देश्य बाहरी चकाचौंध में नहीं बल्कि आंतरिक प्रकाश की खोज में है। तमसो मा ज्योतिर्गमय का शाश्वत मंत्र यहाँ की संरचना में साकार रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसकी सज्जा कृत्रिम आडंबर से दूर सहज और सात्विक है जो साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा के व्यक्तित्व की ही तरह निर्मल शांत और प्रभावशाली प्रतीत होती है। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा का व्यक्तित्व अपने आप में एक विलक्षण प्रेरणा है। वे केवल एक साध्वी नहीं थीं बल्कि वात्सल्य की मूर्ति ज्ञान की गंगा और सृजन की सजीव सरस्वती थीं। अल्पायु में ही आचार्य तुलसी के सान्निध्य में दीक्षित होकर उन्होंने अपने जीवन को साधना सेवा और सृजन के लिए समर्पित कर दिया। मात्र 17 वर्ष की आयु में उन्होंने जिस आध्यात्मिक पथ का वरण किया वह आगे चलकर एक विराट साध्वी संघ के संचालन और मार्गदर्शन तक पहुँचा। लगभग सात सौ से अधिक साध्वियों के विशाल परिवार का नेतृत्व करना अपने आप में एक अद्भुत उपलब्धि है और यह तब और भी विशिष्ट हो जाता है जब उसमें अनुशासन के साथ-साथ वात्सल्य और संवेदना का संतुलन भी बना रहे। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि नारी केवल करुणा और ममता की प्रतीक नहीं बल्कि संगठन नेतृत्व और सृजन की भी अद्वितीय शक्ति है। उनका जीवन एक दीपशिखा की भांति था जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश प्रदान करती रही। उनकी वाणी में ओज विचारों में गहराई और आचरण में ऐसी पवित्रता थी जो हर व्यक्ति को प्रभावित और प्रेरित करती थी। वे केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहीं बल्कि साहित्य शिक्षा और सामाजिक चेतना के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने अनेक साहित्यिक कृतियों की रचना और संपादन किया तथा आचार्य तुलसी की आत्मकथा मेरा जीवन मेरा दर्शन के संपादन में भी अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय दिया। उनकी लेखनी में संवेदनशीलता अभिव्यक्ति में माधुर्य और चिंतन में गहराई का अद्भुत समन्वय था। वे एक सफल साध्वी कुशल प्रशासक प्रभावशाली वक्ता और संवेदनशील कवयित्री के रूप में जानी जाती थीं। वात्सल्य पीठ का निर्माण केवल एक स्मारक के रूप में नहीं किया गया है बल्कि इसे एक जीवंत आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में विकसित किया गया है। यह स्थान आने वाले समय में एक ऐसे तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित होगा जहाँ न केवल श्रद्धालु बल्कि जीवन में शांति-दिशा की खोज करने वाला प्रत्येक व्यक्ति आकर्षित होगा। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति अपने भीतर एक नई ऊर्जा एक नई सकारात्मकता और एक नए संकल्प का अनुभव करेगा। यह स्थान व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है और यही जुड़ाव उसे समाज संस्कृति और मानवता के प्रति अपने दायित्वों का भी बोध कराता है। शासन माता साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा का संपूर्ण जीवन वात्सल्य की ऐसी निर्मल धारा था जिसने न केवल तेरापंथ साध्वी संघ को बल्कि जन-जन के अंतर्मन को भी स्नेह करुणा और आत्मीयता से आप्लावित किया। उनके व्यक्तित्व में वात्सल्य केवल एक गुण नहीं बल्कि एक जीवंत चेतना थी एक ऐसी करुणामयी ऊर्जा जो हर मिलने वाले को अपनेपन के आलोक में भर देती थी। वे अनुशासन की अधिष्ठात्री होते हुए भी ममता की मूर्ति थीं उनके सान्निध्य में कठोरता भी कोमलता में बदल जाती थी। उन्होंने सैकड़ों साध्वियों का नेतृत्व केवल व्यवस्था से नहीं बल्कि माँ की तरह स्नेहिल संरक्षण देकर किया और यही कारण था कि उनके व्यक्तित्व में शासन और माता का अद्भुत संगम साकार हुआ। उनके प्रेम संवेदना और वात्सल्य की असीम अनुकम्पा से अनगिनत जीवन स्पर्शित परिवर्तित और आलोकित हुए। इसी वात्सल्य-रस से आप्लावित उनके जीवन की स्मृतियों को सहेजने के लिए वात्सल्य पीठ नाम पूर्णतः सार्थक और उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि यह केवल एक स्मारक नहीं बल्कि उस दिव्य मातृत्व उस अनंत करुणा और उस जीवनदायी स्नेह का प्रतीक है जिसे साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में जिया और जन-जन तक पहुँचाया। आज के समय में जब भौतिकता और प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में मनुष्य अपने भीतर की शांति और संतुलन खोता जा रहा है ऐसे में वात्सल्य पीठ जैसे केन्द्र अत्यंत आवश्यक हो जाते हैं। यह हमें स्मरण कराता है कि जीवन का वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं बल्कि
मुद्दा : जन भागीदारी से होगा हमारी विरासत का संरक्षण

-प्रदीप कुमार वर्मामिस्र की राजधानी काहिरा के पास गीज़ा पठार पर नील नदी के पश्चिमी तट पर स्थित गीजा के पिरामिड। रोम का ऐतिहासिक एम्फीथिएटर। चट्टानों को काटकर बनाया गया जॉर्डन का पेट्रा शहर। और विश्व के सात अजूबों में शामिल भारत का ताजमहल। यह सभी विश्व विरासत की एक बानगी भर हैं। देश और दुनिया में ऐसी सैकड़ो अमूल्य धरोहर हैं, जो विश्व विरासत के रूप में हमारे सामने हैं। यह विरासतें दुनिया भर की मानव सभ्यता की सांझी संस्कृति हैं। विरासत को बचाने का अर्थ इसी सांझी संस्कृति और विरासत को बचाने से है। इसी विश्व विरासत को बचाने इस संबंध में लोगों को जागरूक करने तथा संरक्षण के प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए 18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है। विश्व विरासत दिवस लोगों को दुनिया भर के विभिन्न सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत स्थलों के बारे में जानने और उनके संरक्षण के मूल्य को पहचानने का अवसर प्रदान करता है। विश्व विरासत दिवस मनाने के अतीत पर गौर करें तो पता चलता है कि 18 अप्रैल 1982 को ट्यूनीशिया में इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स द्वारा इस संबंध में एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद वर्ष 1983 में,यूनेस्को की 22वीं महासभा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और हर साल इसे मनाने की आधिकारिक मान्यता भी दी। विश्व विरासत दिवस मनाने का उद्देश्य समूची मानव सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण के संबंध में जनमानस को जागरूक करना है। और उनकी रक्षा करना। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारी विरासत अनमोल है और इसे भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जाना चाहिए। ऐसी विरासत को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया जाता है, जो सांस्कृतिक या प्राकृतिक रूप से मानवता के लिए अनमोल होते हैं। वर्तमान में भारत में विश्व धरोहर स्थल का संरक्षण भारत सरकार द्वारा किया जाता है। लेकिन इस कार्य की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई। वर्ष 1861 में भारत में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की गई। कनिंघम के नेतृत्व में भारत में सारे ही प्राचीन स्थलों की खोज एवं संरक्षण का काम किया गया। प्राचीन हड़प्पा सभ्यता के शहर मोहन जोदड़ो और हड़प्पा की खोज भी उसी समय हुई। भारत में अब तक 40 से अधिक स्थलों को विश्व विरासत का दर्जा देते हुए उन्हें सूची में शामिल किया गया है। इनमें विश्व प्रसिद्द अजंता एवं एलोरा की गुफाएं,आगरा का किला, दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल,सूर्य मंदिर,महाबलीपुरम स्मारक, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, विदेशी प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग कहा जाने वाला भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान,मानस वन्यजीव अभयारण्य,गोवा के चर्च और कॉन्वेंट, नागर शैली के प्रतीकवाद और कामुक आकृतियों और मूर्तियों के लिए प्रख्यात खजुराहो के स्मारक,हम्पी के स्मारक तथा फतेहपुर सीकरी के चार मुख्य स्मारक जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा,पंच महल, दीवाने-खास और दीवान-आम शामिल हैं। इसके साथ ही ग्रेट लिविंग चोल मंदिर,पट्टदकल स्मारक,सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान,नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान,बुद्ध के स्मारक,हुमायूं का मकबरा, दिल्ली की कुतुब मीनार, अलाई दरवाजा, अलाई मीनार, कुब्बत-उल-इस्लाम मस्जिद, इल्तुमिश का मकबरा और लौह स्तंभ शामिल हैं। इसके साथ ही दार्जिलिंग, कालका शिमला और नीलगिरि की पर्वतीय रेलवे,महाबोधि मंदिर,भीमबेटका,छत्रपति शिवाजी टर्मिनस,चंपानेर पावागढ़ पुरातत्व उद्यान, दिल्ली का लाल किला, जयपुर का जंतर मंतर,राजस्थान के चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर किला, गागरोन किला, आमेर किला और जैसलमेर जैसे प्राचीन किले शामिल हैं। गुजरात के अहमदाबाद में रानी की वाव भी विश्व विरासत धरोहर में शामिल है। आज दुनिया भर में पर्यावरण का विनाश, युद्धों और गृहयुद्धों के कारण बड़े पैमाने पर प्राचीन विरासतों का विनाश हो रहा है। अफ़ग़ानिस्तान प्राचीन बौद्ध सभ्यता का बड़ा केन्द्र रहा है । लेकिन जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी शासक सत्ता में आए तो उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के बामियान प्रान्त में पहाड़ काटकर बनी गौतमबुद्ध की क़रीब एक हजार साल पुरानी मूर्ति को नष्ट कर दिया। इराक़ के बगदाद का राष्ट्रीय संग्रहालय मेसोपोटामिया सभ्यता की कलाकृतियों के संग्रह का सबसे बड़ा संग्रहालय था। लेकिन खाड़ी युद्ध में इराक़ की पराजय के बाद जब अमेरिकी सेनाएं बगदाद में घुसीं तो उन्होंने भारी पैमाने पर इस संग्रहालय में लूट-पाट की। दुनिया भर में विरासतों के हालात अत्यंत चिंताजनक हैं। यूनेस्को द्वारा भारत और समूचे विश्व में विरासत संरक्षण का दायित्व लेने के बावज़ूद इस दिशा में जागरूकता की कमी है। यह धरोहर हमारे समृद्ध अतीत का प्रमाण हैं, लेकिन नागरिक के रूप में हम इसके महत्व को बहुत कम समझते हैं। हमारे इतिहास, संस्कृति और पहचान को बनाये रखने के लिये धरोहरों का महत्वपूर्ण स्थान है। इनका संरक्षण न केवल यूनेस्को या किसी अन्य सरकार का काम है, बल्कि विश्व के हर एक नागरिक को इनके संरक्षण में अपनी सतत एवं समर्पित भागीदारी निभानी चाहिए।
चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा बिहार का नया ‘सम्राट’

-योगेश कुमार गोयलबिहार की राजनीति में सत्ता का शिखर छूना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है उस शिखर पर टिके रहकर अपनी सर्वमान्यता सिद्ध करना। सम्राट चौधरी का बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में उदय राज्य के सियासी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात माना जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति का मुख्यमंत्री बनना नहीं है बल्कि भारतीय जनता पार्टी का बिहार में उस ‘बड़े भाई’ की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता दशकों से कर रहे थे। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब सम्राट चौधरी के कंधों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह नीतीश कुमार की उस लंबी और गहरी छाया से बाहर निकल पाएंगे, जिसने पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति को परिभाषित किया है? यही वह कसौटी है, जिस पर अब सम्राट चौधरी को परखा जाएगा। सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उनके पिता शकुनी चौधरी की विरासत, और उनके स्वयं के आक्रामक संघर्ष, दशकों की राजनीतिक यात्रा, रणनीतिक धैर्य और समयानुकूल निर्णयों का परिणाम है। 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में जन्मे सम्राट ने बहुत कम उम्र में ही सत्ता का स्वाद चख लिया था। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने से लेकर आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर वैचारिक बदलावों और रणनीतिक फैसलों से भरा रहा है। राजद और जदयू जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ काम करने के बाद 2017 में भाजपा का दामन थामना उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने उनमें एक ऐसे पिछड़ा नेतृत्व (ओबीसी) को देखा, जो न केवल संगठन में जान फूंक सकता था बल्कि राजद के ‘माई’ (एमवाई) समीकरण के सामने एनडीए के ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूती दे सकता था। विशेषकर कुशवाहा समुदाय से आने के कारण सम्राट चौधरी भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन का सबसे सटीक मोहरा साबित हुए। भाजपा ने उन्हें न केवल स्वीकार किया बल्कि प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद देकर उनकी नेतृत्व क्षमता पर भरोसा भी जताया। यही भरोसा आज उन्हें मुख्यमंत्री पद तक ले आया है। मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की नियुक्ति के साथ ही बिहार की राजनीति में एक दुर्लभ संयोग भी जुड़ा है। जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने हैं, जिन्होंने पहले उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और बाद में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। यह उपलब्धि उनके कद को तो बढ़ाती है लेकिन इसके साथ आने वाली अपेक्षाएं उनके लिए हिमालयी चुनौतियों जैसी हैं। नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं थे बल्कि वह बिहार के लिए एक ‘इंस्टीट्यूशन’ बन चुके थे। उनके 20 वर्षों के शासनकाल ने राज्य में सुशासन की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसमें महिला सुरक्षा, सड़कें, बिजली और शराबबंदी जैसे मुद्दे हर घर से जुड़े थे। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे स्वयं को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में पेश करते हैं या एक ऐसी नई पहचान गढ़ते हैं, जो नीतीश के ‘विकास’ और भाजपा की ‘वैचारिक प्रखरता’ का संगम हो। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य नेता बनना सम्राट चौधरी के लिए रातों-रात संभव नहीं होगा। नीतीश कुमार की स्वीकार्यता समाज के हर वर्ग, चाहे वह महादलित हो, अति पिछड़ा हो या आधी आबादी (महिलाएं) हो, में गहराई तक थी। सम्राट चौधरी के पास फिलहाल एक मजबूत सांगठनिक ढांचा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का आशीर्वाद है लेकिन उन्हें अपनी ‘आक्रामक छवि’ को अब ‘प्रशासकीय संयम’ में बदलना होगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अब उनके हर फैसले की तुलना नीतीश कुमार के मानकों से की जाएगी। क्या वह उसी सहजता से महादलितों और अति पिछड़ों के हितों की रक्षा कर पाएंगे? क्या वह शराबबंदी जैसी पेचीदा नीतियों को लेकर जनता के बीच अपना स्पष्ट नजरिया रख पाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर उनके कार्यकाल के शुरुआती सौ दिन ही तय करेंगे। चुनौतियां केवल बाहर ही नहीं, गठबंधन के भीतर भी हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद जदयू के भविष्य और निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में प्रवेश ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। जदयू के भीतर इस बदलाव को लेकर एक दबी हुई छटपटाहट है। सम्राट चौधरी को यह सुनिश्चित करना होगा कि गठबंधन के सहयोगी दल खुद को उपेक्षित महसूस न करें। साथ ही, उन्हें भाजपा के भीतर भी उन वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेना होगा, जो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह गए। सम्राट चौधरी पर उनके पुराने विवादों, जैसे कम उम्र में मंत्री पद से हटाए जाने की घटना और उनके शैक्षणिक पहलुओं को लेकर विपक्ष हमलावर रहेगा। एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पेशेवर छवि और शुचिता पर उठने वाले सवालों का सामना उन्हें अपनी कार्यशैली से ही करना होगा। बिहार में 2025 का जनादेश एक तरह से ‘फेयरवेल मैंडेट’ जैसा रहा है, जहां जनता बदलाव की मानसिक तैयारी कर चुकी थी। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी ताकत उनका ओबीसी समुदाय से होना और भाजपा आलाकमान का पूर्ण समर्थन है लेकिन उनकी राह का सबसे बड़ा कांटा ‘नीतीश कुमार का औरा’ है। भाजपा ने अब तक बिहार में नीतीश कुमार के साये में राजनीति की है, अब उसे अपनी स्वतंत्र इमारत खड़ी करनी है, जिसकी नींव सम्राट चौधरी को रखनी है। यह सफर कांटों भरा है क्योंकि उन्हें न केवल विकास की रफ्तार बनाए रखनी है बल्कि बिहार की उस जटिल सामाजिक संरचना को भी साधे रखना है, जहां जाति की राजनीति कभी खत्म नहीं होती। सम्राट चौधरी की कहानी एक ऐसे संघर्षशील नेता की है, जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। क्या वे बिहार को ‘बीमारू’ छवि से पूर्णतः मुक्त कर ‘विकसित बिहार’ के संकल्प को सिद्ध कर पाएंगे? यह भविष्य के गर्भ में है मगर फिलहाल बिहार की सत्ता का यह नया ‘सम्राट’ चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा है। सम्राट चौधरी के पास अवसर भी है और चुनौती भी, अब यह उनके नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि वे इस
महाशक्ति टकराव और वैश्विक अस्थिरता: क्या दुनिया महाविनाश की ओर बढ़ रही है?

– अशोक कुमार झा आज का विश्व एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ हर दिन के साथ अनिश्चितता और अस्थिरता बढ़ती प्रतीत हो रही है। अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि विश्व व्यवस्था एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है। विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय बन चुका है। यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच का राजनीतिक या सैन्य विवाद नहीं है बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक स्थिरता और मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि आम जनमानस के मन में यह सवाल उठे कि क्या हम एक और बड़े युद्ध या महाविनाश की ओर बढ़ रहे हैं? इतिहास के पन्नों को पलटें तो अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की जड़ें काफी गहरी दिखाई देती हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से दोनों देशों के संबंधों में लगातार कटुता बनी रही है। आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सैन्य चेतावनियों ने इस रिश्ते को और अधिक जटिल बना दिया है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका की चिंताओं ने इस तनाव को कई बार खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। हाल के समय में भी कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। बातचीत के असफल रहने और दोनों पक्षों के सख्त रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थिति फिलहाल सामान्य होने की दिशा में नहीं बढ़ रही। पश्चिम एशिया की स्थिति इस पूरे परिदृश्य को और अधिक संवेदनशील बना देती है। यह क्षेत्र पहले से ही संघर्षों का केंद्र रहा है। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ती दूरी, क्षेत्रीय समूहों की सक्रियता और अमेरिका की सैन्य मौजूदगी ने इसे एक जटिल युद्धभूमि में बदल दिया है। यहाँ युद्ध सीधे देशों के बीच कम और “प्रॉक्सी वॉर” के रूप में अधिक देखने को मिलता है, जहाँ बड़े देश अपने हितों की लड़ाई अप्रत्यक्ष रूप से लड़ते हैं। ऐसी परिस्थितियों में परमाणु हथियारों का मुद्दा सबसे बड़ा भय पैदा करता है। यदि किसी भी कारण से यह तनाव परमाणु स्तर तक पहुँचता है, तो इसका परिणाम केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी मानवता को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। हालांकि यह भी सच है कि परमाणु हथियारों का भय ही उनके उपयोग को रोकने का काम करता है। बड़े देश यह भली-भांति जानते हैं कि परमाणु युद्ध में कोई विजेता नहीं होगा, केवल विनाश ही होगा। इस तनाव का प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर संकट, महंगाई में उछाल और शेयर बाजारों में अस्थिरता जैसे परिणाम सामने आ सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। वहीं दूसरी ओर, चीन और रूस जैसी वैश्विक शक्तियाँ भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। ये देश अपने-अपने हितों के अनुसार रणनीति बना रहे हैं और प्रत्यक्ष युद्ध से बचने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ फिलहाल तीसरे विश्व युद्ध की संभावना को कम मानते हैं, लेकिन बढ़ते तनाव को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। वर्तमान परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि दुनिया एक “उच्च तनाव लेकिन सीमित संघर्ष” के दौर से गुजर रही है। इसे एक तरह से नए शीत युद्ध की स्थिति भी कहा जा सकता है, जहाँ प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और दबाव की राजनीति अधिक देखने को मिलती है। ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता है संवाद, संयम और कूटनीतिक समझदारी। इतिहास यह बताता है कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। इसके परिणाम केवल विनाश, पीड़ा और अस्थिरता के रूप में सामने आते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि विश्व के सभी देश अपने मतभेदों को बातचीत और सहयोग के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करें। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि दुनिया आज एक नाजुक दौर से गुजर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव एक चेतावनी है, लेकिन यह अभी अंतिम स्थिति नहीं है। “महाविनाश” की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि यदि समय रहते सही कदम उठाए जाएं, तो इस संकट को टाला जा सकता है। मानवता के हित में यही आवश्यक है कि हम युद्ध नहीं, बल्कि शांति और सहयोग का मार्ग चुनें क्योंकि अंततः यही मार्ग हमें एक सुरक्षित, स्थिर और बेहतर भविष्य की ओर ले जा सकता है।
नारी-आरक्षणः नये भारत का आधार एवं संभावनाओं का शिखर

-ललित गर्ग नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर भारत की राजनीति और समाज में जो नई चेतना उभरकर सामने आई है, वह केवल एक विधायी परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक रूपांतरण एवं नये भारत-निर्माण की संभावनाओं की प्रस्तावना है। निश्चिततौर पर भारत अब अपने विकास की धुरी में महिलाओं की सक्रिय और निर्णायक भागीदारी को अनिवार्य मानने लगा है। दशकों से लंबित महिला आरक्षण का मुद्दा केवल संसद के गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय समाज की उस अंतर्धारा से जुड़ा रहा है, जिसमें बराबरी, सम्मान और अवसर की मांग निरंतर उठती रही है। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह सही कहा कि यह इस सदी के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। पहले यह अधिनियम नई जनगणना के बाद लागू होना था, पर उसमें देरी के चलते सरकार ने इसे 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने का निर्णय किया। इस पर विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई है, पर इस आपत्ति को महत्व देने से अगले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करना संभव नहीं होगा, क्योंकि ताजा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बनने वाले परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने में समय लगता और तब तक 2029 के आम चुनाव हो जाते। इसी कारण इस अधिनियम में संशोधन करने हेतु संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है। चूंकि यह सत्र विधानसभा चुनावों के बीच बुलाया जा रहा है, इसलिए भी कई विपक्षी दलों को यह कांटों की तरह चुभन दे रहा है। भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास विरोधाभासों से भरा रहा है। एक ओर देश ने इंदिरा गांधी जैसी सशक्त महिला नेतृत्व को देखा, वहीं दूसरी ओर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या लंबे समय तक सीमित बनी रही। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 15 प्रतिशत के आसपास है, जो यह बताती है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर अभी भी एक बड़ा अंतर विद्यमान है। इस संदर्भ में महिला आरक्षण अधिनियम उस अंतर को पाटने का एक संगठित और संरचनात्मक प्रयास है। महत्वपूर्ण यह भी है कि इस अधिनियम को लागू करने के संदर्भ में जनगणना और परिसीमन को लेकर जो विवाद सामने आया है, वह भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को भी उजागर करता है। सरकार द्वारा 2011 की जनगणना के आधार पर इसे लागू करने का निर्णय एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, क्योंकि नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया में होने वाली देरी महिला आरक्षण को वर्षों तक टाल सकती थी। विपक्ष की आशंकाएं अपनी जगह पर हैं, परंतु अभी तक उनके समर्थन में ठोस तथ्य सामने नहीं आए हैं। भारतीय राजनीति में किसी भी बड़े निर्णय को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की परंपरा रही है और महिला आरक्षण भी इससे अछूता नहीं है। विपक्ष द्वारा यह आरोप लगाना कि सरकार इस पहल के माध्यम से राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र में लिए जाने वाले अधिकांश निर्णयों के पीछे राजनीतिक गणित काम करता है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि निर्णय के पीछे राजनीतिक लाभ है या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उसका प्रभाव समाज पर कितना सकारात्मक पड़ता है। यदि महिला आरक्षण से महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है और नीति निर्माण में उनका दृष्टिकोण शामिल होता है, तो यह संपूर्ण समाज के लिए लाभकारी होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका में एक उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। महिलाएं अब केवल मतदाता नहीं रहीं, बल्कि वे एक निर्णायक मतदाता वर्ग के रूप में उभरी हैं। 2019 के आम चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों के लगभग बराबर रही और कई राज्यों में उन्होंने पुरुषों से अधिक मतदान किया। यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं, बल्कि चेतना का संकेत है। महिलाएं अब अपने अधिकारों और हितों के प्रति अधिक सजग हो रही हैं और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। सरकारी योजनाओं ने भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उज्ज्वला योजना के माध्यम से रसोई गैस की उपलब्धता, जनधन योजना के तहत बैंकिंग सुविधा, स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय निर्माण और मातृत्व लाभ योजनाओं ने महिलाओं के जीवन में प्रत्यक्ष सुधार किया है। इन योजनाओं का प्रभाव केवल आर्थिक या भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी रहा है, जिससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे सार्वजनिक जीवन में अधिक सक्रिय हुई हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को इस संदर्भ में विशेष रूप से स्मरण किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समानता और न्याय के सिद्धांतों को स्थापित करते हुए महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका यह विश्वास था कि किसी भी समाज की प्रगति का आकलन वहां की महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। आज जब महिला आरक्षण की बात हो रही है, तो यह उसी विचारधारा का विस्तार प्रतीत होता है, जिसमें महिलाओं को केवल संरक्षण नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का अवसर प्रदान किया जाता है। हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि महिला आरक्षण अपने आप में कोई अंतिम समाधान नहीं है। यह एक आवश्यक कदम है, परंतु पर्याप्त नहीं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ने से महिलाओं की आवाज अवश्य मजबूत होगी, परंतु सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर समानता स्थापित करने के लिए और भी प्रयास करने होंगे। आज भी भारत में महिला श्रम भागीदारी दर लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है, परंतु उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाने की आवश्यकता है। महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि कई स्थानों पर महिलाएं केवल नाममात्र की प्रतिनिधि बनकर रह जाएंगी और वास्तविक निर्णय उनके पुरुष परिजन लेंगे। पंचायत स्तर पर इस तरह के उदाहरण देखने को मिले हैं, परंतु समय के साथ महिलाओं ने इस स्थिति को बदला भी है और अपने अधिकारों को स्वयं संभालने की क्षमता विकसित की है। इसी प्रकार राजनीतिक प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास
DR. BHIMRAO AMBEDKAR JAYANTI : डॉ. भीमराव आंबेडकर: बहुआयामी व्यक्तित्व का समग्र परिप्रेक्ष्य

-डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे भारतीय इतिहास में कुछ महान व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनकी छवि समाज के सामने सीमित रूप में प्रस्तुत होती है, जबकि उनका वास्तविक योगदान उससे कहीं अधिक व्यापक और बहुआयामी होता है। डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर भी ऐसे ही एक महान पुरुष हैं। सामान्यतः उन्हें केवल “संविधान निर्माता” या “दलितों के उद्धारक” के रूप में जाना जाता है, किन्तु यह उनके विराट व्यक्तित्व का केवल एक अंश है। उनके जीवन और कार्यों का गहराई से अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि वे एक अद्वितीय विद्वान, प्रखर अर्थशास्त्री, दूरदर्शी चिंतक, समर्पित शिक्षाविद, सिद्धांतनिष्ठ पत्रकार, श्रमिकों के हितैषी तथा सच्चे राष्ट्रनेता थे। डॉ. आंबेडकर का प्रारंभिक जीवन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। आर्थिक अभाव और सामाजिक भेदभाव के बीच उन्होंने जिस दृढ़ता और लगन से उच्च शिक्षा प्राप्त की, वह अद्भुत है। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उन्होंने उच्चतम शैक्षणिक उपाधियाँ प्राप्त कीं। उनके शोध कार्य आज भी अर्थशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संदर्भ माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति “The Problem of the Rupee” ने भारतीय वित्तीय व्यवस्था की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना की वैचारिक आधारशिला रखी। एक शोधकर्ता और चिंतक के रूप में डॉ. आंबेडकर ने अनेक प्रचलित धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने तथाकथित ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’ को तार्किक आधार पर अस्वीकार करते हुए यह सिद्ध किया कि भारतीय समाज की जड़ें एक ही सांस्कृतिक स्रोत में निहित हैं। अपनी पुस्तक “Who Were Shudras” में उन्होंने शूद्रों की ऐतिहासिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन किया और यह स्थापित किया कि वे मूलतः क्षत्रिय थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित न होकर एक सामाजिक विकृति के रूप में विकसित हुई। संस्कृत भाषा के प्रति उनके गहरे अनुराग और प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन ने उनके विचारों को और भी प्रखर बनाया। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने न केवल शिक्षण कार्य किया, बल्कि शिक्षा के प्रसार हेतु संस्थागत प्रयास भी किए। People’s Education Society की स्थापना, सिद्धार्थ कॉलेज और मिलिंद कॉलेज का प्रारंभ- ये सभी उनके शिक्षा के प्रति समर्पण के प्रमाण हैं। उनका मानना था कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे सशक्त साधन है। वे शिक्षा को जीवनभर आवश्यक मानते थे और चाहते थे कि यह समान रूप से सभी वर्गों तक पहुँचे। पत्रकारिता के क्षेत्र में डॉ. आंबेडकर ने जनजागरण का प्रभावी माध्यम तैयार किया। ‘मूकनायक’, ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘जनता’ जैसे पत्रों के माध्यम से उन्होंने समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ को मुखर किया। वे एक सिद्धांतनिष्ठ और अनुशासित संपादक थे, जोकि लेखन की गुणवत्ता और तथ्यात्मकता पर विशेष ध्यान देते थे। उनकी पत्रकारिता केवल सूचना देने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह समाज में चेतना और परिवर्तन का माध्यम भी थी। श्रमिक हितों के लिए उनके प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वायसराय की परिषद में श्रमिक प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने कार्य घंटे को 12 से घटाकर आठ घंटे करने, ओवरटाइम भुगतान, न्यूनतम वेतन, मातृत्व अवकाश और कर्मचारी बीमा जैसी अनेक सुविधाओं को लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनके सामाजिक न्याय के व्यापक दृष्टिकोण का ही परिणाम था कि उन्होंने श्रमिक वर्ग के अधिकारों को सशक्त बनाने का निरंतर प्रयास किया। दलितों के उद्धार के लिए उनका संघर्ष उनके जीवन का केन्द्रीय उद्देश्य था। उनका संघर्ष सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए था, न कि वैमनस्य फैलाने के लिए। उन्होंने अपने जीवन में अनेक अपमान सहते हुए भी अहिंसा और संवेदनशीलता का मार्ग नहीं छोड़ा। यह उनकी महानता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है कि उन्होंने सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष किया, परंतु उसे हिंसा से दूर रखा। धार्मिक दृष्टिकोण से भी उनका चिंतन अत्यंत स्पष्ट और तार्किक था। लगभग दो दशकों के विचार-मंथन के बाद उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म को अपनाया। यह निर्णय उन्होंने कहना चाहिए कि तत्कालीन समय में सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए संभवतया लिया। उनके अनुसार बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति का ही अभिन्न अंग है और उसमें मानवता के लिए आवश्यक नैतिक आधार निहित है। एक राष्ट्रनेता के रूप में डॉ. आंबेडकर का योगदान सर्वविदित है। भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका निर्णायक रही। उन्होंने संविधान को स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के सिद्धांतों पर आधारित किया। उनका मानना था कि सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं है, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी आवश्यक है। उन्होंने अपने ऐतिहासिक भाषण में यह भी चेतावनी दी कि व्यक्ति-पूजा लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है और हमें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक मार्ग ही अपनाना चाहिए। राष्ट्रीय विकास के संदर्भ में भी उनकी सोच अत्यंत दूरदर्शी थी। उन्होंने जल और ऊर्जा के क्षेत्र में राष्ट्रीय नीतियों की आवश्यकता पर बल दिया तथा नदियों को जोड़ने और औद्योगीकरण को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। राष्ट्रीय एकता के विषय में वे अत्यंत सजग थे और भाषाई आधार पर राज्यों के गठन को लेकर उन्होंने अपनी आशंकाएँ व्यक्त कीं। उनका मानना था कि यह प्रवृत्ति भविष्य में राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन सकती है। डॉ. आंबेडकर की एक विशेषता यह भी थी कि वे समय और परिस्थितियों के अनुसार अपने विचारों में परिवर्तन करने से नहीं हिचकते थे। पूना समझौते के समय उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपने पूर्व विचारों में लचीलापन दिखाया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि देश की आजादी की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है। अंततः कहना यही है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता उपलब्धियों में सीमित नहीं की जा सकती है, वह वास्तव में उन मूल्यों में निहित होती है जिनके आधार पर व्यक्ति समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करता है। इसलिए वे केवल एक वर्ग विशेष के नेता नहीं थे, बल्कि समूचे राष्ट्र के पथप्रदर्शक थे। आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों को समग्रता में समझें और उन्हें अपने जीवन तथा समाज में आत्मसात करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
हमारे जनप्रतिनिधि और संविधान: जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व

डॉ राकेश कुमार आर्य. देश की संसद अर्थात शीर्ष सभा के सभासद कैसे हों ? – इस पर अपना मत व्यक्त करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि ” सभा में चारों वेद, कारण अकारण का ज्ञाता न्यायशास्त्र, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि के वेत्ता विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों। देश विषयक प्रमुख निर्णय लेने वाली सभा में दस विद्वानों से न्यून न होने चाहियें। स्वामी दयानंद जी महाराज ने यहां पर स्पष्ट किया है की सभा में चारों वेदों के ज्ञाता उपस्थित होने चाहिए। प्रश्न है कि स्वामी जी ने सबसे पहले चारों वेदों के ज्ञाता को ही शीर्ष सभा का सभासद होने के लिए योग्य क्यों माना ? इसका उत्तर केवल एक है कि वेद सृष्टि का आदि संविधान है। ईश्वर प्रदत्त सबसे पहला संविधान है। यह संविधान हमें चार अरब 32 करोड़ के सृष्टि काल के लिए मिला है। यद्यपि ईश्वर का यह ज्ञान सृष्टि दर सृष्टि यथावत चलता रहता है। वेद नाम के इस संविधान की व्यवस्थाओं का अर्थात विधिक व्यवस्थाओं का मर्मज्ञ होता है, वही धर्मज्ञ होता है। उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह संसार के लिए उपयोगी चिंतन करेगा और ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेगा जिससे किसी का अहित होता हो। वह अपने विवेक का संतुलन बनाकर काम करेगा। विवेक का संतुलन बनाकर ही नीतियों का निर्धारण करेगा और विवेक का संतुलन बनाकर ही उन नीतियों को लागू करेगा। ऐसे व्यक्ति से कभी भी किसी भी प्रकार के उत्पात, उन्माद या उग्रवाद की अपेक्षा नहीं की जा सकती। तीन सभासद मिलकर व्यवस्था करेंस्वामी दयानंद जी की यह भी मान्यता रही है कि ” जिस सभा में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के जानने वाले तीन सभासद् होके व्यवस्था करें उस सभा की की हुई व्यवस्था का भी कोई उल्लंघन न करे। यदि एक अकेला सब वेदों को जानने वाला द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म, कर्तव्य, सिद्धान्त व नीति की व्यवस्था करे, वही श्रेष्ठ धर्म व न्याय है क्योंकि अज्ञानियों के सहस्रों लाखों करोड़ों लोग मिल के जो कुछ व्यवस्था करें उस को कभी न मानना चाहिये।” स्वामी दयानंद जी महाराज ने कहा कि सभाओं में विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों’ जब ऐसे लोगों को प्रजा के बीच से निकालकर संसद तक भेजा जाएगा या संसद में स्थान दिया जाएगा तो वह विद्वानों की सभा होगी। न्यायकारी सभासदों से सुभूषित होगी। ऐसे लोग भूसुर कहलाते हैं। भूसुर ही संसार में व्यवस्था बना सकते हैं।इसलिए भूसुरों को संसद में स्थान मिले, सम्मान मिले – यही ऋषि दयानंद जी का मंतव्य रहा। भूसुरों को जब आप संसद में भेजेंगे तो वे वहां रहकर न्यायपूर्ण नीतियों का विधान करेंगे। महर्षि दयानन्द जी महाराज की स्पष्ट मान्यता रही कि यदि आप किसी एक व्यक्ति विशेष के हाथों में सारे अधिकार सौंप देंगे तो न्याय, नीति और धर्म तीनों ही मर जाएंगे। स्वामी जी का स्पष्ट कहना था कि ” एक व्यक्ति वा राजा को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिए किन्तु राजा जो सभापति, तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के आधीन रहें।”हमारे ऋषि पूर्वज इस प्रकार के मानवीय स्वभाव की तानाशाही से पूर्व में ही परिचित रहे हैं। यही कारण रहा कि उन्होंने ” शक्ति पृथक्करण ” के सिद्धांत को अपनाया। महर्षि मनु की मनुस्मृति इस संबंध में हमारा सही मार्गदर्शन करती है। न्याय और दया में है सूक्ष्म अंतरमहर्षि दयानन्द जी महाराज कहते हैं :-” ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दु:खों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दु:ख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दु:ख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है ? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना। संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है ? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।” न्यायपरक लोकतंत्र और वेद की व्यवस्थास्वामी जी ने वेद मंत्रों के आधार पर इस व्यवस्था को दिया। वेद वास्तविक न्यायपरक लोकतंत्र के समर्थक हैं। वेद की लोकतंत्र की इसी पवित्र भावना का सम्मान करते हुए महर्षि मनु द्वारा मनुस्मृति में राजधर्म का प्रतिपादन किया गया। वह भी इसी मत के थे। वेद की स्पष्ट मान्यता रही है कि किसी भी एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता सौंपना मनुष्य की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना होता है। जैसे ही मनुष्य को यह आभास होता है कि अब वह सबसे ऊपर हो गया है और सभी लोग उसकी बुद्धि का लोहा मान रहे हैं अथवा उसके बाहुबल के समक्ष नतमस्तक हैं, तुरंत वह घमंड से फूल जाता है। ऐसा व्यक्ति सत्ता के मद में चूर होकर जनता के हितों के साथ खिलवाड़ कर सकता है। जैसा कि हमने मुस्लिम शासकों को जनता पर अत्याचार करते हुए देखा भी है। मनुष्य को कभी बेलगाम नहीं होने देना चाहिए। उस पर ऐसी दूसरी बुद्धियों का पहरा रहना चाहिए जो उसकी बुद्धि से कहीं अधिक पवित्र और निर्मल हों। यदि दुर्बुद्धि मनुष्य किसी
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर: संविधान निर्माता और सामाजिक क्रांति के नायक..

प्रदीप कुमार वर्माभारतीय संविधान के कुशल शिल्पकार, वंचित एवं दलितों के मसीहा, कुशल राजनीतिक एवं प्रखर समाजशास्त्री, एक समर्पित शिक्षक और श्रमजीवी पत्रकार और तत्कालीन भारतीय समाज के एक महान समाज सुधारक। एक जमाना था जब भारतीय समाज जाति एवं कुरीतियों के बंधनों में जकड़ा हुआ था और समाज के दलित और वंचित तबके को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था। यही नहीं, इस “तबके” की समाज में भागीदारी न के बराबर थी। और तब बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर ने ऐसे ही पिछड़े समाज में जन्म लिया और तत्कालीन भारतीय समाज को अपने कार्य एवं सिद्धांतों से एक नई दिशा दी। बाबा साहेब द्वारा किए गए संवैधानिक एवं सामाजिक सुधारो की मदद से आज वंचित और दलितों की आवाज न केवल सुनी जाती है,बल्कि इस तबके को समाज की मुख्य धारा में आने का अवसर भी मिला है। आज दलितों के मसीहा कहे जाने वाले उन्ही बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर की जन्म जयंती है। भारतीय संविधान निर्माता के तौर पर देश और दुनिया में चर्चित बाबा साहेब डा. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। बाबा साहेब अंबेडकर के पिता सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल तथा उनकी माता का नाम भीम बाई था। डा. अंबेडकर जब लगभग दो वर्ष के थे,जब उनके पिता नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए थे। जब वह केवल छह वर्ष के थे तब उसकी मां का निधन हो गया था। बाबासाहेब ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में प्राप्त की। अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान वह अस्पृश्यता के अभिशाप से पीड़ित हुए तथा उन्हें अछूत होने का अहसास भी हो गया। डा. अंबेडकर अपनी स्कूली शिक्षा सतारा में ही पूरी की तथा बाद में वह मुंबई चले गए। डा. अंबेडकर ने अपनी स्नातक की पढ़ाई एल्फिंस्टन कॉलेज आज के मुंबई तथा तत्कालीन बॉम्बे से की,जिसके लिए उन्हें बड़ौदा के महामहिम सयाजीराव गायकवाड़ से छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। इसी क्रम में वर्ष 1913 में डा. अंबेडकर को उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका जाने वाले एक विद्वान के रूप में चुना गया। यह उनके शैक्षिक जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1915 और 1916 में एमए और पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए लंदन गए। बाद में उन्होंने बार-एट-लॉ और डीएससी की डिग्री भी प्राप्त की। वर्ष 1924 में इंग्लैंड से वापस लौटने के बाद उन्होंने दलित लोगों के कल्याण के लिए एक एसोसिएशन की शुरुआत की, जिसमें सर चिमनलाल सीतलवाड़ अध्यक्ष और डा. अम्बेडकर चेयरमैन थे। एसोसिएशन का तत्काल उद्देश्य शिक्षा का प्रसार करना, आर्थिक स्थितियों में सुधार करना और दलित वर्गों की शिकायतों का प्रतिनिधित्व करना था। उन्होंने नए सुधार को ध्यान में रखते हुए दलित वर्गों की समस्याओं को संबोधित करने के लिए 03 अप्रैल, 1927 को ‘बहिष्कृत भारत’ समाचारपत्र की भी शुरुआत की। इसी दौरान 13 अक्टूबर 1935 को दलित वर्गों का एक प्रांतीय सम्मेलन नासिक जिले में येवला में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में उनकी घोषणा से हिंदुओं को गहरा सदमा लगा। तब उन्होंने कहा, “मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा”। उनके हजारों अनुयायियों ने उनके इस फैसले का समर्थन किया। वर्ष 1936 में उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी महार सम्मेलन को संबोधित किया और हिंदू धर्म का त्याग करने की वकालत की। इसके बाद 15 अगस्त 1936 को उन्होंने दलित वर्गों के हितों की रक्षा करने के लिए “स्वतंत्र लेबर पार्टी” का गठन किया, जिसमें ज्यादातर श्रमिक वर्ग के लोग शामिल थे। वर्ष 1938 में जब कांग्रेस ने अछूतों के नाम में बदलाव करने वाला एक विधेयक प्रस्तुत किया। तब डा. अंबेडकर ने इसकी आलोचना की। उनका दृष्टिकोण था कि महज नाम बदलने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। वर्ष1942 में वह भारत के गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में एक श्रम सदस्य के रूप में नियुक्त हुए। इसके बाद 1946 में उन्हें बंगाल से संविधान सभा के लिए चुना गया। उसी समय उन्होंने अपनी पुस्तक प्रकाशित की, “शूद्र कौन थे”?आजादी के बाद वर्ष 1947 में उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में कानून एवं न्याय मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया लेकिन 1951 में उन्होंने कश्मीर मुद्दे, भारत की विदेश नीति और हिंदू कोड बिल के प्रति प्रधानमंत्री नेहरू की नीति पर अपना मतभेद प्रकट करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। डा. अंबेडकर को उस्मानिया विश्वविद्यालय ने 12 जनवरी 1953 को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया।आखिरकार 21 वर्षों के बाद, उन्होंने सच साबित कर दिया, जो उन्होंने 1935 में येओला में कहा था कि “मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा”। 14 अक्टूबर 1956 को, उन्होंने नागपुर में एक ऐतिहासिक समारोह में बौद्ध धर्म अपना लिया और 06 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई। भारतीय संविधान के जनक के रूप में संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक समावेशी संविधान तैयार किया जो सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देता है। उन्होंने छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाई और संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत इसे समाप्त किया। उन्होंने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ों के लिए आरक्षण के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित की। यही नहीं, उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति, तलाक और गोद लेने का अधिकार दिलाने का प्रयास किया, जिससे महिलाओं को समानता मिले। देश के प्रथम श्रम मंत्री के रूप में उन्होंने कामकाज को 8 घंटे तक सीमित किया। इसके साथ ही समान काम के लिए समान वेतन, महिला श्रम कल्याण और कर्मचारी राज्य बीमा जैसे सुधार लागू किए। बाबा साहेब ने दलितों को शिक्षित, संगठित और संघर्ष करने का भी संदेश दिया। यही वजह है कि बाबा साहब आज तक वंचित और पिछड़ों से लेकर आमजन की स्मृतियों में जीवंत हैं।