अब नहीं पनपेंगे माओवादी : जरा याद इन्हें भी कर लो

– कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल देश से सशस्त्र माओवादी आतंक का खात्मा हो गया है। लेकिन अर्बन नक्सलियों का माड्यूल अभी भी सक्रिय है। नक्सलवाद-माओवाद के ख़ूनी पंजों ने चारो ओर कैसे दहशत फैला रखी थी? उसकी गवाह हर वो तारीख़े हैं जब-जब हमारे वीर जवानों ने माओवादियों से लोहा लिया। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में, बस्तर में सुख-शांति के लिए अपना बलिदान दे दिया। ऐसी ही इतिहास की एक तारीख़ है 6 अप्रैल 2010। ये तारीख़ याद कर लीजिए। ये वो तारीख़ थी जब दंतेवाड़ा में CRPF की 62 वीं बटालियन पर घात लगाकर माओवादी आतंकियों ने हमला किया था। सुकमा (तत्कालीन दंतेवाड़ा) के चिंतागुफा, ताड़मेटला के पास माओवादियों ने क्रूरता की अति कर दी थी। लेकिन जवानों का हौसला कम नहीं था। माओवादियों के साथ हुए संघर्ष में 76 जवानों ने अपना बलिदान दे दिया था। CRPF ने वीर बलिदानियों को याद करते हुए लिखा —“हमारे 75 श्रेष्ठ जवानों ने 6 घंटे तक चले भीषण संघर्ष में 7 माओवादियों को ढेर किया और 8 को घायल किया, इसके बाद उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। 500 से अधिक भारी हथियारों से लैस माओवादियों और सैकड़ों IEDs से घिरे होने के बावजूद—जो लगभग हर उस स्थान पर लगाए गए थे। जहाँ हमारे जवान शरण लेकर जवाबी कार्रवाई कर सकते थे। उनका साहस अद्वितीय और अविस्मरणीय था।हमारे कुछ वीरों ने अपने साथियों की रक्षा करने और दुश्मन को निष्क्रिय करने के लिए ग्रेनेड पर लेटकर सर्वोच्च बलिदान दिया। अंतिम क्षणों में भी वीर सैनिकों ने अपने हथियार अपने नीचे छिपा लिए। ” इस क्रूर हमले का मास्टरमाइंड माडवी हिड़मा था। इसके बाद जेएनयू में अर्बन नक्सलियों ने जश्न मनाया था। दंतेवाड़ा क्षेत्र में हमले के समय डीआईजी रहे आईपीएस कल्लूरी ने जेनएयू में हमले के बाद हुए जश्न की चर्चा करते हुए कहा था —“मुझे काफी दुःख पहुँचा था जब मुझे यह पता चला कि जेनएयू में (कुछ विद्यार्थियों द्वारा) ताड़मेटला में 76 बलिदानी जवानों के बलिदान का जश्न मनाया गया।” साथ ही छत्तीसगढ़ के कांकेर समेत कई अलग-अलग इलाकों में अर्बन नक्सलियों ने जवानों के बलिदान पर जश्न मनाया। इस घटना को अर्बन नक्सली कही जाने वाली अरुंधति राय की पुस्तक, रिपोर्टिंग के लिए भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि इस घटना वाले दिन से अगले— 19 दिन तक अरुंधति राय दंतेवाड़ा में रुकीं। उन्होंने एक रिपोर्ट बनाई थी, जो सेना, प्रशासन और छत्तीसगढ़ सरकार के विरोध में थी। अब आप सोचिए कि जहां एक ओर हमारे 76 जवानों का बलिदान हो गया। वहीं दूसरी ओर अर्बन नक्सली। इसे जीत के तौर पर देख रहे थे। भारत के ख़िलाफ़ छेड़े गए सशस्त्र युद्ध के इस घटनाक्रम पर जश्न मना रहे थे। सेना, पुलिस और सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा वाली रिपोर्टिंग की जा रही थी। उन्हें खलनायक बताया जा रहा था। जबकि माओवादी आतंकियों की रहनुमाई की जा रही थी। क्योंकि अर्बन नक्सलियों के लिए माओवादियों के द्वारा जवानों की हत्या—जीत थी। इसे वो बड़े माड्यूल के तौर पर फैलाना चाहते थे। ये ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। ये दोनों न तो देश के संविधान को मानते हैं। न ही इनमें राष्ट्र के प्रति कोई निष्ठा है। इनका हमेशा से एक ही उद्देश्य रहा है कि – कैसे भारत में रक्तपात किया जाए। ‘जल-जंगल, जमीन’ के नाम पर हिंसा की जाए। ये दोनों जनजातीय समाज के, वनवासियों के घोर शत्रु हैं।अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों के रक्तपात के चलते ही— सुदूर वनांचल क्षेत्र विकास से बहुत पीछे रह गए। हालांकि जैसा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि — “ यह अर्बन नक्सल खुद हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते, लेकिन गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा फैलाना चाहते हैं। मगर उनके भी दिन लद गए हैं। ” ये कथन इस बात की प्रतिपुष्टि करता है कि हथियारबंद माओवादियों के बाद अगला नंबर अर्बन नक्सलियों का है। जो भी भारत की अखंडता, संप्रभुता और संविधान के ख़िलाफ़ आएगा। वो बख़्शा नहीं जाएगा। मातृभूमि भारतभूमि को हम रक्तरंजित नहीं होने दे सकते। हमारे वीर जवानों ने सुरक्षा के लिए जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है। वर्षों तक माओवादियों की मांद में घुसकर उन्हें नेस्तनाबूद किया है।आज उन वीर बलिदानियों के कारण ही छत्तीसगढ़ ख़ूनी आतंक से बाहर आया है। सशस्त्र माओवादी आतंक का सफाया हो चुका है। अर्बन नक्सली हमेशा से हथियारबंद माओवादियों की ढाल बनकर खड़े रहते थे। अभी भी ये सिलसिला रुका नहीं है। अर्बन नक्सली नक्सलवाद के समर्थन में साहित्य लिखते, इंटरव्यू करते, एडिटोरियल लिखते, नाट्य मंचन करते, ढफली बजाते, रैली करते और चिंघाड़ते हुए अर्बन नक्सली नज़र आते थे। ये मानवाधिकार के नाम पर माओवादी हिंसा को जायज़ ठहराते थे। लेकिन माओवादी आतंकी जिन निर्दोषों की हत्या करते थे। उनके मानवाधिकार पर ये चुप्पी ओढ़ लेते थे। वो माओवादी जो बस्तर के जनजातीय समाज का दमन करते थे। स्थानीय लोगों के जवान बच्चों और महिलाओं को अर्बन नक्सलियों के कॉन्सेप्ट पर उठा ले जाते थे। फिर उनके हाथों में हथियार थमा देते थे। रक्तपात कराते थे। बस्तर के वो बच्चे जिन्हें हाथों में किताबें थामनी थी। अर्बन नक्सलियों, माओवादियों ने – उन्हें बंदूक पकड़ने के लिए मजबूर किया। उनका बचपन, घर-परिवार और समाज सबकुछ छीन लिया। बारूदी गंध की ज़िंदगी जीने को विवश किया। भोले-भाले, सरल हृदय जनजातीय समाज को अपने ही समाज का दुश्मन बना दिया। माओवादियों ने उन्हें रक्तपात करने का हथियार बनाने का जघन्य अपराध किया। क्या इनसे किसी भी प्रकार की सहानुभूति की दिखाई जा सकती है ? आज जिस माडवी हिड़मा को अर्बन नक्सली हीरो बना रहे हैं। अर्बन नक्सली जिस हिड़मा के लिए नारे लगा रहे हैं। मत भूलिए कि वो आतंकी इन 76 जवानों की हत्या का असल मास्टरमाइंड था। माडवी हिड़मा वो खूंखार आतंकी था जिसने न जाने कितने घर-परिवार उजाड़ दिए। न जाने कितने निर्दोषों को गोली से भून दिया। नृशंसता के साथ सिलसिलेवार ढंग से हत्याओं को अंज़ाम दिया। अब, उस हिड़मा को महान बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा से जोड़ने का अपराध , अर्बन नक्सली कर रहे हैं। बिरसा मुंडा जिन्होंने राष्ट्रीय अस्मिता के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। ईसाई मिशनरियों, अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया। स्वतंत्रता, जनजातीय अस्मिता,
उपेक्षित आबादी बनाम वैश्विक एजेंडा: असली मुद्दे क्यों ओझल हो रहे हैं?

-कैलाश चन्द्रभारत का सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य जितना विशाल है, उतना ही जटिल भी है। इस जटिलता के बीच आज हमारे सामने दो वास्तविकताएँ खड़ी हैं। पहली, भारत के ग्यारह करोड़ से अधिक घुमन्तु, अर्धघुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजाति समुदाय जिन्हें डीएनटी, एनटी और एसएनटी के रूप में भी जाना जाता है, जोकि आज भी पहचान, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों की बुनियादी लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी ओर एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय का मुद्दा है, जिसकी जनसंख्या लगभग पाँच से छह लाख मानी जाती है, किन्तु राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसकी उपस्थिति अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की जा रही है। एक ओर इतनी विशाल आबादी है जो अदृश्य बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर एक छोटा समुदाय वैश्विक एजेंडों और वित्तीय तंत्रों के माध्यम से राष्ट्रीय बहस को प्रभावित कर रहा है। इस विरोधाभास ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हमारे राष्ट्रीय मुद्दों पर वैश्विक एजेंडों का कब्जा हो रहा है। भारत का जनजाति समाज गौरव, संघर्ष और उपेक्षा की एक लंबी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है। भारत की जनजातियाँ, चाहे वे अनुसूचित जनजाति हों या घुमन्तु और अर्धघुमन्तु समुदाय, सदियों से भारतीय सभ्यता का अभिन्न अंग रही हैं। उनकी विवाह परम्पराएँ, कृषि-कौशल, वन-ज्ञान, संगीत और नृत्य की परम्परा, आत्मनिर्भर जीवन शैली और सांस्कृतिक स्वायत्तता, ये सभी भारतीय समाज के मूल स्वरूप से ही उत्पन्न हुए हैं, लेकिन औपनिवेशिक दौर में इनके परिचय को लेकर जान-बूझकर भ्रम पैदा किया गया। मैक्समूलर और मैकाले जैसे विद्वानों ने इंडीजिनस, एबोरिजिनल और ट्राइब जैसे विदेशी शब्दों को थोपकर भारतीय जनजाति समाज को मुख्यधारा से अलग दिखाने का प्रयास किया। ब्रिटिश शासन के लिए इसका उद्देश्य स्पष्ट था, वन-संपदा, खनिज और भूमि पर अपना अधिपत्य स्थापित करना। उद्योगों के विस्तार के नाम पर वन समुदायों के अधिकारों को कमजोर किया गया और क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871) जैसे कानूनों ने पूरे के पूरे समुदायों को अपराधी घोषित कर दिया। यह कलंक आज भी कई क्षेत्रों में सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बना हुआ है। स्वतंत्र भारत में भी यह उपेक्षा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। रेंके कमीशन (2008) और इडेट कमीशन (2018) की रिपोर्टों के अनुसार देश में आठ से ग्यारह करोड़ के बीच घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजातियाँ हैं, किंतु अब तक किसी भी जनगणना में इन्हें अलग श्रेणी के रूप में स्थान नहीं मिला है। सत्तर से अस्सी प्रतिशत लोगों के पास स्थायी पता, पहचान पत्र या आवास संबंधी दस्तावेज तक नहीं हैं। सरकारी योजनाएँ इन तक पहुँच ही नहीं पातीं, जिससे शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। रोजगार और आजीविका के अवसर भी इनके लिए बेहद सीमित हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब इतनी बड़ी आबादी अपनी बुनियादी पहचान तक से वंचित है, तब इसे राष्ट्रीय विमर्श में स्थान क्यों नहीं मिलता? इसके विपरीत एलजीबीटीक्यू प्लस विमर्श का वैश्विक स्तर पर तीव्र उत्थान देखा जा रहा है। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि इस समुदाय के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की बुनियादी जिम्मेदारी है, किंतु जब हम तुलना के स्तर पर देखते हैं तो एक स्पष्ट असंतुलन सामने आता है। एक ओर पाँच से छह लाख की अनुमानित आबादी वाला समुदाय है, जिसे राष्ट्रीय विमर्श में अत्यधिक स्थान प्राप्त है, वहीं दूसरी ओर आठ से ग्यारह करोड़ की घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजातियाँ हैं, जिन्हें लगभग नगण्य स्थान मिलता है। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? अब इसे गहराई से समझें तो इसका एक उत्तर वैश्विक फंडिंग नेटवर्क में दिखाई देता है। फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन्स, रॉकफेलर नेटवर्क, ह्यूमन राइट्स फंड, यूएनडीपी इन्क्लूजन फंड और वैश्विक कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व तंत्र जैसी संस्थाएँ भारतीय विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया मंचों, सांस्कृतिक आयोजनों और डिजिटल अभियानों में भारी निवेश कर रही हैं। यह निवेश मुख्य रूप से एलजीबीटीक्यू प्लस और जेंडर फ्लुइडिटी जैसे एजेंडों के विस्तार के लिए किया जा रहा है। आँकड़े बताते हैं कि पिछले पाँच वर्षों में ऐसे विषयों पर आधारित कार्यक्रमों और उत्सवों में दो सौ से चार सौ प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जिनमें साहित्यिक उत्सव, फिल्म समारोह, सामाजिक मीडिया संवाद और जेंडर आधारित चर्चाएँ प्रमुख हैं। इसके विपरीत यही समय अवधि ऐसी रही है, जिसमें घुमन्तु समाज पर राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा आयोजन देखने को नहीं मिला। ब्रांडिंग और वास्तविक मुद्दों के बीच यह अंतर भी इस असंतुलन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि एलजीबीटीक्यू प्लस विषय शहरी ब्रांडिंग के अनुकूल है, कॉरपोरेट प्रगतिशीलता के मॉडल से मेल खाता है। यह पश्चिमी राजनीतिक एजेंडों के अनुरूप है और मीडिया तथा एलीट वर्ग के लिए प्रतिष्ठा का विषय भी बन चुका है, इसलिए इसे वित्तीय सहयोग और मंच उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। इसके विपरीत घुमन्तु और डिनोटिफाइड जनजातियाँ न तो शहरी परिवेश का हिस्सा हैं, न ही उनके पास सामाजिक या डिजिटल प्रभाव है। वे बाजार या मीडिया के लिए तथाकथित रूप से आकर्षक नहीं मानी जातीं और न ही उनकी कहानी वैश्विक विमर्श के अनुरूप प्रस्तुत की जाती है। परिणामस्वरूप वे ब्रांड वैल्यू नहीं बन पातीं और विमर्श से बाहर रह जाती हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी यह असंतुलन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में कई प्रमुख विश्वविद्यालयों ने जेंडर फ्लुइडिटी, क्वीयर स्टडीज और सेक्सुअलिटी करिकुलम जैसे विषयों को अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है। वहीं दूसरी ओर घुमन्तु जनजातियों का इतिहास, उनकी परम्पराएँ, उनकी कला, भाषा और संस्कृति, तथा औपनिवेशिक शोषण का उनका अनुभव, इन सभी विषयों पर राष्ट्रीय स्तर का कोई ठोस अकादमिक कार्यक्रम उपलब्ध नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत की शिक्षा प्रणाली भी कहीं न कहीं वैश्विक एजेंडों से प्रभावित हो रही है। अब यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या वास्तव में असली मुद्दों से ध्यान हटाया जा रहा है? राष्ट्रीय विमर्श का यह असंतुलन केवल संयोग नहीं प्रतीत होता, बल्कि इसके पीछे कई कारक कार्य कर रहे हैं। पहला, कॉरपोरेट और वैश्विक एजेंडा, जिसके तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी ब्रांड छवि को प्रगतिशील दिखाने के लिए कुछ विशेष विषयों को प्राथमिकता देती हैं। दूसरा, विदेशी गैर-सरकारी संगठन तंत्र,
वीआईपी दर्शन के बढ़ते चलन में आम श्रद्धालु कहाँ खड़ा है?

डॉ. सत्यवान सौरभ भारत जैसे देश में जहाँ धर्म और आस्था केवल व्यक्तिगत विश्वास का विषय नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं वहाँ मंदिरों और तीर्थ स्थलों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। ये स्थान सदियों से समानता शांति और आध्यात्मिक संतुलन के प्रतीक माने जाते रहे हैं। भगवान के दरबार में सब बराबर हैं यह वाक्य केवल एक आदर्श नहीं बल्कि भारतीय समाज की गहरी मान्यता रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगते दिखाई दे रहे हैं। देश के कई प्रमुख मंदिरों और तीर्थ स्थलों पर वीआईपी दर्शन विशेष पूजन अभिषेक और आरती के नाम पर भारी शुल्क वसूले जा रहे हैं। इन सेवाओं के बदले श्रद्धालुओं को लंबी कतारों से मुक्ति कम समय में दर्शन और अधिक सुविधाजनक अनुभव दिया जाता है। पहली नजर में यह व्यवस्था एक विकल्प के रूप में दिखाई देती है लेकिन जब इसका असर आम श्रद्धालुओं के अनुभव पर पड़ता है तब यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बन जाती है। आज स्थिति यह है कि एक ओर वे लोग हैं जो अतिरिक्त पैसे देकर कुछ ही मिनटों में आराम से दर्शन कर लेते हैं वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में आम लोग घंटों कभी कभी पूरे दिन कतारों में खड़े रहते हैं। इस दौरान उन्हें भीड़ धक्का मुक्की बदतमीजी और कई बार मारपीट जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह अनुभव केवल असुविधाजनक नहीं बल्कि अपमानजनक भी होता है विशेषकर तब जब व्यक्ति अपनी आस्था और श्रद्धा के साथ वहां पहुंचा हो। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या आस्था भी अब एक प्रीमियम सेवा बनती जा रही है? क्या भगवान के दर्शन के लिए भी आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव होना चाहिए? यह स्थिति केवल धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमारे समाज में बढ़ती असमानता का प्रतिबिंब भी है। राशन की दुकानों से लेकर गैस सिलेंडर की लाइन तक और अब मंदिरों तक मिडल क्लास और आम आदमी के हिस्से में अक्सर अव्यवस्था और संघर्ष ही आता है। वीआईपी संस्कृति के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि इससे मंदिरों को अतिरिक्त राजस्व मिलता है जिससे उनकी व्यवस्था और सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सकता है। यह तर्क कुछ हद तक सही भी है। बड़े मंदिरों में रोजाना लाखों श्रद्धालु आते हैं जिनकी व्यवस्था करना आसान नहीं होता। ऐसे में यदि कुछ लोग अतिरिक्त शुल्क देकर अलग व्यवस्था चाहते हैं तो उससे प्राप्त धन का उपयोग सार्वजनिक सुविधाओं में किया जा सकता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह व्यवस्था असंतुलित हो जाती है। जब वीआईपी सुविधाएं इतनी अधिक हो जाती हैं कि आम श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध संसाधन और समय कम पड़ने लगते हैं तब यह एक प्रकार का अन्याय बन जाता है। कई बार देखा गया है कि वीआईपी दर्शन के लिए सामान्य कतारों को रोका जाता है जिससे आम लोगों का इंतजार और बढ़ जाता है। इससे असंतोष और आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है। इसके अलावा मंदिरों में कार्यरत कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों का व्यवहार भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई मामलों में आम श्रद्धालुओं के साथ कठोर और अपमानजनक व्यवहार किया जाता है जबकि वीआईपी लोगों के साथ अत्यधिक विनम्रता दिखाई जाती है। यह दोहरा व्यवहार समाज में पहले से मौजूद वर्ग विभाजन को और गहरा करता है। धार्मिक स्थलों की मूल भावना पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं होते बल्कि वे मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन के केंद्र होते हैं। जब वहां पहुंचने वाला व्यक्ति अव्यवस्था भीड़ और भेदभाव का सामना करता है तो उसकी आध्यात्मिक अनुभूति प्रभावित होती है। यह अनुभव उसे निराश और हताश कर सकता है। इस समस्या का समाधान आसान नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं। सबसे पहले मंदिर प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वीआईपी सेवाओं की संख्या और प्रभाव सीमित रहे। इन सेवाओं का उद्देश्य केवल अतिरिक्त सुविधा प्रदान करना होना चाहिए न कि आम श्रद्धालुओं के अधिकारों को कम करना। दूसरा भीड़ प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। ऑनलाइन बुकिंग टाइम स्लॉट सिस्टम और डिजिटल कतार प्रबंधन जैसे उपायों से भीड़ को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। इससे सभी श्रद्धालुओं को एक व्यवस्थित और सम्मानजनक अनुभव मिल सकता है। तीसरा कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों को संवेदनशीलता और शिष्टाचार का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। हर श्रद्धालु चाहे वह वीआईपी हो या आम व्यक्ति सम्मान का पात्र है। यह भावना केवल नीतियों में नहीं बल्कि व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। चौथा सरकार और संबंधित ट्रस्टों को इस मुद्दे पर स्पष्ट दिशा निर्देश बनाने चाहिए। धार्मिक स्थलों पर समानता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।अंततः यह भी जरूरी है कि समाज स्वयं इस मुद्दे पर जागरूक हो। जब तक लोग इस असमानता को सामान्य मानते रहेंगे तब तक इसमें बदलाव आना कठिन है। आस्था का अर्थ केवल पूजा पाठ नहीं बल्कि समानता करुणा और न्याय जैसे मूल्यों को अपनाना भी है। आज समय आ गया है कि हम यह सोचें कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ भगवान के दर्शन भी पैसे और पहुँच के आधार पर तय होंगे? या हम उस मूल भावना को बचाए रखेंगे जिसमें हर व्यक्ति को समान अधिकार और सम्मान प्राप्त हो? मंदिरों की पवित्रता केवल उनकी भव्यता या व्यवस्था से नहीं बल्कि वहां मिलने वाले अनुभव से तय होती है। यदि वह अनुभव भेदभाव और असमानता से भरा होगा तो आस्था की नींव कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए यह जरूरी है कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लें और मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाएं जहाँ हर श्रद्धालु को यह महसूस हो कि वह वास्तव में भगवान के दरबार में है जहाँ सब बराबर हैं।
नारी शिक्षा के अग्रदूत ज्योतिबा फुले

– मोहन मंगलमज्योतिबा फुले के संक्षिप्त नाम से ख्यात महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले महान समाजसेवी, समाज सुधारक, समाज प्रबोधक, विचारक, लेखक, दार्शनिक, विचारक, लेखक और क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे। उनकी विचारधारा स्वतंत्रता, समतावाद और समाजवाद पर आधारित थी। महिलाओं तथा पिछड़ों व अछूतों के उत्थान के लिए उन्होंने अनेक कार्य किए। उनका जीवन असमानता, जातिगत भेदभाव और अंधश्रद्धा के विरोध में संघर्ष का प्रतीक है। वे समाज के सभी वर्गों को शिक्षा प्रदान करने के प्रबल समर्थक और भारतीय समाज में प्रचलित जाति आधारित विभाजन व भेदभाव के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि सामाजिक बुराइयों का मुकाबला करने का एकमात्र जरिया है महिलाओं और दमित वर्ग के लोगों को शिक्षा देना। वे कुप्रथाओं और अंधश्रद्धा की जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे। नारी शिक्षा के अग्रदूत ज्योतिबा फुले ने अपना सम्पूर्ण जीवन स्त्रियों को शिक्षा प्रदान कराने में, स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में समर्पित कर दिया। ज्योतिबा का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था। उनकी माता का नाम चिमणाबाई तथा पिता का नाम गोविन्दराव था। उनका परिवार कई पीढ़ी पहले माली का काम करता था। वे सतारा से पुणे फूल लाकर गजरे आदि बनाने का काम करते थे, इसलिए ये लोग ‘फुले’ के नाम से जाने जाते थे। ज्योतिबा ने कुछ समय मराठी में अध्ययन किया। परंतु लोगों द्वारा पिता को यह कहने पर कि पढ़ने से तुम्हारा पुत्र किसी काम का नहीं रह जाएगा, पिता गोविंद राम ने उनकी पढ़ाई छुड़वा दी। बाद में जब उदार विचार वाले लोगों ने पिता को समझाया तो तीव्र बुद्धि के बालक ज्योतिबा का दाखिला स्कॉटिश मिशनरी हाई स्कूल (पुणे) में हुआ, जहाँ से उन्होंने शिक्षा पूरी की। संत-महात्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में ज्योतिबा की बड़ी रुचि थी। उन्हें ज्ञान हुआ कि जब भगवान के सामने सब नर-नारी समान हैं तो उनमें ऊँच-नीच का भेद क्यों होना चाहिए। 1848 में ही उन्होंने थॉमस पेन की पुस्तक ‘राइट्स ऑफ मैन’ पढ़ी। इसे पढ़ने के बाद उनके अंदर सामाजिक न्याय की गहरी समझ विकसित हुई। 1848 में 21 वर्ष की आयु में फुले ने अहमदनगर में ईसाई मिशनरी सिंथिया फैरर द्वारा संचालित एक बालिका विद्यालय का दौरा किया। उन्होंने महसूस किया कि भारतीय समाज में शोषित जातियाँ और महिलाएँ वंचित थीं, और इन वर्गों की शिक्षा उनकी मुक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक थी। उन्होंने युवा विधवाओं को अपने सिर मुंडवाते और जीवन में किसी भी प्रकार की खुशी से वंचित होते देखा। असमानता को बढ़ावा देने वाली इन सभी सामाजिक बुराइयों को देखकर उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी पत्नी से शुरुआत की। ज्योतिराव हर दोपहर अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ बैठते और जब वह खेतों में उन्हें भोजन देने आती थीं, तो उन्हें शिक्षित करते थे। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को प्रशिक्षण के लिए एक स्कूल में भेजा। पति-पत्नी ने 1848 में पुणे के विश्रामबाग वाडा में बालिका विद्यालय खोला। लड़कियों के लिए यह देश में पहला विद्यालय था। कुछ लोगों ने इस काम में बाधा डालने की कोशिश भी की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाव डालकर पति-पत्नी को घर से निकलवा दिया। इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन विद्यालय खोल दिए। निर्धन तथा निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए फुले ने मानव कल्याण, सुख, एकता, समानता, सरल धार्मिक सिद्धांतों और अनुष्ठानों के आदर्शों के साथ 24 सितंबर 1873 को सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इसके माध्यम से उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया और जाति व्यवस्था की निंदा की। ज्योतिबा बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। उन्होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए बहुत काम किया। किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किये। धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखीं। इनमें प्रमुख हैं – गुलामगिरी, तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत आदि। ‘गुलामगिरी’ में बताए गए विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में समाज सुधार के अनेक आंदोलन चले। स्त्रियों को शिक्षा प्रदान करने के महान कार्य के लिए 1883 में तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने ज्योतिबा फुले को ‘स्त्री शिक्षण के आद्य जनक’ कहकर गौरव प्रदान किया। महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया। ज्योतिबा फुले को 1876 में तत्कालीन पूना नगरपालिका में आयुक्त नियुक्त किया गया था और उन्होंने 1883 तक इस गैर-निर्वाचित पद पर कार्य किया। बॉम्बे के एक अन्य समाज सुधारक विट्ठलराव कृष्णाजी वांडेकर ने 11 मई 1888 को ज्योतिराव फुले को ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया था। ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र में अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए काम किया। उनके जन जागरुकता अभियान ने आगे चलकर डॉ. बी. आर. अंबेडकर और महात्मा गांधी की विचारधाराओं को प्रभावित किया, जिन्होंने बाद में जातिगत भेदभाव के खिलाफ बड़ी पहलें कीं। महान समाजसेवी ज्योतिबा फुले 28 नवंबर 1890 को इस संसार से सदा-सर्वदा के लिए विदा हो गए, लेकिन नारी जगत को अशिक्षा के अंधकार से निकालने तथा समाज को अंधविश्वास और कुरूढ़ियों से मुक्ति दिलाने वाले उनके कार्य सदैव समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
Energy Crisis : परमाणु ऊर्जा की नई सुबह: भारत ने ईंधन खत्म होने के डर को दी चुनौती

– निशान्त Energy Crisis : तमिलनाडु के कल्पक्कम में समुद्र के किनारे खड़ा एक रिएक्टर बाहर से देखने पर किसी और पावर प्लांट जैसा ही लगता है। लेकिन 6 अप्रैल 2026 को यहां कुछ ऐसा हुआ जिसने भारत की ऊर्जा कहानी को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया। Prototype Fast Breeder Reactor ने पहली क्रिटिकलिटी हासिल की। आसान भाषा में कहें तो इसके भीतर पहली बार नियंत्रित परमाणु श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हुई। यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है। यह उस सोच की शुरुआत है जिसमें ऊर्जा सिर्फ खपत नहीं होती बनाई भी जाती है। इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा। आज भारत की ऊर्जा व्यवस्था तीन बड़े दबावों के बीच खड़ी है। एक तरफ तेजी से बढ़ती मांग दूसरी तरफ आयातित ईंधन पर निर्भरता और तीसरी तरफ जलवायु परिवर्तन का दबाव। कोयला अभी भी सबसे बड़ा स्रोत है लेकिन उसी कोयले से सबसे ज्यादा एमिशन भी निकलते हैं। सोलर और विंड तेजी से बढ़ रहे हैं लेकिन वे हर वक्त उपलब्ध नहीं रहते। ऐसे में सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा रास्ता है जो लगातार बिजली भी दे एमिशन भी कम करे और ईंधन की चिंता भी कम करे। यहीं से Prototype Fast Breeder Reactor की कहानी शुरू होती है। आम रिएक्टरों में यूरेनियम का इस्तेमाल होता है और समय के साथ वह ईंधन खत्म हो जाता है। लेकिन यह फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अलग है। यह यूरेनियम और प्लूटोनियम के मिश्रण से चलता है और साथ ही आसपास मौजूद यूरेनियम-238 को बदलकर नया प्लूटोनियम पैदा करता है। यानी यह जितना ईंधन जलाता है उससे ज्यादा बना भी सकता है। ऊर्जा की दुनिया में यह वैसा ही है जैसे कोई इंजन पेट्रोल जलाते हुए खुद पेट्रोल भी बनाना शुरू कर दे। इस तकनीक की जड़ें उस विजन में हैं जिसे Homi J. Bhabha ने दशकों पहले रखा था। भारत के पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम बहुत ज्यादा है। इसलिए एक तीन-चरणीय कार्यक्रम बनाया गया। पहले चरण में यूरेनियम से बिजली और प्लूटोनियम बनता है। दूसरे चरण में जिसमें यह रिएक्टर आता है प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके और ज्यादा ईंधन तैयार किया जाता है। और तीसरे चरण में उसी ईंधन की मदद से थोरियम को उपयोग में लाया जाएगा। यानी यह रिएक्टर सिर्फ बिजली नहीं बना रहा यह भविष्य के लिए रास्ता तैयार कर रहा है। Madhya Pradesh Congress : एमपी कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की बड़ी परीक्षा: 15 अप्रैल से परफॉर्मेंस रिव्यू, कमजोर पाए गए तो हो सकती है छुट्टी अब इस पूरे विकास को जलवायु के नजरिए से देखें। दुनिया आज एक अजीब स्थिति में है। एक तरफ हमें फॉसिल फ्यूल से बाहर निकलना है दूसरी तरफ हमें हर वक्त बिजली भी चाहिए। सोलर और विंड इस दिशा में अहम हैं लेकिन वे इंटरमिटेंट हैं। यानी उनकी उपलब्धता मौसम पर निर्भर है। यहां परमाणु ऊर्जा एक बेसलोड विकल्प देती है। 24 घंटे स्थिर और कम एमिशन वाली बिजली। Prototype Fast Breeder Reactor इस मॉडल को और आगे ले जाता है। क्योंकि यह सिर्फ आज की बिजली नहीं आने वाले दशकों की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करता है। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर कामयाब होती है तो भारत को ईंधन के लिए बार-बार वैश्विक बाजार की तरफ देखने की जरूरत कम हो सकती है। यह बात आज के भू-राजनीतिक माहौल में और अहम हो जाती है। तेल और गैस की कीमतें युद्ध और संकट के साथ ऊपर-नीचे होती रहती हैं। ऐसे में घरेलू दीर्घकालिक और कम-एमिशन वाली ऊर्जा व्यवस्था एक रणनीतिक मजबूती बन जाती है। लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है जो उतना ही महत्वपूर्ण है। यह तकनीक आसान नहीं है। यह रिएक्टर पानी की जगह तरल सोडियम का इस्तेमाल करता है जो बहुत उच्च तापमान पर काम करता है। इससे दक्षता बढ़ती है लेकिन जोखिम भी बढ़ते हैं। इसलिए क्रिटिकलिटी हासिल करना सिर्फ शुरुआत है। अब अगले कुछ महीनों में इसे धीरे-धीरे पूरी क्षमता तक ले जाया जाएगा। हर चरण में परीक्षण होगा हर सिस्टम को परखा जाएगा। अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह 500 मेगावाट की पूरी क्षमता से बिजली देना शुरू कर सकता है। इसके बाद ही यह साफ होगा कि यह तकनीक बड़े पैमाने पर कितनी जल्दी और कितनी सुरक्षित तरीके से फैल सकती है। TI Posting In Aaron : जिले में बड़ा पुलिस फेरबदल, कोतवाली थाने की कमान राजकुमार शर्मा को सौंपी गई भारत की योजना यहीं रुकने की नहीं है। इस अनुभव के आधार पर 600 मेगावाट के और बड़े फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित करने की योजना है ताकि इस तकनीक को प्रोटोटाइप से निकालकर स्टैंडर्ड मॉडल बनाया जा सके। अगर यह सफल होता है तो भारत का परमाणु कार्यक्रम एक नए स्तर पर पहुंच सकता है जहां थोरियम आधारित ऊर्जा व्यवस्था भी हकीकत बन सकती है। लेकिन शायद इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा तकनीक नहीं सोच है। ऊर्जा के बारे में हमारी आम समझ यह रही है कि संसाधन सीमित हैं और एक दिन खत्म हो जाएंगे। लेकिन Prototype Fast Breeder Reactor इस सोच को चुनौती देता है। यह दिखाता है कि अगर तकनीक और नीति साथ आएं तो हम संसाधनों का इस्तेमाल सिर्फ उपभोग के लिए नहीं विस्तार के लिए भी कर सकते हैं। कल्पक्कम का यह रिएक्टर अभी शांत खड़ा है। इसके भीतर प्रतिक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं लेकिन इसका असली असर आने वाले वर्षों में दिखेगा। जब भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करेगा जब क्लाइमेट के दबाव और तेज होंगे और जब दुनिया ईंधन की अस्थिरता से जूझेगी तब शायद यह रिएक्टर एक जवाब की तरह सामने आए। एक ऐसा जवाब जो धीरे चलता है जटिल है लेकिन लंबी दूरी तय करने की क्षमता रखता है।
भारतीयता में समाहित है वैश्विक कल्याण का मार्ग

– प्रो. एस. के. सिंहवर्तमान में अविश्वास की परतों से घिरी हुई विश्व व्यवस्था अनेक प्रकार के संघर्षों एवं अस्थिरताओं से जूझ रही है। ईरान बनाम अमेरिका-इजराइल युद्ध, अमेरिका द्वारा वेनेजुएला में की गई असंगत कार्यवाही, लंबे समय से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध, पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव एवं बढ़ती असहिष्णुता इस बात का प्रमाण है कि आज विश्व गहरे संकट से गुजर रहा है। वस्तुत: पिछले कुछ समय की सैन्य गतिविधियों को देखकर तो ऐसा लग रहा है कि विश्व-व्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा गई है एवं धीरे-धीरे दुनिया ‘जंगलराज’ की ओर बढ़ रही है। टैरिफ को लेकर ट्रंप के अपरिपक्व एवं गैर-जिम्मेदार रवैये तथा पल-पल बदलते उनके बचकाने बयानों ने भूमंडलीकरण के मूल उद्देश्यों पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। जिस भूमंडलीकरण को परस्पर निर्भरता, वैश्विक सहयोग एवं साझा प्रगति का आधार माना गया था, आज वह कमजोर पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इन विषम परिस्थितियों में भारतीय दर्शन, भारत की संस्कृति अर्थात् ‘भारतीयता’ एक ऐसा विकल्प है जो विश्व में स्थायी शांति, संतुलन, समन्वय एवं सहयोग का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हजारों सालों से पूरी पृथ्वी को एक मानने एवं मानवता के समग्र कल्याण पर आधारित ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ जैसे भारतीय सिद्धांतों में विकास और प्रगति का अर्थ किसी एक व्यक्ति या किसी एक राष्ट्र का हित नहीं बल्कि समग्र रूप में पूरी मानवता का कल्याण करना है, अर्थात् ‘स्व’ से ‘सर्व’ की यात्रा ही भारतीयता है। भारतीयता के इस मूल भाव को भारतीय जीवन दृष्टि के विभिन्न पहलुओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भारतीयता का एक महत्वपूर्ण आयाम प्रकृति के साथ निकटता, सामंजस्य एवं संतुलन रखना है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में वृक्षों, नदियों, पर्वतों एवं धरती को पूजनीय माना गया है, जिसमें यह मान्यता है कि प्रकृति के साथ समन्वय रखकर ही पृथ्वी को बचाकर जीवन को सुरक्षित रखा जा सकता है। सत्य, परोपकार, त्याग, दया, करुणा, अहिंसा, सहिष्णुता, नैतिकता, भक्ति, समर्पण, संयम और राष्ट्रप्रेम जैसे भारतीय जीवन मूल्य, मूल्य-आधारित भारतीयता की आत्मा हैं। कई तरह की विविधताओं के बावजूद ‘अनेकता में एकता’ भी भारतीयता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। ‘साईं इतना दीजिए जामें कुटुम्ब समाय’ अर्थात् हमें उतना ही संचय करना चाहिए, जितना आवश्यक है। भारतीय मूल्यों की यह गहन अभिव्यक्ति भारतीयता के उस पहलू को उजागर करती है जहां व्यक्तिगत और सामूहिक हित साथ-साथ चलते हैं। इसके विपरीत पाश्चात्य चिंतन के मूल में व्यक्ति, भौतिकता, बाहरी दुनिया एवं बाहरी उपलब्धियां हैं। इसलिए पश्चिम का मूल स्वभाव स्वार्थ है न कि सद्भाव। जिसके कारण कभी-कभी किसी एक व्यक्ति की अनैतिक एवं अनुचित महत्वाकांक्षाओं का खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ता है। ईरान, अमेरिका-इजराइल युद्ध के चलते पूरी दुनिया में इंटरनेट बंद होने का खतरा मंडरा रहा है। अनगिनत लाभ होने के बावजूद अनियंत्रित लालच तथा विज्ञान एवं तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता हमारे विनाश का कारण भी बन सकती है। भारत का स्पष्ट मानना है कि विज्ञान का उपयोग मानवता एवं मानव कल्याण के लिए होना चाहिए न कि व्यक्तिगत लाभ तथा भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ एवं प्रभुत्व स्थापित करने के लिए। यही कारण है कि 16 से 20 फरवरी, 2026 को दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ की थीम ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ रखी गई थी। इसके पूर्व नई दिल्ली में ही आयोजित जी-20 के शिखर सम्मेलन की मुख्य थीम ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ थी, जिसमें वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर का नारा दिया गया था। स्पष्ट है कि भारत को जब भी दुनिया का नेतृत्व करने का अवसर मिला है, भारत ने सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की है। चूंकि विस्तारवादी सोच की शुरुआत हमेशा लालच से होती है, इसलिए भारतीय चिंतन में इस सोच को कभी भी प्रश्रय नहीं दिया गया। आध्यात्मिकता भारतीय चिंतन की मूल विशेषता है, इसलिए भारतीयता के हर पहलू में हमें इसकी झलक दिखाई देती है। सदियों से भारत में शिक्षा को विद्या, छात्र को विद्यार्थी एवं शिक्षक को गुरु कहा जाता था। शिक्षा हमें बाहरी ज्ञान एवं जीवनयापन सिखाती है, जबकि विद्या एक आंतरिक गुण है जो कि हमारे विवेक, संस्कारों एवं आचरण से जुड़ी होती है तथा हमें सही एवं गलत में भेद करना सिखाती है। शिक्षा सिर्फ सफलता तक सीमित रहती है जबकि विद्या हमें सार्थकता तक ले जाती है। श्री विष्णु पुराण में उल्लेख है कि ‘तत्कर्म यन्न बन्धाय, सा विद्या या विमुक्तये’ अर्थात् कर्म वही है जो बंधन में न बांधे और विद्या वही है जो मुक्त करे। यही कारण है कि भारतीयता में आत्म-बोध अर्थात् आत्म-साक्षात्कार पर विशेष बल दिया गया है। शिक्षा वह है जिसे प्राप्त करने के बाद विनम्रता आए एवं व्यक्ति, व्यक्तिगत लाभ की जगह सामूहिक हित को प्राथमिकता दे, इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में कहा गया है कि ‘विद्या ददाति विनयं’ अर्थात् सच्ची विद्या से व्यक्ति में विनम्रता आती है। भारतीय ज्ञान परंपरा त्याग, परोपकार एवं आत्मबोध पर आधारित होने के कारण संयम, उत्तरदायित्व एवं कर्तव्यबोध की भावना उत्पन्न करती है, जबकि पाश्चात्य ज्ञान परंपरा तर्क, विज्ञान एवं भौतिकता पर आधारित होने के कारण प्रतिस्पर्धा, अहंकार, श्रेष्ठता-बोध एवं आत्मकेन्द्रित बनाती है। यहां स्पष्ट है कि दुनिया में यदि स्थायी शांति एवं सद्भाव स्थापित करना है तो हमें भारतीयता के मूल्यों का प्रचार-प्रसार करना होगा। यहां पर यह उल्लेख करना आवश्यक है कि अतीत की ओर लौटना ही भारतीयता नहीं है, बल्कि ‘नित्य नूतन, चिर पुरातन’ की सोच के साथ भविष्य के लिए एक संतुलित एवं मानवीय मार्ग का निर्माण करना भारतीयता का एक प्रमुख गुण है। यह केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि भविष्य के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है। पर्यावरणीय असंतुलन, नैतिक पतन एवं सामाजिक विघटन के इस दौर में भारतीयता के मूल तत्वों से प्रेरित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि भारतीयता का मूल आधार भौगोलिक सीमाएं नहीं बल्कि समस्त जड़-चेतन एवं मानवता है। संघ के पंच परिवर्तन का किसी भी राजनीतिक दल द्वारा विरोध न किया जाना इसकी व्यापक स्वीकार्यता एवं सहमति का सबसे बड़ा प्रमाण है। भारतीयता एवं संवैधानिक आदर्शों से प्रेरित सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी चेतना एवं नागरिक कर्तव्य ऐसे आधारभूत मूल्य हैं जो न केवल भारत के उत्थान तक सीमित
आखिर कब तक बचाव कर पाएंगी ममता दीदी ?

– मृत्युंजय दीक्षित वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधनासभा चुनाव घोषित हो चुके हैं। जैसे -जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे वैसे राज्य की राजनीति का पारा चढ़ रहा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने प्रचार को आक्रामक बना चुकी हैं। उनके लिए इस बार राह उतनी आसान नहीं है। भारतीय जनता पार्टी भी इस बार हर हाल में बंगाल में अपनी सरकार बनाने को संकल्पबद्ध है। बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा में कहा था कि गंगा नदी बिहार से ही बंगाल में जाती है और उसी दिन से बंगाल मे राजनीतिक तपिश का अनुभव होने लगा था। बंगाल में ममता दीदी के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की राह बहुत आसान नहीं है क्योकि कांग्रेस और वामपंथी दल भी पूरी ताकत से ममता दीदी को हराने के लिए काम कर रहे हैं। उनकी अपनी ही पार्टी के निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद की नींव रखने और फिर नयी पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर राजनैतिक ध्रुवीकरण की समस्या पैदा कर दी है। मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर के कदमों का ममता दीदी की सरकार ने कोई प्रतिवाद नहीं किया कि कहीं उनके मुस्लिम मतदाता नाराज न हो जाएं। बंगाल की कानून व्यवस्था भी ममता बनर्जी के लिए चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए समस्या पैदा कर सकती है। संदेशखाली में महिलाओं के साथ घटित वीभत्स घटना के आरोपी को बचाने से लेकर आर. जी कर में महिला डाक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की भयंकर घटना में शामिल तृणमूल समर्थकों को बचाने के प्रयास चुनाव प्रचार के दौरान जमकर उछाले जायेंगे। इसके अलावा बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार अनेक घोटालों में बुरी तरह से फंसी हुई है और उन सभी घोटालो की जांच रही है। चुनाव आयोग की तरफ से मतदाता सूची के शुद्धीकरण के गहन अभियान को ममता बनर्जी ने जिस तरह बाधित करने का प्रयास किया उससे उनकी अपनी ही छवि ख़राब हुई है। मतदाता शुद्धीकरण अभियान के दौरान ममता बनर्जी व उनकी पार्टी ने पूरा दम लगा दिया कि किसी प्रकार इस कार्य को बाधित किया जाए या रोक दिया जाए। ममता की ओर से एसआईआर को लेकर भ्रम पैदा करने के पूरे प्रयास किए गए जिसमें उनकी ओर से पहले कहा गया कि वह एसआईआर फार्म नहीं भरेंगी और फिर उन्होंने भर भी दिया। आई पैक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान ममता जी जिस तरह पुलिस लेकर पहुँच गयीं वह हास्यास्पद था लेकिन अब उनके लिए अत्यंत गंभीर समस्या बनने जा रहा है। अब आई पैक का प्रकरण हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ममता दीदी ने कहा है कि बीजेपी ईडी के सहारे उनकी पार्टी की रणनीति चुराना चाहती है। आई- पैक प्रकरण को लेकर वह अत्यंत आक्रामक मुद्रा हैं। आई- पैक प्रकारण में ग्रीन फाइल को लेकर प्रश्न किया जा रहा है कि आखिर उन ग्रीन फाईल में ऐसा क्या था जिसे पाने के लिए ममता दीदी ने राज्य पुलिस की पूरी ताकत लगा दी। अब ईडी उन फाईल्स को तत्काल पाने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई है। अदालत में दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी याचिकाएं लगा दी है। आई -पैक प्रकरण में ईडी की छापेमारी की खबर मीडिया में आग की तरह फैली और उसके बाद से ही कोलकाता से लेकर नई दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तीव्र हो गई। टीवी चैनलों पर संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमने वाले आ गए और कहा जाने लगा कि चुनाव से दो -तीन महीने पहले ही यह छापेमारी क्यों शुरू हो जाती है ? जबकि वास्तविकता यह है कि यह जांच काफी समय से चल रही है इस घोटाले की जांच रुकवाने के लिए तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी ने एक याचिका दायर की थी जो खारिज हो चुकी है। ईडी का यह छापा तृणमूल कांग्रेस आईटी सेल के हेड प्रतीक जैन के घर और कार्यालय पर पड़ा था और माना जा रहा है कि उनके रिश्ते चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से भी हैं बिहार में अपनी सरकार बनने का सपना देखने वाले प्रशांत किशोर बंगाल में ममता दीदी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक हैं। यही कारण है कि जब ईडी का छापा पड़ा और ममता दीदी की पुलिस ने ईडी के कब्जे से ग्रीन फाइल अपने कब्जे में ली तभी से यह आरोप लगाया जाने लगा कि आखिर ममता दीदी की दाल में कुछ तो काला है । आखिर क्यों उन्हें ग्रीन फाइलों से इतना लगाव है? पहले ममता जी धमकी देते हुए कह रही थीं कि अगर वह बीजेपी के कार्यालाय में घुस गयीं तो क्या हो जाएगा और अब कह रही हैं कि जब बीजेपी को पता चला कि अबकी बार बीजेपी को पहले की तुलना में भी कम सीटें आ रही हैं तब उन्होंने हमारी रणनीति चुराने का प्रयास किया । जबकि प्रवर्तन निदेशालय ने अब सरकारी काम में बाधा डालने तथा कोयला घोटाले में ममता दीदी व तृणमूल सरकार को आरोपी बनाने का फैसला किया है। ममता दीदी के सामने अब वैसी गंभीर चुनौती है जैसी दिल्ली के मुख्यंमत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष आ गई थी। अगर ममता दीदी को कोर्ट से राहत नहीं मिलती या वे ग्रीन फाइल्स को लेकर जांच एजेंसियों के साथ टकराव का रास्ता अपनाती हैं तो केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने पर मजबूर हो सकती है। बंगाल में लंबे समय से कई अवसरों पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग भाजपा व अन्य संगठनों की ओर से लगातार की जा रही है किंतु अभी तक केंद्र की राजग सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जबकि राज्य में चुनावों के समय तृणमूल कांग्रेस के संगठित अपराधियों द्वारा चुनावी हिंसा का दौर प्रांरभ हो जाता है जिसके शिकार भाजपा व हिंदू संगठनो के कार्यकर्ता होते हैं। अभी आई -पैक प्रकरण के दौरान मची हलचल के बीच भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की कार पर हमला बोला गया और वह आरोपियों पर कार्रवाई करने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए। ऐसा नहीं है कि ममता दीदी
‘सभ्यता खत्म’ के बयान पर घिरते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

-सुनील कुमार महलामध्य-पूर्व में जारी युद्ध को 40 दिन से अधिक समय हो चुका है तथा लगातार हमलों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दुनिया स्पष्ट रूप से दो धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पेश एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रूस और चीन के वीटो के कारण पारित नहीं हो सका। बहरीन द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव में होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपील की गई थी। पाठकों को बताता चलूं कि 15 सदस्यीय परिषद में इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 वोट पड़े, जबकि रूस और चीन ने विरोध में मतदान किया। वहीं पर पाकिस्तान और कोलंबिया इस मतदान से दूर रहे।आवश्यक 09 मत मिलने के बावजूद, वीटो के चलते प्रस्ताव असफल हो गया। इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को समझौते के लिए दी गई समय-सीमा समाप्त होने से एक दिन पहले, 7 अप्रैल 2026 (मंगलवार) को अमेरिकी सेना ने खर्ग द्वीप पर हमला किया। इसके समानांतर, इजरायल की सेना ने ईरान के भीतर रेल पटरियों और पुलों को निशाना बनाते हुए बमबारी की। जवाब में ईरान ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें और रॉकेट दागे। हालांकि, व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि वह ईरान के खिलाफ परमाणु हथियारों के उपयोग पर विचार नहीं कर रहा है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ईरान स्थित भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों के लिए नई एडवाइजरी जारी की, जिसमें अगले 48 घंटे तक अपने स्थान पर ही सुरक्षित रहने की सलाह दी गई। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि ‘आज रात एक पूरी सभ्यता समाप्त हो सकती है, जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा।’ दूसरी ओर, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने दावा किया कि 1 करोड़ 40 लाख से अधिक ईरानी देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि मध्य-पूर्व के इस युद्ध के प्रभाव लगातार गंभीर होते जा रहे हैं और इजरायली हमलों में ईरान के आठ पुल नष्ट हो चुके हैं तथा कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। जानकारी अनुसार इजरायल ने तेहरान, करज, काशान और कोम में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जबकि ईरान ने इजरायल पर सात बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इतना ही नहीं, कुवैत से दागे गए एक रॉकेट हमले में इराक में तीन लोगों की मृत्यु हुई। वहीं, ईरान द्वारा कतर पर दागी गई मिसाइलों को कतर ने नाकाम करने का दावा किया है। इस बीच ईरान की विशेष सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने संभावित हमलों के लक्ष्यों की सूची भी जारी की है।सच तो यह है कि इस युद्ध का असर पूरे विश्व समेत भारत पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। दिल्ली-एनसीआर में इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड ने पाइप्ड नैचुरल गैस (पीएनजी) के दामों में 1.70 रुपये प्रति एससीएम की वृद्धि की है, जो 1 अप्रैल से लागू हो चुकी है। इसके अलावा, एयर इंडिया ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर ईंधन शुल्क बढ़ा दिया है, जिसके तहत घरेलू उड़ानों में 299 रुपये से 899 रुपये तक की बढ़ोतरी की गई है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद शुरू हुआ यह युद्ध एक महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीच-बीच में युद्धविराम की चर्चाएं जरूर होती हैं, लेकिन वे जल्द ही तीव्र हमलों के बीच दब जाती हैं। ताजा घटनाक्रम में जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि अमेरिका ने खर्ग द्वीप पर पुनः हमला किया, जबकि ईरान के अल्बोर्ज प्रांत में हुए हवाई हमले में कम से कम 18 लोगों की मौत हुई है। डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान निर्धारित समय तक होर्मुज जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बहाल नहीं करता, तो उसके बिजली संयंत्रों और पुलों पर व्यापक बमबारी की जाएगी। इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या नागरिक ढांचे पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध की श्रेणी में आते हैं। यहां यह गौरतलब है कि पहले ही एक स्कूल पर हुए हमले में बच्चियों की मौत को लेकर अमेरिका और इजरायल की आलोचना हो चुकी है। वास्तव में अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस युद्ध में मानवीय संवेदनाएं पीछे छूटती जा रही हैं। जहां अमेरिका और इजरायल ईरान पर लगातार हमले कर रहे हैं, वहीं ईरान भी इजरायल और मध्य-पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है। इसके परिणामस्वरूप पूरे क्षेत्र में कच्चे तेल के उत्पादन और आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव पड़ा है, जिससे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और खाद्य संकट गहराता जा रहा है।इधर, युद्धविराम के प्रयास भी ठोस परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। ईरान ने 45 दिनों के युद्धविराम प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया है कि वह केवल स्थायी शांति और भविष्य में हमले न किए जाने की गारंटी चाहता है। यह मांग कूटनीतिक दृष्टि से तार्किक प्रतीत होती है, क्योंकि अस्थायी समाधान मूल समस्याओं का निवारण नहीं कर सकते। कहना ग़लत नहीं होगा कि वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि सभी पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े हुए हैं, जिससे समाधान की संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं। ऐसे में यह बड़ा प्रश्न उभरता है कि जब व्यापक विनाश के बाद यह युद्ध समाप्त होगा, तब शांति की कीमत कितनी भारी होगी। इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल के पहले सप्ताह में ईरान के साथ दो सप्ताह के सीज़फायर की घोषणा की, जिसके तहत तत्काल बमबारी को टाल दिया गया। यह घोषणा संभावित हमले की तय समयसीमा से ठीक पहले की गई, जिससे क्षेत्र में बढ़ते तनाव को अस्थायी रूप से नियंत्रित करने का प्रयास हुआ। हालांकि, यह सीज़फायर कुछ शर्तों पर आधारित है, इसलिए हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं और मध्य-पूर्व में तनाव अभी भी बना हुआ है। अंत में यही कहूंगा कि , इस युद्ध को समाप्त करने के लिए सबसे पहले तत्काल और पूर्ण युद्धविराम आवश्यक है, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सक्रिय भूमिका अनिवार्य होगी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र या ओमान जैसे निष्पक्ष मध्यस्थों के माध्यम
युद्ध के माहौल में विश्व शांति का शंखनाद है विश्व णमोकार दिवस

-ललित गर्ग विश्व इतिहास के इस संक्रमणकाल में, जब मानवता युद्ध, हिंसा, आतंक, तनाव और असहिष्णुता के बोझ तले कराह रही है, ऐसे समय में 9 अप्रैल 2026 को मनाया जाने वाला विश्व णमोकार मंत्र दिवस एक अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा-विस्फोट के रूप में सामने आ रहा है। यह दिवस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि दिव्य चेतना के जागरण का ऐसा अवसर है, जिसमें सामूहिक मंत्रोच्चारण से उत्पन्न होने वाली चमत्कारी और सिद्ध शक्तियां पूरे विश्व को आलोकित करने वाली हैं। “एक विश्व, एक दिन, एक मंत्र”-इस संकल्प के साथ प्रातः जब संपूर्ण पृथ्वी पर एक साथ णमोकार महामंत्र का उच्चारण होगा, तब यह केवल ध्वनि नहीं होगी, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा तरंग का निर्माण होगा। आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार, जब लाखों-करोड़ों लोग एक ही समय पर एक ही पवित्र मंत्र का उच्चारण करते हैं, तो उससे उत्पन्न स्पंदन वातावरण को शुद्ध करते हैं, नकारात्मक ऊर्जा का क्षय करते हैं, सकारात्मक चेतना का तीव्र प्रसार करते हैं और शांति एवं अहिंसा का शंखनाद करते हैं। यह सामूहिक ऊर्जा ‘संकल्प शक्ति’ के रूप में कार्य करती है, जो असंभव को संभव बनाने की क्षमता रखती है। यह विलक्षण दिवस हजारों मंदिरों एवं अन्य स्थलों में जातीय बंधनों को तोड़कर सभी समुदाय, जाति, वर्ग के लोगों को सम्मिलित होने का अवसर देकर एक प्रेरणादीप बनेगा, जहां मैत्री के फूल खिलेंगे, शांति एवं सद्भावना की ज्योति रश्मियां जगमगायेगी। मानव ने ज्ञान-विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति की है। परन्तु अपने और औरों के जीवन के प्रति सम्मान में कमी आई है। विचार-क्रान्तियां बहुत हुईं, किन्तु आचार-स्तर पर क्रान्तिकारी परिवर्तन कम हुए। शान्ति, अहिंसा और मानवाधिकारों की बातें संसार में बहुत हो रही हैं, किन्तु सम्यक्-आचरण, सम्यक्-चरित्र, सम्यक्-दृष्टि का अभाव अखरता है। सिद्ध एवं चमत्कारी णमोकार महामंत्र सम्यक्-आचरण को उद्घाटित करने वाला किसी धर्म विशेष का नहीं है़, यह एक सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सार्वदैशिक मंत्र है, जिसका उच्चारण कर व्यक्ति शुद्ध आचरण एवं स्वस्थ जीवनशैली को आकार देते हुए शांति, अहिंसा, अयुद्ध, सह-जीवन का साकार कर सकता है। ‘णमोकार महामंत्र’ के सामूहिक उच्चारण के माध्यम से दुनिया भर के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास है। यह आयोजन विश्व शांति, आत्मशांति, सद्भावना और आध्यात्मिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन-जीतो संस्था के द्वारा कराया जा रहा है़। इस विराट आयोजन में 180 से अधिक देशों के लाखों श्रद्धालु भाग लेंगे। विश्वभर में 100 से अधिक मेगा इवेंट्स और 6000 से अधिक मंदिरों एवं स्थलों पर यह सामूहिक जाप होगा। दिल्ली के मुख्य समारोह में भारत के 14वें राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद एवं गृहमंत्री श्री अमित शाह की उपस्थिति इस आयोजन को वैश्विक पहचान प्रदान करेगी। इस आयोजन से उत्पन्न होने वाली चमत्कारी और सिद्ध शक्तियों का वर्णन केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि अनुभव का विषय भी है। यह मंत्र आत्मा के गहनतम स्तर को स्पर्श करता है, जहां से चेतना की शुद्ध धारा प्रवाहित होती है। ऐसा माना जाता है कि इस सामूहिक जाप के दौरान- मानसिक शांति और स्थिरता का अद्भुत अनुभव होता है, जिससे तनाव, भय और अवसाद स्वतः क्षीण होते हैं। आभामंडल की शुद्धि होती है, जिससे व्यक्ति की ऊर्जा सकारात्मक और प्रभावशाली बनती है। रोगों में राहत और स्वास्थ्य में सुधार के अनेक अनुभव सामने आते हैं, क्योंकि सकारात्मक कंपन शरीर की कोशिकाओं को संतुलित करते हैं। संकल्प सिद्धि की शक्ति बढ़ती है अर्थात् जो शुभ संकल्प किए जाते हैं, वे पूर्ण होने की दिशा में तीव्र गति से अग्रसर होते हैं। कर्म निर्जरा (कर्मों का क्षय) की प्रक्रिया तेज होती है, जिससे आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति संभव होती है। दुनिया में अनेक मंत्र हैं, किंतु दो मंत्र विशेष रूप से प्रभावशाली माने जाते हैं गायत्री मंत्र और णमोकार महामंत्र। णमोकार मंत्र न केवल जैन धर्म का मूल मंत्र है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि और चेतना के उत्कर्ष का सार्वभौमिक सूत्र है। इसकी शक्ति अनंत और अक्षय मानी जाती है। इसमें किसी व्यक्ति का नहीं, किंतु संपूर्ण रूप से विकसित और विकासमान विशुद्ध आत्मस्वरूप का ही दर्शन, स्मरण, चिंतन, ध्यान एवं अनुभव किया जाता है। लौकिक मंत्र आदि सिर्फ लौकिक लाभ पहुँचाते हैं, किंतु लोकोत्तर मंत्र लौकिक और लोकोत्तर दोनों कार्य सिद्ध करते हैं। इसलिए णमोकार मंत्र सर्वकार्य सिद्धिकारक लोकोत्तर मंत्र माना जाता है, सब पापों का नाश करने वाला है, यह अद्भुत शांति का कारक है। यह संसार में सबसे उत्तम मंगल को घटित करने वाला सिद्ध मंत्र है। णमोकार-स्मरण से अनेक लोगों के रोग, दरिद्रता, भय, तनाव, अशांति, विपत्तियाँ दूर होने की अनुभव सिद्ध घटनाएँ सुनी जाती हैं। मन चाहे काम आसानी से बन जाने के अनुभव भी सुने हैं। णमोकार महामंत्र के जाप एवं साधना से उत्पन्न ऊर्जा एक पाथेय है जीवनशैली को बदलने का, पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति जागरूक होने का, शांति एवं अहिंसक जीवनशैली का, शरीर, मन, आत्मा एवं प्रकृति के प्रति सचेत रहने का। मूल्यों का सम्बन्ध तो ‘जियो और जीने दो’ जैसे सरल श्रेष्ठ उद्घोष से है, जो णमोकार महामंत्र की सार्थक निष्पत्ति है। इस मंत्र के प्रथम पाँच पदों में 35 अक्षर और शेष दो पदों में 33 अक्षर हैं। इस तरह कुल 68 अक्षरों का यह महामंत्र समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाला व कल्याणकारी अनादि सिद्ध मंत्र है। इसकी आराधना करने वाला स्वर्ग यानी मोक्ष- संसारबंधनों मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। यह मन्त्र एक भावना है, एक इच्छा है, एक कामना है जो बार बार दोहराई जाती है ताकि वैसा हो जाए, इस दृष्टि में उन्नत विश्व संरचना, हिंसा एवं युद्ध मुक्ति के लिये यह कारगर है। सह-अस्तित्व के लिए अहिंसा अनिवार्य है और अहिंसा को फलित करने के लिये णमोकार महामंत्र अचूक उपक्रम है, अनुष्ठान है। दूसरों का अस्तित्व मिटाकर अपना अस्तित्व बचाए रखने की कोशिशें व्यर्थ और अन्ततः घातक होती हैं। भगवान् महावीर का संदेश कि “सुख सबको प्रिय है, दुःख अप्रिय”-इस मंत्र की मूल भावना है। जब यह मंत्र करोड़ों कंठों से एक साथ गूंजता है, तो यह केवल शब्द नहीं रहता, बल्कि करुणा, अहिंसा और सह-अस्तित्व की वैश्विक घोषणा बन जाता है। आचार्य उमास्वाति की उक्ति “परस्परोपग्रहो जीवानाम्” इस सामूहिक साधना के माध्यम से जीवंत हो उठती है। गतवर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने उद्बोधन में इस मंत्र को “आंतरिक क्रांति का माध्यम” बताया था।
ऊर्जा संकट से कैसे बाहर निकलें मजदूर ?

– सौरभ वार्ष्णेयआज जब देश ऊर्जा संकट की चुनौती से जूझ रहा है, उसका सबसे गहरा असर समाज के उस वर्ग पर पड़ रहा है जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है—मजदूर वर्ग। महंगी बिजली, बढ़ते ईंधन दाम और अनिश्चित रोजगार ने मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को और कठिन बना दिया है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मजदूर इस संकट से कैसे बाहर निकलें और सरकार व समाज उनकी कैसे मदद कर सकते हैं। ऊर्जा संकट केवल बिजली की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कोयला आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, और नीतिगत कमजोरियों से भी जुड़ा है। जब उद्योगों की लागत बढ़ती है, तो सबसे पहले असर मजदूरों की मजदूरी और रोजगार पर पड़ता है। कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर हैं, जिससे मजदूरों का पलायन तेज हो रहा है। ऊर्जा संकट के बीच मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन ने गहरी चिंता पैदा कर दी है। देश में बढ़ते ऊर्जा संकट ने केवल उद्योगों और अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि इसका सबसे बड़ा असर आम मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है। बिजली की कमी, महंगी ऊर्जा और घटते औद्योगिक उत्पादन के कारण शहरों में रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ रहे हैं। ऐसे हालात में मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन फिर से तेज होता दिख रहा है। ऊर्जा संकट का सीधा असर फैक्ट्रियों और छोटे उद्योगों पर पड़ा है। कई उद्योग या तो बंद हो गए हैं या सीमित क्षमता पर काम कर रहे हैं। इससे दिहाड़ी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय पर गहरा असर पड़ा है। जब शहरों में काम नहीं मिलता, तो मजदूरों के सामने अपने गांव लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह स्थिति हमें कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान हुए बड़े पैमाने के पलायन की याद दिलाती है, जब लाखों मजदूर शहरों से अपने गांवों की ओर लौट गए थे। हालांकि मौजूदा संकट उतना अचानक नहीं है लेकिन इसके प्रभाव धीरे-धीरे उतने ही गंभीर होते जा रहे हैं।गांवों में लौटने के बाद मजदूरों को रोजगार की गारंटी नहीं मिलती। कृषि पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर है और सभी के लिए पर्याप्त अवसर नहीं दे सकती। ऐसे में ग्रामीण बेरोजगारी और गरीबी बढऩे का खतरा है। इससे सामाजिक और आर्थिक असंतुलन और गहरा सकता है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान निकाले और साथ ही शहरी रोजगार को बचाए। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, छोटे उद्योगों को राहत देना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना समय की मांग है।मजदूरों का यह पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर देश के विकास की गति पर भी पड़ सकता है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां आर्थिक प्रगति की गाथाएं अक्सर सुनाई जाती हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसकी रोज़मर्रा की जि़ंदगी आज भी संघर्षों से भरी हुई है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं — यह कथन सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बहुत दूर नहीं है। जब तक मजदूर को स्थायी रोजगार, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक उसकी स्थिति में ठोस सुधार संभव नहीं है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं — यह न तो पूरी तरह फ़साना है, न ही हर जगह की सच्चाई। यह उस कड़वी हकीकत का प्रतीक है, जिसे हम अक्सर आंकड़ों और विकास के शोर में नजरअंदाज कर देते हैं। समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि मजदूर वर्ग को सिर्फ योजनाओं का लाभ ही नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर भी मिले। तभी असली विकास संभव होगा। देश के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूर आज भी अस्थिर आय, महंगाई और सामाजिक सुरक्षा की कमी से जूझ रहे हैं। दिहाड़ी मजदूर की कमाई अक्सर इतनी सीमित होती है कि वह सिर्फ दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर पाता है। ऐसे में अगर एक दिन भी काम न मिले, तो चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है। महंगाई ने इस संकट को और गहरा किया है। रसोई गैस, खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि ने गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी है। कई जगहों पर आज भी लोग लकड़ी या कंडे से खाना बनाने को मजबूर हैं। हालांकि यह भी सच है कि सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाई हैं—मुफ्त राशन, उज्ज्वला योजना, मनरेगा जैसी योजनाएं मजदूरों को राहत देने का प्रयास करती हैं। इन योजनाओं से कई परिवारों की स्थिति में सुधार भी आया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं हर जरूरतमंद तक पूरी तरह पहुंच पा रही हैं? अक्सर भ्रष्टाचार, जानकारी की कमी और व्यवस्थागत खामियों के कारण कई मजदूर इन लाभों से वंचित रह जाते हैं। समस्या केवल आय की नहीं, बल्कि असमानता और अवसरों की भी है। समाधान के रास्तेपहला समाधान यह हो सकता है कि सरकारी हस्तक्षेप यानी सरकार को सस्ती बिजली और ईंधन उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी और राहत पैकेज देने चाहिए। ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए विशेष योजनाएं बनाई जानी चाहिए। दूसरा वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देना । सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना इस संकट का स्थायी समाधान हो सकता है। अगर मजदूरों को सोलर पैनल जैसी सुविधाएं सस्ती दरों पर मिलें, तो वे अपनी ऊर्जा जरूरतें खुद पूरी कर सकते हैं। तीसरा रोजगार के नए अवसर पैदा करना ऊर्जा क्षेत्र में ही रोजगार सृजन किया जा सकता है—जैसे सोलर इंस्टॉलेशन, बैटरी मेंटेनेंस आदि। इससे मजदूरों को नया कौशल और काम मिलेगा। चौथा सामाजिक सुरक्षा यानी मजदूरों के लिए राशन, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि वे संकट के समय भी सम्मानजनक जीवन जी सकें। ऊर्जा संकट केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता को बढ़ाने वाला मुद्दा भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा मजदूर वर्ग को ही भुगतना पड़ेगा। सरकार, उद्योग और समाज—तीनों को मिलकर ऐसा समाधान खोजना होगा जिससे विकास की रोशनी