स्वराज्य ही उनके लिए सर्वस्व था : छत्रपति संभाजी महाराज

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, तब वीरता, संघर्ष और स्वराज्य की रक्षा के प्रेरणापुंज छत्रपति संभाजी महाराज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। उनका संपूर्ण जीवन अदम्य साहस, अटूट आत्मसम्मान और धर्म तथा स्वराज्य के लिए सर्वोच्च बलिदान की प्रेरक गाथा है। 11 मार्च 1689 का दिन भारतीय इतिहास में उस अमर क्षण के रूप में अंकित है, जब ‘स्वराज्य’ के इस महान रक्षक ने औरंगजेब की इस्लामिक जिहादी क्रूर यातनाओं के सामने झुकने की बजाय अपने प्राणों का बलिदान देना ही उचित माना। यही कारण है कि उन्हें भारत के राष्ट्रीय चेतना के हिन्दू-सनातन भाव भरे इतिहास में स्वराज्य रक्षक के रूप में स्मरण किया जाता है। छत्रपति संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले में हुआ था। उनकी माता साईबाई थीं, जो छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रथम पत्नी थीं। दुर्भाग्य से संभाजी महाराज की माता का निधन तब हो गया जब वे मात्र दो वर्ष के थे। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी वीरमाता जीजाबाई ने किया। जीजाबाई ने बचपन से ही उनमें धर्म, साहस, स्वाभिमान और स्वराज्य की रक्षा के संस्कार भर दिए। यही संस्कार आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति बने। प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक ‘शिवाजी एंड हिज टाइम्स’ में लिखते हैं, “शिवाजी की पहली पत्नी साईबाई से 14 मई 1657 को उनके ज्येष्ठ पुत्र संभाजी का जन्म हुआ।” (पृष्ठ 64) यह दिन उस महान व्यक्तित्व की शुरुआत है जिसने आगे चलकर मराठा साम्राज्य की रक्षा में अद्वितीय भूमिका निभाई। संभाजी महाराज बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी, साहसी और बुद्धिमान थे। मात्र नौ वर्ष की आयु में उन्हें 1665 की पुरंदर संधि के बाद मुगलों के पास राजनीतिक बंधक के रूप में भेजा गया। वहाँ उन्हें आमेर के राजा जयसिंह प्रथम के साथ रहना पड़ा। मुगल दरबार की राजनीति, कूटनीति और शक्ति के स्वरूप को उन्होंने बहुत निकट से देखा। यह अनुभव उनके जीवन का पहला राजनीतिक पाठ था, जिसने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ बना दिया। इतिहासकार स्टुअर्ट गॉर्डन ‘द मराठाज 1600–1818’ पुस्तक में लिखते हैं कि “बचपन में ही संभाजी ने असाधारण बुद्धिमत्ता और साहस का परिचय दिया, जिसने आगे चलकर उनके नेतृत्व को आकार दिया।”(पृष्ठ 88)। वस्तुत: 1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर संकट उत्पन्न हो गया। शिवाजी महाराज की दूसरी पत्नी सोयराबाई अपने पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं। इससे राज्य में राजनीतिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई। लगभग नौ महीनों तक चली इस स्थिति के बाद सेनापति हम्बीरराव मोहिते और अन्य प्रमुख मराठा सरदारों के समर्थन से 1681 में संभाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ और वे मराठा साम्राज्य के छत्रपति बने। इसका विस्तारित उल्लेख इतिहासकार गोविंद सखाराम सरदेसाई ने पुस्तक ‘न्यू हिस्ट्री ऑफ द मराठाज खंड 1’ में बहुत विस्तार से किया है, उनका कहना हैकि “संक्षिप्त संघर्ष के बाद 1681 में संभाजी ने प्रमुख मराठा सरदारों के समर्थन से सिंहासन ग्रहण किया।”(पृष्ठ 322)। छत्रपति बनने के बाद संभाजी महाराज ने अपने पिता की स्थापित हिंदवी स्वराज्य की परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने प्रशासन को सुदृढ़ किया, योग्य अधिकारियों की नियुक्ति की और आठ मंत्रियों की परिषद को सक्रिय बनाए रखा। उन्होंने न्याय व्यवस्था को मजबूत किया और प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि माना। उनके शासन में अनुशासन, संगठन और प्रशासनिक क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है। संभाजी महाराज एक महान योद्धा होने के साथ ही विद्वान और साहित्यप्रेमी भी थे। उन्हें संस्कृत और मराठी भाषा का गहन ज्ञान था। उन्होंने बुधभूषण, नायिकाभेद और सतशतक जैसी साहित्यिक रचनाएँ भी कीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे युद्ध के साथ-साथ संस्कृति और ज्ञान के भी संरक्षक थे। इतिहासकार कमल गोखले अपनी पुस्तक ‘संभाजी’ में उनके इस व्यक्तित्व के गुण पर गहराई से प्रकाश डाला है, वे लिखती हैं, “लगातार युद्धों के बावजूद संभाजी ने साहित्य और विद्वता को प्रोत्साहित किया और स्वयं संस्कृत ग्रंथों की रचना की।”(पृष्ठ 145)। दूसरी ओर यह भी उनके जीवन का बड़ा सत्य है कि संभाजी महाराज का अधिकांश शासनकाल युद्धों में बीता। मुगल सम्राट औरंगजेब इस्लाम की जिहादी मानसिकता की पराकाष्ठा तक भरा हुआ था, उसे हिन्दू एक आंख नहीं सुहाते थे, ऐसे में वो हिन्दवी स्वराज्य को कैसे स्वीकार्य कर सकता था, वो मराठा साम्राज्य को समाप्त करना चाहता था। इसी उद्देश्य से वह स्वयं विशाल सेना लेकर दक्षिण भारत आ गया। 1682 से 1688 तक संभाजी महाराज ने मुगलों, पुर्तगालियों और अन्य शत्रुओं के विरुद्ध लगातार युद्ध किए। उन्होंने अपने पिता शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति को अपनाया। इस युद्ध नीति में अचानक आक्रमण करना, घात लगाकर हमला करना और तुरंत पीछे हट जाना शामिल था। इस रणनीति के कारण मुगलों की विशाल सेना भी मराठों के सामने कई बार असहाय हो जाती थी। इतिहासकार जदुनाथ सरकार शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति पर विस्तार से लिखते हैं, और अपनी पुस्तक में संभाजी द्वारा इसके उपयोग पर गहराई से बात करते हैं, वे कहते हैं- “संभाजी ने शिवाजी की गुरिल्ला युद्ध नीति को आगे बढ़ाया और औरंगजेब का अत्यंत दृढ़ता से प्रतिरोध किया।”(जदुनाथ सरकार, हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब, खंड 5, पृष्ठ 231)। हालाँकि 1687 में वाई के युद्ध में मराठा सेना के महान सेनापति हम्बीरराव मोहिते वीरगति को प्राप्त हो गए। इससे मराठा सेना का मनोबल प्रभावित हुआ और परिस्थितियाँ धीरे-धीरे कठिन होती गईं। अंततः 1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में शिरके कबीले के कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने संभाजी महाराज को बंदी बना लिया। उनके साथ उनके प्रिय मित्र और विद्वान कवि कलश भी बंदी बनाए गए। संभाजी महाराज को औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया गया। औरंगजेब ने कई दिनों तक उन्हें अमानवीय यातनाएँ दीं और इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला। लेकिन संभाजी महाराज अपने धर्म, स्वाभिमान और स्वराज्य के आदर्शों से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इतिहासकार सरदेसाई इस प्रसंग का वर्णन कुछ इस तरह से करते हैं, “अत्यंत कठोर यातनाओं के बावजूद संभाजी ने औरंगजेब के सामने झुकने से इंकार कर दिया।” उन्हें भयंकर प्रताड़नाएं दी गईं, कई दिन भूखा रखा गया, शरीर का रोम-रोम अलग कर दिया गया, किंतु स्वधर्म की
नारी सशक्तिकरण में नई मिसाल बना मध्यप्रदेश: स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण की योजनाओं से बदल रही महिलाओं की तस्वीर

भोपाल । मध्यप्रदेश में महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बीते कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार ने महिलाओं और बालिकाओं के स्वास्थ्य पोषण सुरक्षा संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर अनेक योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू किया है। इन योजनाओं के सकारात्मक परिणाम अब जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगे हैं जिसके चलते मध्यप्रदेश धीरे धीरे नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में देश के लिए एक रोल मॉडल बनकर उभर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी देश की प्रगति को समाज के चार प्रमुख वर्गों की उन्नति से जोड़ते हुए महिलाओं के सशक्तिकरण को प्राथमिकता देने की बात कही है। इसी दृष्टि से मध्यप्रदेश सरकार ने महिला कल्याण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को मजबूत करने की रणनीति अपनाई है। प्रदेश में महिलाओं और बच्चों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से देवी अहिल्या नारी सशक्तिकरण अभियान सहित कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं जिनका लाभ लाखों महिलाएं और बालिकाएं उठा रही हैं। प्रदेश में एकीकृत बाल विकास परियोजनाओं के तहत 453 परियोजनाओं के अंतर्गत 97 हजार 882 आंगनवाड़ी केंद्र स्वीकृत हैं जिनके माध्यम से लगभग 84 लाख हितग्राहियों को सेवाएं दी जा रही हैं। आंगनवाड़ियों में जियो फेंसिंग आधारित ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली लागू की गई है जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है। साथ ही प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है जहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी ऑनलाइन प्रणाली से शुरू की गई है। वित्तीय वर्ष 2026 27 में सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 कार्यक्रम के लिए 3 हजार 768 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया गया है। पोषण 2.0 के अंतर्गत मातृ एवं शिशु पोषण गंभीर कुपोषित बच्चों के उपचार और निगरानी के लिए पोषण ट्रैकर ऐप के माध्यम से आंगनवाड़ियों की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। प्रदेश में फेस मैचिंग प्रणाली के जरिए 94 प्रतिशत हितग्राहियों का सत्यापन किया जा चुका है जो देश में सर्वाधिक है। पूरक पोषण आहार कार्यक्रम के तहत टेक होम राशन और गर्म पका भोजन योजना के माध्यम से 60 लाख से अधिक बच्चों गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को लाभ मिल रहा है। इस वर्ष के बजट में पोषण आहार के लिए 1 हजार 150 करोड़ और पोषण अभियान के लिए 250 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम के माध्यम से वर्ष 2025 में पंजीकृत 7.37 लाख गंभीर कुपोषित बच्चों में से 3.71 लाख बच्चों को सामान्य पोषण स्तर तक लाया गया है। झाबुआ जिले के मोटी आई नवाचार को प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिल चुका है। प्रदेश में 5 हजार 263 नए आंगनवाड़ी भवनों का निर्माण कार्य जारी है वहीं लगभग 38 हजार 900 आंगनवाड़ी भवनों में बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराने की योजना भी प्रस्तावित की गई है। भवन निर्माण और आधारभूत सुविधाओं के विकास के लिए 459 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना प्रदेश की सबसे बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर योजना बन चुकी है। वर्तमान में 1.25 करोड़ से अधिक महिलाओं को प्रतिमाह 1 हजार 500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है। जून 2023 से फरवरी 2026 तक इस योजना के तहत 52 हजार 305 करोड़ रुपये महिलाओं के खातों में सीधे ट्रांसफर किए जा चुके हैं। वित्तीय वर्ष 2026 27 में इस योजना के लिए 23 हजार 882 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। वहीं लाड़ली लक्ष्मी योजना के अंतर्गत अब तक 52.56 लाख बालिकाओं का पंजीयन हो चुका है जिसके लिए 1 हजार 801 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। महिला सुरक्षा और संरक्षण के क्षेत्र में भी प्रदेश में महत्वपूर्ण पहल की गई है। राज्य में 57 वन स्टॉप सेंटर संचालित हैं जबकि 8 नए केंद्रों को स्वीकृति दी गई है। महिला हेल्पलाइन 181 और चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 के माध्यम से इस वर्ष 1.43 लाख से अधिक मामलों का निराकरण किया गया है। भोपाल और इंदौर में सखी निवास संचालित हैं तथा 8 नए वर्किंग वूमन हॉस्टल स्वीकृत किए गए हैं। इसके अलावा शक्ति सदन शौर्या दल योजना और समेकित बाल संरक्षण योजना के माध्यम से हजारों महिलाओं और बच्चों को संरक्षण और पुनर्वास सहायता प्रदान की जा रही है। महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए मध्यप्रदेश महिला वित्त एवं विकास निगम के माध्यम से हजारों स्व सहायता समूहों और महिला उद्यमियों को आर्थिक सहायता और ब्याज अनुदान दिया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2026 27 के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग को कुल 32 हजार 730 करोड़ 45 हजार रुपये का बजट आवंटित किया गया है जो महिलाओं और बच्चों के कल्याण के प्रति राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इन योजनाओं और प्रयासों के चलते मध्यप्रदेश में महिलाएं आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
मध्य प्रदेश में ग्राम सभाओं से सशक्त होंगी महिलाएं

– प्रद्युम्न शर्मा हर वर्ष आठ मार्च को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के अधिकारों, समानता और सम्मान के संघर्ष का प्रतीक है। यह दिन समाज को यह याद दिलाने का अवसर भी है कि महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण के बिना समावेशी विकास संभव नहीं है। इसी सोच को व्यवहार में उतारने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य सरकार ने इस विशेष प्रसंग के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रदेश की ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया जाना सुनिश्चित किया है। इन ग्राम सभाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा करना और स्थानीय स्तर पर ठोस निर्णय लेना है। मध्यप्रदेश में पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ग्रामीण स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम पचास प्रतिशत पदों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है। वर्तमान त्रिस्तरीय पंचायतों के पंचवर्षीय कार्यकाल में निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधियों का प्रतिशत पचास से भी अधिक, लगभग बावन प्रतिशत है। यह स्थिति दर्शाती है कि पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और वे अब केवल औपचारिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाली ग्राम सभाओं को सार्थक और प्रभावी बनाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी इन्हीं महिला पंचायत प्रतिनिधियों के कंधों पर है। यदि वे सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाती हैं, तो ग्राम स्तर पर महिलाओं से जुड़े मुद्दों के समाधान की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति संभव है। यदि हम एक नजर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर डालें तो इसका इतिहास महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में यूरोप और उत्तरी अमेरिका में महिला श्रमिकों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किए थे। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य कार्य के बेहतर घंटे, उचित पारिश्रमिक और समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता को समाप्त करना था। धीरे-धीरे यह आंदोलन वैश्विक स्तर पर फैल गया और महिलाओं के अधिकारों की आवाज मजबूत होती गई। वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया और उसी वर्ष आठ मार्च को आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। तब से यह दिन दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है। पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर सामने आता है कि क्या महिला पंचायत प्रतिनिधि वास्तव में स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सक्रिय रूप से पंचायत के कार्यों में भाग ले रही हैं और विकास योजनाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, किंतु कुछ जगहों पर अभी भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है जहां महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष सदस्य पंचायत के निर्णय लेते हैं और कार्यों का संचालन करते हैं। इसे प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व कहा जाता है। यह स्थिति महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण में बाधा उत्पन्न करती है। इसलिए महिला पंचायत प्रतिनिधियों का क्षमता संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। उन्हें योजनाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और कानूनों की जानकारी देकर आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाना जरूरी है। महिला सशक्तिकरण के लिए समाज की सक्रिय भूमिका भी आवश्यक है। महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना समय की मांग है। आज महिला साक्षरता पहले की तुलना में काफी आगे बढ़ी है, किंतु सिर्फ साक्षरता ही पर्याप्त नहीं। महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और सामाजिक सम्मान मिलना भी जरूरी है। साथ ही पारंपरिक सामाजिक सोच और पुरुषों के अनावश्यक हस्तक्षेप को भी कम करना होगा, ताकि महिलाएं स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बन सकें। ग्राम सभाएं ग्रामीण लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती हैं। यही वह मंच है जहां गांव के विकास से जुड़े निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित विशेष ग्राम सभाएं महिलाओं के मुद्दों पर चर्चा करने का एक प्रभावी मंच बन सकती हैं। इन सभाओं में महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं और किशोरी बालिकाओं की समस्याओं, आवश्यकताओं और संभावनाओं पर भी खुलकर चर्चा की जा सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर समाधान खोजने और महिलाओं के हित में ठोस निर्णय लेने का अवसर मिलता है। इन विशेष ग्राम सभाओं को प्रेरणादायक और परिणामकारी बनाने के लिए कई सकारात्मक पहलें की जा सकती हैं। गांव में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को सम्मानित किया जा सकता है, जिससे अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। इसके अलावा महिलाओं की आजीविका, कौशल विकास और शिक्षा से जुड़े विषयों पर चर्चा की जा सकती है। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान से जुड़े मुद्दों पर भी ग्राम स्तर पर महत्वपूर्ण संकल्प लिए जा सकते हैं। ग्राम सभाओं की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि गांव की अधिक से अधिक महिलाएं इसमें भाग लें। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्राम सभा के आयोजन की सूचना गांव की सभी महिलाओं तक पहुंचे। महिला स्वसहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ये समूह ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन ग्राम सभाओं में महिलाओं को उनके अधिकारों से जुड़े कानूनों की जानकारी देना भी अत्यंत आवश्यक है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 और कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित कानूनों के बारे में जानकारी देकर महिलाओं को जागरूक बनाया जा सकता है। इसके साथ-साथ सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, नारी सशक्तिकरण मिशन और वन स्टॉप सेंटर जैसी सुविधाओं के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार इन ग्राम सभाओं में कई सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर भी चर्चा की जाएगी। इनमें बाल विवाह की रोकथाम, किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य और पोषण, धात्री माताओं की देखभाल, एनीमिया से पीड़ित महिलाओं और किशोरियों के उपचार तथा व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल
नारी सम्मान ही सभ्य, सुसंस्कृत होने की पहचान

विनोद बब्बरयस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता अथार्त जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। इसी प्रकार कहा गया- ‘न गृहं गृह मित्याहु गृहिणी गृह मुच्यते’. सच ही है परिवार संस्था की संकल्पना नारी के बिना व्यर्थ है। महल हो या टूटी झोंपड़ी गृहलक्ष्मी के प्रवेश से ही घर बनता है। परिवार के विस्तार, पोषण, विकास का प्रश्न हो या हास- उल्लास, सृजन, संयम, धर्म, परोपकार का, नारी नायिका की भूमिका में है। पुरुष जीविका अर्जन के नाम पर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ सकते हैं परंतु परिवार को सुसंस्कृत, परिष्कृत और समुन्नत बनाने के अपने उत्तरदायित्व को नारी कभी नहीं भूलती। नारी को परिवार का हृदय और प्राण कहा जाता है तो समाज का सेतुबंध भी नारी ही है। उदारचेत्ता और सुव्यवस्था की अभ्यस्त सुसंस्कारी देवी अपनी कोमलता, संवेदना, करुणा, स्नेह और ममता के स्वाभाविक गुणों से परिवार की जिम्मेवारी निभाते हुए सामाजिक रिश्तों को भी निभाती है। इतिहास साक्षी है, मातृशक्ति ने सदैव अपनी संतान में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा के संस्कार विकसित किये। माता जीजाबाई को कौन नहीं जानता जिसने वीर शिवा को छत्रपति बनाया था। हाड़ा रानी ने अपने नवविवाहित पति को मातृभूमि के प्रति कर्तव्य याद दिलाने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान प्रस्तुत किया। पद्मीनी संग हजारों देवियों ने जौहर कर धर्म रक्षा का स्वर्णिम अध्याय लिखा। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने इतिहास पर ऐसी छाप छोड़ी की हर नारी में उनकी छवि तलाशी जाती है क्योंकि कोमल हृदय देवी आवश्यकता पड़ने पर चंडी का रूप भी धारण कर सकती है। स्वतंत्रता संग्राम में कित्तूर कर्नाटक की रानी चेनम्मा से लखनऊ की बेगम हजरत महल, मध्यप्रदेश के रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई, मुंडभर की महावीरी देवी सहित असंख्य वीरांगनाओं ने अपने युद्ध कौशल से दुश्मन के छक्के छुड़ाये। इतिहास साक्षी है, 1857 की क्रान्ति के दौरान दिल्ली के आस-पास के गाँवों की 255 महिलाओं ने क्रांति की मशाल को अपने प्राण देकर भी बूझने न दिया। इन्हें अंग्रेजों ने मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था। इतना ही नहीं, स्वामी श्रद्धानन्द की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने महिलाओं को संगठित कर अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार और उनकी होली जलाने का अभियान शुरु किया। नागा रानी गुइंदाल्यू, दुर्गा भाभी, सरोजिनी नायडू सहित अनेक वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता की गौरवशाली दास्तान हमारी मातृशक्ति के इस रूप से भी साक्षात्कार कराती है। नारी ने समाज को अपना सब दिया लेकिन भटके हुए लोगों ने उसके साथ न्याय नहीं किया। 1947 में धर्म के आधार पर देश विभाजन के समय हमारी मातृशक्ति को अपमान और अपार कष्ट सहने पड़े। यही नहीं, एक काल विशेष अक्रांताओं द्वारा नारी अपहरण, हरम, हत्या, पर्दा, सौतन, जबरन धर्मांतरण से आरंभ हुआ। इससे कालांतर में कुछ कुरीतियां पनपी। यथा नवजात कन्या की हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, देवदासी प्रथा, अशिक्षा, विधवा का अभिशाप। कामुक सोच के कारण नारी को सुरक्षित पिंजरे में बंद करने वाली कुप्रथाएं हावी हो गई। आखिर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अकारण तो नहीं कहा होगा- अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी! आंचल में है दूध और आंखों में पानी। कारण कुछ भी हो लेकिन एक काल विशेष से नारी शोषित रही है। परिस्थितियों ने ऐसा दबाव बनाया कि वह लगातार डरी, सहमी रही। इसी बीच कुछ क्रूर बादशाहों और समाजों ने नारी श्रद्धा और सम्मान को ‘सामान’ बना दिया। विकृतियों ने ऐसा विकराल रूप धारण किया कि राजाओं को जन्म देने वाली नारी की जिंदगी का फैसला करते हुए भी उससे बात तक नहीं जाती थी। ज्ञातव्य है कि गुरु नानक देव जी ने नारी निंदा करने वालों को चेताते हुए कहा है – सो क्यों मंदा आखिए जिस जम्मे राजान । नामधारी संप्रदाय के संस्थापक सद्गुरु राम सिंह जी ने सर्वप्रथम बेटियों के जीवन के अधिकार के पक्ष में कुड़ी मार से नहीं, व्यवहार को जन जन तक पहुंचते हुए ऐसे राक्षसों से संबंध न रखने का आह्वान किया था ! कल नहीं, आज भी कन्या भ्रूण हत्या होती है। पर्दाप्रथा, दहेज या बालविवाह जैसी कुप्रथाएं अभी कायम है। एक संप्रदाय विशेष में हलाला जैसी घृणित परंपराएं आज भी कायम है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के विपरीत तलाक के बाद महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है। हर काल में भेदभाव और अन्याय की स्थिति को बदलने और नारी को सम्मान दिलाने वाले कुछ महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने ढंग से ऐसी कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठा नारी सशक्तिकरण का उद्घोष किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज स्थिति बहुत बदली है। आज भारत की नारी वायुसेना के लड़ाकू विमान उड़ाने से राजनीति, प्रशासन, व्यवसाय और शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है। देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति के पद को आज आदिवासी समाज से संबंध रखने वाली एक देवी सुशोभित कर रही है। तो इससे पूर्व देश की प्रधानमंत्री और अनेक राज्यों में मुख्यमंत्री भी नारी रह चुकी हैं। देश की राजधानी दिल्ली की वर्तमान मुख्यमंत्री भी एक नारी है। यह सर्वाधिक है कि मोदी सरकार के प्रयासों से संसद और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण विधेयक नई संसद में सर्वप्रथम सर्वसम्मति से पारित होकर कानून बना जो जनगणना व नए परिसीमन के बाद शीघ्र लागू होगा। स्वाभाविक है इस क्रांतिकारी परिवर्तन के बाद लोकतंत्र और प्रशासन की सूरत भी बदलेगी। पंचायतों में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण पहले से ही प्राप्त है। इसके बावजूद देश के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में बदलाव की गति अत्यंत धीमी है। उसपर कन्या भ्रूण हत्या गंभीर असंतुलन पैदा कर रही है। यह स्थिति तब हैजबकि भारतीय संस्कृति के मूल आधार वेदों में नारी जाति को उच्च स्थान दिया गया है। नारी के प्रति ऐसा सम्मान और स्थान विश्व के किसी भी मत की पुस्तक में देखने को नहीं मिलता। महिला दिवस की सार्थकता तब है जब राजनीति और समाज की धारणा बदलें। नारी को उसका खोया सम्मान, अधिकार मिलें। अन्यथा ऐसे दिवस केवल शाब्दिक कर्मकांड बनकर रह जाएगे। ध्यान रहे अपनी मातृशक्ति के अशिक्षित, अस्वस्थ, असंतुलित, अपमानित, असमान रहते कोई भी समाज न तो विकास कर सकता है और न ही विश्व में सम्मान प्राप्त कर सकता है। हॉ कृतघन जरूर कहला सकता है। देश की सभी बेटियों को उच्चतम स्तर तक की शिक्षा तथा अन्य सुविधाएं बिना शुल्क, बिना भेदभाव दी जानी चाहिए । महिलाओं से संबंधित अपराधों की
समावेशी विकास की ओर बढ़ता मध्य प्रदेश: केंद्र में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार

– प्रद्युम्न शर्मामध्य प्रदेश में इस साल मनाए जा रहे किसान कल्याण वर्ष की पहली कृषि कैबिनेट जनजातीय बहुल जिले बड़वानी में होना और उसमें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में अनेक किसानों के हित में निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ना आज बता रहा है कि राज्य विकास के धरातल पर अपनी किन प्राथमिकताओं को लेकर चल रहा है। इस दृष्टि से मध्य प्रदेश सरकार का वर्ष 2026-27 का बजट राज्य के विकास मॉडल को नए ढंग से परिभाषित करता नजर आता है। कहना होगा कि हाल ही में सामने आए मप्र के बजट में जहां एक ओर दीर्घकालीन योजनाओं के लिए वित्तीय प्रबंधन की रणनीति दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने का स्पष्ट प्रयास भी झलकता है। “समावेशी बजट, सशक्त नागरिक” के नारे के साथ पेश किए गए इस बजट की थीम “तेरा तुझको अर्पण” रखी गई है, जो यह संकेत देती है कि विकास का लाभ सीधे जनता तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था पर विशेष फोकसबजट का सबसे बड़ा फोकस ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन पर दिखाई देता है। इसी दिशा में भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए “विकसित भारत – रोजगार की गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण)” के लिए 10,428 करोड़ रुपये की बड़ी राशि स्वीकृत की गई है। यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है। राज्य सरकार का मानना है कि इस मिशन के माध्यम से ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे और पलायन की समस्या में भी कमी आएगी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास को मिला बड़ा बजटपंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को इस बजट में विशेष प्राथमिकता दी गई है। वर्ष 2026-27 में इस विभाग के लिए कुल 40,103 करोड़ रुपये का व्यय अनुमानित किया गया है। यह राशि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास, सामाजिक योजनाओं के क्रियान्वयन और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने के लिए उपयोग की जाएगी। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार विभाग को अधिक बजट आवंटित किया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार ग्रामीण विकास को अपने एजेंडे के केंद्र में रख रही है। ग्रामीण सड़क नेटवर्क को मजबूत करने की पहलग्रामीण सड़कों के निर्माण और उन्नयन के लिए 2,968 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क बेहतर होने से कृषि उत्पादों के बाजार तक पहुंच आसान होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। इसके अलावा प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत सड़कों के नवीनीकरण और उन्नयन के लिए 1,285 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इससे पहले से बनी सड़कों की गुणवत्ता में सुधार होगा और परिवहन व्यवस्था अधिक सुगम बनेगी। तीन वर्षीय रोलिंग बजट की नई व्यवस्थाइस बजट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक तीन वर्षीय रोलिंग बजट व्यवस्था है। इस प्रणाली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास योजनाएं केवल एक वर्ष की सीमा में न सिमटें, बल्कि उन्हें दीर्घकालीन लक्ष्य और वित्तीय स्थिरता के साथ लागू किया जा सके। इस तरह की व्यवस्था से सरकार को बड़े विकासात्मक प्रोजेक्ट्स के लिए बेहतर योजना बनाने और संसाधनों का संतुलित उपयोग करने में मदद मिलेगी। बहुआयामी गरीबी सूचकांक आधारित बजटिंग का प्रयोगइस बजट की एक और विशेषता यह है कि इसमें मल्टी डायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स आधारित बजटिंग को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया गया है। यह अपनी तरह का पहला प्रयास माना जा रहा है। इसका उद्देश्य यह है कि विकास योजनाओं का लाभ उन क्षेत्रों तक प्राथमिकता से पहुंचे जो पहले से ही अभावग्रस्त और पिछड़े के रूप में चिन्हित किए गए हैं। इस व्यवस्था से सरकारी खर्च को परिणाम आधारित बनाया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि संसाधनों का उपयोग वास्तव में गरीबी कम करने और जीवन स्तर सुधारने में हो। खनिज राजस्व से स्थानीय विकास को बलखनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व का भी स्थानीय विकास में उपयोग सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है। जिला खनिज निधि के लिए 1,400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि गौण खनिज राजस्व से पंचायतों को 934 करोड़ रुपये अंतरित किए जाएंगे। इससे खनन प्रभावित क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं और सामाजिक विकास योजनाओं को मजबूती मिल सकेगी। पोषण और कनेक्टिविटी योजनाओं को प्राथमिकतापोषण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को भी बजट में पर्याप्त प्राथमिकता दी गई है। प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना के लिए 1,100 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों में कुपोषण को कम करना और विद्यालयों में पोषण स्तर सुधारना है। इसके अलावा मुख्यमंत्री मजरा टोला सड़क योजना के लिए 793 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे छोटे-छोटे गांवों और बस्तियों को मुख्य सड़कों से जोड़ा जा सकेगा। प्रमुख योजनाओं के लिए बढ़ा बजट प्रावधानसरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए भी पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में अधिक राशि स्वीकृत की है। इनमें ग्राम स्वराज अभियान, प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना, यशोदा दुग्ध प्रदाय योजना, क्षतिग्रस्त पुलों का पुनर्निर्माण, मुख्यमंत्री मजरा टोला सड़क योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, रेडी टू ईट टेक होम राशन, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), मुख्यमंत्री आवास मिशन, वाटरशेड विकास और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी योजनाएं शामिल हैं। ग्रामीण जीवन स्तर सुधारने की दिशा में प्रयासइन योजनाओं का सीधा संबंध ग्रामीण जीवन स्तर को बेहतर बनाने से है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण और मुख्यमंत्री आवास मिशन के माध्यम से गरीब परिवारों को पक्के घर उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। वहीं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को मजबूत कर महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है। समावेशी विकास की व्यापक रणनीतिअत: कहना होगा कि मध्य प्रदेश का यह बजट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेजीकण न होकर विकास की एक व्यापक रणनीति का संकेत देता है। इसमें ग्रामीण बुनियादी ढांचे, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन को एक साथ जोड़कर विकास की समावेशी अवधारणा को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो यह बजट राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण
होलिका दहन पर वामपंथी कलुष

– कैलाश चन्द्र भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर जितने हमले बाहरी आक्रांताओं ने नहीं किए, उससे कहीं अधिक गहरे और कहीं अधिक धूर्त हमले आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने किए हैं। यह हमला तलवारों का नहीं, शब्दों का है। यह आक्रमण सीमाओं का नहीं, स्मृति का है। वस्तुत: आज जो लोग होली, होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा को “ब्राह्मणवाद द्वारा एक दलित नारी को जलाए जाने” की घटना बताकर प्रस्तुत करते हैं, वे न परंपरा जानते हैं और न कथा समझते हैं। वे सिर्फ भारत की सांस्कृतिक संचेतना को उसकी अपनी कहानी से काट देना चाहते हैं। होलिका की वास्तविक कथाहोलिका की कथा जितनी सरल है, उतनी ही गहन भी। कश्यप ऋषि और दिति की पुत्री तथा दिति की संतानों को स्वभाव वैचित्र्य के कारण दैत्य कहा गया है। सम्पूर्ण कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बहुत विस्तार से कही गई है। भारतवर्ष में होने वाली अधिकांश भागवत कथाओं में भागवताचार्य अपनी कथा का प्रारम्भ यहीं से करते हैं। इस आधार पर होलिका दैत्यकुल की राजकुमारी व प्रिचिति की पत्नी और स्वरभानु की माता थी। वह एक संपूर्ण दैत्यवंशी, राक्षसी चरित्र है। उसका भाई हिरण्यकश्यप न केवल राजा था बल्कि अत्याचारी, अहंकारी और असुर प्रवृत्ति वाला शासक भी था। उसके सामने किसी “शोषित समुदाय” की कथा गढ़ना या उसे “दलित नारी उत्पीड़न” में बदल देना केवल अज्ञान नहीं एक सुनियोजित बौद्धिक छल है, जो भारतीय मिथकीय चेतना को वर्गीय, जातीय और जेंडरवादी चश्मे से दूषित करना चाहता है। धर्म और अधर्म का स्पष्ट संदेशयहां सत्य सरल है। होलिका किसी “अबला स्त्री” की कथा नहीं है। वह वरदान से सशक्त, छल से प्रेरित और अधर्म की सहायक थी। ब्रह्मा ने उसे अग्नि प्रतिरोध का वरदान दिया था, किन्तु वह वरदान धर्म विरोधी कर्मों के लिए नहीं था। जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है तो उसका जलना कर्मफल है। यह अन्याय के अंत, अधर्म की पराजय और सत्य की विजय का प्रतीक है। यही पुराणों का स्वर है और यही भारतीय संस्कृति की जीवंतता का मूलाधार भी है। पर आज इस कथा को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले “कल्चरल मार्क्सिज्म” के प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसे “ब्राह्मणों द्वारा स्त्री दहन” का उदाहरण बताते हैं। ये उनकी चाल पुरानी है। हर परंपरा को उत्पीडन का प्रमाण बनाओ। हर कथा को वर्ग संघर्ष के ढांचे में फिट करो। हर मूल्य को अपराधबोध में बदलो। वे राक्षसी को पीड़िता बना देते हैं, दैत्यकुल को जाति समूह कह देते हैं और धर्म-अधर्म की अनंत कथा को सत्ता विरोध के रंग में विकृत कर देते हैं। यही मानसिकता श्रीराम को साम्राज्यवादी, श्रीकृष्ण को चालबाज, माता दुर्गा को पीड़ित स्त्री और श्रीगणेश को उपहास का पात्र बना देती है। होलिका दहन का सांस्कृतिक अर्थहोलिका दहन का अर्थ किसी व्यक्ति, कुल या जाति का दमन नहीं है। यह जीवन की नकारात्मकता के दहन का संदेश है। यह नव वसंत, नवहर्ष, नई शुरुआत और सत्य के धारण एवं संरक्षण का पर्व है। इसमें प्रह्लाद की विजय, भक्ति की शक्ति और अधर्म के अंत का संदेश निहित है। इसे महिला विरोध, समाज विरोध या सत्ता विरोध की कहानी में बदलना हमारी परंपरा का नहीं बल्कि हमारी स्मृति का अपमान है। इतिहास के नाम पर फैलाया गया भ्रमभारतीय समाज को बांटने के लिए आज एक विचित्र वैचारिक नाटक रचा जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि ‘हिरण्यकश्यप’ शूद्र था, शूद्र तप नहीं कर सकते और गुरुकुल नहीं जा सकते। यह इतिहास नहीं बल्कि वैचारिक क्षुद्रता का प्रमाण है। जिन लोगों ने न शास्त्र पढ़े और न पुराण समझे, वे आज सोशल मीडिया की अधूरी जानकारी के आधार पर एक संपूर्ण सभ्यता को अपराधी सिद्ध करने में लगे हैं। भारतीय चेतना का मूल सत्यवास्तविकता यह है कि होलिका और हिरण्यकश्यप भारतीय चेतना में सदियों से अहंकार और अधर्म के प्रतीक रहे हैं। गुरुकुलों की शिक्षा में शस्त्र और शास्त्र का अध्ययन करने के बाद अहंकार के कारण वे अधर्म के मार्ग पर चले और भक्त प्रह्लाद सत्य के प्रतीक बने। जो लोग इस सरल सत्य को भी “सामाजिक न्याय” के चश्मे से विकृत करते हैं, वे न्याय के पक्षधर नहीं बल्कि भारतीय समाज को भीतर से तोड़ने वाले मानसिक उपनिवेशवाद के वाहक हैं। स्मृति और परंपरा की पुनर्स्थापनाआज आवश्यकता किसी प्रतिक्रिया या प्रतिशोध की नहीं है। आवश्यकता है तथ्यों की पुनर्स्थापना की। हमें अपनी चेतना में सांस्कृतिक स्मृति को पुनः प्रखर करना होगा। परंपरा को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों के ढांचे में कैद करने के स्थान पर उसके कालातीत संदेश को समझना होगा। यह संघर्ष एक कथा का न होकर भारतीय तत्वज्ञान, वांग्मय, दर्शन और वैचारिक संप्रभुता का है। इसलिए यह समझना सभी के लिए समान रूप से आवश्यक है कि ‘होलिका’ का जलना किसी स्त्री का दहन नहीं है। यह अत्याचार, असहिष्णुता, अधर्म, अनीति और असत्य के दहन का प्रतीक है। उसका अंत किसी समाज पर अत्याचार का नहीं बल्कि अधर्म की पराजय का उत्सव है। आज भारत की सभ्यता इस वैचारिक आक्रमण को पहचान चुकी है। वह जानती है कि हमारी परंपराएं हिंसा की नहीं बल्कि समरसता की उपज हैं। होलिका दहन उसी समरसता का उत्सव है, अहंकार के अंत और सत्य के आरंभ का पर्व। अत: हमेशा ही अपने समय में वर्तमान काल की हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस वैचारिक धुंध में भी स्पष्ट देख सकें और यह कह सकें कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भारतीयता चाहिए, न कि वह वैचारिक चश्मा जो हर कथा को संघर्ष, हर पात्र को पीड़ित और हर पर्व को अपराध में बदल देता है। अंत में यही कि होलिका दहन पर कलुष केवल परंपरा का नहीं बल्कि विवेक का अपमान है। इसे समझना और इस भ्रम को तोड़ना आज केवल सांस्कृतिक कर्तव्य नहीं यह हम सभी की राष्ट्रीय आवश्यकता है। (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)
विनायक दामोदर सावरकर : एक विचार, एक क्रांति, एक युग

डॉ. निवेदिता शर्मा एक विचार, एक क्रांति, एक युग यदि इन शब्दों में किसी व्यक्तित्व को समेटना हो तो वह नाम है स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी का। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति को ही अपने जीवन का परम ध्येय बनाया। उनके लिए स्वाधीनता राष्ट्रीय चेतना की पुकार थी। उनका संपूर्ण जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि यदि संकल्प अडिग हो तो लोहे की सलाखें भी विचारों को कैद नहीं कर सकतीं। 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के भगूर में जन्मे सावरकर बचपन से ही तेजस्वी, जिज्ञासु और राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत रहे। अल्पायु में माता-पिता का निधन हो गया, किंतु विपरीत परिस्थितियों ने उनके मनोबल को और दृढ़ किया। छात्र जीवन में उन्होंने मित्र मेला और बाद में अभिनव भारत जैसे क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। ये संगठन गुप्त क्रांतिकारी मंडल के साथ ही राष्ट्रजागरण के केंद्र थे, जहाँ युवाओं के हृदय में स्वतंत्रता की ज्योति प्रज्वलित की जाती थी। पुणे के फर्ग्युसन महाविद्यालय में अध्ययन करते समय उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी। आगे की शिक्षा के लिए वे लंदन गए जहाँ इंडिया हाउस में रहकर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित किया। वहीं उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को नया दृष्टिकोण देने का साहसिक कार्य किया। उनकी प्रसिद्ध कृति The Indian War of Independence 1857 ने अंग्रेजों द्वारा प्रचारित सिपाही विद्रोह की अवधारणा को अस्वीकार करते हुए 1857 को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध किया। प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि 1857 का संघर्ष केवल सैनिकों का विद्रोह नहीं था, वह स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय युद्ध था। 1909 के इस ग्रंथ ने भारतीय युवाओं में आत्मगौरव का संचार किया। ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि यह पुस्तक क्रांति की चेतना को तीव्र कर रही थी। सावरकर ने इतिहास को पराधीनता की दृष्टि से मुक्त कर स्वाभिमान के आलोक में पुनर्परिभाषित किया। 1910 में उनकी गिरफ्तारी हुई और 1911 में उन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा देकर अंडमान भेज दिया गया। सेल्युलर जेल की अंधेरी कालकोठरी में जो यातनाएँ उन्होंने सहीं, वे किसी भी सामान्य मनुष्य को तोड़ सकती थीं। तेल के कोल्हू में बैलों की तरह जोतना, कोड़े, एकांतवास और अमानवीय व्यवहार उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया। किंतु अंडमान की सेल्युलर जेल की अंधेरी काल कोठरी भी वीर सावरकर की क्रांतिकारी चेतना को कुचल नहीं सकी। उन्होंने अपनी आत्मकथा माझी जन्मठेप में उन दिनों का मार्मिक वर्णन करते हुए लिखा है कि कालकोठरी की अंधेरी रातों में भी उनके मन में स्वतंत्र भारत का सूर्य उदित होता रहता था। निश्चित ही इन शब्दों में एक कैदी भावना में एक तपस्वी का अडिग विश्वास झलकता है। उनका जीवन हमें दिखाता है कि यदि संकल्प अडिग हो तो कारागार भी साधना स्थल बन जाता है। कारावास के वर्षों ने उनके विचारों को और परिपक्व किया। 1923 में प्रकाशित उनकी पुस्तक Hindutva: Who Is a Hindu? में उन्होंने हिंदुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदुत्व को सिर्फ धार्मिक पहचान के रूप में नहीं समझना चाहिए। अध्याय छह में वे लिखते हैं कि हिंदू वह है जो इस भारतभूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों के रूप में स्वीकार करता है। इस परिभाषा में सांस्कृतिक एकता और राष्ट्रीय अस्मिता का भाव निहित है। उन्होंने हिंदुत्व को एक जीवनदर्शन बताया, ऐसा दर्शन जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि है और हर नागरिक उसकी आत्मा है। यह विचार उनके व्यापक राष्ट्रवाद का आधार था। सावरकर सामाजिक समरसता के प्रबल समर्थक थे। रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध आंदोलन चलाया और 1931 में पतित पावन मंदिर की स्थापना की, जहाँ सभी जातियों को प्रवेश का अधिकार दिया गया। हिंदुत्व के सामाजिक आयाम पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा, जातिगत विभाजन ने हिंदू समाज को दुर्बल किया है और एकता ही उसे सशक्त बना सकती है। उनके लिए राष्ट्रनिर्माण सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, वे सदैव ही सामाजिक सुधार और आत्मसम्मान के पुनर्जागरण पर आवश्यक बल देते रहे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे क्रांतिकारी थे, लेखक थे, कवि थे और विचारक भी। उनकी कविताएँ मातृभूमि के प्रति समर्पण से भरी हुई हैं। ने मजसी ने परत मातृभूमीला जैसी रचनाओं में एक व्याकुल हृदय की पुकार सुनाई देती है जो अपनी भूमि से दूर रहकर भी उसी की स्मृति में जीता है। वे हर राष्ट्रभक्त के हृदय में विचारों की दहकती ज्वाला हैं, वे क्रांति की मशाल हैं। उनके भाषणों और लेखों में राष्ट्रवाद का ओजस्वी स्वर गूंजता है। उन्होंने युवाओं को संगठित होने और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने का आह्वान किया क्योंकि वे मानते थे कि स्वतंत्र राष्ट्र की सुरक्षा उसके जागरूक और सक्षम नागरिकों पर निर्भर करती है। इतिहास में उनके जीवन के कुछ प्रसंग विवादों से भी जुड़े रहे। महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में उनका नाम आया, किंतु न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें दोषमुक्त कर दिया। मतभेदों और वैचारिक असहमतियों के बावजूद यह तथ्य निर्विवाद है कि उन्होंने अपने जीवन का स्वर्णिम काल कारावास में बिताया और राष्ट्र के लिए असाधारण त्याग किया। उनके योगदान का मूल्यांकन करते समय उनके समग्र जीवन और तप को दृष्टि में रखना आवश्यक है। जीवन के अंतिम चरण में भी उनका आत्मविश्वास और अनुशासन अटूट रहा। 26 फरवरी 1966 को उन्होंने भारत राष्ट्र में चिति के रूप में आत्मार्पण का निर्णय लिया। उनका मानना था कि जब जीवन का ध्येय पूर्ण हो जाए और शरीर राष्ट्रसेवा में समर्थ न रहे तो शांतिपूर्वक उसका परित्याग कर देना चाहिए। यह निर्णय भी उनके तपस्वी स्वभाव का द्योतक था। स्वाधीनता के सूर्य, अखंड राष्ट्रवाद के पुजारी, हिंदुत्व के प्रखर व्याख्याकार और संघर्षों के तपस्वी विनायक दामोदर वीर सावरकर की पुण्यतिथि पर उन्हें करबद्ध नमन करते हुए स्मरण होता है कि उनका जीवन सिर्फ अतीत की कहानी न होकर वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा है। उन्होंने हमें सिखाया कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं होता, वह करोड़ों लोगों की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत स्वरूप है। जब कोई व्यक्ति उस चेतना के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है तो वह स्वयं एक युग बन जाता है। एक विचार जोकि स्वाधीनता का था, एक क्रांति जो आत्मगौरव की थी और एक युग जो राष्ट्रसमर्पण का प्रतीक बन गया, वह
विकास का सशक्त विजन : एक ट्रिलियन डॉलर की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्यप्रदेश आज एक ऐसे परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है, जहाँ विकास नारा न होकर धरातल पर उतरती हुई वास्तविकता बन चुका है। राज्य की आर्थिक गति, औद्योगिक विस्तार, कृषि समृद्धि और रोजगार सृजन की दिशा में हो रहे सतत प्रयासों ने इसे देश के तेजी से उभरते राज्यों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। इस परिवर्तन के केंद्र में हैं डॉ. मोहन यादव, जिनके नेतृत्व में मध्यप्रदेश आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सशक्त बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव का स्पष्ट मानना है कि राज्य का विकास देश के समग्र विकास से जुड़ा हुआ है। वे अक्सर कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत नई ऊँचाइयों को छू रहा है और इसी दिशा में मध्यप्रदेश भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है। विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए राज्य ने एक व्यापक दृष्टिपत्र तैयार किया है, जिसमें आने वाले 25 वर्षों में प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लिया गया है। आर्थिक विकास की नई कहानीपिछले कुछ वर्षों में एक तरह से देखें तो जिस गति से आर्थिक प्रगति की है, वह प्रेरणादायक है। प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय वर्तमान में लगभग 1 लाख 55 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है, जिसे अगले 25 वर्षों में 22 लाख 50 हजार रुपये तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे व्यापक औद्योगिक निवेश, कृषि उत्पादन और सेवा क्षेत्र के विस्तार से हासिल किया जाएगा। राज्य सरकार ने औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए 18 नई औद्योगिक नीतियां लागू की हैं। इन नीतियों का उद्देश्य बड़े शहरों के साथ ही छोटे और दूरस्थ क्षेत्रों तक उद्योगों को पहुँचाना है। इसके लिए संभागीय स्तर पर अलग-अलग सेक्टरों पर केंद्रित रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव आयोजित किए जा रहे हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम अब दिखाई देने लगा है। रोजगार सृजन और युवाओं में नया उत्साहमप्र में तेजी से बढ़ते उद्योगों और निवेश के कारण रोजगार के नए अवसर लगातार पैदा हो रहे हैं। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश का युवा रोजगार देने वाला बने। इसी उद्देश्य से स्वरोजगार और युवा उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। यही कारण है कि वर्तमान में प्रदेश की बेरोजगारी दर मात्र 1 से 1.5 प्रतिशत के बीच रह गई है, जोकि देश के कई राज्यों की तुलना में काफी कम है। इसका सीधा संबंध उद्योगों के विस्तार, एमएसएमई सेक्टर की मजबूती और कृषि आधारित रोजगार से है। वस्तुत: यहां देखने में यह भी आ रहा है, जैसा कि मुख्यमंत्री डॉ. यादव का स्पष्ट मानना भी है कि एमएसएमई क्षेत्र राज्य के औद्योगिक विकास की बैकबोन है। छोटे और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर ही व्यापक स्तर पर रोजगार सृजित किया जा सकता है। यही कारण है कि राज्य सरकार एमएसएमई और लघु उद्योगों को विशेष अनुदान, कर में रियायत और आसान ऋण सुविधा उपलब्ध करा रही है। औद्योगिकरण को विशेष रूप से जनजाति और पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। कटनी और शहडोल जैसे क्षेत्रों में माइनिंग सेक्टर में निवेश बढ़ा है, वहीं नर्मदापुरम के बाबई-मोहासा क्षेत्र में इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट्स के निर्माण के लिए औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जा रहा है। यही कारण है कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में मिले लगभग 30 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों में से करीब 8 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव धरातल पर उतर चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि निवेशकों का भरोसा मध्यप्रदेश की नीतियों और वातावरण पर लगातार बढ़ रहा है। कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूतीमध्यप्रदेश लंबे समय से कृषि क्षेत्र में अग्रणी रहा है और सरकार इसे और सशक्त बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। कृषक कल्याण वर्ष के तहत किसानों को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने का संकल्प लिया गया है। कृषि उत्पादन के साथ-साथ फूड प्रोसेसिंग और पशुपालन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। दूध उत्पादन को 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। सिंचाई के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पिछले डेढ़ साल में ही 7.5 लाख हेक्टेयर सिंचाई रकबा बढ़ाया गया है और इसे 100 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नर्मदा का जल क्षिप्रा नदी में पहुंचने से मालवा क्षेत्र के किसानों को विशेष लाभ मिला है। इसके साथ ही नवकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी मध्यप्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य देश में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। मुरैना में उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर एक बड़ा सोलर प्रोजेक्ट स्थापित किया जा रहा है, जिससे दोनों राज्यों को बिजली का लाभ मिलेगा। किसानों को सोलर पंप देकर ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मंदसौर के गांधी सागर बांध में पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट की स्थापना भी राज्य की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह सब प्रयास पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास को भी गति दे रहे हैं। कौशल विकास और तकनीकी सशक्तिकरणऔद्योगिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ भविष्य में कुशल श्रमिकों की मांग भी बढ़ेगी। इसे ध्यान में रखते हुए शिक्षा नीति 2020 के तहत युवाओं के कौशल उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इंजीनियरिंग कॉलेजों में आईटी सेंटर खोले जा रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। सरकार तकनीक को चुनौती नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देख रही है और युवाओं को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। महिला सशक्तिकरण और सामाजिक विकासप्रधानमंत्री मोदी की मंशा के अनुरूप महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी ठोस काम मध्यप्रदेश में मोहन सरकार के नेतृत्व में होता हुआ इन दिनों बड़े स्तर पर देखा जा सकता है। प्रदेश के एक लाख से अधिक स्वसहायता समूहों को बाजार और तकनीकी सहायता दी जा रही है। उद्योगों में महिलाओं को 48 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है और उनके लिए विशेष औद्योगिक क्षेत्र बनाए जा रहे हैं। वहीं धार्मिक पर्यटन को नई गति देने के लिए होम-स्टे जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया गया है। इससे एक ओर पर्यटकों को बेहतर सुविधा मिल रही
वैदिक चेतना से सामाजिक क्रांति तक भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत महर्षि दयानंद सरस्वती – आचार्य ललित मुनि

आचार्य ललित मुनिउन्नीसवीं सदी का भारत गहरे संक्रमण का समय था। एक ओर अंग्रेजी शासन का राजनीतिक वर्चस्व था, दूसरी ओर समाज भीतर से जर्जर हो चुका था। धार्मिक जीवन कर्मकांडों में उलझा हुआ था, जातिगत ऊंच नीच ने सामाजिक एकता को तोड़ दिया था, स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और शिक्षा का दायरा सीमित था। मिशनरियों का प्रभाव बढ़ रहा था और पश्चिमी चिंतन भारतीय परंपराओं को चुनौती दे रहा था। ऐसे दौर में कुछ व्यक्तित्व प्रकाशस्तंभ बनकर उभरे, जिन्होंने भारतीय समाज को आत्मचिंतन की दिशा दी। इन अग्रदूतों में स्वामी दयानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने न कोई राजनीतिक दल बनाया और न किसी सत्ता का सहारा लिया। उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक उत्थान भीतर से होता है। वेदों की ओर लौटने का उनका आह्वान केवल धार्मिक सुधार का संदेश नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष था। स्वामी दयानंद का जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका बाल्यकालीन नाम मूलशंकर था। परिवार धार्मिक था और वैदिक संस्कारों का पालन करता था। किंतु बालक मूलशंकर का मन प्रश्नों से भरा था। किशोरावस्था में एक शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में जागरण के दौरान उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग को देवता मानकर पूजा जा रही है, उस पर चूहे निर्भय होकर घूम रहे हैं। यह दृश्य उनके मन में गहरी हलचल का कारण बना। उन्होंने स्वयं से पूछा कि यदि यह ईश्वर है तो स्वयं को चूहों से क्यों नहीं बचाता। यह प्रश्न साधारण नहीं था। यही प्रश्न आगे चलकर उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला बना। उन्होंने घर छोड़ दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े। वर्षों तक वे विभिन्न साधु संतों के संपर्क में रहे, हिमालय की कंदराओं में तप किया और शास्त्रों का अध्ययन किया। अंततः मथुरा में उन्हें स्वामी विरजानंद का सान्निध्य मिला। विरजानंद ने उन्हें वेदों का गहन अध्ययन कराया और कहा कि सत्य का मूल स्रोत वेद हैं। शिष्य दयानंद ने गुरु को वचन दिया कि वे वेदज्ञान का प्रचार करेंगे और समाज को अज्ञान से मुक्त करने का प्रयास करेंगे। स्वामी दयानंद का सबसे प्रसिद्ध वाक्य था कि वेदों की ओर लौटो। इसका अर्थ अतीत में पलायन नहीं था, बल्कि मूल स्रोतों की ओर लौटकर शुद्धता और विवेक को अपनाना था। उनका मानना था कि वेद ज्ञान, विज्ञान और नैतिकता का मूल आधार हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा, अवतारवाद और कर्मकांडों की कठोर आलोचना की। उनके अनुसार ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। उसे पत्थर या धातु की मूर्तियों में सीमित करना उचित नहीं। वे जाति व्यवस्था को जन्म पर आधारित मानने के विरोधी थे। उनके विचार में वर्ण व्यवस्था कर्म और गुण पर आधारित होनी चाहिए। उनकी वाणी में स्पष्टता और तर्क था। वे संस्कृत के विद्वान थे, किंतु उन्होंने हिंदी में प्रवचन देकर आम जनता तक अपने विचार पहुंचाए। काशी, हरिद्वार, अजमेर और अन्य नगरों में उन्होंने शास्त्रार्थ किए। इन बहसों में वे वेदों की प्रामाणिकता और तार्किकता पर बल देते थे। 1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। आर्य समाज का उद्देश्य समाज को वैदिक सिद्धांतों पर संगठित करना और सामाजिक सुधार को गति देना था। इसके दस नियम सरल किंतु गहरे थे। इनमें ईश्वर की एकता, सत्य का अनुसरण, विद्या का प्रचार, अज्ञान का नाश और सर्वहित की भावना प्रमुख थे। आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। शुद्धि आंदोलन के माध्यम से उन लोगों को पुनः हिंदू समाज में स्थान दिया गया, जो विभिन्न कारणों से अन्य धर्मों में चले गए थे। इस अभियान ने समाज में आत्मविश्वास का संचार किया। स्वामी दयानंद स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि समाज तभी प्रगति कर सकता है जब स्त्रियां शिक्षित हों। उन्होंने वेदाध्ययन का अधिकार स्त्रियों को दिया और उनके लिए विद्यालय स्थापित करने का आह्वान किया। बाल विवाह, सती प्रथा और बहुविवाह जैसी कुरीतियों के वे विरोधी थे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और स्त्रियों की गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। उनके विचारों ने समाज में नई बहस छेड़ी और सुधार आंदोलनों को प्रेरणा दी। उनकी प्रमुख कृति सत्यार्थ प्रकाश है। इसमें उन्होंने वेदों की व्याख्या के साथ साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं का विश्लेषण किया। उनका उद्देश्य विवाद खड़ा करना नहीं था, बल्कि सत्य की खोज करना था। उन्होंने तर्क, प्रमाण और विवेक पर बल दिया। सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय समाज में आत्ममंथन की प्रक्रिया को तेज किया। यह ग्रंथ आज भी आर्य समाज के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक है। स्वामी दयानंद के विचारों से प्रेरित होकर दयानंद एंग्लो वैदिक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों ने आधुनिक शिक्षा और वैदिक मूल्यों का समन्वय प्रस्तुत किया। आज भी डीएवी संस्थाएं देश भर में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। गुरुकुल कांगड़ी जैसे संस्थानों ने वैदिक पद्धति और आधुनिक विषयों का संगम प्रस्तुत किया। इस शिक्षा मॉडल ने भारतीय युवाओं में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। स्वामी दयानंद का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक आधार पर टिका था। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हो। उन्होंने स्वराज की अवधारणा को स्पष्ट किया। आर्य समाज से जुड़े अनेक नेता आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए। लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे व्यक्तित्वों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इस प्रकार स्वामी दयानंद का प्रभाव सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण तक पहुंचा। स्वामी दयानंद निर्भीक थे। वे राजाओं और शासकों से भी प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करते थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों की भी आलोचना की। 1883 में जोधपुर में उन्हें विष दिया गया। यह घटना दुखद थी, किंतु उनके विचारों को रोक न सकी। उनका जीवन अल्पकालिक था, पर प्रभाव दीर्घकालिक। आज का भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। जातीय विभाजन, अंधविश्वास और सांस्कृतिक असंतुलन अब भी विद्यमान हैं। ऐसे समय में स्वामी दयानंद के विचार नई प्रेरणा देते हैं। उनका आग्रह था कि सत्य को तर्क की कसौटी पर परखा जाए और समाज को ज्ञान आधारित बनाया जाए। उनका संदेश था कि शिक्षा, नैतिकता और आत्मगौरव से ही राष्ट्र सशक्त बनता है। वे आधुनिकता
वन्दे मातरम्: राष्ट्र चेतना का सनातन गीत और आधुनिक भारत का पुनर्जागरण

– कैलाश चंद “वन्दे मातरम्” ये दो शब्द सिर्फ एक नारा नहीं, भारत की आत्मा का गूढ़ और दिव्य उद्गार हैं। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक जड़ है, जो भूमि, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान इन चारों को मातृभाव में एक सूत्र में पिरोता है। जब कोई भारतीय “वन्दे मातरम्” कहता है तो वह केवल मातृभूमि को प्रणाम नहीं करता बल्कि उस चेतना, परंपरा और जीवन दर्शन को नमन करता है जिसने इस देश को हजारों वर्षों से जीवित और गतिशील बनाए रखा है। आज, जब इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार के 2026 के नए दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय अपील सामने आई है, तब यह गीत एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित होता दिखाई दे रहा है। भारतीय सभ्यता में भूमि को केवल भौगोलिक सीमा या प्राकृतिक संसाधनों का समूह नहीं माना गया है। यहां धरती को “माता” कहा गया है, एक ऐसी माता जो जीवन देती है, पोषण करती है और संस्कार प्रदान करती है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” भारतीय चिंतन की इसी भावना को प्रकट करता है। यह वाक्य बताता है कि मनुष्य और भूमि का संबंध केवल उपयोग का नहीं बल्कि आत्मीयता और मातृत्व का है। यही वैदिक आधार “वन्दे मातरम्” की आत्मा में समाहित है। जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना की, तब उन्होंने केवल एक राजनीतिक नारा नहीं दिया। उन्होंने भारत की प्राचीन आत्मा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं था बल्कि एक जीवित मातृशक्ति थी, जो लक्ष्मी के रूप में समृद्धि देती है, सरस्वती के रूप में ज्ञान प्रदान करती है और दुर्गा के रूप में शक्ति का संचार करती है। इसीलिए इस गीत की हर पंक्ति में प्रकृति, शक्ति, ज्ञान और मातृत्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। सन् 1875 का वह काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। ब्रिटिश शासन का दमन, सांस्कृतिक अपमान और आत्मगौरव का संकट समाज में गहराई तक समा चुका था। भारतीयों के भीतर अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बचाने की तीव्र आकांक्षा जन्म ले रही थी। इसी समय बंकिमचन्द्र ने “वन्दे मातरम्” की रचना की। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं था बल्कि एक जागरण का मंत्र बनकर उभरा। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया, तब यह गीत पूरे देश में फैल गया और एक राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बन गया। धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण मंत्र बन गया। साल 1905 के बंग भंग आंदोलन के समय “वन्दे मातरम्” हर गली, हर सभा और हर आंदोलन की धड़कन बन गया। विद्यार्थी जुलूसों में यह गूंजता था, महिलाओं की सभाओं में यह प्रेरणा देता था, क्रांतिकारियों के शपथ पत्रों में यह आत्मबल जगाता था और राष्ट्रीय आंदोलनों में यह एकजुटता का स्वर बन जाता था। यह केवल गीत नहीं रहा, यह आत्मगौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा का घोष बन गया। श्री अरविन्द ने इसे राष्ट्र आत्मा का मंत्र कहा। लाला लाजपत राय, सुब्रमण्य भारती, लाला हरदयाल और भीकाजी कामा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी पत्रिकाओं और पत्रों के शीर्षक में “वन्दे मातरम्” को स्थान दिया। महात्मा गांधी भी अपने कई पत्रों का समापन इसी मंत्र के साथ करते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस गीत के प्रभाव को समझा और इसे रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए, लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन जितना दमन हुआ, उतनी ही इसकी शक्ति और बढ़ती गई। यह जनता के हृदय में बस चुका था और वहां से इसे कोई नहीं हटा सकता था। समय के साथ यह गीत केवल स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति बनकर नहीं रह गया बल्कि भारतीय पहचान का स्थायी प्रतीक बन गया। 30 से 31 अक्टूबर तथा 1 नवम्बर 2025 को जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसे राष्ट्र चेतना का मूल स्वरबद्ध गीत बताया। उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम् एक दिव्य गीत है, जो राष्ट्र चेतना को जागृत करता है और समाज को जोड़ने वाली अद्भुत डोर है।” उनके अनुसार यह गीत सभी प्रांतों, भाषाओं और समुदायों के बीच समान रूप से स्वीकार्य है और यह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और आत्मस्वत्व का आधार है। संघ ने समाज से आह्वान किया कि इस 150 वर्ष के पावन काल में “वन्दे मातरम्” की ज्योति हर हृदय में प्रज्ज्वलित हो और इसी भाव से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया जाए। इसी संदर्भ में 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार द्वारा घोषित नए दिशा-निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। इन निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले “वन्दे मातरम्” के सभी छह अंतरों का गायन किया जाएगा, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड होगी। राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज समारोह, पद्म पुरस्कार और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में इसे गाना अनिवार्य किया गया है। विद्यालयों में भी प्रार्थना की शुरुआत “वन्दे मातरम्” से करने का सुझाव दिया गया है। हालांकि इस संबंध में किसी प्रकार की कानूनी सजा का प्रावधान नहीं रखा गया है। यह एक दंडात्मक आदेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में है। आज के समय में “वन्दे मातरम्” अक्सर केवल दो शब्दों तक सीमित होकर रह जाता है। लोग इसे एक नारे के रूप में बोलते हैं किंतु इसकी वास्तविक महत्ता पूरे गीत में निहित है। ये दो शब्द भावना जगाते हैं, लेकिन पूरा गीत चेतना जगाता है। इसकी संपूर्ण रचना में राष्ट्र चेतना को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करने की क्षमता है। इसमें प्रकृति का सौंदर्य है, संस्कृति का गौरव है, ज्ञान का प्रकाश है और शक्ति का तेज है। ये चारों तत्व मिलकर इसे केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन दर्शन बना देते हैं। “वन्दे मातरम्” हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं होता, यह एक जीवित सांस्कृतिक सत्ता होता है। इसकी सेवा कर्तव्य से बढ़कर है, यह तप और साधना है। मातृभूमि सिर्फ भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी चेतना, पहचान और अस्तित्व का आधार है। जब हम “वन्दे मातरम्” कहते हैं तो हम उस परंपरा को