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डिजिटलीकरण की रफ्तार और ‘डिजिटल जहर’ का खतरा

-सुनील कुमार महला आज हमारा देश भारत तेजी से डिजिटाइजेशन की ओर अग्रसर है, और कहना ग़लत नहीं होगा कि इसमें स्मार्टफोन विशेषकर एंड्रॉयड का सबसे बड़ा योगदान है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि वैश्विक स्तर पर जहां एंड्रॉयड उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 3.9 अरब (390 करोड़) है, वहीं भारत में वर्ष 2025–2026 के अनुमान के अनुसार कुल स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं की संख्या लगभग 75 करोड़ (750 मिलियन) तक पहुंच चुकी है। इनमें से लगभग 89%-90% स्मार्टफोन एंड्रॉयड आधारित हैं। अर्थात सरल शब्दों में कहें तो भारत में करीब 65-70 करोड़ लोग एंड्रॉयड फोन का उपयोग कर रहे हैं।यह भी कहा जा सकता है कि आज हर 10 में से लगभग 9 लोग एंड्रॉयड फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। वास्तव में, हमारे देश में सस्ते डेटा प्लान, किफायती स्मार्टफोन और डिजिटल सेवाओं का विस्तार इस तेज़ी के प्रमुख कारण हैं। हालांकि, इस डिजिटल क्रांति का एक चिंताजनक पहलू भी सामने आ रहा है-‘डिजिटल जहर’ अर्थात मोबाइल और स्क्रीन की बढ़ती लत, जो विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के लिए गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। आंकड़े इस समस्या की भयावहता को स्पष्ट करते हैं। क्या यह चिंताजनक बात नहीं है कि हमारे देश में 0-5 वर्ष के बच्चे प्रतिदिन औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन पर बिताते हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से लगभग दोगुना है। वहीं, 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी औसतन 1.2 घंटे स्क्रीन देखते हैं, जबकि उनके लिए स्क्रीन टाइम शून्य होना चाहिए। इतना ही नहीं, यदि हम यहां पर स्कूल जाने वाले बच्चों की बात करें, तो एक अध्ययन के अनुसार 62.5% बच्चों में मध्यम से उच्च स्तर की स्क्रीन लत पाई गई है, और उनका औसत स्क्रीन टाइम लगभग 4 घंटे प्रतिदिन है। एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि भारत के 74% छात्र रोजाना 2 घंटे से अधिक स्क्रीन का उपयोग करते हैं, जिनमें से 21% बच्चे 4 घंटे से भी अधिक समय मोबाइल, गेमिंग या सोशल मीडिया पर बिताते हैं। लगभग 70% माता-पिता का मानना है कि उनके बच्चे वीडियो और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के आदी हो चुके हैं। और भी चिंता की बात यह है कि 64% बच्चे सोशल मीडिया और गेमिंग के आदी हैं, जबकि केवल 20% बच्चों में किसी प्रकार की डिजिटल लत नहीं पाई गई है।एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज के समय में भारत में लगभग 90% किशोरों के पास स्मार्टफोन की पहुंच है और 76% बच्चे मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भी डिजिटल लत को बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बताया है, क्योंकि यह उनकी पढ़ाई, एकाग्रता और व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। इस डिजिटल लत के दुष्परिणाम भी स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। मसलन, ध्यान में कमी, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या, पढ़ाई में गिरावट, सामाजिक दूरी, अकेलापन, मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि हाल ही में राज्यसभा में भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया, जहां यह बताया गया कि कई बच्चे प्रतिदिन 7-8 घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिता रहे हैं। इससे उनकी शिक्षा, सामाजिक जीवन और नींद पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।विशेषज्ञों ने इस स्थिति को ‘डिजिटल गुलामी’ तक करार दिया है, क्योंकि बच्चे मोबाइल के बिना स्वयं को असहज महसूस करते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में सोशल मीडिया पर लाइक्स और कमेंट्स की होड़ बच्चों में हीन भावना, तनाव और अवसाद को बढ़ा रही है, वहीं ऑनलाइन बुलिंग जैसी समस्याएं भी उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। हाल ही में एक अमेरिकी अदालत ने भी यह माना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का डिजाइन इस प्रकार बनाया जाता है कि उपयोगकर्ता बार-बार उन्हें इस्तेमाल करें, जिससे लत की प्रवृत्ति बढ़ती है। इस बढ़ती समस्या के समाधान के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं। राज्यसभा में राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने, स्कूलों में ‘डिजिटल हेल्थ’ को पाठ्यक्रम में शामिल करने और सोशल मीडिया तथा गेमिंग कंपनियों पर सख्त नियम लागू करने की मांग की गई है। साथ ही, अभिभावकों को यह सलाह दी गई है कि वे बच्चों पर केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय उनसे खुलकर संवाद करें, उनके साथ समय बिताएं और उन्हें खेल-कूद तथा रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करें। अंततः, यह स्पष्ट है कि डिजिटल लत अब केवल एक आदत नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने जहां अभिव्यक्ति और सूचना के नए द्वार खोले हैं, वहीं उनका अत्यधिक उपयोग बच्चों और किशोरों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास को प्रभावित कर रहा है। यदि समय रहते प्रभावी और संतुलित कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर गहरा और दीर्घकालिक होगा। इसलिए सरकार, शैक्षणिक संस्थान, अभिभावक और समाज-सभी को मिलकर जागरूकता, संतुलित उपयोग और सकारात्मक संवाद के माध्यम से इस ‘डिजिटल जहर’ से बच्चों और युवाओं को बचाने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।

किताबों के नाम पर कमीशन- शिक्षा या व्यापार?

– डॉ. सत्यवान सौरभशिक्षा को सदैव समाज की आत्मा, विकास का आधार और समान अवसरों का सेतु माना गया है। यह केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक के निर्माण की प्रक्रिया भी है। परंतु जब यही शिक्षा लाभ कमाने का साधन बन जाए, तो यह चिंता का विषय ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के लिए एक गंभीर चेतावनी बन जाती है। हाल ही में सामने आई खबर कि कुछ निजी विद्यालय 50 प्रतिशत तक कमीशन लेकर किताबें बेच रहे हैं, इस चिंता को और अधिक गहरा करती है। यह केवल एक प्रशासनिक अनियमितता नहीं, बल्कि शिक्षा के मूल स्वरूप पर सीधा आघात है। आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है, प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, और साथ ही बढ़ा है शिक्षा का खर्च। लेकिन इस बढ़ते खर्च के पीछे यदि गुणवत्ता, बेहतर सुविधाएं और आधुनिक संसाधन हों, तो इसे एक हद तक उचित ठहराया जा सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब शिक्षा के नाम पर अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक बोझ के नीचे दबाया जाने लगे। किताबों के नाम पर लिया जा रहा भारी कमीशन इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण है। कई निजी विद्यालय अभिभावकों को यह निर्देश देते हैं कि वे केवल स्कूल द्वारा निर्धारित दुकानों से ही किताबें खरीदें या सीधे स्कूल परिसर से किताबें लें। यह स्थिति एक प्रकार का एकाधिकार (मोनोपॉली) पैदा करती है, जहां अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता। खुले बाजार में उपलब्ध सस्ती या वैकल्पिक पुस्तकों को खरीदने की स्वतंत्रता उनसे छीन ली जाती है। परिणामस्वरूप, उन्हें मजबूरी में अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में शामिल होता है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का भी घोर अभाव है। अभिभावकों को यह नहीं बताया जाता कि किन आधारों पर इन पुस्तकों का चयन किया गया है, उनकी वास्तविक कीमत क्या है, और उन पर कितना अतिरिक्त लाभ जोड़ा गया है। कई बार तो यह भी देखा गया है कि एक ही विषय की पुस्तक हर वर्ष बदल दी जाती है, ताकि पुरानी किताबें किसी काम की न रहें और नई किताबें खरीदने के लिए अभिभावक बाध्य हों। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक शोषण को बढ़ावा देती है, बल्कि संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी भी करती है। यह स्थिति केवल आर्थिक दृष्टि से ही चिंताजनक नहीं है, बल्कि यह शिक्षा के मूल उद्देश्य को भी कमजोर करती है। जब विद्यालय ज्ञान के केंद्र के बजाय लाभ कमाने के साधन बन जाते हैं, तो शिक्षा का मूल्य स्वतः ही गिरने लगता है। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच का संबंध, जो कभी विश्वास और मार्गदर्शन पर आधारित होता था, धीरे-धीरे एक औपचारिक लेन-देन में बदलने लगता है। बच्चों के समग्र विकास की जगह संस्थान का आर्थिक लाभ प्राथमिकता बन जाता है। अभिभावकों की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक दयनीय हो जाती है। वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए सर्वोत्तम शिक्षा चाहते हैं, लेकिन उन्हें बार-बार आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है। मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों के लिए यह बोझ और भी अधिक भारी हो जाता है। कई बार वे अपनी अन्य आवश्यकताओं में कटौती करके इन खर्चों को पूरा करते हैं। यह स्थिति सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल उन लोगों तक सीमित होती जा रही है, जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। इस पूरे मुद्दे का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—सिलेबस में बार-बार होने वाला बदलाव। हर वर्ष या दो वर्ष में पाठ्यक्रम में छोटे-मोटे बदलाव कर दिए जाते हैं, जिससे पुरानी किताबें अप्रासंगिक हो जाती हैं। यह बदलाव अक्सर शैक्षणिक आवश्यकता से अधिक व्यावसायिक हितों से प्रेरित प्रतीत होता है। यदि पाठ्यक्रम में वास्तव में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, तो केवल किताबों के संस्करण बदलना और नई किताबें अनिवार्य करना कहीं न कहीं संदेह पैदा करता है। सबसे चिंताजनक पहलू है—शिक्षा विभाग की निष्क्रियता। नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसके बावजूद, यह प्रथा खुलेआम जारी है। इसका अर्थ यह है कि या तो नियमों का पालन नहीं हो रहा, या फिर उनके पालन को सुनिश्चित करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। यह खामोशी कहीं न कहीं इस व्यवस्था को मौन स्वीकृति देती प्रतीत होती है। यह भी आवश्यक है कि हम इस समस्या को केवल आलोचना तक सीमित न रखें, बल्कि इसके समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने की बात करें। सबसे पहले, शिक्षा विभाग को इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। केवल चेतावनी या औपचारिक नोटिस पर्याप्त नहीं होंगे; आवश्यक है कि ऐसे मामलों में दंडात्मक कार्रवाई भी हो, ताकि एक स्पष्ट संदेश जाए। दूसरे, किताबों की बिक्री में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। स्कूलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे कौन-सी किताबें क्यों निर्धारित कर रहे हैं और उनकी कीमत क्या है। यदि संभव हो, तो सभी किताबों की सूची ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाए, ताकि अभिभावक कहीं से भी उन्हें खरीद सकें। इससे एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बनी रहेगी और कीमतों में अनावश्यक वृद्धि पर रोक लगेगी। तीसरे, सिलेबस में बार-बार होने वाले अनावश्यक बदलावों पर भी नियंत्रण होना चाहिए। यदि पाठ्यक्रम में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं है, तो किताबों को बार-बार बदलने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। इससे न केवल अभिभावकों का आर्थिक बोझ कम होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान मिलेगा। चौथे, अभिभावकों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा। वे यदि संगठित होकर अपनी बात रखते हैं, तो इस प्रकार की प्रथाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है। समाज के अन्य वर्गों, जैसे सामाजिक संगठनों और मीडिया को भी इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाना चाहिए। अंततः, हमें यह समझना होगा कि शिक्षा कोई वस्तु नहीं है, जिसे मुनाफे के लिए बेचा जाए। यह एक सामाजिक दायित्व है, जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को निर्धारित करता है। यदि इस क्षेत्र में अनियंत्रित व्यावसायीकरण को बढ़ावा दिया गया, तो इसका दुष्प्रभाव केवल वर्तमान पर ही नहीं, बल्कि आने वाले समय पर भी पड़ेगा। आज आवश्यकता इस बात की है

अपने भीतर के हनुमान को जगाने का पर्व

– ललित गर्ग हनुमान जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन के चरित्र-निर्माण, आत्मबल, संयम, सेवा और समर्पण की प्रेरणा देने वाला महान दिवस है। यह दिन हमें मंदिरों में दीप जलाने से अधिक अपने भीतर के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है। हनुमान केवल शक्ति के प्रतीक नहीं हैं, वे शक्ति के सदुपयोग, ज्ञान की विनम्रता, भक्ति की पराकाष्ठा और सेवा की परंपरा के प्रतीक हैं। इसलिए हनुमान जयंती मनाने का वास्तविक अर्थ है-अपने भीतर के हनुमान को जगाना। हनुमान जी को मंगलकर्ता और विघ्नहर्ता कहा गया है। लेकिन वे विघ्न केवल बाहरी नहीं हटाते, वे मनुष्य के भीतर के विघ्न-अहंकार, भय, आलस्य, क्रोध, लोभ, मोह, इन सबका भी नाश करते हैं। आज का मनुष्य बाहरी समस्याओं से कम और आंतरिक कमजोरियों से अधिक परेशान है। इसलिए आज हनुमान की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है। हनुमान शक्ति के प्रतीक हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने अपनी शक्ति को सेवा में लगाया। आज का युग शक्ति प्रदर्शन का युग बन गया है-धन का प्रदर्शन, पद का प्रदर्शन, ज्ञान का प्रदर्शन, शक्ति का प्रदर्शन। लेकिन हनुमान हमें सिखाते हैं कि शक्ति और ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, उसका संरक्षण और सदुपयोग ही महानता है। सर्वशक्तिमान होकर भी उन्होंने स्वयं को “राम का दास” कहा। इससे बड़ी विनम्रता और क्या हो सकती है? हनुमान हमें यह भी सिखाते हैं कि शक्ति और ज्ञान का अहंकार नहीं होना चाहिए। ज्ञान यदि विनम्रता नहीं देता, तो वह अज्ञान है। शक्ति यदि सेवा में नहीं लगती, तो वह विनाश का कारण बनती है। इसलिए हनुमान शक्ति और ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता और सेवा के भी प्रतीक हैं। हनुमान को ज्ञानियों में अग्रगण्य कहा गया है-“ज्ञानिनामग्रगण्यम”। वे केवल बलवान नहीं थे, वे महान विद्वान, व्याकरणाचार्य, तर्कशास्त्री, संगीतज्ञ और नीतिज्ञ भी थे। लेकिन इतनी विद्या होने पर भी उनमें अहंकार नहीं था। वे सरलता, सादगी और सेवा के प्रतीक बने रहे। आज शिक्षा बढ़ रही है, लेकिन विनम्रता घट रही है। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन चरित्र घट रहा है। ऐसे समय में हनुमान का चरित्र हमें ज्ञान के साथ विनम्रता का संतुलन सिखाता है। हनुमानजी को हिन्दू देवताआंे में सबसे शक्तिशाली माना गया है, वे रामायण जैसे महाग्रंथ के सह पात्र थे। वे भगवान शिव के ग्यारवंे रूद्र अवतार थे जो श्रीराम की सेवा करने और उनका साथ देने त्रेता युग में अवतरित हुए थे। उनको बजरंग बलि, मारुतिनंदन, पवनपुत्र, केशरीनंदन आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है। उनका एक नाम वायुपुत्र भी है, उन्हें वातात्मज भी कहा गया है अर्थात् वायु से उत्पन्न होने वाला। इन्हें सात चिरंजीवियो में से एक माना जाता है। वे सभी कलाओं में सिद्धहस्त एवं माहिर थे। वीरो में वीर, बुद्धिजीवियांे में सबसे विद्वान। इन्होंने अपने पराक्रम और विद्या से अनेकों कार्य चुटकीभर समय में पूर्ण कर दिए है। वे शौर्य, साहस और नेतृत्व के भी प्रतीक हैं। समर्पण एवं भक्ति उनका सर्वाधिक लोकप्रिय गुण है। रामभक्त हनुमान बल, बुद्धि और विद्या के सागर तो थे ही, अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता और ज्योतिष के भी प्रकांड विद्वान थे। हनुमान के जीवन में तीन महान तत्व दिखाई देते हैं-ज्ञान, भक्ति और कर्म। ज्ञान उन्हें दिशा देता है, भक्ति उन्हें प्रेरणा देती है और कर्म उन्हें महान बनाता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में ज्ञान है पर कर्म नहीं, तो वह अधूरा है। यदि कर्म है पर भक्ति नहीं, तो उसमें संवेदना नहीं होगी। यदि भक्ति है पर ज्ञान नहीं, तो वह अंधविश्वास बन सकती है। इन तीनों का समन्वय यदि किसी चरित्र में दिखाई देता है, तो वह हनुमान का चरित्र है। हनुमान का जीवन संयम का जीवन था। वे बलशाली थे, पर ब्रह्मचारी थे। वे विद्वान थे, पर विनम्र थे। वे वीर थे, पर शांत थे। वे शक्तिशाली थे, पर सेवक थे। यह संतुलन ही उन्हें महान बनाता है। आज मनुष्य के पास साधन हैं, पर संयम नहीं। ज्ञान है, पर दिशा नहीं। शक्ति है, पर सेवा नहीं। इसलिए समाज में अशांति बढ़ रही है। हनुमान का जीवन हमें संयम और संतुलन का संदेश देता है। हनुमान के बाल स्वरूप की कथा भी अत्यंत प्रेरणादायक है। बालक हनुमान ने सूर्य को फल समझकर पकड़ने का प्रयास किया। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक महान संदेश है। यह बालकों की असीम जिज्ञासा, उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक है। यह कथा समाज को संदेश देती है कि बच्चों की जिज्ञासा को दबाया नहीं जाना चाहिए, उसे सही दिशा देनी चाहिए। यदि बालकों को सही मार्गदर्शन मिले, तो उनमें से हर बालक हनुमान बन सकता है-ऊर्जावान, जिज्ञासु, साहसी और रचनात्मक। आज के माता-पिता और समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में हनुमान जैसे गुण विकसित करें-साहस, जिज्ञासा, अनुशासन, सेवा, विनम्रता और भक्ति। यदि बचपन में ही यह संस्कार मिल जाएं, तो समाज का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। हनुमान भक्ति का वास्तविक अर्थ भी समझना जरूरी है। हनुमान भक्ति केवल चालीसा पढ़ना नहीं है, बल्कि हनुमान के गुणों को जीवन में उतारना है। हनुमान भक्ति का अर्थ है- अहंकार छोड़ना, सेवा करना, सत्य का साथ देना, संयम रखना, कर्तव्य निभाना और अपने जीवन को किसी महान उद्देश्य से जोड़ना। जब तक भक्ति केवल मंदिर तक सीमित रहेगी, तब तक भगवान अलग रहेंगे और भक्त अलग रहेगा। जब भक्ति जीवन बन जाती है, तब भगवान और भक्त अलग नहीं रहते। हनुमान की भक्ति प्रदर्शन नहीं, आत्मपरिवर्तन की प्रक्रिया है। यह भक्ति व्यक्ति को भीतर से बदल देती है-अहंकार की जगह विनम्रता, क्रोध की जगह क्षमा, भय की जगह साहस और निराशा की जगह आशा भर देती है। आज समाज में सबसे बड़ी समस्या शक्ति की नहीं, चरित्र की है; ज्ञान की नहीं, दिशा की है; साधनों की नहीं, संयम की है। इसलिए आज समाज को हनुमान की जरूरत है-मंदिरों में नहीं, जीवन में; मूर्तियों में नहीं, व्यक्तित्व में। हर व्यक्ति के भीतर एक हनुमान सोया हुआ है- किसी में साहस का हनुमान, किसी में सेवा का हनुमान, किसी में ज्ञान का हनुमान, किसी में भक्ति का हनुमान। जरूरत केवल उसे जगाने की है। अपने भीतर के हनुमान को जगाने का अर्थ है- अपने भीतर के भय को हराना,

'स्कूल चलें हम’,

– प्रो. मनोज कुमारशिक्षा की महती जवाबदारी समाज की है. सरकार शिक्षा के संसाधन उपलब्ध कराती है, अवसर देती है और अपने स्तर पर प्रयास करती है कि कोई बच्चा स्कूल जाने से ना छूटे. इसके बाद जवाबदारी आती है समाज की अर्थात हम-सब की कि बच्चों को स्कूल तक पहुँचायें. बच्चा का अर्थ केवल अपना बच्चा नहीं है बल्कि वह अपने आसपास का बच्चा भी है. आपके घर में सफाई करने वाली, बर्तन-कपड़ा धोने वाली दीदी होंगी, आपके घर में ड्रायवर भी होगा और अन्य सहायता करने वाले लोग भी आसपास होंगे और इनके बच्चे भी होंगे. कुछ अपने बच्चों को स्कूल भेजते होंगे और कुछ नहीं भेजते होंगे. ऐसे परिवारों को उनके बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करना हम-सब की सामाजिक एवं नैतिक जवाबदारी है. नवीन शिक्षा सत्र से चार दिनों का ‘स्कूल चलें हम’ उत्सव आरंभ हो गया है. यही चार दिन बच्चों का भविष्य तय करने के लिए अर्थवान है. शिक्षकों की भी जवाबदारी बढ़ गई है कि वे नौनिहालों को किताब की ओर आकर्षित करें. ध्यान रखना होगा कि स्कूल सीखने और समझने की जगह है और ऐसे में शिक्षकों को स्नेह के साथ बच्चों के मन को जीतना होगा. मध्यप्रदेश में अब सरकारी स्कूल सुविधाहीन नहीं हैं और ना ही निजी स्कूलों से कमतर. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत स्मार्ट क्लास, डिजिटल लाइब्रेरी और वोकेशनल कोर्स के साथ पीएमश्री योजना के तहत सरकारी स्कूलों को आधुनिक बनाया जा रहा है या यों कहें कि इस दिशा में काफी कुछ कार्य सरकार ने पूर्ण कर लिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. मिसाल के तौर पर पीएम श्री योजना के अंतर्गत 799 शासकीय विद्यालयों को स्मार्ट क्लास, प्रयोगशाला और लाइब्रेरी के साथ अपग्रेड किया गया है। साथ ही उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए सक्रिय अभ्यास क्रियाविधि का उपयोग किया जा रहा है, जो विज्ञान और सामाजिक विज्ञान को इंटरैक्टिव बनाता है। स्कूलों में कौशल विकास के लिए व्यावसायिक कोर्स (जैसे ब्यूटीशियन, सिलाई) भी शुरू किए गए हैं। स्कूली शिक्षा का नया शैक्षणिक सत्र 2026-27, 1 अप्रैल से शुरू हो चुका है जिसमें ‘स्कूल चलें हम’ अभियान के तहत बच्चों का स्वागत, नि:शुल्क पुस्तकें वितरण और पहले दिन से ही पढ़ाई शुरू की गई है। ‘स्कूल चलें हम’ अभियान में नामांकन और पढ़ाई पर फोकस रहेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में 92 हजार से अधिक सरकारी स्कूलों में 85 लाख से अधिक छात्रों का स्वागत किया जाएगा और मुफ्त किताबें वितरित की गई। ‘स्कूल चलें हम’ अभियान को इस तरह डिजाइन किया गया है कि हर बच्चे की रूचि स्कूल आने में हो. अभियान के दूसरे दिन ‘भविष्य से भेंट’ कार्यक्रम में अपने-अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों से नवागत विद्यार्थियों की भेंट होगी. विद्यार्थी उनकी सफलता के बारे में सवाल करेंगे. यह प्रयास विद्यार्थियों को भविष्य में क्या बनना है, के प्रति पे्ररित करेगा. विशिष्ट उपलब्धियां हासिल करने वाले खिलाड़ी, साहित्यकार, कलाकार, मीडिया, संचार मित्रों, पुलिस अधिकारी, राज्य शासन के अधिकारी बच्चों को पढ़ाई के महत्व और प्रेरणादायी कहानियां सुना कर उन्हें प्रेरित करेंगे। प्रत्येक जिले के प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों को किसी एक शाला में जाकर एक कालखण्ड में बच्चों के साथ सुरूचिपूर्ण ढंग से संवाद करने के लिये भी कहा गया है अभियान का तीसरा तीन सांस्कृतिक एवं खेल गतिविधियों का होगा. पालकों को अपनापन लगे और वे बच्चों को स्कूल भेजने के लिए दूसरों को प्रेरित करें, इस ध्येय के साथ उत्कृृष्ट उपस्थिति वाले विद्यार्थियों के पालकों को सम्मानित किया जाएगा. यह अपने आप में अनोखी पहल होगी. अभियान के अंतर्गत 3 अप्रैल को शाला स्तर पर पालकों के साथ सांस्कृतिक एवं खेल-कूद की गतिविधियां आयोजित की जायेंगी। इसका उद्देश्य पालकों का विद्यालय से जोडऩा है। इसी दिन शाला में उपस्थित पालकों को शैक्षणिक स्टॉफ द्वारा राज्य सरकार की स्कूल शिक्षा से जुड़ी सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जायेगी। अभियान के अंतिम दिन ड्रॉपआउट बच्चों को वापस स्कूल लाने के लिए विशेष पहल और विशेष शिक्षण सहायता की रूपरेखा से अवगत कराया जाएगा. अभियान के अंतिम दिन 4 अप्रैल को ऐसे छात्रों को चिन्हित किया जायेगा, जो किन्हीं वजहों से कक्षोन्नति प्राप्त करने में असफल हो गये हैं। पालकों को इन बच्चों की आगे की पढ़ाई के लिये समझाइश दी जायेगी। उन्हें बताया जायेगा कि असफल होने के बाद भी लगातार प्रयास से अच्छा भविष्य तैयार किया जा सकता है। इसमें हम-सब सहायता कर सकते हैं. शिक्षा पर सबका अधिकार है, यह बात अधिकतम लोगों तक पहुंचाने की जवाबदारी हमें ही लेना होगी. सरकार पर आश्रित रहने से कुछ खास बदलाव होने वाला नहीं है. सरकार अपने स्तर पर प्रयास करती है लेकिन इन प्रयासों को सफलता तक पहुँचाने की जवाबदारी समाज की होती है. सरकार ने एक कोशिश कर स्कूलों के ढाँचे को सुदृढ़ करने की कोशिश की है. शासकीय स्कूल नए साज-सज्जा के साथ निजी स्कूलों के टक्कर में खड़े हो गए हैं फिर वह पीएमश्री स्कूल हो या सांदीपनी स्कूल. एक बड़ी सोच के साथ कम बजट में बेहतर शिक्षा देने की पहल हो चुकी है और इस पहल को आगे बढ़ाने की जवाबदारी उठाने के लिए हम-सबको आगे आना होगा.

रूस भारत के लिए एक बार फिर मददगार साबित

– सौरभ वार्ष्णेयजब-जब भारत को जरूरत पड़ी, तब -तब रूस ने अपना मित्रता धर्म निभाया है। वैश्विक राजनीति के जटिल दौर में, जब विश्व शक्तियों के बीच तनाव और प्रतिस्पर्धा चरम पर है, ऐसे समय में भारत के लिए रूस का एक बार फिर भरोसेमंद साझेदार के रूप में सामने आना बेहद महत्वपूर्ण है। यह केवल कूटनीतिक संबंधों का मामला नहीं, बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक व्यापक सहयोग है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया गैस कच्चे तेल की कमी से त्रस्त है तब 9 मार्च तक भारत का रूसी तेल आयात 5.55 करोड़ बैरल तक पहुंच गया है जो कि खरीद नौ महीने में सबसे अधिक है। भारत की तेल खरीद में अंगोला भी पिक्चर में आया है। उसकी सप्लाई में 255 फीसदी का भारी इजाफा हुआ है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। उसके कच्चे तेल के आयात का लगभग 40-50 फीसदी हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। सऊदी अरब से होने वाले आयात में फरवरी के मुकाबले 38 फीसदी की कमी आई। वहीं दूसरी ओर अंगोला से होने वाली खरीद में महीने-दर-महीने के आधार पर जबरदस्त 255 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यह अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। भारत की ओर से इराक से की जाने वाली खरीद में भी 73 फीसदी की कमी आई। यह घटकर 73 लाख बैरल रह गई। इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात से होने वाली खरीद में भी 59 फीसदी की कमी आई। यह 64 लाख बैरल पर पहुंच गई। भारत और रूस के संबंध दशकों पुराने हैं, जो समय-समय पर परखे गए और हर बार मजबूत होकर उभरे। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज के बहुध्रुवीय विश्व तक, रूस ने कई अहम मौकों पर भारत का साथ दिया है। आज जब पश्चिमी देशों और रूस के बीच टकराव बढ़ा है, तब भारत ने संतुलित विदेश नीति अपनाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। ऊर्जा के क्षेत्र में रूस की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। वैश्विक बाजार में तेल और गैस की कीमतों में अस्थिरता के बीच रूस ने भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराया, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिली और आम जनता पर महंगाई का बोझ कुछ हद तक कम हुआ। यह सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार बनकर उभरा है। रक्षा क्षेत्र में भी रूस भारत का प्रमुख सहयोगी रहा है। आधुनिक हथियारों, तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच गहरा सहयोग है। चाहे वह ब्रह्मोस मिसाइल परियोजना हो या एस-400 वायु रक्षा प्रणाली, रूस ने भारत की सैन्य क्षमता को सुदृढ़ करने में अहम योगदान दिया है। हालांकि, इस संबंध में चुनौतियां भी कम नहीं हैं। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते भुगतान तंत्र, आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय दबाव जैसे मुद्दे सामने आए हैं। इसके बावजूद भारत ने अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए रूस के साथ सहयोग जारी रखा है। आज जरूरत इस बात की है कि भारत और रूस अपने संबंधों को और अधिक विविध और आधुनिक बनाएं। केवल रक्षा और ऊर्जा तक सीमित न रहकर, विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष और व्यापार के नए क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाया जाना चाहिए। इससे दोनों देशों के संबंध और अधिक मजबूत और टिकाऊ बन सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में रूस का भारत के लिए मददगार बनकर उभरना न केवल द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती का संकेत है, बल्कि यह भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति की सफलता का भी प्रमाण है। भारत-रूस मित्रता बहुत पुरानीभारत और रूस के बीच संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विश्वास, रणनीतिक सहयोग और परस्पर सम्मान पर आधारित हैं। यह मित्रता दशकों पुरानी है और बदलते वैश्विक परिदृश्य के बावजूद निरंतर मजबूत होती रही है। शीत युद्ध के दौर में, जब विश्व दो ध्रुवों में बंटा हुआ था, तब सोवियत संघ ने भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर साथ दिया। चाहे 1971 के युद्ध का समय हो या औद्योगिक विकास की शुरुआत, सोवियत समर्थन ने भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूती दी। यही कारण है कि दोनों देशों के संबंध केवल हितों तक सीमित नहीं, बल्कि भरोसे की नींव पर टिके हैं। आज के दौर में भी, रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्रों में भारत-रूस सहयोग बेहद अहम है। भारत की रक्षा प्रणाली में रूस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, वहीं ऊर्जा क्षेत्र में भी रूस एक विश्वसनीय भागीदार बना हुआ है। वैश्विक तनावों और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच भी भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। हालांकि, बदलती वैश्विक राजनीति में नई चुनौतियां भी सामने हैं। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत के बढ़ते संबंध, और रूस का चीन के साथ समीकरण, इस मित्रता के लिए नई जटिलताएं पैदा कर रहे हैं। इसके बावजूद, भारत की विदेश नीति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित है, जो उसे सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलन बनाने में सक्षम बनाती है। वर्तमान समय में भारत-रूस संबंधों को नई दिशा देने की आवश्यकता है। केवल रक्षा तक सीमित न रहकर, व्यापार, निवेश, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाना होगा। इससे यह मित्रता और अधिक व्यापक और टिकाऊ बन सकेगी। भारत-रूस मित्रता केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का भी आधार है। यह संबंध समय की हर परीक्षा में खरा उतरा है और आने वाले वर्षों में भी वैश्विक स्थिरता और संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता

– डॉ. प्रियंका सौरभभारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (2026) ऐसे समय में उभरकर सामने आया है, जब भारत एक ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी को विस्तार देने की दिशा में अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर अपनी कृषि-आधारित सामाजिक-आर्थिक संरचना की रक्षा करने की अनिवार्य चुनौती का सामना कर रहा है। फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम रूपरेखा ने जहां भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में नए अवसरों के द्वार खोले हैं, वहीं सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पादों के संभावित आयात ने देश के करोड़ों किसानों के बीच चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। इस संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह समझौता भारत को एक सशक्त वैश्विक कृषि निर्यातक के रूप में स्थापित करेगा या यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक संकट का कारण बन सकता है। भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध ऐतिहासिक रूप से रणनीतिक और बहुआयामी रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच कृषि व्यापार में भारत को अधिशेष प्राप्त हुआ है, जो यह संकेत देता है कि भारतीय कृषि उत्पादों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता मौजूद है। प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों—जैसे मसाले, चाय, कॉफी, काजू, आम, पपीता और प्रसंस्कृत खाद्य—पर शुल्क में कमी या समाप्ति भारतीय निर्यात को प्रोत्साहित कर सकती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा अर्जन में वृद्धि होगी, बल्कि कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योग को भी बढ़ावा मिल सकता है। किन्तु इस समझौते का दूसरा पक्ष कहीं अधिक जटिल और संवेदनशील है। अमेरिका अपने किसानों को व्यापक सब्सिडी प्रदान करता है, जिससे उसके कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं। यदि ऐसे उत्पाद—जैसे DDGS, सोयाबीन तेल और ज्वार—भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर प्रवेश करते हैं, तो घरेलू किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जो पहले से ही आय संकट से जूझ रहे किसानों के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न करेगी। भारत की कृषि संरचना मुख्यतः छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है, जो कुल किसानों का लगभग 86% हिस्सा हैं। ये किसान सीमित संसाधनों, अस्थिर बाजार और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच अपनी आजीविका बनाए रखते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी नीतियां इन किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं, किंतु इसकी पहुंच सीमित है और यह सभी फसलों तथा क्षेत्रों को समान रूप से लाभ नहीं पहुंचा पाती। ऐसे में यदि सस्ते आयात घरेलू बाजार में बढ़ते हैं, तो MSP की प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। एक अन्य महत्वपूर्ण चिंता जैव-सुरक्षा और जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों से जुड़ी हुई है। अमेरिका GM फसलों का एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक है, जबकि भारत में इस विषय पर अभी भी सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाता है। व्यापार समझौते के तहत गैर-शुल्कीय बाधाओं को कम करने का दबाव भारत पर पड़ सकता है, जिससे GM उत्पादों के आयात की संभावना बढ़ सकती है। यह स्थिति देश की जैव-विविधता, पारंपरिक कृषि पद्धतियों और खाद्य सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न कर सकती है। इसके अतिरिक्त, डेयरी, पोल्ट्री और तिलहन जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इस समझौते से प्रभावित हो सकते हैं। भारत का डेयरी क्षेत्र न केवल विश्व में अग्रणी है, बल्कि यह करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार भी है। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश करते हैं, तो स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार तिलहन क्षेत्र, जिसमें भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासरत है, सस्ते आयातों के कारण प्रभावित हो सकता है, जिससे घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिलने में बाधा उत्पन्न होगी। इन आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ इस समझौते के सामाजिक और रणनीतिक आयाम भी महत्वपूर्ण हैं। कृषि क्षेत्र में संभावित आय हानि और प्रतिस्पर्धा से ग्रामीण रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे सामाजिक असमानता और क्षेत्रीय विषमताएँ बढ़ सकती हैं। वहीं रणनीतिक दृष्टि से यह समझौता भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते सहयोग का प्रतीक है, जो QUAD और Indo-Pacific में शक्ति संतुलन के व्यापक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में भारत के लिए इस समझौते को पूरी तरह अस्वीकार करना व्यवहारिक नहीं है, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इस संदर्भ में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह वैश्विक आर्थिक अवसरों का लाभ उठाते हुए अपने कृषि हितों की रक्षा कैसे करे। इसके लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, व्यापारिक सुरक्षा उपायों—जैसे मात्रा सीमाएँ (TRQ), न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) और विशेष संरक्षण उपाय (SSM)—का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि अचानक बढ़ते आयातों से घरेलू बाजार को सुरक्षित रखा जा सके। दूसरे, घरेलू कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं। इसमें कृषि उत्पादक संगठनों (FPOs) को बढ़ावा देना, आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना और प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करना शामिल है। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और किसान बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकेंगे। तीसरे, निर्यातोन्मुख कृषि नीति को मजबूत किया जाना चाहिए। भारत के पास मसाले, जैविक उत्पाद, बागवानी फसलें और पारंपरिक खाद्य उत्पादों में वैश्विक बाजार पर कब्जा करने की अपार संभावनाएँ हैं। यदि इन क्षेत्रों में गुणवत्ता मानकों, ब्रांडिंग और लॉजिस्टिक्स पर ध्यान दिया जाए, तो भारत न केवल व्यापार संतुलन बनाए रख सकता है, बल्कि उसे और सुदृढ़ भी कर सकता है। चौथे, जैव-सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को लेकर स्पष्ट और सख्त नीति अपनाना आवश्यक है, ताकि देश की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन से समझौता न हो। इसके साथ ही, तकनीकी नवाचारों को अपनाते हुए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। अंततः, यह समझौता केवल एक आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें निहित अवसरों और जोखिमों के बीच संतुलन स्थापित करना ही इसकी सफलता की कुंजी होगा। भारत को “नेशन फर्स्ट” दृष्टिकोण अपनाते हुए ऐसी रणनीति विकसित करनी होगी, जो किसानों की सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा—इन तीनों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके। यदि भारत स्मार्ट और संवेदनशील नीति-निर्माण के माध्यम से इस संतुलन को साधने में

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सामूहिक विफलता का प्रमाण है निरंतर हो रहे अंतरराष्ट्रीय युद्ध

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब वैश्विक समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना की, तब उसका मूल उद्देश्य स्पष्ट था—भविष्य में युद्धों को रोकना, राष्ट्रों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना तथा वैश्विक शांति और सुरक्षा को स्थायी आधार प्रदान करना किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में एक साथ अनेक युद्ध और सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ अपने मूल उद्देश्य में सफल रही हैं। यूक्रेन, गाजा, सूडान, यमन और कई अन्य क्षेत्रों में लगातार जारी हिंसा इस बात का संकेत देती है कि वैश्विक शांति व्यवस्था का ढांचा गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सामूहिक प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। उप्साला कॉन्फ्लिक्ट डेटा प्रोग्राम के अनुसार वर्ष 2023 में विश्व में 59 राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष दर्ज किए गए जो 1946 के बाद सबसे अधिक संख्या है। यह आंकड़ा केवल संघर्षों की वृद्धि ही नहीं बल्कि इस तथ्य का भी प्रमाण है कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस शांति काल की आशा की जा रही थी, वह अपेक्षा के अनुरूप स्थायी नहीं हो सका। उसी वर्ष वैश्विक स्तर पर संगठित हिंसा से लगभग 154000 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई जबकि 2022 में यह संख्या 310000 थी। यद्यपि मृत्यु दर में उतार-चढ़ाव देखा गया किंतु सक्रिय संघर्षों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि विश्व व्यवस्था में अस्थिरता गहराती जा रही है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इन संघर्षों को रोकने या नियंत्रित करने में सीमित सफलता ही प्राप्त कर पा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को वैश्विक शांति और सुरक्षा का मुख्य संरक्षक माना जाता है किंतु व्यवहार में उसकी संरचना और निर्णय प्रक्रिया कई बार उसकी प्रभावशीलता को सीमित कर देती है। स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो अधिकार के कारण कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव केवल इसलिए पारित नहीं हो पाते क्योंकि महाशक्तियों के भू-राजनीतिक हित उनसे टकराते हैं। यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस ने अनेक प्रस्तावों पर वीटो का प्रयोग किया, जबकि गाजा संघर्ष के दौरान भी विभिन्न प्रस्ताव स्थायी सदस्यों के मतभेदों के कारण लंबित या विफल रहे। इस स्थिति ने संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता और क्षमता दोनों पर प्रश्न खड़े किए हैं, क्योंकि जब वही राष्ट्र, जिन पर शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी है, स्वयं संघर्षों में पक्षकार बन जाते हैं या अपने सहयोगियों के पक्ष में निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, तब संस्था की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमित प्रभावशीलता का एक अन्य संकेत वैश्विक सैन्य व्यय में लगातार हो रही वृद्धि है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार वर्ष 2024 में विश्व का कुल सैन्य व्यय 2.718 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर है और पिछले 10 वर्षों से लगातार बढ़ रहा है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 2.5 प्रतिशत भाग सैन्य खर्च पर व्यय किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि राष्ट्र सुरक्षा के लिए सामूहिक संस्थाओं पर भरोसा करने के बजाय अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल हथियारों की दौड़ को बढ़ावा देती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की उस भूमिका को भी कमजोर करती है, जिसमें वे सामूहिक सुरक्षा और संघर्ष-निवारण के माध्यम से युद्ध की आवश्यकता को कम करने का प्रयास करती हैं। हाल के वर्षों में विश्व के कई प्रमुख संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मध्यस्थता और शांति स्थापना प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। यूक्रेन युद्ध के दो वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद स्थायी और सर्वमान्य समाधान नहीं निकल सका। इसी प्रकार पश्चिम एशिया में इजराइल और हमास के बीच हिंसा बार-बार युद्धविराम के बावजूद पुनः भड़क उठती है। सूडान में आंतरिक संघर्ष ने मानवीय संकट को जन्म दिया, किंतु अंतरराष्ट्रीय समुदाय समय रहते निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर सका। इन सभी उदाहरणों में यह देखा गया कि संस्थाएँ बयान जारी करने, मानवीय सहायता प्रदान करने और कूटनीतिक प्रयास करने तक तो सक्रिय रहीं, किंतु संघर्षों को शीघ्र समाप्त कराने या दीर्घकालिक शांति स्थापित करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की इस विफलता के पीछे कई संरचनात्मक और राजनीतिक कारण हैं। संयुक्त राष्ट्र की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति संतुलन पर आधारित है, जबकि आज का विश्व बहुध्रुवीय हो चुका है। नए उभरते राष्ट्र और क्षेत्रीय शक्तियाँ वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रही हैं, किंतु सुरक्षा परिषद की संरचना में अब तक व्यापक सुधार नहीं हो सका है। परिणामस्वरूप, अनेक राष्ट्र स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर या हाशिये पर महसूस करते हैं, जिससे संस्थाओं की वैधता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थाओं की शक्ति मुख्यतः सदस्य राष्ट्रों की सहमति और सहयोग पर निर्भर करती है। यदि कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी निर्णय को मानने से इनकार कर देता है या प्रतिबंधों को नजरअंदाज करता है, तो संस्थाओं के पास उसे बाध्य करने के सीमित साधन ही होते हैं। यही कारण है कि कई बार अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या परिषदों के निर्णय नैतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हुए भी व्यवहार में लागू नहीं हो पाते। इससे यह संदेश जाता है कि वैश्विक व्यवस्था में नियमों से अधिक शक्ति और प्रभाव का महत्व है, जो संस्थागत व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है। निरंतर हो रहे युद्धों का मानवीय और आर्थिक प्रभाव भी इस विफलता को और अधिक स्पष्ट करता है। युद्धों के कारण लाखों लोग विस्थापित हो रहे हैं, शरणार्थी संकट बढ़ रहा है और अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाएँ अस्थिर हो रही हैं। जब अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इन संकटों को समय रहते रोक नहीं पातीं, तो उनका ध्यान संघर्ष के बाद राहत और पुनर्वास पर केंद्रित हो जाता है जबकि मूल उद्देश्य युद्ध को रोकना और शांति बनाए रखना था। इस प्रकार संस्थाएँ प्रतिक्रियात्मक भूमिका में सिमट जाती हैं, जबकि उनसे अपेक्षा सक्रिय और निवारक भूमिका की थी। यह भी ध्यान देने योग्य है कि आधुनिक युद्धों का स्वरूप पारंपरिक युद्धों से भिन्न हो गया है। अब केवल दो राष्ट्रों के बीच सीधी लड़ाई ही नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध, साइबर आक्रमण, आतंकवाद और

वैश्विक संकट के बीच मानवता की अंतिम सुरक्षा-रेखा है ऊर्जा संरक्षण

  – योगेश कुमार गोयल आज जब विश्व एक बार फिर भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रहा है और ईरान, अमेरिका तथा इजरायल के बीच टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है, तब ऊर्जा केवल विकास का साधन नहीं बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। तेल और गैस के दामों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और ऊर्जा स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या आधुनिक सभ्यता ने अपनी बुनियाद अत्यधिक अस्थिर संसाधनों पर खड़ी कर दी है। इस परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं बल्कि मानवता की सुरक्षा का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी उपाय बनकर उभर रहा है। ऊर्जा आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग है, चाहे वह उद्योगों की मशीनें हों, परिवहन के साधन हों, डिजिटल अर्थव्यवस्था हो या घरेलू जीवन की सुविधाएं किंतु विडंबना यह है कि जिस ऊर्जा पर हमारी प्रगति आधारित है, वही अब संकट का कारण बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की ‘एनर्जी प्रोग्रेस रिपोर्ट 2024’ के अनुसार आने वाले दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग में लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है जबकि जीवाश्म ईंधनों के भंडार तेजी से सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में यदि ऊर्जा संरक्षण और दक्षता को प्राथमिकता नहीं दी गई तो भविष्य में ऊर्जा संकट केवल आर्थिक चुनौती नहीं रहेगा बल्कि सामाजिक अस्थिरता और वैश्विक संघर्षों का कारण भी बन सकता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इस खतरे को और स्पष्ट करता है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने तेल आपूर्ति पर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर हो रही हैं। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। दरअसल भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। पैट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि केवल परिवहन लागत को नहीं बढ़ाती बल्कि खाद्य पदार्थों से लेकर निर्माण सामग्री तक हर क्षेत्र में महंगाई को जन्म देती है। इस परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा संरक्षण राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण आधार बन जाता है। भारत तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है और यहां ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की ‘इंडिया एनर्जी आउटलुक 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी ऊर्जा उपभोक्ता अर्थव्यवस्था बन जाएगा। ऐसे में यदि ऊर्जा खपत को संतुलित नहीं किया गया तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। यही कारण है कि भारत ने ऊर्जा दक्षता और संरक्षण को अपनी नीति का केंद्रीय तत्व बनाया है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा लागू ऊर्जा संरक्षण अधिनियम और ‘उजाला’ जैसे कार्यक्रमों ने यह साबित किया है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकते हैं। 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्बों का वितरण और उससे हुई 48 बिलियन यूनिट बिजली की बचत इस बात का प्रमाण है कि यदि नीति और जनभागीदारी साथ आएं तो ऊर्जा संरक्षण एक जनांदोलन बन सकता है। ऊर्जा संरक्षण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह किसी नई तकनीक या बड़े निवेश पर निर्भर नहीं है बल्कि यह हमारे दैनिक व्यवहार में छोटे-छोटे बदलावों से ही संभव है। उदाहरण के लिए, अनावश्यक रूप से जलती लाइटों को बंद करना, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का उपयोग करना, एयर कंडीशनर का सीमित प्रयोग, सार्वजनिक परिवहन को अपनाना और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना, ये सभी कदम न केवल ऊर्जा बचाते हैं बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। यदि भारत का प्रत्येक परिवार प्रतिदिन केवल एक यूनिट बिजली की बचत करे तो यह देश के लिए ऊर्जा क्रांति के समान होगा। ऊर्जा संरक्षण का संबंध केवल बिजली तक सीमित नहीं है बल्कि यह जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ऊर्जा उत्पादन में जल का व्यापक उपयोग होता है और जल की बर्बादी सीधे ऊर्जा की बर्बादी में बदल जाती है। इसी प्रकार, ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि का मुख्य कारण है। आज जब दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, तब ऊर्जा संरक्षण इस दिशा में सबसे प्रभावी हथियार साबित हो सकता है। अक्षय ऊर्जा इस संकट का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करती है लेकिन इसकी सफलता भी ऊर्जा संरक्षण पर ही निर्भर करती है। सौर, पवन और जैव ऊर्जा जैसे स्रोतों का विस्तार तभी प्रभावी होगा, जब ऊर्जा की कुल मांग को नियंत्रित किया जाए। भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और स्मार्ट ग्रिड जैसी तकनीकें इस दिशा में नई संभावनाएं खोल रही हैं लेकिन इन सबका मूल आधार ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग ही है। शहरीकरण के बढ़ते दबाव ने भी ऊर्जा खपत को तेजी से बढ़ाया है। महानगरों में ऊंची इमारतें, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और बढ़ती वाहन संख्या ऊर्जा की मांग को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसे में हरित भवन निर्माण, सौर पैनलों का उपयोग और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना आवश्यक हो जाता है। यदि भवन निर्माण में ऊर्जा दक्षता को प्राथमिकता दी जाए तो बिजली की खपत में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। यह न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। ऊर्जा संरक्षण का एक महत्वपूर्ण आयाम औद्योगिक क्षेत्र भी है। उद्योगों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने से उत्पादन लागत में कमी आती है और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि ऊर्जा संरक्षण को केवल सरकारी नीति या अभियान के रूप में न देखा जाए बल्कि इसे एक सामाजिक संस्कृति के रूप में विकसित किया जाए। विद्यालयों में ऊर्जा शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, मीडिया के माध्यम से जनजागरूकता बढ़ाई जाए और प्रत्येक नागरिक को यह समझाया जाए कि ऊर्जा की बचत केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य है। जब तक ऊर्जा संरक्षण

जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता : बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम और पारंपरिक भ्रांतियाँ

डॉ. शैलेश शुक्ला भारत आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। 2024 में भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ को पार कर गई है। यह एक ऐसी समस्या है जो देश के विकास, संसाधनों, पर्यावरण और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डालती है। एक तरफ जहाँ देश तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती आबादी उस तरक्की को खा जा रही है। सड़कों पर भीड़, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों में जगह की कमी और बेरोजगारी — ये सब बढ़ती जनसंख्या के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। इस लेख में हम बढ़ती जनसंख्या से होने वाले नुकसानों को समझेंगे और उन पारंपरिक विचारधाराओं का खंडन करेंगे जो अधिक संतान पैदा करने को प्रेरित करती हैं। भारतीय समाचार विश्लेषण बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम : गरीबी और भुखमरी : लेख लेखन कार्यशाला जब किसी परिवार में कमाने वाला एक होता है और खाने वाले दस, तो गरीबी अपने आप आ जाती है। यही बात पूरे देश पर लागू होती है। भारत में उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से आबादी बढ़ रही है। नतीजा यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय कम रह जाती है। करोड़ों लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं। गरीबी का सीधा संबंध अधिक जनसंख्या से है। बेरोजगारी : हर साल लाखों युवा पढ़-लिखकर नौकरी ढूँढने निकलते हैं, लेकिन नौकरियाँ उतनी तेजी से नहीं बढ़तीं जितनी तेजी से लोग बढ़ रहे हैं। एक सरकारी पद के लिए लाखों आवेदन आते हैं। इससे निराशा, अपराध और सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है। अगर जनसंख्या नियंत्रित होती तो हर हाथ को काम मिलना आसान होता। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ : सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में 60-70 बच्चे बैठते हैं, जहाँ शिक्षक का ध्यान हर बच्चे पर देना असंभव हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की इतनी भीड़ होती है कि डॉक्टर को एक मरीज को देखने के लिए मुश्किल से दो मिनट मिलते हैं। बढ़ती आबादी के कारण सरकार चाहकर भी हर व्यक्ति तक अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुँचा पाती। पर्यावरण का विनाश : ज्यादा लोग यानी ज्यादा जमीन की जरूरत, ज्यादा पानी की खपत, ज्यादा प्रदूषण और ज्यादा कचरा। जंगल काटकर बस्तियाँ बसाई जा रही हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों को साफ पानी और स्वच्छ हवा भी नसीब नहीं होगी। आवास और शहरीकरण की समस्या : शहरों में जगह कम पड़ रही है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग तंग और अस्वच्छ जगहों पर रहने को मजबूर हैं। ट्रैफिक जाम, पानी की कमी और बिजली की समस्या — ये सब अधिक जनसंख्या का ही नतीजा है। अपराध और सामाजिक अशांति : जब लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो अपराध बढ़ता है। भूख, बेरोजगारी और निराशा लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती है। अधिक जनसंख्या वाले इलाकों में चोरी, लूट और हिंसा की घटनाएँ ज्यादा देखी जाती हैं। पारंपरिक भ्रांतियाँ और उनका खंडन : हमारे समाज में कई ऐसी पुरानी मान्यताएँ प्रचलित हैं जो लोगों को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन मान्यताओं की जड़ें धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में हैं। आइए इन भ्रांतियों को एक-एक करके समझें और उनका तर्कपूर्ण खंडन करें। भ्रांति 1 : संतान से मोक्ष मिलता है : यह सबसे प्रचलित मान्यता है कि पुत्र के बिना मोक्ष नहीं मिलता। कहा जाता है कि पुत्र पिंडदान करेगा तो पूर्वज मुक्त होंगे। इस मान्यता के कारण लोग बेटे की चाह में कई संतानें पैदा करते रहते हैं। खंडन : अगर हम धर्मग्रंथों को गहराई से पढ़ें तो मोक्ष कर्म, ज्ञान और भक्ति से मिलता है, संतान की संख्या से नहीं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग निष्काम कर्म और आत्मज्ञान है। कोई भी धर्मग्रंथ यह नहीं कहता कि जिसके ज्यादा बच्चे होंगे, उसे ज्यादा पुण्य मिलेगा। मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण, सदाचार और आध्यात्मिक साधना पर निर्भर करता है। अगर संतान से ही मोक्ष मिलता तो संन्यासियों, साधुओं और ऋषि-मुनियों को मोक्ष कैसे प्राप्त होता? शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद — इन सबने संतान नहीं उत्पन्न की, फिर भी ये महापुरुष माने गए। भ्रांति 2 : बेटा जरूरी है, बेटी से काम नहीं चलता : समाज में यह धारणा गहरी जड़ें जमाए बैठी है कि बेटा वंश आगे बढ़ाता है, बुढ़ापे का सहारा बनता है और अंतिम संस्कार करता है। इसलिए लोग बेटे की चाह में बच्चे पैदा करते रहते हैं। खंडन : आज के समय में बेटियाँ हर क्षेत्र में बेटों से आगे निकल रही हैं। चाहे सेना हो, अंतरिक्ष हो, खेल हो या प्रशासन — बेटियाँ हर जगह अपना परचम लहरा रही हैं। कई बेटियाँ अपने माता-पिता की बुढ़ापे में बेटों से बेहतर देखभाल करती हैं। रही बात अंतिम संस्कार की, तो आज कानूनी रूप से बेटी को भी यह अधिकार प्राप्त है। जो लोग बेटे की चाह में पाँच-छह बेटियाँ पैदा कर देते हैं, वे न उन बेटियों को अच्छी शिक्षा दे पाते हैं, न अच्छा जीवन। यह कोई समझदारी नहीं, बल्कि मूर्खता है। भ्रांति 3 : ज्यादा बच्चे यानी बुढ़ापे का सहारा : कई लोग सोचते हैं कि जितने ज्यादा बच्चे होंगे, बुढ़ापे में उतना ज्यादा सहारा मिलेगा। उनका मानना है कि एक-दो बच्चे हुए तो कौन देखभाल करेगा। खंडन : सच्चाई यह है कि आज के समय में ज्यादा बच्चे होने का मतलब ज्यादा सहारा नहीं बल्कि ज्यादा खर्चा और ज्यादा चिंता है। अगर आप दो बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं, उन्हें संस्कारवान बनाते हैं तो वे दो बच्चे दस बच्चों से बेहतर देखभाल करेंगे। दूसरी तरफ, अगर पाँच-छह बच्चे हों और किसी को भी अच्छी शिक्षा या संस्कार न मिले, तो वे सब मिलकर भी बुढ़ापे में सहारा नहीं बन पाएँगे। आज वृद्धाश्रमों में ऐसे बहुत से बुजुर्ग हैं जिनके चार-पाँच बच्चे हैं, लेकिन कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं।

आपदा में अवसर खोजने की मानसिकता: समाज के लिए एक खतरनाक संकेत

– कैलाश चन्द्रमार्च 2026 के दूसरे सप्ताह से भारत में एलपीजी सिलिंडर की आपूर्ति और बुकिंग से जुड़ी चर्चा अचानक सुर्खियों में आ गई। देश के अनेक हिस्सों से गैस सिलिंडर की कमी, बुकिंग में देरी और डिलीवरी में व्यवधान जैसी खबरें तेजी से फैलने लगीं। सोशल मीडिया पर लोगों की चिंता देखकर यह विषय राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया। कई उपभोक्ताओं ने आरोप लगाए कि सिलिंडर मिल नहीं रहे, डिलीवरी डेट आगे बढ़ रही है और एजेंसियों पर दबाव बढ़ चुका है। इसके विपरीत केंद्र और राज्य सरकारों ने बार-बार स्पष्ट किया कि देश में कोई वास्तविक कमी नहीं है, परंतु कुछ क्षेत्रों में अचानक बढ़ी मांग और डिमांड–सप्लाई असंतुलन से अस्थायी तनाव अवश्य देखा गया है। यही तनाव इस पूरी चर्चा की शुरुआत बना। इन खबरों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह रहा कि अचानक ऐसी स्थिति क्यों बनी? इसे समझने के लिए एलपीजी बुकिंग और सप्लाई के वास्तविक आंकड़ों को देखना आवश्यक है। मार्च 2026 के आरंभ में रोज़ाना LPG बुकिंग 5.5 मिलियन के औसत स्तर से बढ़कर 7.6 मिलियन तक पहुँच गई। यह लगभग 35–40 प्रतिशत की उछाल थी, जिसे विशेषज्ञों ने ‘पैनिक बुकिंग’ की श्रेणी में रखा। कई शहरों में बुकिंग 2–3 गुना तक बढ़ गई। एक प्रमुख महानगर में केवल छह दिनों के भीतर 12 लाख से अधिक बुकिंग दर्ज होना इसकी तीव्रता का प्रमाण था। दूसरी ओर सरकार का दावा था कि घरेलू सिलिंडर की डिलीवरी 2–2.5 दिन के सामान्य समय में ही हो रही है, और राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई गंभीर समस्या नहीं है, जिसे कमी कहा जाए। इसका अर्थ यह था कि समस्या व्यापक राष्ट्रीय अभाव की नहीं, बल्कि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में अचानक मांग बढ़ने और वितरण प्रणाली पर बने अस्थायी दबाव की थी। इस पूरे परिदृश्य के पीछे जो वास्तविक कारण उभरकर सामने आए, वे कई स्तरों पर काम कर रहे थे। पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक तनाव था। मध्य-पूर्व में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के मध्य बढ़ते संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित हुए। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, इसलिए जहाजों में देरी, समुद्री बीमा लागत और जोखिम बढ़ने लगे। एलपीजी शिपमेंट का समय बढ़ा, जिससे भारतीय बंदरगाहों पर डिलीवरी शेड्यूल में भी देर हुई। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह था कि भारत आज भी LPG की अपनी कुल घरेलू आवश्यकता का लगभग 60–65% आयात करता है। अर्थात वैश्विक अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारतीय उपभोक्ता तक पहुँच सकता है। बड़े आयातक देशों में तनाव, शिपमेंट विलंब, पोर्ट कंजेशन और बर्करिंग समय का बढ़ना, इन सभी का प्रभाव सीधे घरेलू सप्लाई चेन पर पड़ा। इसके अतिरिक्त ट्रकों की कमी, स्थानीय परिवहन में देरी, कुछ क्षेत्रों में सड़क मरम्मत या मौसम अवरोध जैसी घरेलू परिस्थिति ने भी दबाव बढ़ाया। तीसरा कारण मीडिया और सोशल मीडिया के प्रभाव से उत्पन्न ‘पैनिक बुकिंग’ रहा। किसी भी संकट में यह मानवीय प्रतिक्रिया आमतौर पर देखी जाती है। जैसे ही कुछ उपभोक्ताओं ने देरी की बात साझा की, लोगों ने एक साथ अतिरिक्त सिलिंडर बुक करना शुरू कर दिया। कई परिवारों ने सुरक्षा कारणों से दो-तीन सिलिंडर अतिरिक्त बुक कर लिए। जबकि सामान्य परिस्थितियों में वे इतनी खपत नहीं करते। इस असामान्य मांग ने वितरण प्रणाली में तात्कालिक तनाव उत्पन्न किया और सामान्य चक्र बिगड़ गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार और तेल विपणन कंपनियों ने कई त्वरित कदम उठाए। सबसे पहले रिफाइनरियों को निर्देश दिया गया कि वे अपनी प्रोपेन-ब्यूटेन स्ट्रीम्स को एलपीजी उत्पादन में परिवर्तित करें, ताकि घरेलू बाजार की जरूरतें तुरंत पूरी हों। इस निर्देश से घरेलू एलपीजी उत्पादन लगभग 25% तक बढ़ाने में सफलता मिली। इससे तत्काल राहत मिली और डोमेस्टिक सप्लाई बैलेंस मजबूत हुआ। दूसरा महत्वपूर्ण कदम यह था कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों के तहत घरेलू उपभोक्ता को प्राथमिकता देने और ब्लैक मार्केटिंग पर रोक लगाने की कार्रवाई शुरू की गई। वितरण प्रणाली में किसी भी प्रकार की जमाखोरी या कृत्रिम कमी की आशंका को खत्म किया गया। तीसरा कदम बुकिंग नियमों में संशोधन का था। पैनिक बुकिंग को रोकने के लिए बुकिंग गैप 25 दिन तक बढ़ाया गया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में इसे 45 दिन तक भी बढ़ाया गया, जिससे बार-बार अनावश्यक बुकिंग रुक सके। इससे सिस्टम पर दबाव कम हुआ और जिन उपभोक्ताओं को वास्तव में सिलिंडर की जरूरत थी, उन्हें समय पर उपलब्धता सुनिश्चित की गई। सरकार ने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि जहां पीएनजी (पाइप्ड नैचरल गैस) उपलब्ध है वहाँ उपभोक्ता अस्थायी रूप से पीएनजी को प्राथमिकता दें, ताकि एलपीजी वितरण पर दबाव संतुलित किया जा सके। इसके साथ-साथ अफवाहों और गलत सूचनाओं को रोकने के लिए प्रेस विज्ञप्तियों, मीडिया ब्रीफिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया गया। इन सभी तात्कालिक उपायों ने संकट के विस्तार को रोका, लेकिन इस स्थिति का प्रभाव विभिन्न वर्गों पर अलग-अलग दिखाई दिया। घरेलू उपभोक्ता, जिनके लिए सरकार प्राथमिकता देती है, उन्हें सामान्यतः 2–3 दिन की डिलीवरी चक्र में सिलिंडर मिलता रहा। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अस्थायी देरी का अनुभव हुआ। दूसरी ओर व्यापारिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं, विशेषकर होटल, रेस्टोरेंट और फूड उद्योग—को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति पर प्राथमिकता सीमित थी। कुछ छोटे व्यवसायों और एमएसएसई ने भी गैस की अनिश्चिता के कारण उत्पादन लागत बढ़ने की शिकायत की। इधर-उधर से ब्लैक मार्केटिंग की सूचनाएं भी मिलीं, हालांकि सरकार ने इन शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई कर स्थिति को नियंत्रित किया। इस संकट के बीच कई मिथक भी उभरे, जिनमें प्रमुख था कि देश में गैस खत्म हो गई है। सरकारी आंकड़े और विशेषज्ञ रिपोर्टें इस दावे को स्पष्ट रूप से गलत साबित करती हैं। देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद था, और प्रमुख समस्या सप्लाई अभाव की नहीं बल्कि वितरण तनाव और पैनिक बुकिंग की थी। दूसरा मिथक यह था कि गैस आपूर्ति पूरी तरह रुक गई है, जबकि वास्तविकता यह थी कि देशभर में ट्रकिंग, रीफिलिंग और डिलीवरी कार्य एक सीमित देरी के साथ निरंतर जारी रहा। इस अनुभव का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति अब पहले से अधिक परिपक्व और दीर्घकालिक दिशा में बढ़ रही है। भारत