टीवी एक्ट्रेस आरती सिंह का दिल छू लेने वाला पल, परिवार की वापसी पर साझा किया दर्द और खुशी

नई दिल्ली। टीवी अभिनेत्री आरती सिंह के लिए हाल ही में एक ऐसा पल आया जिसने उन्हें भावनात्मक रूप से गहराई से छू लिया। लंबे समय के बाद जब उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को एक साथ देखा, तो उनकी भावनाएं संभाले नहीं संभल सकीं। यह मुलाकात उनके लिए सिर्फ एक साधारण रीयूनियन नहीं थी, बल्कि टूटे हुए रिश्तों के फिर से जुड़ने जैसा अनुभव था। आरती सिंह ने एक शो के विशेष एपिसोड को देखते हुए अपने परिवार की झलक पाई, जिसमें उनके भाई, भाभी और अन्य करीबी सदस्य एक साथ नजर आए। यह दृश्य उनके लिए बेहद भावुक करने वाला था क्योंकि पिछले कई वर्षों से परिवार के बीच दूरियां और गलतफहमियां बनी हुई थीं। उन्होंने महसूस किया कि समय के साथ रिश्तों में आई दरारें भले ही गहरी हो जाती हैं, लेकिन जब परिस्थितियां बदलती हैं, तो वही रिश्ते फिर से जुड़ भी सकते हैं। आरती के अनुसार, यह मिलन उनके लिए एक सपने के पूरे होने जैसा था, जिसे उन्होंने लंबे समय तक महसूस किया था। इस खास मौके पर उन्होंने अपने भाई और भाभी के प्रयासों की भी सराहना की, जिन्होंने आगे बढ़कर पुराने गिले-शिकवे दूर करने की पहल की। आरती ने माना कि भावनाएं और माफी जब दिल से होती हैं, तो रिश्तों में नई शुरुआत संभव हो जाती है। उन्होंने अपने परिवार के बड़े सदस्यों को भी याद किया और कहा कि परिवार की जड़ें वही लोग होते हैं जो सभी को जोड़कर रखते हैं। उनके अनुसार, परिवार में प्यार और सम्मान बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही रिश्तों को मजबूत बनाता है। आरती सिंह ने अंत में उम्मीद जताई कि भविष्य में पूरा परिवार फिर से एक साथ खुशहाल पल साझा करेगा और सभी पुराने मतभेद पीछे छोड़कर आगे बढ़ेंगे। यह अनुभव उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद खास और यादगार बन गया।
जब मेकअप ने बदल दी पहचान, ‘मदर इंडिया’ ने सेट पर नहीं पहचाना सुनील दत्त..

नई दिल्ली। फिल्मी दुनिया में कई बार ऐसे पल सामने आते हैं जो पर्दे के पीछे की असल कहानी को और भी दिलचस्प बना देते हैं। ऐसा ही एक यादगार किस्सा उस समय का है जब भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री नरगिस दत्त अपने ही पति सुनील दत्त को पहचान नहीं सकीं। यह घटना एक फिल्म के सेट पर हुई, जहां एक किरदार के लिए बेहद भारी और वास्तविक दिखने वाला मेकअप किया गया था। सुनील दत्त उस दृश्य में एक वृद्ध व्यक्ति का किरदार निभा रहे थे। उनके लुक को इतना बदल दिया गया था कि चेहरे की बनावट, उम्र और हावभाव पूरी तरह से एक अलग व्यक्ति जैसे लग रहे थे। मेकअप की बारीकी इतनी शानदार थी कि पहचान पाना लगभग असंभव हो गया था। जब नरगिस दत्त सेट पर पहुंचीं, तो उन्होंने सामान्य रूप से अपने पति को ढूंढना शुरू किया। उन्हें उम्मीद थी कि सुनील दत्त कहीं आस-पास होंगे, लेकिन जब उनकी नजर उस वृद्ध किरदार पर पड़ी, तो उन्हें अंदाजा भी नहीं हुआ कि वह उनके पति ही हैं। वे कई बार आसपास के लोगों से पूछती रहीं कि सुनील दत्त कहां हैं। दिलचस्प बात यह थी कि सुनील दत्त उसी समय उनके सामने खड़े थे, लेकिन भारी मेकअप के कारण नरगिस उन्हें पहचान नहीं पा रही थीं। बातचीत के दौरान भी वह उन्हें एक सामान्य कलाकार समझती रहीं और लगातार अपने पति की तलाश करती रहीं। कुछ समय बाद जब सच्चाई सामने आई कि वही वृद्ध किरदार असल में सुनील दत्त हैं, तो नरगिस दत्त हैरान रह गईं। उन्हें यकीन नहीं हुआ कि मेकअप की मदद से कोई व्यक्ति इस तरह पूरी तरह बदल सकता है। इस अनोखे अनुभव से प्रभावित होकर उन्होंने मेकअप आर्टिस्ट की खूब सराहना की और अपनी ओर से एक कीमती उपहार भी दिया। यह घटना सिर्फ एक मजेदार किस्सा नहीं बल्कि फिल्मी तकनीक और कला की उस ताकत को भी दिखाती है, जो किसी कलाकार की पहचान तक बदल सकती है। नरगिस और सुनील दत्त का यह वाकया आज भी सिनेमा की दुनिया में एक दिलचस्प और यादगार कहानी के रूप में सुनाया जाता है।
सुनील पाल ने समय रैना को कहा 'आतंकवादी' और समय ने सरेआम कर दिया रोस्ट

नई दिल्ली। टेलीविजन के सबसे लोकप्रिय कॉमेडी शो ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ का ताजा एपिसोड हंसी के ठहाकों से ज्यादा तीखी नोकझोंक और पुरानी रंजिशों के सुलझने का गवाह बना। इस बार शो के मंच पर आधुनिक दौर के ‘रोस्ट किंग’ समय रैना और पुराने दौर के दिग्गज कॉमेडियन सुनील पाल का आमना-सामना हुआ। दोनों के बीच का विवाद जगजाहिर है, लेकिन कपिल शर्मा के शो पर जब ये दोनों आमने-सामने आए, तो माहौल में तनाव और हंसी का मिला-जुला तड़का देखने को मिला। समय रैना, जो रणवीर इलाहाबादिया के साथ पहुंचे थे, सुनील पाल की सरप्राइज एंट्री देखकर हैरान रह गए। विवाद की जड़ उस समय की है जब सुनील पाल ने समय रैना के ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ जैसे शो और उनकी कॉमेडी शैली की कड़ी आलोचना की थी। बात इतनी बढ़ गई थी कि सुनील पाल ने सार्वजनिक तौर पर समय रैना को ‘आतंकवादी’ तक कह दिया था। शो के दौरान जब कपिल शर्मा ने इस कड़वाहट पर सवाल किया और मजाकिया लहजे में पूछा कि समय ने कब मुंह से ग्रेनेड फेंके जो उन्हें ऐसा टैग दिया गया, तो सुनील पाल अपने स्टैंड पर अडिग दिखे। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि समय जो कंटेंट परोसते हैं, वह समाज की समझ से परे है और जो समाज की मुख्यधारा में फिट नहीं बैठता, वह उनके लिए किसी आतंकवादी से कम नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि समय अगर मुंह से ग्रेनेड मार देते तो शायद वह सह लिया जाता, लेकिन उनकी बातें असहनीय होती हैं। समय रैना ने भी इस वार का जवाब अपने ही अंदाज में दिया। उन्होंने सुनील पाल की बातों का बुरा मानते हुए कहा कि एक कलाकार के तौर पर उन्हें तब सबसे ज्यादा दुख होता है जब इंडस्ट्री के सीनियर लोग मुश्किल समय में साथ देने के बजाय विरोध में खड़े हो जाते हैं। हालांकि, माहौल को हल्का करने के लिए समय ने सुनील पाल को जबरदस्त रोस्ट भी किया। जब सुनील पाल ने गाली-गलौज वाली कॉमेडी पर तंज कसा, तो समय ने चुटकी लेते हुए कहा कि उन्होंने सारी गालियां सुनील पाल के वीडियो के कमेंट सेक्शन से सीखी हैं। इस दौरान अर्चना पूरन सिंह ने भी बीच-बचाव करने की कोशिश की, लेकिन दोनों कॉमेडियन्स के बीच की वैचारिक जंग पूरी तरह हावी रही। कपिल शर्मा ने पूरे एपिसोड के दौरान दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश की। समय ने अपनी शिकायतें सामने रखीं और बताया कि कैसे विवादों के समय उन्हें अपनों के साथ की कमी खली। अंत में, यह एपिसोड न केवल मनोरंजन से भरपूर रहा, बल्कि इसने कॉमेडी के दो अलग-अलग दौर के बीच की गहरी खाई और कंटेंट को लेकर बदलते नजरिए को भी बखूबी दिखाया। सुनील पाल की पुरानी परंपरा और समय रैना की मॉडर्न ‘डार्क कॉमेडी’ का यह टकराव लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहेगा।
जब दिग्गज गायक ने एक नए अभिनेता के लिए अपनी फीस से किया था बड़ा समझौता..

नई दिल्ली। अस्सी के दशक में जब बॉलीवुड की गलियों में एक नया लड़का अपनी थिरकन और मासूमियत से पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा सितारा उसके लिए अपनी शर्तें बदल देगा। यह कहानी है ‘चीची’ यानी गोविंदा और किशोर कुमार के उस अनकहे रिश्ते की, जिसने फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के नए मायने लिखे। साल 1986 में जब गोविंदा ने फिल्म ‘लव 86’ और ‘इल्जाम’ के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, तब वह महज एक उभरते हुए कलाकार थे। उनके पास टैलेंट तो था, लेकिन उस समय के सबसे महंगे और दिग्गज गायक किशोर कुमार की आवाज पाना उनके लिए एक सुनहरे सपने जैसा था। फिल्म ‘ड्यूटी’ गोविंदा के शुरुआती करियर की एक ऐसी फिल्म थी, जिसका बजट बेहद सीमित था। फिल्म के निर्देशक रविकांत नगैच और संगीतकार बाबला शाह इस बात को लेकर बेहद चिंतित थे कि इतने कम बजट में फिल्म को बड़े स्तर पर कैसे प्रमोट किया जाए। इसी बीच गोविंदा ने एक ऐसी मांग रख दी जिसने मेकर्स के पसीने छुड़ा दिए। गोविंदा चाहते थे कि फिल्म के दो महत्वपूर्ण गानों को केवल किशोर कुमार ही अपनी आवाज दें। गोविंदा का मानना था कि यदि किशोर दा जैसा बड़ा नाम उनके साथ जुड़ जाएगा, तो न केवल फिल्म की वैल्यू बढ़ जाएगी, बल्कि एक नए अभिनेता के तौर पर उन्हें इंडस्ट्री में वह गंभीरता मिलेगी जिसकी उन्हें तलाश थी। चुनौती यह थी कि किशोर कुमार उस दौर के सबसे व्यस्त और महंगे गायक थे। फिल्म का बजट इतना कम था कि निर्माता एक बड़े विलेन तक को कास्ट नहीं कर पा रहे थे, ऐसे में किशोर कुमार की भारी-भरकम फीस चुकाना नामुमकिन लग रहा था। जब संगीत निर्देशक बाबला शाह ने यह बात कल्याणजी-आनंदजी को बताई, तो कहानी में एक नया मोड़ आया। दरअसल, बाबला शाह दिग्गज संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के छोटे भाई थे। अपने भाई के भविष्य और गोविंदा के जुनून को देखते हुए कल्याणजी-आनंदजी ने किशोर कुमार से खास सिफारिश की। किशोर दा के संबंध इस जोड़ी से बेहद मधुर थे, इसलिए उन्होंने मित्रता और सम्मान के खातिर अपनी फीस काफी कम कर दी और गानों के लिए हामी भर दी। किशोर कुमार ने इस फिल्म के लिए ‘जिस महफिल में आता हूं’ और ‘तुम जिसे चाहो’ जैसे दो शानदार गाने गाए। इन गानों के रिलीज होते ही संगीत प्रेमियों के बीच तहलका मच गया। किशोर दा की जादुई आवाज और पर्दे पर गोविंदा के बेहतरीन डांस मूव्स ने वह जादू पैदा किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। इन गानों की सफलता ने गोविंदा को रातों-रात सुपरस्टार्स की कतार में खड़ा कर दिया। इसके बाद गोविंदा और किशोर कुमार की जोड़ी ने कई यादगार नगमे दिए, लेकिन फिल्म ‘ड्यूटी’ के वे दो गाने हमेशा इस बात के गवाह रहेंगे कि कैसे एक दिग्गज कलाकार ने अपनी दरियादिली से एक उभरते हुए सितारे की तकदीर बदल दी थी।
हॉलीवुड के मंच पर अब भारतीय फिल्मों का होगा दबदबा? अकादमी के नए नियमों ने पलटी वैश्विक सिनेमा की बाजी

नई दिल्ली। अकादमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज ने 2027 में आयोजित होने वाले 99वें ऑस्कर अवॉर्ड समारोह के लिए जो नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वे वैश्विक फिल्म उद्योग की नींव हिलाने वाले साबित हो सकते हैं। इन नियमों में सबसे क्रांतिकारी बदलाव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के उपयोग को लेकर किया गया है। अब फिल्म निर्माताओं को यह अनिवार्य रूप से बताना होगा कि क्या उनकी फिल्म के लेखन, विजुअल इफेक्ट्स, वॉयस क्लोनिंग या किरदारों के चेहरे बदलने में एआई तकनीक का प्रयोग हुआ है। अकादमी का यह कदम रचनात्मकता के क्षेत्र में मानवीय संवेदनशीलता को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से उठाया गया है। संस्था का मानना है कि सिनेमा की आत्मा मानवीय कल्पनाओं में बसती है, इसलिए तकनीक का प्रयोग केवल सहायक के रूप में होना चाहिए न कि वह कलाकार की जगह ले ले। हालांकि एआई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, लेकिन पारदर्शिता की यह शर्त भविष्य की फिल्म मेकिंग को अधिक जवाबदेह बनाएगी। अभिनय की श्रेणी में किया गया बदलाव उन कलाकारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है जो एक ही साल में कई उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं। अब एक ही अभिनेता या अभिनेत्री को एक ही श्रेणी में एक से अधिक फिल्मों के लिए नामांकित किया जा सकता है। पहले के नियमों में यह विकल्प बेहद सीमित था, जिससे कई बार बेहतरीन काम भी जूरी की नजरों से छूट जाता था। अब यदि किसी कलाकार का काम शीर्ष पांच मतों में शामिल होता है, तो वह एक ही साल में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर कई नामांकन हासिल कर सकता है। यह न केवल कलाकारों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा बल्कि दर्शकों को भी एक ही कलाकार के विभिन्न पहलुओं को देखने और समझने का मौका देगा। यह बदलाव वैश्विक सिनेमा में अभिनय की परिभाषा को और अधिक व्यापक बनाने वाला है। भारतीय फिल्म उद्योग के लिए सबसे महत्वपूर्ण खबर अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी से जुड़ी है। अब तक चली आ रही उस व्यवस्था को बदल दिया गया है जिसमें प्रत्येक देश से केवल एक ही फिल्म आधिकारिक तौर पर भेजी जा सकती थी। नए नियमों के मुताबिक, अब यदि कोई फिल्म प्रमुख अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सवों जैसे कान्स, वेनिस, बर्लिन, टोरंटो, सनडांस या बुसान में बड़ा पुरस्कार जीतती है, तो वह सीधे ऑस्कर की इस श्रेणी में शामिल होने के योग्य होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब भारत जैसे देश से एक ही साल में एक से अधिक फिल्में ऑस्कर की मुख्य प्रतियोगिता का हिस्सा बन सकती हैं। यह उन स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए एक सुनहरा अवसर है जिनकी फिल्में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो सराही जाती हैं, लेकिन अक्सर स्थानीय चयन समितियों की राजनीति या सीमित कोटे की वजह से मुख्य दौड़ से बाहर रह जाती थीं। इसके अलावा डिजिटल रिलीज और थिएट्रिकल प्रदर्शन के नियमों को भी वर्तमान समय की मांग के अनुरूप ढाला गया है। अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज होने वाली फिल्मों के लिए अकादमी ने नियमों में थोड़ी नरमी बरती है, ताकि बेहतरीन कंटेंट को केवल इसलिए न नकारा जाए क्योंकि वह बड़े पर्दे पर लंबे समय तक नहीं रहा। इसके साथ ही संगीत और तकनीकी श्रेणियों में भी मूल्यांकन की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और सटीक बनाने के लिए नए मानक तय किए गए हैं। कुल मिलाकर ये बदलाव एक नए युग की शुरुआत हैं जहां सिनेमा की सीमाओं को विस्तार दिया जा रहा है। भारतीय फिल्मकारों के पास अब अपनी कहानियों को बिना किसी बाधा के विश्व मंच पर ले जाने का एक अभूतपूर्व रास्ता खुल गया है, जिससे आने वाले वर्षों में भारतीय तिरंगे की चमक ऑस्कर के मंच पर और अधिक बढ़ने की उम्मीद है।
बेमन स्क्रीन टेस्ट से शुरू हुआ सफर, नरगिस दत्त ने रच दिया भारतीय सिनेमा का इतिहास

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर में कुछ ऐसी हस्तियां हुईं जिन्होंने अपने अभिनय और व्यक्तित्व से इतिहास रच दिया। नरगिस दत्त भी उन्हीं में से एक थीं, जिनकी कहानी केवल एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि एक ऐसे सपने की है जो किस्मत के मोड़ पर पूरी तरह बदल गया। बचपन में उनका सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन जीवन की परिस्थितियों और परिवार की इच्छा ने उन्हें सिनेमा की दुनिया की ओर मोड़ दिया। नरगिस का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो पहले से ही कला और संगीत की दुनिया से जुड़ा हुआ था। उनकी मां एक प्रतिष्ठित कलाकार थीं और चाहती थीं कि उनकी बेटी भी अभिनय की दुनिया में नाम कमाए। हालांकि नरगिस की रुचि शुरू से ही पढ़ाई और चिकित्सा के क्षेत्र में थी, लेकिन बहुत कम उम्र में ही उन्हें फिल्मों की ओर कदम बढ़ाना पड़ा। मात्र छह साल की उम्र में उन्होंने बाल कलाकार के रूप में अपने अभिनय जीवन की शुरुआत कर दी थी, लेकिन वह इस रास्ते से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थीं। आगे चलकर एक ऐसा मौका आया जब उन्हें प्रसिद्ध फिल्मकार के सामने स्क्रीन टेस्ट देने के लिए भेजा गया। यह वह क्षण था जिसने उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। नरगिस इस टेस्ट को सिर्फ औपचारिकता मानकर गई थीं, क्योंकि उनका मानना था कि शायद उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा और वे अपने असली सपने की ओर लौट सकेंगी, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। उनके अभिनय ने सभी को प्रभावित किया और उन्हें फिल्म में मुख्य भूमिका मिल गई। इसके बाद उनका फिल्मी सफर तेजी से आगे बढ़ा और उन्होंने कई यादगार फिल्मों में काम किया। शुरुआती दौर में उन्हें बड़ी सफलता मिली और वह उस समय की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। उनकी जोड़ी कई बड़े सितारों के साथ खूब पसंद की गई और उनकी फिल्मों के गीत आज भी लोगों की यादों में जीवित हैं। हालांकि करियर के बीच में उन्हें कुछ असफलताओं का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। कुछ समय बाद उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आया जब उन्हें एक ऐसी फिल्म में काम करने का अवसर मिला जिसने उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। इस फिल्म में उन्होंने एक मजबूत और संघर्षशील महिला का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने न सिर्फ सराहा बल्कि इतिहास में दर्ज कर दिया। इस फिल्म ने न केवल उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाई दी। इसके बाद उनकी छवि एक ऐसी अभिनेत्री की बन गई जो सिर्फ ग्लैमर नहीं बल्कि मजबूत अभिनय के लिए भी जानी जाती थी।नरगिस दत्त का जीवन केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। उनके जीवन का सफर यह दर्शाता है कि कभी-कभी सपने बदल भी जाएं तो भी नई दिशा में मिली सफलता उन्हें और बड़ा बना देती है। उनकी कहानी आज भी यह संदेश देती है कि किस्मत भले रास्ता बदल दे, लेकिन मेहनत और प्रतिभा से पहचान हमेशा बनाई जा सकती है।
इतिहास के दो किरदार, एक मंच पर सम्मान, अजय देवगन ने ‘राजा शिवाजी’ के लिए रितेश की तारीफ की

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक कहानियों का आकर्षण हमेशा से दर्शकों को अपनी ओर खींचता रहा है, और जब इन कहानियों में भावनाएं, संघर्ष और प्रेरणा का मेल होता है, तो उनका प्रभाव और भी गहरा हो जाता है। हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म Raja Shivaji इसी भावना को जीवंत करती नजर आ रही है। फिल्म के साथ सामने आए एक खास वीडियो ने दर्शकों के बीच उत्सुकता और बढ़ा दी है, जिसमें Ajay Devgn और Riteish Deshmukh के बीच एक दिलचस्प बातचीत देखने को मिलती है। इस बातचीत में Ajay Devgn ने मौजूदा दौर के सिनेमा पर चर्चा करते हुए कहा कि आज के समय में सुपरहीरो फिल्मों का प्रभाव काफी बढ़ गया है। दर्शक बड़े पैमाने पर काल्पनिक किरदारों और उनकी शक्तियों से प्रभावित होते हैं, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत के इतिहास में ऐसे असली नायक मौजूद रहे हैं, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से समाज और देश के लिए असाधारण कार्य किए हैं। उनके अनुसार, इन ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की कहानियां किसी भी काल्पनिक सुपरहीरो से कम प्रेरणादायक नहीं हैं। वहीं Riteish Deshmukh, जो इस फिल्म में Chhatrapati Shivaji Maharaj की भूमिका निभा रहे हैं, उन्होंने अपने किरदार को लेकर गहरी भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने बताया कि बचपन से ही वे शिवाजी महाराज को अपना पहला “सुपरहीरो” मानते आए हैं। यही व्यक्तिगत जुड़ाव और सम्मान उनके अभिनय में झलकता है, जिसने उन्हें इस फिल्म को करने के लिए प्रेरित किया। बातचीत के दौरान Ajay Devgn ने Riteish Deshmukh की मेहनत और समर्पण की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि किसी ऐतिहासिक चरित्र को पर्दे पर जीवंत करना आसान नहीं होता, लेकिन जिस सच्चाई और भावना के साथ रितेश ने इस किरदार को निभाया है, वह बेहद सराहनीय है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ऐसे किरदारों के लिए केवल अभिनय कौशल ही नहीं, बल्कि गहरी समझ और भावनात्मक जुड़ाव भी जरूरी होता है। यह बातचीत केवल दो कलाकारों के बीच संवाद नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और उसके नायकों के प्रति सम्मान का एक उदाहरण भी है। दर्शकों के लिए यह एक याद दिलाने जैसा है कि मनोरंजन के साथ-साथ सिनेमा समाज और संस्कृति को भी जोड़ने का माध्यम बन सकता है। फिल्म Raja Shivaji हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में रिलीज़ की गई है और यह Chhatrapati Shivaji Maharaj के जीवन, संघर्ष और उनके गौरवशाली इतिहास को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करती है। भव्य सेट, भावनात्मक कहानी और मजबूत अभिनय के साथ यह फिल्म दर्शकों को एक ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाने का दावा करती है।
लॉर्ड बॉबी का बॉक्स ऑफिस पर दोबारा कब्ज़ा करने का मास्टर प्लान, इन 6 बड़े प्रोजेक्ट्स के साथ मनोरंजन जगत में मचेगा तहलका

नई दिल्ली। भारतीय फिल्म उद्योग में इन दिनों बॉबी देओल एक ऐसी लहर बनकर उभरे हैं, जिसे रोक पाना नामुमकिन नजर आ रहा है। पिछले कुछ समय में उनके किरदारों ने दर्शकों पर जो छाप छोड़ी है, उसका नतीजा यह है कि आज उनके पास एक के बाद एक कई बड़े प्रोजेक्ट्स की कतार लगी हुई है। वर्तमान में अभिनेता के पास कुल छह ऐसी बड़ी परियोजनाएं हैं, जिनकी आधिकारिक घोषणा की जा चुकी है। अपनी नई छवि और दमदार अभिनय के दम पर बॉबी देओल ने खुद को एक ऐसे कलाकार के रूप में स्थापित कर लिया है, जो अब केवल मुख्य नायक की भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि कहानी की रीढ़ बनने वाले जटिल किरदारों को भी उतनी ही शिद्दत से निभा रहा है। अभिनेता के आगामी प्रोजेक्ट्स की सूची में सबसे ऊपर अनुराग कश्यप की फिल्म ‘बंदर’ का नाम शामिल है, जो एक गहन कानूनी ड्रामा होने वाली है। इस फिल्म में बॉबी देओल का एक बिल्कुल नया अवतार देखने को मिलेगा, जिसकी रिलीज इसी साल जून के महीने में संभावित है। इसके तुरंत बाद, जुलाई 2026 में वे ‘वाईआरएफ स्पाई यूनिवर्स’ की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘अल्फा’ में नजर आएंगे। इस फिल्म में वे आलिया भट्ट और शर्वरी वाघ जैसे सितारों के साथ स्क्रीन साझा करेंगे। माना जा रहा है कि इस एक्शन-थ्रिलर फिल्म में उनका किरदार इतना प्रभावशाली होगा कि यह उनके पिछले सभी रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ सकता है। सिनेमाई पर्दे के अलावा, डिजिटल दुनिया में भी बॉबी देओल की बादशाहत बरकरार है। उनकी सबसे चर्चित और सफल वेब सीरीज ‘आश्रम’ के चौथे भाग पर काम तेजी से चल रहा है। ‘बाबा निराला’ के किरदार में उनकी वापसी को लेकर सोशल मीडिया पर अभी से भारी उत्साह देखा जा रहा है। हालांकि निर्माण टीम ने अभी तक इसकी आधिकारिक रिलीज तारीख का खुलासा नहीं किया है, लेकिन शूटिंग शुरू होने की खबर ने प्रशंसकों को रोमांचित कर दिया है। इसके साथ ही, वे प्रसिद्ध स्टार किड आर्यन खान के निर्देशन में बनने वाली पहली वेब सीरीज का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो सीधे तौर पर फिल्म उद्योग की आंतरिक कार्यप्रणाली को दर्शाएगी। क्षेत्रीय सिनेमा में भी बॉबी देओल अपनी धाक जमा रहे हैं। दक्षिण भारतीय फिल्मों ‘डाकू महाराज’ (तेलुगु) और ‘जन नायगन’ (तमिल) में उनकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि अब उनकी अपील केवल हिंदी भाषी दर्शकों तक सीमित नहीं रह गई है। इन फिल्मों में वे बड़े सितारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते नजर आएंगे। बॉबी देओल के ये सभी प्रोजेक्ट्स इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अब केवल संख्या बढ़ाने के लिए फिल्में चुनना बंद कर दिया है, बल्कि वे ऐसे विषयों का चयन कर रहे हैं जो दर्शकों को लंबे समय तक याद रहें। आने वाले कुछ महीने फिल्म प्रेमियों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होंगे, क्योंकि ‘लॉर्ड बॉबी’ एक के बाद एक अलग और चुनौतीपूर्ण किरदारों में नजर आने वाले हैं।
फिल्म निर्देशक और विहिप नेता समेत चार पर पॉक्सो के तहत मुकदमा दर्ज..

नई दिल्ली। प्रयागराज कुंभ मेले के दौरान अपनी विशिष्ट आंखों की सुंदरता से रातों-रात इंटरनेट सनसनी बनी मध्य प्रदेश के खरगोन की एक युवती का मामला अब एक जटिल कानूनी मोड़ ले चुका है। हाल ही में केरल के कोच्चि में इस युवती ने एक सनसनीखेज कदम उठाते हुए फिल्म जगत के एक निर्देशक और एक प्रमुख सामाजिक संगठन के नेता सहित चार व्यक्तियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया है। इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब युवती ने सार्वजनिक रूप से आकर अपनी आपबीती सुनाई और न्याय की गुहार लगाई। पुलिस प्रशासन ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एर्नाकुलम सेंट्रल पुलिस स्टेशन में ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कर ली है, जिसे बाद में जांच के लिए संबंधित राज्य को हस्तांतरित किए जाने की संभावना है। युवती द्वारा लगाए गए आरोपों की फेहरिस्त काफी लंबी और गंभीर है। शिकायत में मुख्य रूप से एक फिल्म निर्देशक पर निशाना साधा गया है, जिन्होंने युवती को अपनी फिल्म में अभिनय का अवसर दिया था। पीड़िता का आरोप है कि फिल्म की शूटिंग के दौरान निर्देशक ने उसके साथ कई बार अमर्यादित और गलत व्यवहार किया। एक भावुक प्रेस वार्ता के दौरान युवती ने साझा किया कि कार्यस्थल पर सुरक्षा की कमी और निर्देशक के अनुचित व्यवहार ने उसे मानसिक रूप से काफी आहत किया है। इसके साथ ही, युवती ने एक वकील और संगठन से जुड़े नेता पर आरोप लगाया है कि उन्होंने सोशल मीडिया मंचों का उपयोग कर उसकी छवि को धूमिल करने और उसे बदनाम करने का सुनियोजित प्रयास किया है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे उम्र और वैवाहिक स्थिति को लेकर चल रहा विवाद भी एक मुख्य कड़ी है। एक ओर युवती का दावा है कि वह बालिग है और उसने अपनी मर्जी से केरल के एक मंदिर में अपने मित्र से विवाह किया है, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश में रह रहे उसके माता-पिता उसे नाबालिग बता रहे हैं। माता-पिता के दावों के आधार पर पूर्व में युवती के पति के खिलाफ अपहरण और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस कानूनी खींचतान के बीच केरल उच्च न्यायालय ने युवती के पति को अस्थायी राहत प्रदान की है, लेकिन नए आरोपों ने इस विवाद को एक बिल्कुल नया आयाम दे दिया है। प्रशासनिक स्तर पर इस मामले की जांच अब दो राज्यों के बीच उलझती नजर आ रही है। चूंकि कथित घटनाओं का केंद्र मध्य प्रदेश बताया जा रहा है, इसलिए केरल पुलिस इस मामले के दस्तावेजों को मध्य प्रदेश पुलिस को सौंपने की प्रक्रिया पर विचार कर रही है। युवती ने अपनी सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है और उच्चाधिकारियों से संरक्षण की मांग की है। यह मामला अब केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं रह गया है, बल्कि इसमें कार्यस्थल पर सुरक्षा, सोशल मीडिया पर निजता का हनन और कानूनी उम्र के दस्तावेजों की वैधता जैसे कई महत्वपूर्ण सवाल जुड़ गए हैं, जिनका समाधान अब गहन अदालती जांच के बाद ही संभव हो पाएगा।
आमिर खान के करियर की वे दो फ़िल्में जो मिस्टर परफेक्शनिस्ट ने बिना स्क्रिप्ट पढ़े ही कर ली थीं साइन

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा में अपनी बेहतरीन अदाकारी और पटकथा की गहरी समझ के लिए मशहूर अभिनेता आमिर खान का फिल्मी सफर हमेशा से केवल नपे-तुले फैसलों पर आधारित नहीं रहा है। अक्सर रणनीतिक सोच के साथ काम करने वाले इस कलाकार ने स्वीकार किया है कि उनके जीवन में ऐसे भी पल आए जब उन्होंने तर्क के बजाय केवल भावनाओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने बताया कि उनके शुरुआती करियर की दो फिल्में ऐसी थीं, जिनकी स्क्रिप्ट के बारे में उन्हें रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था, लेकिन पिता के प्रति सम्मान और उनके व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण उन्होंने उन फिल्मों को अपनी सहमति देने में एक पल की भी देरी नहीं की। इस दिलचस्प कहानी की शुरुआत तब हुई जब दिग्गज अभिनेता देव आनंद ने आमिर खान को अपनी एक फिल्म के लिए याद किया। आमिर के पिता ने अपने बेटे से मशविरा किए बिना ही देव आनंद को जुबान दे दी थी कि आमिर इस परियोजना का हिस्सा बनेंगे। जब आमिर खान को इस बारे में पता चला, तो एक पेशेवर अभिनेता के तौर पर उन्होंने पहले फिल्म की कहानी और अपनी भूमिका को समझने की इच्छा जताई। हालांकि, उनके पिता ताहिर हुसैन का रुख बेहद सख्त था। उन्होंने साफ लफ्जों में आमिर को हिदायत दी कि उन्हें स्क्रिप्ट पूछने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें सीधे जाकर फिल्म के लिए अपनी सहमति देनी होगी। पिता के अनुशासित स्वभाव और उनके प्रति मन में बसे डर के कारण आमिर खान चाहकर भी विरोध नहीं कर पाए और बिना कुछ जाने उस फिल्म का हिस्सा बन गए। एक अन्य घटना भी ठीक वैसी ही थी, जब उनके पिता स्वयं एक फिल्म का निर्माण कर रहे थे। आमिर ने जब स्वाभाविक रूप से अपने पिता से उस फिल्म की पटकथा के बारे में सवाल किया, तो उन्हें पिता के कड़े रुख का सामना करना पड़ा। उनके पिता का मानना था कि दशकों से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय रहने के बाद उन्हें अपने ही बेटे को कहानी सुनाने की औपचारिकता निभाने की आवश्यकता नहीं है। इस मुद्दे पर आमिर को पिता के लंबे उपदेश का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने हार मान ली और बिना किसी सवाल के फिल्म में काम करने का निर्णय लिया। आमिर खान ने मजाकिया लहजे में यह स्पष्ट किया कि उनके करियर में जिन फिल्मों के चुनाव पर सवाल उठते हैं, उनमें से इन दो फिल्मों के लिए वह जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि इनका फैसला केवल उनके पिता का था। यह किस्सा यह भी उजागर करता है कि किस तरह उस दौर के कलाकारों के लिए व्यावसायिक अनुबंधों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण अपने बड़ों का मान-सम्मान और पारिवारिक गरिमा हुआ करती थी। आमिर खान का यह अनुभव यह भी दिखाता है कि एक मंझा हुआ कलाकार भी कभी-कभी अपनों के प्रति समर्पण के कारण अपने पेशेवर सिद्धांतों से समझौता कर लेता है।