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आमिर खान के करियर की वे दो फ़िल्में जो मिस्टर परफेक्शनिस्ट ने बिना स्क्रिप्ट पढ़े ही कर ली थीं साइन

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा में अपनी बेहतरीन अदाकारी और पटकथा की गहरी समझ के लिए मशहूर अभिनेता आमिर खान का फिल्मी सफर हमेशा से केवल नपे-तुले फैसलों पर आधारित नहीं रहा है। अक्सर रणनीतिक सोच के साथ काम करने वाले इस कलाकार ने स्वीकार किया है कि उनके जीवन में ऐसे भी पल आए जब उन्होंने तर्क के बजाय केवल भावनाओं को प्राथमिकता दी। उन्होंने बताया कि उनके शुरुआती करियर की दो फिल्में ऐसी थीं, जिनकी स्क्रिप्ट के बारे में उन्हें रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था, लेकिन पिता के प्रति सम्मान और उनके व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण उन्होंने उन फिल्मों को अपनी सहमति देने में एक पल की भी देरी नहीं की।

इस दिलचस्प कहानी की शुरुआत तब हुई जब दिग्गज अभिनेता देव आनंद ने आमिर खान को अपनी एक फिल्म के लिए याद किया। आमिर के पिता ने अपने बेटे से मशविरा किए बिना ही देव आनंद को जुबान दे दी थी कि आमिर इस परियोजना का हिस्सा बनेंगे। जब आमिर खान को इस बारे में पता चला, तो एक पेशेवर अभिनेता के तौर पर उन्होंने पहले फिल्म की कहानी और अपनी भूमिका को समझने की इच्छा जताई। हालांकि, उनके पिता ताहिर हुसैन का रुख बेहद सख्त था। उन्होंने साफ लफ्जों में आमिर को हिदायत दी कि उन्हें स्क्रिप्ट पूछने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें सीधे जाकर फिल्म के लिए अपनी सहमति देनी होगी। पिता के अनुशासित स्वभाव और उनके प्रति मन में बसे डर के कारण आमिर खान चाहकर भी विरोध नहीं कर पाए और बिना कुछ जाने उस फिल्म का हिस्सा बन गए।

एक अन्य घटना भी ठीक वैसी ही थी, जब उनके पिता स्वयं एक फिल्म का निर्माण कर रहे थे। आमिर ने जब स्वाभाविक रूप से अपने पिता से उस फिल्म की पटकथा के बारे में सवाल किया, तो उन्हें पिता के कड़े रुख का सामना करना पड़ा। उनके पिता का मानना था कि दशकों से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय रहने के बाद उन्हें अपने ही बेटे को कहानी सुनाने की औपचारिकता निभाने की आवश्यकता नहीं है। इस मुद्दे पर आमिर को पिता के लंबे उपदेश का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने हार मान ली और बिना किसी सवाल के फिल्म में काम करने का निर्णय लिया।

आमिर खान ने मजाकिया लहजे में यह स्पष्ट किया कि उनके करियर में जिन फिल्मों के चुनाव पर सवाल उठते हैं, उनमें से इन दो फिल्मों के लिए वह जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि इनका फैसला केवल उनके पिता का था। यह किस्सा यह भी उजागर करता है कि किस तरह उस दौर के कलाकारों के लिए व्यावसायिक अनुबंधों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण अपने बड़ों का मान-सम्मान और पारिवारिक गरिमा हुआ करती थी। आमिर खान का यह अनुभव यह भी दिखाता है कि एक मंझा हुआ कलाकार भी कभी-कभी अपनों के प्रति समर्पण के कारण अपने पेशेवर सिद्धांतों से समझौता कर लेता है।

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