SRK को बताया शानदार, आमिर बोले-तीनों खान का साथ आना मुमकिन

नई दिल्ली हिंदी सिनेमा के इतिहास में अगर तीन सबसे बड़े सुपरस्टार्स का नाम लिया जाए तो Shah Rukh Khan, Salman Khan और Aamir Khan का नाम सबसे ऊपर आता है। पिछले तीन दशकों से ये तीनों खान इंडस्ट्री पर राज कर रहे हैं और हर पीढ़ी के दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाए हुए हैं। हालांकि, आज तक इन तीनों को एक साथ किसी फिल्म में नहीं देखा गया, जो फैंस के लिए हमेशा एक अधूरी ख्वाहिश रही है। अब इस अधूरी ख्वाहिश को पूरा करने के संकेत खुद आमिर खान ने दिए हैं, जिससे फैंस के बीच उत्साह और बढ़ गया है। शाहरुख की एक्टिंग के कायल हुए आमिरहाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान Aamir Khan ने Shah Rukh Khan की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि शाहरुख एक शानदार अभिनेता हैं, जिनका अपना अलग चार्म है और जो दर्शकों के साथ गहराई से जुड़ने की क्षमता रखते हैं। आमिर ने यह भी कहा कि शाहरुख सिर्फ एक स्टार नहीं बल्कि बेहतरीन आर्टिस्ट हैं, जो हर किरदार में जान डाल देते हैं। आमिर के इस बयान से दोनों सितारों के बीच आपसी सम्मान और दोस्ती साफ झलकती है। अच्छी स्क्रिप्ट बनी सबसे बड़ी शर्तइंटरव्यू में आमिर खान ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने और शाहरुख खान ने साथ काम करने को लेकर बातचीत की है। हालांकि, दोनों ही किसी भी प्रोजेक्ट को लेकर बेहद चयनात्मक हैं और एक दमदार स्क्रिप्ट की तलाश में हैं। आमिर ने कहा कि जैसे ही उन्हें एक मजबूत कहानी मिलेगी, वे शाहरुख के साथ काम करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि शाहरुख और सलमान पहले साथ काम कर चुके हैं, वहीं आमिर और सलमान भी स्क्रीन शेयर कर चुके हैं, लेकिन आमिर और शाहरुख अब तक किसी फिल्म में साथ नजर नहीं आए। क्या सच होगा तीनों खान का सपना?सबसे दिलचस्प बात यह रही कि आमिर खान ने तीनों खान को एक साथ स्क्रीन पर लाने के विचार पर भी खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि करीब एक साल पहले जब Shah Rukh Khan और Salman Khan उनके साथ बैठे थे, तब तीनों ने इस संभावना पर चर्चा की थी। आमिर का मानना है कि दर्शकों के लिए यह एक बेहद खास और यादगार अनुभव होगा। हालांकि, फिल्म का स्केल कितना बड़ा होगा, यह अलग मुद्दा है, लेकिन तीनों का साथ आना ही अपने आप में एक बड़ी घटना होगी। अगर यह सपना साकार होता है तो यह बॉलीवुड इतिहास की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक साबित हो सकती है। वर्क फ्रंट पर आमिर खानवर्क फ्रंट की बात करें तो Aamir Khan इन दिनों अपने प्रोडक्शन में बन रही फिल्म ‘एक दिन’ को लेकर चर्चा में हैं। इस फिल्म में उनके बेटे जुनैद खान के साथ साउथ की चर्चित अभिनेत्री Sai Pallavi नजर आएंगी। खास बात यह है कि यह साई पल्लवी की पहली हिंदी फिल्म होगी, जिससे फिल्म को लेकर दर्शकों में खासा उत्साह है। फिल्म 1 मई को रिलीज होने वाली है और इसकी एडवांस बुकिंग पहले ही शुरू हो चुकी है।
दिग्गज एक्टर भरत कपूर का निधन…. 80 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

नई दिल्ली। फिल्म इंडस्ट्री (Film Industry) से बुरी खबर सामने आ रही है। बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर भरत कपूर (Bharat Kapoor) अब इस दुनिया में नहीं रहे। 80 साल की उम्र में भरत कपूर (Bharat Kapoor) ने अंतिम सांस ली। उनके निधन (Passed Away) की खबर से फिल्म इंडस्ट्री और उनके चाहने वालों के बीच गहरा दुख और शोक की लहर दौड़ गई है। अशोक पंडित ने जताया शोकभरत कपूर ने निधन पर निर्माता अशोक पंडित शोक व्यक्त किया है। अशोक पंडित ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर दिग्गज एक्टर की तस्वीर शेयर करते हुए उनके निधन की खबर की पुष्टि की है। उन्होंने लिखा, “दिग्गज थिएटर और फिल्म अभिनेता भरत कपूर जी के निधन के बारे में जानकर दुख हुआ। मेरे करियर के शुरुआती दिनों में उनके साथ काम करने की बहुत अच्छी यादें हैं। एक महान इंसान। ओम शांति।” तीन दिनों से बीमार थे एक्टरभरत कपूर का निधन मुंबई के Sion Hospital में दोपहर करीब 3:30 बजे हुआ। उनका अंतिम संस्कार शाम 6:30 बजे परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों की मौजूदगी में किया गया। एक्टर और उनके करीबी दोस्त अवतार गिल ने India Today को बताया, “मैं अभी-अभी श्मशान घाट से लौटा हूं, जहां शाम 6:30 बजे अंतिम संस्कार हुआ। उनका निधन आज दोपहर करीब 3 बजे अस्पताल में हुआ। पिछले तीन दिनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। पिछले कुछ दिनों से उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था।” चार दशकों तक पर्दे पर किया राजभरत कपूर ने 1972 में फिल्म इंडस्ट्री में करियर की शुरुआत की और लगभग चार दशक तक पर्दे पर छाए रहे। भरत सपोर्टिंग रोल और खलनायक की भूमिकाओं के लिए जाने जाते थे। वह 1970, 80 और 90 के दशक में हिंदी सिनेमा में एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए। उन्होंने नूरी (1979), राम बलराम (1980), लव स्टोरी (1981), बाजार (1982), गुलामी (1985), आखिरी रास्ता (1986), सत्यमेव जयते (1987), स्वर्ग (1990), खुदा गवाह (1992), और रंग (1993) सहित कई उल्लेखनीय फिल्मों में अभिनय किया। इन फिल्मों में दिखाया जलवाभरत कपूर ने इसके अलावा ‘बरसात’ (1995), ‘साजन चले ससुराल’ (1996), और ‘मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज’ (2004) जैसी फिल्मों में नजर आए, जिनमें उन्होंने हर दौर के हिसाब से खुद को ढालने की अपनी काबिलियत दिखाई। फिल्मों के अलावा, भरत कपूर ने ‘कैंपस’, ‘परंपरा’, ‘राहत’, ‘सांस’, ‘अमानत’, ‘तारा’, ‘चुनौती’ और ‘कहानी चंद्रकांता की’ जैसे टीवी शो के जरिए टेलीविजन पर भी अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें अलग-अलग माध्यमों के बीच आसानी से काम करने का मौका दिया।
बॉक्स ऑफिस पर बड़ा टकराव तय, यश की ‘टॉक्सिक’ और महेश बाबू की फिल्म आमने-सामने

नई दिल्ली। साउथ फिल्म इंडस्ट्री में एक बार फिर बड़े बॉक्स ऑफिस क्लैश की स्थिति बनती दिखाई दे रही है, जहां यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक’ अपनी रिलीज को लेकर चर्चा के केंद्र में है। पहले भी इस फिल्म की रिलीज डेट कई बार बदली जा चुकी है, लेकिन अब एक बार फिर नई परिस्थितियों के कारण इसकी रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं। ताजा स्थिति के अनुसार ‘टॉक्सिक’ की संभावित रिलीज खिड़की पर एक नई बड़ी फिल्म के आने से टकराव की स्थिति बन गई है। यह नई फिल्म महेश बाबू से जुड़े प्रोजेक्ट के रूप में सामने आ रही है, जिसे ‘राव बहादुर’ नाम से जाना जा रहा है। दोनों फिल्मों की रिलीज समय के बेहद करीब होने के कारण बॉक्स ऑफिस पर सीधा मुकाबला लगभग तय माना जा रहा है। ‘टॉक्सिक’ को लेकर पहले भी कई बार अनिश्चितता बनी रही है। कभी प्रोडक्शन से जुड़े कारण, तो कभी रिलीज रणनीति में बदलाव के चलते इसकी रिलीज आगे खिसकती रही। हर बार फिल्म किसी न किसी बड़े प्रोजेक्ट से टकराने की स्थिति में आ जाती है, जिससे इसकी रिलीज योजना लगातार प्रभावित होती रही है। दूसरी ओर, ‘राव बहादुर’ भी अपने अनोखे विषय और प्रस्तुति को लेकर चर्चा में है। फिल्म की कहानी एक अलग और गंभीर पृष्ठभूमि पर आधारित बताई जा रही है, जिसमें रहस्य और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को प्रमुखता दी गई है। इसकी घोषणा के बाद से ही दर्शकों में इसे लेकर उत्सुकता बनी हुई है। दोनों फिल्मों की शैली और विषय अलग होने के बावजूद रिलीज का समय इतना करीब है कि दर्शकों का बंटना तय माना जा रहा है। यही कारण है कि फिल्म व्यापार से जुड़े विशेषज्ञ इसे एक बड़ा क्लैश मान रहे हैं, जिसका असर दोनों फिल्मों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है। यश की ‘टॉक्सिक’ अपने बड़े बजट, एक्शन और स्टार पावर के कारण चर्चा में रहती है, जबकि दूसरी ओर ‘राव बहादुर’ अपनी कहानी और गंभीर ट्रीटमेंट के कारण एक अलग दर्शक वर्ग को आकर्षित कर सकती है। ऐसे में यह मुकाबला सिर्फ फिल्मों का नहीं, बल्कि दर्शकों की पसंद और बाजार की दिशा का भी बन सकता है। फिलहाल दोनों फिल्मों की रिलीज डेट को लेकर अंतिम निर्णय स्पष्ट नहीं हुआ है, लेकिन मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ा आमना-सामना देखने को मिल सकता है। कुल मिलाकर, ‘टॉक्सिक’ एक बार फिर बड़े टकराव के केंद्र में आ गई है और अब सभी की नजर इस बात पर है कि आने वाले समय में रिलीज रणनीति में कोई बदलाव होता है या फिर यह सीधा मुकाबला सिनेमाघरों में देखने को मिलेगा।
छत्रपति शिवाजी महाराज पर बयान से विवाद, रितेश देशमुख का तीखा रिएक्शन—‘ऐसी बातें स्वीकार नहीं’

नई दिल्ली। छत्रपति शिवाजी महाराज को लेकर दिए गए एक बयान के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला उस समय और गर्मा गया जब अभिनेता और फिल्ममेकर रितेश देशमुख ने इस टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया दी। रितेश ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए साफ शब्दों में कहा कि महान ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में इस तरह की बातें किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकतीं। जानकारी के अनुसार, हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन से जुड़ा एक कथन सामने आया था, जिसे लेकर विवाद शुरू हो गया। इस कथन में महाराज के संघर्ष और उनके निर्णयों को लेकर टिप्पणी की गई थी, जिसे उनके समर्थकों और इतिहास से जुड़े जानकारों ने गलत और भ्रामक बताया। इसके बाद यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया और अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। रितेश देशमुख, जो खुद शिवाजी महाराज के जीवन और विचारों से गहरी प्रेरणा लेने की बात करते रहे हैं, इस बयान से काफी आहत नजर आए। उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा कि ऐसे महान व्यक्तित्वों की विरासत को कमजोर करने या गलत तरीके से पेश करने की कोशिशें स्वीकार नहीं की जाएंगी। उनके अनुसार, शिवाजी महाराज केवल एक ऐतिहासिक नाम नहीं, बल्कि प्रेरणा और स्वाभिमान का प्रतीक हैं, जिनका सम्मान हर हाल में बनाए रखना जरूरी है। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित पक्ष की ओर से स्पष्टीकरण और खेद व्यक्त किया गया। कहा गया कि बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है और किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का उद्देश्य नहीं था। इसके बावजूद मामला शांत होता नहीं दिखा और सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर बहस जारी रही। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर टिप्पणी करते समय कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास से जुड़े विषय केवल तथ्यों के आधार पर ही प्रस्तुत किए जाने चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी या विवाद से बचा जा सके। इसी बीच, रितेश देशमुख अपनी आगामी ऐतिहासिक फिल्म को लेकर भी चर्चा में हैं, जिसमें वह छत्रपति शिवाजी महाराज के किरदार में नजर आने वाले हैं। फिल्म को लेकर दर्शकों में पहले से ही उत्सुकता बनी हुई है, और यह विवाद इसे और अधिक सुर्खियों में ले आया है। पूरा मामला अब सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह इतिहास, भावनाओं और अभिव्यक्ति की सीमाओं पर एक बड़ी बहस का रूप ले चुका है।
सुपरस्टार्स का चेहरा और डबिंग आर्टिस्ट का दम: फिल्म मेकिंग के इस जादुई फॉर्मूले का पूरा सच

नई दिल्ली। सिनेमा की दुनिया में अक्सर जो हम देखते हैं, वह हकीकत का केवल एक हिस्सा होता है। पर्दे पर दिखने वाले किसी प्रभावशाली किरदार की गूंजती हुई आवाज के पीछे अक्सर एक लंबी और जटिल तकनीकी प्रक्रिया छिपी होती है, जिसे ‘डबिंग’ कहा जाता है। यह फिल्मी दुनिया का वह जादुई हिस्सा है जिसके बिना आधुनिक सिनेमा की कल्पना करना लगभग असंभव है। कई बार दर्शक थिएटर में जिस अभिनेता के संवादों पर तालियां बजाते हैं, असल में वह आवाज किसी और फनकार की होती है। हाल के दौर में बड़े बजट की कई पैन-इंडिया फिल्मों ने इस प्रक्रिया को और भी ज्यादा लोकप्रिय बना दिया है, जहाँ भाषा की बाधा को पार करने के लिए डबिंग का सहारा लिया जाता है। डबिंग की प्रक्रिया मुख्य रूप से फिल्म के ‘पोस्ट-प्रोडक्शन’ चरण के दौरान शुरू होती है। इसकी जरूरत कई कारणों से पड़ती है। अक्सर शूटिंग के समय लोकेशन पर बाहरी शोर-शराबे, हवा की आवाज या तकनीकी दिक्कतों के कारण कलाकार के संवाद स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं हो पाते। ऐसे में उन संवादों को स्टूडियो के शांत वातावरण में दोबारा रिकॉर्ड किया जाता है ताकि दर्शकों को एक बेहतरीन ध्वनि अनुभव मिल सके। लेकिन यह केवल एक तकनीकी जरूरत नहीं है; यह एक रचनात्मक फैसला भी होता है। कई बार किसी अभिनेता का व्यक्तित्व तो किरदार के लिए एकदम सही होता है, लेकिन उसकी आवाज या बोलने का लहजा उस खास रोल के साथ न्याय नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में निर्देशक किसी ऐसे डबिंग आर्टिस्ट का चुनाव करते हैं जिसकी आवाज उस किरदार की गहराई और गंभीरता को पूरी तरह से व्यक्त कर सके। आज के दौर में जब फिल्में एक साथ कई राज्यों और भाषाओं में रिलीज हो रही हैं, तो डबिंग की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। दक्षिण भारतीय सितारों की फिल्मों को उत्तर भारत में और बॉलीवुड की फिल्मों को दक्षिण में घर-घर तक पहुँचाने का श्रेय इन आवाज के जादूगरों को ही जाता है। एक सफल डबिंग आर्टिस्ट वह होता है जो न केवल अभिनेता के होंठों की हलचल (लिप-सिंक) के साथ तालमेल बिठाता है, बल्कि उस किरदार के हर इमोशन, गुस्से और दर्द को अपनी आवाज के जरिए जीवंत कर देता है। कई बार बड़े सितारे भी अपने अभिनय को और अधिक निखारने के लिए ‘वॉयस मॉड्यूलेशन’ का सहारा लेते हैं, जिसमें तकनीक की मदद से उनकी आवाज को भारी या अलग तरह का बनाया जाता है। विशेष रूप से एक्शन फिल्मों में, जहाँ अभिनेता का पूरा ध्यान शारीरिक कौशल और स्टंट पर होता है, संवादों की गुणवत्ता अक्सर प्रभावित हो जाती है। ऐसे में बाद में स्टूडियो में जाकर दी गई डबिंग ही उस दृश्य को प्रभावशाली बनाती है। दिलचस्प बात यह है कि कई बार नामचीन एक्टर्स भी दूसरे बड़े सितारों को अपनी आवाज उधार देते हैं, जिससे फिल्म की लोकप्रियता को एक नया आयाम मिलता है। हालांकि इन पर्दे के पीछे काम करने वाले कलाकारों को अक्सर वह प्रसिद्धि नहीं मिल पाती जो पर्दे पर दिखने वाले चेहरों को मिलती है, लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी मेहनत ही किसी कहानी को मुकम्मल बनाती है। डबिंग महज एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि वह कला है जो शब्दों को आत्मा प्रदान करती है और सिनेमाई अनुभव को यादगार बनाती है।
16 करोड़ के साथ माइकल की बायोपिक मैदान में, अक्षय और रणवीर की फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर दबदबा

नई दिल्ली। भारतीय सिनेमाई बाजार इस समय विभिन्न शैलियों की फिल्मों के संगम का गवाह बन रहा है, जहाँ दर्शकों के पास अंतरराष्ट्रीय बायोपिक से लेकर घरेलू ब्लॉकबस्टर तक के कई विकल्प मौजूद हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार, संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह माइकल जैक्सन के जीवन पर आधारित फिल्म ‘माइकल’ ने अपने शुरुआती चार दिनों के सफर में भारतीय बॉक्स ऑफिस पर 16 करोड़ रुपये का शुद्ध कारोबार करने में सफलता प्राप्त की है। जाफर जैक्सन की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म ने सप्ताहांत के दौरान अपनी पकड़ मजबूत की और रविवार को अकेले 5.50 करोड़ रुपये का कलेक्शन किया। हालांकि इस फिल्म को लेकर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग रही है, लेकिन संगीत प्रेमी बड़े पर्दे पर इस दिग्गज कलाकार की कहानी देखने के लिए उत्सुक नजर आ रहे हैं। दूसरी तरफ, अभिनेता अक्षय कुमार की हॉरर कॉमेडी फिल्म ‘भूत बंगला’ ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी धाक जमानी शुरू कर दी है। फिल्म ने अपने रिलीज के दसवें दिन 12.50 करोड़ रुपये का शानदार प्रदर्शन करते हुए यह साबित कर दिया है कि दर्शकों को डराने और हंसाने का यह फॉर्मूला आज भी उतना ही कारगर है। इस प्रदर्शन के साथ ही फिल्म की कुल घरेलू कमाई अब 113.40 करोड़ रुपये हो गई है। वैश्विक स्तर पर भी फिल्म ने अपनी चमक बिखेरी है और करीब 179 करोड़ रुपये का कुल ग्रॉस कलेक्शन कर लिया है। ‘भूत बंगला’ की इस सफलता ने इसे साल की सबसे भरोसेमंद फिल्मों की कतार में खड़ा कर दिया है। वहीं, बॉक्स ऑफिस के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए रणवीर सिंह की स्पाई थ्रिलर ‘धुरंधर 2’ (द रिवेंज) एक ऐतिहासिक सफर पर है। करीब 40 दिनों से सिनेमाघरों में अपना जलवा बिखेर रही यह फिल्म अब 1,130.59 करोड़ रुपये का भारतीय नेट कलेक्शन कर चुकी है। वैश्विक मंच पर इस फिल्म की सफलता और भी बड़ी है, जहाँ इसने 1,777.52 करोड़ रुपये का विशालकाय ग्रॉस कलेक्शन हासिल किया है। फिल्म ने अपने 39वें दिन भी 3.40 करोड़ रुपये का व्यवसाय कर यह दिखा दिया है कि इसकी लोकप्रियता अभी कम नहीं हुई है। व्यापारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह भारतीय सिनेमा के लिए एक सुखद संकेत है कि एक ही समय में तीन अलग-अलग मिजाज की फिल्में शानदार कमाई कर रही हैं। जहाँ ‘माइकल’ एक वैश्विक हस्ती के संघर्ष की कहानी है, वहीं ‘भूत बंगला’ विशुद्ध मनोरंजन का साधन बनी हुई है और ‘धुरंधर 2’ भारतीय स्पाई यूनिवर्स को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती प्रदान कर रही है। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई फिल्मों के आने के बाद इन मौजूदा फिल्मों की रफ्तार पर क्या प्रभाव पड़ता है, लेकिन फिलहाल बॉक्स ऑफिस की यह हलचल फिल्म उद्योग के लिए उत्साहजनक परिणाम लेकर आई है।
पौराणिक रहस्यों से जुड़ी फिल्म 'राकासा' की ग्लोबल रिलीज का काउंटडाउन शुरू..

नई दिल्ली। सिनेमाई गलियारों में इन दिनों ऐसी कहानियों की मांग तेजी से बढ़ी है जो दर्शकों को डराने के साथ-साथ गुदगुदाने का भी माद्दा रखती हों। इसी कड़ी में, मनोरंजन जगत के डिजिटल प्रेमियों के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। दक्षिण भारतीय सिनेमा की एक ऐसी फिल्म, जिसने अपनी अनूठी कहानी और शानदार निर्माण से समीक्षकों को हैरान कर दिया था, अब घर-घर पहुँचने के लिए तैयार है। ‘राकासा’ नामक यह फैंटेसी हॉरर कॉमेडी फिल्म इसी सप्ताह 1 मई को डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर दस्तक देने जा रही है। इस फिल्म ने अपनी रिलीज से पहले ही 8.8 की बेहद प्रभावशाली आईएमडीबी रेटिंग हासिल कर ली है, जो इसकी गुणवत्ता और दर्शकों के बीच इसकी स्वीकार्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। मानसा शर्मा के निर्देशन में तैयार हुई यह फिल्म पौराणिक कथाओं और आधुनिक जीवन के टकराव की एक दिलचस्प दास्तां है। फिल्म का शीर्षक ‘राकासा’ सीधे तौर पर संस्कृत के ‘राक्षस’ शब्द से प्रेरित है, जो कहानी के केंद्र में मौजूद ‘ब्रह्मराक्षस’ के रहस्य की ओर इशारा करता है। फिल्म की पटकथा ‘वीरबाबू’ नाम के एक एनआरआई युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पुराने प्यार को पाने की उम्मीद लिए विदेश से अपने पैतृक गांव ‘राकावरम’ लौटता है। हालांकि, उसकी यह प्रेम यात्रा तब एक भयानक मोड़ ले लेती है जब वह अनजाने में गांव के पास स्थित एक प्रतिबंधित और शापित क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है। वीरबाबू की एक छोटी सी भूल पिछले 2,000 वर्षों से सोई हुई एक शक्तिशाली अलौकिक शक्ति को जागृत कर देती है, जिसने कभी पूरे इलाके में आतंक मचाया था। तकनीकी और रचनात्मक रूप से इस फिल्म को बेहद बारीकी से संवारा गया है। गुलाबी हाथी (पिंक एलीफेंट) पिक्चर्स के बैनर तले निर्मित इस फिल्म में संगीत शोभन और नयन सारिका ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। सीमित बजट में बनी इस फिल्म ने न केवल अपनी लागत से कहीं अधिक का कारोबार किया, बल्कि कंटेंट के मामले में बड़े सितारों की फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया। फिल्म की चर्चा तब और अधिक बढ़ गई जब फिल्म उद्योग के दिग्गज अभिनेताओं ने इसकी प्रशंसा की और इसके अनूठे कॉन्सेप्ट को सिनेमा की एक नई दिशा बताया। यही कारण है कि यह फिल्म वर्तमान में डिजिटल ट्रेंड्स में शीर्ष पर बनी हुई है। यह फिल्म केवल अपनी डरावनी कहानी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने बेहतरीन हास्य और विजुअल इफेक्ट्स के लिए भी सराही जा रही है। दर्शकों की भारी मांग को देखते हुए इसे मूल भाषा के साथ-साथ हिंदी, तमिल और कन्नड़ में भी रिलीज किया जा रहा है, ताकि भाषाई सीमाओं से परे हर कोई इस रोमांच का अनुभव कर सके। पौराणिक रहस्यों, ग्रामीण परिवेश और आधुनिक संवेदनाओं का ऐसा मिश्रण हाल के वर्षों में कम ही देखने को मिला है। ऐसे में यदि आप भी वीकेंड पर कुछ नया और प्रभावशाली देखने की योजना बना रहे हैं, तो ‘राकासा’ की यह डिजिटल रिलीज एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। यह फिल्म इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे एक सशक्त पटकथा वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकती है।
20 फिल्मों के साथ 100 करोड़ी क्लब में बनाया ऐतिहासिक रिकॉर्ड..

नई दिल्ली। भारतीय फिल्म जगत में किसी फिल्म की सफलता का पैमाना अब उसकी कहानी के साथ-साथ ‘100 करोड़ क्लब’ में शामिल होने की क्षमता से मापा जाता है। हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘भूत बंगला’ ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन करते हुए महज दस दिनों के भीतर 100 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। इस उपलब्धि के साथ ही बॉलीवुड के खिलाड़ी कहे जाने वाले अक्षय कुमार ने एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसे छूना फिलहाल किसी भी समकालीन अभिनेता के लिए एक बड़ी चुनौती नजर आता है। अक्षय कुमार अब भारतीय सिनेमा के इतिहास के पहले ऐसे अभिनेता बन गए हैं, जिनकी झोली में कुल 20 फिल्में ऐसी हैं जिन्होंने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार किया है। बॉक्स ऑफिस पर इस ‘शतक’ वाली फिल्मों के दौर की शुरुआत साल 2008 में आमिर खान की फिल्म ‘गजनी’ से हुई थी। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि आने वाले डेढ़ दशक में यह एक मानक बन जाएगा। अक्षय कुमार ने इस सफर में साल 2012 में ‘हाउसफुल 2’ के जरिए अपना खाता खोला था और तब से लेकर अब तक उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी हालिया सफलताओं में ‘स्काई फोर्स’, ‘हाउसफुल 5’ और ‘जॉली एलएलबी 3’ जैसी फिल्मों ने उनकी स्थिति को और भी मजबूत कर दिया है। अक्षय की सफलता का राज उनकी फिल्मों की विविधता और साल में कई प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की उनकी गति को माना जा सकता है। इस दौड़ में दूसरे पायदान पर सलमान खान का नाम आता है, जिनके खाते में कुल 18 फिल्में 100 करोड़ क्लब का हिस्सा रही हैं। सलमान ने ‘दबंग’ और ‘बॉडीगार्ड’ जैसी फिल्मों के जरिए इस क्लब में अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी और हाल ही में ‘सिकंदर’ जैसी फिल्म ने उनकी इस गिनती को आगे बढ़ाया है। वहीं, अजय देवगन 16 फिल्मों के साथ तीसरे स्थान पर मजबूती से टिके हुए हैं। अजय देवगन की ‘तानाजी’, ‘दृश्यम 2’ और ‘सिंघम’ सीरीज की फिल्मों ने उन्हें इस विशिष्ट क्लब का एक विश्वसनीय खिलाड़ी बना दिया है। सूची में चौथे स्थान पर बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान का नाम दर्ज है। हालांकि उनकी फिल्मों की संख्या 10 है, लेकिन ‘जवान’ और ‘पठान’ जैसी फिल्मों ने जो रिकॉर्ड तोड़ कमाई की है, उसने उनके स्टारडम की एक नई परिभाषा लिखी है। पांचवें स्थान पर रणवीर सिंह ने अपनी जगह पक्की की है, जिनकी कुल 9 फिल्में इस क्लब में शामिल हो चुकी हैं। उनकी हालिया रिलीज ‘धुरंधर’ सीरीज की सफलता ने उन्हें इस एलीट लिस्ट में शामिल होने का मौका दिया। यह आंकड़े न केवल इन अभिनेताओं की लोकप्रियता को दर्शाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि भारतीय दर्शकों की पसंद और सिनेमाई बाजार का दायरा कितनी तेजी से बदल रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई नया चेहरा इस स्थापित क्रम को चुनौती दे पाता है।
भारतीय संस्कारों के रंग में रंगीं ग्लोबल स्टार रिहाना: एंटीलिया में पूजा-अर्चना और गौ सेवा के साथ की नई शुरुआत

नई दिल्ली। मुंबई में इन दिनों वैश्विक मनोरंजन और व्यापारिक जगत की हलचल अपने चरम पर है, जिसका केंद्र बिंदु अंतरराष्ट्रीय पॉप स्टार और सफल उद्यमी रिहाना की भारत यात्रा बनी हुई है। रिहाना अपने मशहूर सौंदर्य ब्रांड के भारतीय बाजार में आधिकारिक प्रवेश और विस्तार के सिलसिले में तीन दिवसीय दौरे पर भारत आई हैं। इस व्यावसायिक यात्रा के बीच उनका एक ऐसा मानवीय और सांस्कृतिक पक्ष सामने आया है, जिसने उनके भारतीय प्रशंसकों का दिल जीत लिया। व्यापारिक औपचारिकताओं से परे, रिहाना ने देश के सबसे प्रतिष्ठित उद्योगपति परिवार के निवास स्थान ‘एंटीलिया’ में समय बिताया, जहाँ उनका स्वागत भारतीय परंपराओं की भव्यता और आतिथ्य सत्कार की प्राचीन मिसाल के साथ किया गया। अंबानी परिवार के घर आयोजित इस विशेष मिलन समारोह में रिहाना का स्वागत परिवार की नई पीढ़ी के सदस्यों ने किया। इस दौरान घर के भीतर का दृश्य किसी बड़े त्योहार जैसा प्रतीत हो रहा था। रिहाना ने न केवल एक मेहमान के तौर पर शिरकत की, बल्कि वे भारतीय रीति-रिवाजों में पूरी तरह रमी हुई नजर आईं। उन्होंने परिवार के सदस्यों के साथ घर में आयोजित एक विशेष पूजा और आध्यात्मिक अनुष्ठान में भाग लिया। हाथ में पूजा की थाली लिए और पूरी श्रद्धा के साथ अनुष्ठान को पूरा करते हुए उनकी तस्वीरें यह दर्शाती हैं कि कला और आध्यात्मिकता भौगोलिक सीमाओं से परे होती है। भारतीय संस्कृति में जीव-दया के महत्व को समझते हुए उन्होंने गौ-सेवा भी की, जहाँ उन्होंने गाय को बड़े प्रेम से चारा खिलाया, जो भारतीय समाज में शुभता का प्रतीक माना जाता है। उत्सव का माहौल तब और अधिक जीवंत हो गया जब रिहाना ने महाराष्ट्र के पारंपरिक लोक नृत्य ‘फुगड़ी’ में अपना हाथ आजमाया। परिवार की महिलाओं के साथ हाथ में हाथ डालकर गोल-गोल घूमते हुए इस नृत्य का आनंद लेते देख वहां मौजूद मेहमान मंत्रमुग्ध रह गए। मनोरंजन का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; रिहाना के स्वागत को यादगार बनाने के लिए ‘फूलों की होली’ का विशेष आयोजन किया गया था। इस दौरान उन पर सुगंधित फूलों की पंखुड़ियों की भारी वर्षा की गई, जिसका रिहाना ने खिलखिलाते हुए आनंद लिया। वे खुद भी इस उत्सव का हिस्सा बनीं और परिवार के साथ फूलों से होली खेली। यह क्षण पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों के उस सुंदर मिलन का गवाह बना, जो अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुर्लभ होता है। व्यापारिक दृष्टिकोण से रिहाना की यह यात्रा भारतीय सौंदर्य बाजार के लिए एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है। उन्होंने एक बड़े भारतीय रिटेल समूह के साथ रणनीतिक साझेदारी की है, जिससे अब उनके उत्पाद देश भर में ऑनलाइन और भौतिक स्टोर्स पर सुलभ होंगे। हालांकि वे इससे पहले भी एक निजी पारिवारिक समारोह में शामिल होने भारत आ चुकी हैं, लेकिन इस बार उनका यह प्रवास व्यावसायिक गंभीरता और व्यक्तिगत जुड़ाव का एक संतुलित मिश्रण रहा। उनकी इस यात्रा ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक हस्तियों के लिए एक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र भी है जहाँ की परंपराएं दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। रिहाना का यह दौरा न केवल उनके ब्रांड की सफलता की नींव रखेगा, बल्कि उनके और भारत के बीच के भावनात्मक रिश्तों को भी एक नई ऊंचाई प्रदान करेगा।
जब बॉलीवुड के 'राज' ने अपने ही परिवार का किरदार निभाकर रचा इतिहास..

नई दिल्ली। बॉलीवुड के इतिहास में कई ऐसी फिल्में आई हैं जिन्होंने अपनी अनूठी कहानी और कलाकारों के शानदार अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई है। ऐसी ही एक यादगार फिल्म साल 2000 में बड़े पर्दे पर उतरी थी, जिसने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़े, बल्कि अभिनय की दुनिया में एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया। इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसके मुख्य अभिनेता गोविंदा थे, जिन्होंने एक या दो नहीं, बल्कि पूरे छह अलग-अलग किरदारों को एक साथ पर्दे पर जीवंत कर दिया था। उस दौर में इस तरह का प्रयोग करना न केवल चुनौतीपूर्ण था, बल्कि दर्शकों के लिए भी यह एक बिल्कुल नया और रोमांचक अनुभव था। फिल्म की कहानी मुख्य रूप से राज मल्होत्रा नाम के एक युवक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी चुलबुली और मजाकिया हरकतों से सबको हंसने पर मजबूर कर देता है। लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है जब राज के पूरे परिवार की एंट्री होती है। पर्दे पर जब राज के दादा, उसकी दादी, पिता, मां और बहन एक साथ नजर आते हैं, तो दर्शक यह देखकर दंग रह जाते हैं कि इन सभी किरदारों को निभाने वाला शख्स कोई और नहीं बल्कि खुद गोविंदा ही थे। हर किरदार के लिए उन्होंने अपनी आवाज, बोलने के लहजे और शारीरिक हाव-भाव को इतनी बारीकी से बदला था कि फिल्म देखते समय एक पल के लिए भी ऐसा महसूस नहीं होता था कि ये सभी भूमिकाएं एक ही कलाकार द्वारा निभाई जा रही हैं। व्यावसायिक मोर्चे पर भी इस फिल्म ने अपनी चमक बिखेरी। मध्यम बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने सिनेमाघरों में जबरदस्त भीड़ जुटाई और अपनी लागत से दोगुने से भी ज्यादा की कमाई करने में सफल रही। इस फिल्म की सफलता ने यह साबित कर दिया कि अगर अभिनेता में प्रतिभा हो और पटकथा में दम हो, तो दर्शक उसे भरपूर प्यार देते हैं। फिल्म के संवाद और कॉमेडी सीन आज भी सोशल मीडिया पर खासे लोकप्रिय हैं। इस प्रोजेक्ट ने गोविंदा को एक ऐसे वर्सटाइल एक्टर के रूप में स्थापित किया जो किसी भी सांचे में ढल सकता था, चाहे वह एक बुजुर्ग दादी का किरदार हो या एक शरारती जवान लड़के का। अभिनय के अलावा फिल्म की स्टारकास्ट ने भी इसकी सफलता में अहम भूमिका निभाई। मुख्य अभिनेत्री के साथ गोविंदा की जोड़ी को काफी सराहा गया और दोनों के बीच की केमिस्ट्री ने पर्दे पर जादू बिखेरा। साथ ही, कॉमेडी जगत के अन्य दिग्गज कलाकारों ने भी अपनी उपस्थिति से फिल्म को और भी मजेदार बना दिया। दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म में केवल मुख्य नायक ने ही बहुमुखी भूमिका नहीं निभाई थी, बल्कि एक अन्य मशहूर कॉमेडियन ने भी दोहरी भूमिका निभाकर हंसी का तड़का लगाया था। तकनीकी रूप से यह फिल्म उस समय की अन्य फिल्मों से काफी आगे थी क्योंकि इसमें कई किरदारों को एक ही फ्रेम में कुशलतापूर्वक दिखाया गया था। आज दशकों बीत जाने के बाद भी यह फिल्म भारतीय सिनेमा प्रेमियों की पसंदीदा सूची में शामिल है। यह फिल्म उस दौर का प्रतीक है जब पारिवारिक मनोरंजन और शुद्ध कॉमेडी ही सिनेमा की जान हुआ करती थी। बिना किसी विवाद या भारी भरकम स्पेशल इफेक्ट्स के, केवल सादगी और बेहतरीन टाइमिंग के दम पर इस फिल्म ने जो मुकाम हासिल किया, वह आज के दौर की फिल्मों के लिए एक मिसाल है। गोविंदा के वे छह यादगार चेहरे आज भी दर्शकों को गुदगुदाते हैं और सिनेमाई पर्दे पर उनके उस अनोखे ‘सिक्सर’ की याद दिलाते हैं।