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हल्दी असली या नकली? घर बैठे इन आसान तरीकों से मिनटों में करें शुद्धता की पहचान

नई दिल्ली । भारतीय रसोई में हल्दी केवल एक मसाला नहीं बल्कि सेहत और परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है। दाल, सब्जी और कई घरेलू नुस्खों में इसका नियमित उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद में भी हल्दी को इसके औषधीय गुणों के लिए विशेष स्थान दिया गया है। लेकिन बदलते समय के साथ बाजार में मिलने वाली हर हल्दी की शुद्धता पर भरोसा करना अब आसान नहीं रहा है। मिलावट के बढ़ते मामलों ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। आजकल कई बार हल्दी में चमकदार रंग और बेहतर दिखावट देने के लिए कृत्रिम रंगों और रसायनों का उपयोग किया जाता है। कुछ मामलों में सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले पदार्थ भी मिलाए जाते हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि घर में इस्तेमाल होने वाली हल्दी की शुद्धता की जांच की जाए। हल्दी की शुद्धता जांचने का सबसे आसान तरीका पानी का परीक्षण माना जाता है। इसके लिए एक गिलास गुनगुने पानी में थोड़ी मात्रा में हल्दी डालकर कुछ देर के लिए छोड़ दिया जाता है। यदि हल्दी नीचे बैठ जाती है और पानी हल्का पीला रहता है, तो इसे अपेक्षाकृत शुद्ध माना जाता है। लेकिन यदि हल्दी तेजी से घुलने लगे और पानी का रंग गहरा पीला हो जाए, तो यह मिलावट का संकेत हो सकता है। इसके अलावा एक और सरल तरीका हथेली परीक्षण है, जिसे घर पर आसानी से किया जा सकता है। इसमें हल्दी की थोड़ी मात्रा हथेली पर रखकर उंगलियों से हल्के से रगड़ा जाता है। यदि हल्दी असली होती है, तो यह हथेली पर हल्का पीला रंग छोड़ती है और उसकी प्राकृतिक खुशबू महसूस होती है। जबकि मिलावटी हल्दी का रंग अक्सर असमान होता है या जल्दी फीका पड़ जाता है। कुछ मामलों में हल्दी में खतरनाक रसायनों की मिलावट की भी आशंका होती है। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक परीक्षणों की आवश्यकता पड़ती है, जिनमें रासायनिक प्रतिक्रिया के आधार पर मिलावट की पहचान की जाती है। यह बताया जाता है कि कुछ विशेष रसायनों की मौजूदगी से हल्दी का रंग बदल सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मिलावटी हल्दी लंबे समय में पेट संबंधी समस्याएं, एलर्जी, मतली और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। इसलिए केवल हल्दी ही नहीं बल्कि सभी रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। बाजार से हल्दी खरीदते समय उपभोक्ताओं को विश्वसनीय स्रोत और ब्रांड का चयन करना चाहिए। पैक्ड और प्रमाणित उत्पादों को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है। इसके साथ ही समय-समय पर घर में हल्दी की शुद्धता की जांच करना भी एक अच्छी आदत हो सकती है। कुल मिलाकर कहा जाए तो हल्दी जैसी साधारण दिखने वाली चीज भी अगर मिलावटी हो, तो यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। इसलिए थोड़ी सावधानी और जागरूकता अपनाकर हम अपने परिवार की सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं।

स्क्रीन टाइम की आदत बिगाड़ रही नींद का पैटर्न, शरीर और दिमाग दोनों पर पड़ रहा असर..

नई दिल्ली ।आज की डिजिटल जीवनशैली में मोबाइल, लैपटॉप और टीवी हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। काम से लेकर मनोरंजन तक लगभग हर गतिविधि स्क्रीन पर ही निर्भर हो गई है। लेकिन इसी आदत का एक गंभीर असर अब लोगों की नींद और स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा है। लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम शरीर के प्राकृतिक नींद चक्र को प्रभावित कर रहा है, जिससे स्लीप साइकिल बिगड़ती जा रही है। दिनभर काम के दौरान कंप्यूटर और मोबाइल की स्क्रीन पर समय बिताने के बाद भी कई लोग रात में भी फोन का इस्तेमाल जारी रखते हैं। सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, वीडियो देखना या देर रात तक चैटिंग करना अब एक सामान्य आदत बन चुकी है। धीरे-धीरे यह पैटर्न शरीर और दिमाग दोनों को थका देता है, लेकिन व्यक्ति को इसका एहसास तब होता है जब नींद प्रभावित होने लगती है। विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी दिमाग को यह संकेत देती है कि अभी दिन का समय है। इससे शरीर का प्राकृतिक नींद तंत्र बाधित होता है। आमतौर पर शरीर रात के समय मेलाटोनिन नामक हार्मोन बनाता है, जो नींद लाने में मदद करता है। लेकिन जब व्यक्ति सोने से पहले लंबे समय तक स्क्रीन देखता है, तो इस हार्मोन का निर्माण प्रभावित होता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को समय पर नींद नहीं आती और वह बिस्तर पर लंबे समय तक करवटें बदलता रहता है। लगातार ऐसा होने पर नींद की गुणवत्ता खराब हो जाती है और शरीर को पूरा आराम नहीं मिल पाता। इसका असर अगले दिन थकान, सिर भारी रहना, आंखों में जलन और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याओं के रूप में सामने आता है। खराब स्लीप साइकिल का प्रभाव केवल थकान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह धीरे-धीरे शरीर की कार्यक्षमता को भी प्रभावित करता है। नींद पूरी न होने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटती है, काम में मन नहीं लगता और मानसिक थकान बढ़ जाती है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर मानसिक स्वास्थ्य और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है। आजकल कई लोग सुबह उठने में परेशानी महसूस करते हैं और दिनभर सुस्ती बनी रहती है। इसका एक बड़ा कारण अनियमित नींद और देर रात तक स्क्रीन का उपयोग है। डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति धीरे-धीरे शरीर की प्राकृतिक लय को बिगाड़ देती है, जिसे ठीक होने में समय लग सकता है। हालांकि, कुछ आसान बदलाव अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल और अन्य स्क्रीन से दूरी बनाना सबसे प्रभावी कदम माना जाता है। इसके अलावा रात के समय हल्की रोशनी में रहना, अनावश्यक स्क्रॉलिंग से बचना और नींद के लिए शांत माहौल तैयार करना मददगार हो सकता है। दिनभर स्क्रीन पर काम करने वाले लोगों को बीच-बीच में आंखों को आराम देना भी जरूरी है, ताकि आंखों और दिमाग पर दबाव कम हो सके। सोने से पहले किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या परिवार के साथ समय बिताना भी नींद को बेहतर बनाने में मदद करता है। कुल मिलाकर, बेहतर स्वास्थ्य के लिए अच्छी नींद बेहद जरूरी है और अच्छी नींद के लिए स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखना आज के समय की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत बन गई है। छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके स्लीप साइकिल को सुधारा जा सकता है और शरीर को फिर से प्राकृतिक ऊर्जा और संतुलन दिया जा सकता है।

सावधान! इन गलतियों की वजह से खराब होजाता जाता है अचार, ऐसे रखें सुरक्षित

नई दिल्ली। भारतीय रसोई में अचार सिर्फ एक साइड डिश नहीं बल्कि स्वाद और परंपरा का हिस्सा होता है। आम, नींबू, मिर्च या आंवले का अचार हर घर में खास जगह रखता है। लेकिन कई बार मेहनत से तैयार किया गया अचार कुछ ही दिनों या महीनों में खराब होने लगता है और उसके ऊपर सफेद या हरे रंग की फफूंदी दिखाई देने लगती है। यह समस्या किसी एक मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि साल के किसी भी समय हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार अचार में फफूंदी लगने का सबसे बड़ा कारण नमी और हवा का संपर्क है। जब भी जार के अंदर नमी पहुंचती है या अचार खुले वातावरण के संपर्क में आता है, तो उसमें फफूंदी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कई बार छोटी-छोटी गलतियां जैसे गीला चम्मच इस्तेमाल करना या जार को खुला छोड़ देना भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं। गंध और स्वाद से मिलते हैं शुरुआती संकेतअचार खराब होने का पहला संकेत उसकी गंध से मिलता है। ताजा अचार की खुशबू तीखी और खट्टी होती है, लेकिन अगर उसमें सड़ी हुई या अजीब सी बदबू आने लगे, तो यह खराब होने का संकेत है। कई बार स्वाद में भी बदलाव आने लगता है, जिससे अचार कड़वा, फीका या अजीब सा लगने लगता है। ऐसे अचार का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। बनावट और रंग में बदलाव भी खतरे का संकेतजब अचार खराब होने लगता है, तो उसकी बनावट में भी बदलाव दिखाई देता है। अगर अचार चिपचिपा, बहुत नरम या रंग बदलने लगे, तो इसे खाने से बचना चाहिए। उदाहरण के लिए आम का अचार भूरा और मुलायम हो जाए या लहसुन का अचार लिसलिसा महसूस हो, तो यह संकेत है कि उसमें खराबी शुरू हो चुकी है। तेल की स्थिति भी काफी अहम होती है। अगर अचार का तेल धुंधला दिखे, अलग-अलग परतों में बंट जाए या उसमें झाग बनने लगे, तो यह भी खराबी की निशानी है। अचार में फफूंदी क्यों लगती है?Pickle में फफूंदी तब लगती है जब उसमें नमी, हवा या गंदगी पहुंच जाती है। कई बार अचार को स्टोर करते समय सावधानी नहीं बरती जाती, जिससे बैक्टीरिया और फंगस तेजी से बढ़ने लगते हैं। अचार को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखें?Pickle को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी सावधानियां अपनानी चाहिए। हमेशा सूखे और साफ चम्मच का इस्तेमाल करें, क्योंकि एक बूंद पानी भी फफूंदी का कारण बन सकती है। जार को हर बार अच्छी तरह बंद करें ताकि हवा अंदर न जा सके। अचार को हमेशा ठंडी और सूखी जगह पर रखें। सीधी धूप और ज्यादा गर्मी मसालों और तेल को खराब कर सकती है। इसके अलावा ध्यान रखें कि अचार पूरी तरह तेल की परत में ढका रहे। अगर तेल कम हो जाए, तो ऊपर से साफ तेल डालकर उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। इन छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर अचार को लंबे समय तक ताजा और स्वादिष्ट रखा जा सकता है, जिससे उसका असली स्वाद बरकरार रहता है और वह फफूंदी से सुरक्षित रहता है।

Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

  Newborn Baby Bath Tips: नई दिल्ली। नवजात शिशु की देखभाल जितनी खुशी देती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। खासतौर पर जब बात बच्चे को नहलाने की हो, तो माता-पिता को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है। जन्म के बाद शुरुआती महीनों में शिशु की त्वचा बहुत कोमल होती है और उसका शरीर बाहरी वातावरण के अनुसार खुद को पूरी तरह ढाल नहीं पाता। ऐसे में नहलाते समय की गई छोटी-सी गलती भी बच्चे के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात या प्रीमैच्योर बच्चे को नहलाते समय पानी का तापमान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। पानी हमेशा हल्का गुनगुना होना चाहिए। ज्यादा गर्म पानी बच्चे की त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि ठंडा पानी सर्दी-जुकाम या शरीर का तापमान गिरने का कारण बन सकता है। नहलाने से पहले हाथ से पानी का तापमान जरूर जांच लेना चाहिए। बच्चे को लंबे समय तक पानी में रखना भी सही नहीं माना जाता। नवजात शिशु जल्दी ठंड पकड़ लेते हैं, इसलिए उनका स्नान बहुत कम समय में और आरामदायक तरीके से होना चाहिए। कई लोग बच्चे को तेजी से रगड़कर साफ करने लगते हैं, लेकिन ऐसा करना नुकसानदायक हो सकता है। शिशु की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है, इसलिए उसे हमेशा मुलायम कपड़े और हल्के हाथों से साफ करना चाहिए। डॉक्टरों का मानना है कि तेज खुशबू वाले साबुन, बॉडी वॉश या केमिकल युक्त प्रोडक्ट नवजात की त्वचा पर बुरा असर डाल सकते हैं। इसलिए बच्चे के लिए केवल माइल्ड और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए प्रोडक्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए। कई मामलों में सिर्फ साफ गुनगुने पानी और मुलायम कपड़े से सफाई करना ही पर्याप्त होता है। नहलाते समय कमरे का तापमान भी सामान्य और आरामदायक होना चाहिए। ठंडी हवा, तेज पंखा या एसी वाले कमरे में बच्चे को नहलाने से वह जल्दी बीमार पड़ सकता है। स्नान के तुरंत बाद बच्चे को मुलायम तौलिए से अच्छी तरह सुखाकर गर्म कपड़े पहनाना जरूरी है। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर दिन नवजात को पानी से नहलाना जरूरी नहीं होता। खासकर प्रीमैच्योर बच्चों के लिए स्पंज बाथ यानी गीले मुलायम कपड़े से शरीर साफ करना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। इससे बच्चा साफ भी रहता है और ठंड लगने का खतरा भी कम होता है। अगर बच्चे को नहलाने के बाद त्वचा लाल हो जाए, ज्यादा रोना आए, सांस लेने में दिक्कत हो या शरीर ठंडा महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। सही देखभाल और सावधानी के साथ ही नवजात शिशु स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है।

Makeup Tips: गलत मेकअप से बिगड़ सकता है चेहरा, जानें सही करने का तरीका

नई दिल्ली। आज के समय में मेकअप सिर्फ एक जरूरत ही नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल का अहम हिस्सा बन चुका है। शादी, पार्टी या रोजमर्रा की जिंदगी में लोग अक्सर मेकअप का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अगर मेकअप सही तरीके से न किया जाए, तो यह आपकी स्किन को नुकसान भी पहुंचा सकता है और प्राकृतिक निखार धीरे-धीरे कम हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मेकअप से जुड़ी सबसे बड़ी गलती उसे बिना हटाए सो जाना है। दिनभर की थकान के बाद अगर मेकअप चेहरे पर ही छोड़ दिया जाए, तो यह स्किन के पोर्स को बंद कर देता है। रात के समय त्वचा खुद को रिपेयर करती है, लेकिन मेकअप की परत के कारण यह प्रक्रिया रुक जाती है, जिससे पिंपल्स, ब्लैकहेड्स और डल स्किन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। एक और आम गलती जल्दबाजी में सीधे फाउंडेशन या बेस लगाना है। ऐसा करने से केमिकल्स सीधे त्वचा पर असर डालते हैं। स्किन एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि मेकअप से पहले हमेशा मॉइस्चराइजर और प्राइमर का इस्तेमाल करें। इससे त्वचा और मेकअप के बीच एक प्रोटेक्टिव लेयर बनती है और स्किन को नुकसान कम होता है। इसके अलावा, मेकअप ब्रश और ब्यूटी ब्लेंडर की सफाई न करना भी एक बड़ी गलती मानी जाती है। गंदे ब्रश में बैक्टीरिया और डेड स्किन सेल्स जमा हो जाते हैं, जो चेहरे पर इस्तेमाल करने से पिंपल्स और स्किन इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं। इसलिए इनकी नियमित सफाई बेहद जरूरी है। मेकअप हटाने के लिए सिर्फ फेस वॉश पर निर्भर रहना भी सही नहीं है। पहले किसी अच्छे मेकअप रिमूवर, क्लींजिंग बाम या नारियल तेल जैसे प्राकृतिक विकल्प से मेकअप को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। इसके बाद ही स्किन टाइप के अनुसार फेस वॉश का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि चेहरा पूरी तरह साफ हो सके। अगर इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाए, तो मेकअप आपकी खूबसूरती बढ़ाने का काम करेगा, न कि स्किन को नुकसान पहुंचाने का।

तला-भुना खाना कितना खतरनाक? जानें कैसे कम तेल से सुधर सकती है आपकी हेल्थ

नई दिल्ली । आज के समय में तला-भुना और ज्यादा तेल वाला खाना लोगों की डाइट का एक आम हिस्सा बन चुका है। भारतीय रसोई में तड़के से लेकर डीप फ्राई डिशेज तक तेल का इस्तेमाल काफी अधिक होता है, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन शरीर के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। ज्यादा ऑयली खाना सबसे पहले पाचन तंत्र पर असर डालता है। ऐसे भोजन को पचाने में शरीर को अधिक समय और ऊर्जा लगती है, जिससे कई लोगों को पेट भारी लगना, एसिडिटी, ब्लोटिंग और अपच जैसी समस्याएं होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह आदत पाचन क्षमता को कमजोर कर सकती है। इसके अलावा, ज्यादा तला हुआ खाना मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। प्रोसेस्ड और डीप फ्राइड फूड में मौजूद अनहेल्दी फैट्स शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं, जिसका सीधा संबंध दिमाग के कामकाज और मूड से भी जोड़ा जाता है। कुछ रिसर्च में ऐसे खान-पान को तनाव और मानसिक अस्थिरता से भी जोड़ा गया है। लंबे समय तक अधिक तेल वाला भोजन करने से वजन बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। फ्राइड फूड में कैलोरी अधिक होती है, जबकि पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम होते हैं, जिससे शरीर में फैट जमा होने लगता है और मोटापा बढ़ सकता है। यही स्थिति आगे चलकर कई अन्य बीमारियों की वजह बन सकती है। दिल की सेहत पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव देखा जाता है। अधिक तेल वाला भोजन बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है और गुड कोलेस्ट्रॉल को कम कर सकता है। इससे धमनियों में ब्लॉकेज बनने का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थितियों को जन्म दे सकता है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ज्यादा ऑयली डाइट का असर लिवर और ब्लड शुगर पर भी पड़ सकता है। यह इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाकर टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है, साथ ही फैटी लिवर जैसी समस्याएं भी पैदा कर सकता है। हालांकि अच्छी बात यह है कि छोटे-छोटे बदलावों से सेहत में बड़ा सुधार लाया जा सकता है। डीप फ्राइड खाने की जगह ग्रिल्ड या बेक्ड विकल्प अपनाना, साथ ही डाइट में फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल करना शरीर को संतुलित और स्वस्थ रखने में मदद करता है।

Weekend Getaway: दिल्ली के आसपास ये खास जगहें जरूर घूमें, यादगार बन जाएगा ट्रिप

नई दिल्ली। गर्मियों के मौसम में अगर आप दिल्ली के पास किसी ठंडी और खूबसूरत जगह की तलाश में हैं, तो उत्तर भारत में कई ऐसे हिल स्टेशन मौजूद हैं जो कम दूरी में शानदार अनुभव देते हैं। यहां आप भीड़भाड़ से दूर प्रकृति की गोद में कुछ सुकून भरे पल बिता सकते हैं। चकराता (उत्तराखंड)दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर स्थित चकराता एक शांत और कम भीड़ वाला हिल स्टेशन है। यह जगह अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों और शांत वातावरण के लिए जानी जाती है। यहां का प्रसिद्ध टाइगर फॉल्स पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। गर्मियों में यहां का मौसम बेहद सुहावना रहता है, जहां तापमान सामान्यतः 15 से 24 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। भीड़भाड़ से दूर शांति पसंद करने वालों के लिए यह एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है। कसौल (हिमाचल प्रदेश)हिमाचल प्रदेश का कसौल युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। पार्वती नदी के किनारे स्थित यह जगह अपने शांत और खूबसूरत वातावरण के लिए जानी जाती है। यहां बैठकर नदी की आवाज और ठंडी हवाओं का आनंद लेना एक अलग ही अनुभव देता है। एडवेंचर पसंद करने वालों के लिए खीरगंगा ट्रेक भी एक बेहतरीन विकल्प है। यहां का मौसम ठंडा रहता है, इसलिए हल्की जैकेट साथ रखना बेहतर होता है। औली (उत्तराखंड)औली भारत के सबसे खूबसूरत हिल स्टेशनों में से एक माना जाता है, जो स्कीइंग के लिए प्रसिद्ध है। हालांकि गर्मियों में यहां की हरी-भरी घास और बर्फ से ढकी पहाड़ियां बेहद आकर्षक लगती हैं। चारों तरफ फैला प्राकृतिक नजारा और ठंडी हवा यहां आने वालों को सुकून देती है। औली में केबल कार की सवारी भी एक खास अनुभव देती है। मई-जून में यहां का मौसम लगभग 15 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है, जो घूमने के लिए आदर्श है। अगर आप इस गर्मी में दिल्ली के आसपास कहीं घूमने का प्लान बना रहे हैं, तो ये तीनों जगहें आपकी ट्रिप को यादगार बना सकती हैं।

खाने में नखरे करने वाले बच्चों के लिए 7 असरदार टिप्स, माता-पिता की टेंशन होगी कम

नई दिल्ली । बच्चों का खाने के समय नखरे करना आजकल बहुत आम समस्या बन गई है। कई माता-पिता इस बात से परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा ठीक से खाना नहीं खाता और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सही तरीका अपनाकर और धैर्य रखकर इस आदत को आसानी से बदला जा सकता है। छोटे बच्चों का स्वाद समय-समय पर बदलता रहता है, इसलिए किसी भी नए खाने को तुरंत पसंद कर लेना उनके लिए जरूरी नहीं होता। ऐसे में माता-पिता को लगातार प्रयास करते रहना चाहिए और छोटे-छोटे बदलावों के साथ उन्हें नए स्वाद से परिचित कराना चाहिए। सबसे पहले जरूरी है कि बच्चे को बार-बार नए खाने का स्वाद चखने का मौका दिया जाए। कई बार किसी चीज को स्वीकार करने में समय लगता है, इसलिए एक ही बार में हार मान लेना सही नहीं है। नए खाने को उनकी पसंदीदा चीजों के साथ मिलाकर देना भी एक अच्छा तरीका हो सकता है। इसके साथ ही बच्चों को अलग-अलग तरह का पौष्टिक भोजन देने पर ध्यान देना चाहिए। फल, सब्जियां, अनाज, दालें और डेयरी उत्पाद जैसे खाद्य पदार्थ उनके रोज के आहार का हिस्सा बनने चाहिए। खाने में रंग, स्वाद और बनावट की विविधता बच्चों को आकर्षित करती है और उनकी रुचि बढ़ाती है। बच्चों को खाने की प्रक्रिया में शामिल करना भी बेहद प्रभावी तरीका माना जाता है। जब बच्चे खुद सब्जियां चुनते हैं या खाना बनाने में मदद करते हैं तो उनका खाने के प्रति उत्साह बढ़ जाता है। इससे वे खाने को एक जिम्मेदारी और मजेदार गतिविधि के रूप में देखने लगते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों पर खाने का दबाव नहीं डालना चाहिए। जब तक बच्चा स्वस्थ है और उसका विकास सामान्य है, तब तक उसे उसकी भूख के अनुसार खाने देना बेहतर होता है। जबरदस्ती करने से अक्सर खाने के प्रति नकारात्मक सोच विकसित हो सकती है। खाने की मात्रा भी उम्र के अनुसार संतुलित होनी चाहिए। छोटे हिस्सों में भोजन देना बच्चों के लिए अधिक आसान और स्वीकार्य होता है। साथ ही, अच्छे खाने की आदतों के लिए तारीफ करना भी उन्हें प्रोत्साहित करता है। खाने को इनाम या सजा से जोड़ना भी सही नहीं माना जाता, क्योंकि इससे बच्चे भोजन को गलत तरीके से समझने लगते हैं। इसके बजाय स्वस्थ खाने को रोजमर्रा की सामान्य आदत बनाना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। अगर घर में सभी लोग मिलकर संतुलित और पौष्टिक भोजन करते हैं, तो बच्चे भी धीरे-धीरे उसी आदत को अपनाने लगते हैं।

Romantic Travel: मई में पार्टनर के साथ जाने के लिए ये खूबसूरत जगहें हैं परफेक्ट

नई दिल्ली। मई का महीना घूमने के लिए बेहद खास होता है। इस समय देश की कई हिल स्टेशन और शांत वादियां कपल्स के लिए परफेक्ट रोमांटिक डेस्टिनेशन बन जाती हैं। जानिए ऐसी खूबसूरत जगहें जहां आप पार्टनर के साथ यादगार पल बिता सकते हैं। गर्मी के मौसम में अगर आप अपने पार्टनर के साथ कहीं सुकून और रोमांस से भरा समय बिताना चाहते हैं, तो भारत में कई ऐसी डेस्टिनेशन हैं जो इस मौसम में और भी खूबसूरत हो जाती हैं। अलेप्पी (केरल)केरल का अलेप्पी अपनी बैकवाटर और हाउसबोट एक्सपीरियंस के लिए मशहूर है। शांत नहरें, हरे-भरे ताड़ के पेड़ और पानी पर तैरती नावें कपल्स को एक अलग ही रोमांटिक एहसास देती हैं। इसे “पूरब का वेनिस” भी कहा जाता है। चोपता (उत्तराखंड)अगर आपको नेचर और ट्रेकिंग पसंद है तो चोपता एक बेहतरीन विकल्प है। बुरांश के फूलों से सजी वादियां और तुंगनाथ मंदिर तक की ट्रेक इस जगह को और भी खास बना देती हैं। मनाली (हिमाचल प्रदेश)मनाली कपल्स के लिए हमेशा से पसंदीदा जगह रही है। रोहतांग और आस-पास की बर्फीली चोटियां, ठंडी हवाएं और एडवेंचर स्पोर्ट्स इसे परफेक्ट रोमांटिक डेस्टिनेशन बनाते हैं। डलहौज़ी (हिमाचल प्रदेश)भीड़ से दूर शांत माहौल में समय बिताना चाहते हैं तो डलहौज़ी बेस्ट है। देवदार के जंगल, झरने और खज्जियार जैसी जगहें इसे बेहद रोमांटिक बनाती हैं। यूसमार्ग (जम्मू-कश्मीर)यूसमार्ग अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। हरे मैदान, ठंडी हवाएं और शांत वातावरण कपल्स के लिए एक यादगार अनुभव बनाते हैं। मई का महीना कपल्स के लिए ट्रैवल और रोमांस दोनों का परफेक्ट कॉम्बिनेशन है। सही जगह चुनकर आप अपने रिश्ते को और भी खास बना सकते हैं।

सुबह या शाम कब करें वॉकिंग? गर्मियों में हेल्थ एक्सपर्ट्स की अहम सलाह

नई दिल्ली । गर्मी के मौसम में स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए वॉकिंग को सबसे आसान और प्रभावी व्यायामों में से एक माना जाता है, लेकिन इसका लाभ तभी मिलता है जब इसे सही समय पर किया जाए। गलत समय पर की गई वॉकिंग शरीर पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है और कई बार यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण भी बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार गर्मी के दौरान दिन के समय तापमान काफी अधिक हो जाता है, जिससे शरीर जल्दी थक जाता है और पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए वॉकिंग के लिए समय का सही चयन बेहद जरूरी माना जाता है। आमतौर पर सुबह और शाम का समय सबसे सुरक्षित और फायदेमंद होता है। सुबह के समय, खासकर 5 बजे से 7 बजे के बीच का समय वॉकिंग के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस समय वातावरण अपेक्षाकृत ठंडा होता है और हवा भी साफ होती है, जिससे शरीर को ताजगी मिलती है। इस दौरान की गई वॉक न केवल शरीर को ऊर्जा देती है बल्कि मानसिक तनाव को भी कम करने में मदद करती है। इसके अलावा सुबह के समय प्रदूषण का स्तर भी कम होता है, जिससे सांस लेने में आसानी रहती है और फेफड़ों पर दबाव कम पड़ता है। अगर किसी कारणवश सुबह वॉक करना संभव न हो, तो शाम का समय एक अच्छा विकल्प माना जाता है। शाम 6:30 बजे के बाद तापमान धीरे-धीरे कम होने लगता है और धूप का असर भी खत्म हो जाता है। इस समय की गई वॉक शरीर को रिलैक्स करने में मदद करती है और दिनभर की थकान को कम करती है। हालांकि बहुत देर रात तक वॉक करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे नींद का पैटर्न प्रभावित हो सकता है। दिन के समय, खासकर 11 बजे से 4 बजे के बीच वॉकिंग करना स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इस दौरान तेज धूप और गर्म हवाएं शरीर के तापमान को तेजी से बढ़ा सकती हैं, जिससे हीट स्ट्रोक, सिरदर्द, चक्कर और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह समय और भी अधिक खतरनाक माना जाता है, इसलिए इस अवधि में बाहर निकलने से बचना चाहिए। गर्मी में वॉकिंग के दौरान शरीर से पसीना अधिक निकलता है, जिससे शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इसलिए वॉक से पहले और बाद में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है। नारियल पानी और नींबू पानी जैसे पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद कर सकते हैं और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखते हैं। इसके अलावा वॉकिंग के दौरान हल्के और ढीले कपड़े पहनना भी जरूरी माना जाता है। हल्के रंग के कपड़े शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं और गर्मी का असर कम महसूस होता है। धूप से बचाव के लिए टोपी और सनग्लासेस का उपयोग भी फायदेमंद हो सकता है।