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IIT रुड़की की अहम खोज, गौमूत्र डिस्टिलेट में मिले ऐसे यौगिक जिन्होंने लैब में चिकनगुनिया वायरस की सक्रियता को किया कमजोर

नई दिल्ली । मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा शोध प्रस्तुत किया है, जो भविष्य में एंटीवायरल दवाओं के विकास के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने गौमूत्र डिस्टिलेट में मौजूद कुछ जैव-सक्रिय यौगिकों की पहचान की है, जिन्होंने प्रयोगशाला स्तर पर चिकनगुनिया वायरस के खिलाफ प्रभावी परिणाम प्रदर्शित किए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन वायरसजनित रोगों पर अनुसंधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने चिकनगुनिया वायरस से संक्रमित कोशिकाओं पर गौमूत्र डिस्टिलेट के प्रभाव का परीक्षण किया। नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में किए गए परीक्षणों से संकेत मिला कि डिस्टिलेट में मौजूद कुछ यौगिक वायरस की सक्रियता को कम करने में सक्षम हैं। अध्ययन के अनुसार संक्रमित कोशिकाओं में इन तत्वों के उपयोग के बाद वायरस की मात्रा में उल्लेखनीय कमी देखी गई, जिससे शोधकर्ताओं का ध्यान इस दिशा में और अधिक केंद्रित हुआ। वैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान कई महत्वपूर्ण जैव-सक्रिय तत्वों की पहचान की। इनमें बेंजोइक एसिड, हिप्यूरिक एसिड और ओलेइक एसिड जैसे यौगिक शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि ये तत्व वायरस के जीवन चक्र से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रोटीन और एंजाइमों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे वायरस की प्रतिकृति बनाने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है और उसके फैलाव की क्षमता कमजोर हो सकती है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जब गौमूत्र डिस्टिलेट को कुछ अन्य प्राकृतिक यौगिकों के साथ मिलाकर परीक्षण किया गया, तब परिणाम और अधिक प्रभावशाली दिखाई दिए। वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेत देता है कि विभिन्न प्राकृतिक तत्वों का संयोजन भविष्य में नई एंटीवायरल दवाओं के विकास में उपयोगी भूमिका निभा सकता है। इससे कम लागत वाले और वैकल्पिक उपचार विकल्पों की दिशा में भी अनुसंधान को गति मिल सकती है। हालांकि शोधकर्ताओं ने इस उपलब्धि को लेकर सावधानी बरतने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है। उनका स्पष्ट कहना है कि वर्तमान निष्कर्ष केवल प्रयोगशाला स्तर तक सीमित हैं और इन्हें सीधे मानव उपचार से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। किसी भी संभावित औषधि को चिकित्सा उपयोग के लिए स्वीकृति मिलने से पहले विस्तृत प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों से गुजरना आवश्यक होता है। विशेषज्ञों ने आम लोगों को यह सलाह भी दी है कि इस अध्ययन के आधार पर किसी प्रकार का स्व-उपचार या सीधे गौमूत्र का सेवन करने जैसे कदम नहीं उठाने चाहिए। प्रयोगशाला में प्राप्त सकारात्मक परिणामों और मानव शरीर में वास्तविक प्रभाव के बीच कई वैज्ञानिक चरण होते हैं, जिनका मूल्यांकन आवश्यक है। सुरक्षा, प्रभावशीलता और संभावित दुष्प्रभावों की पुष्टि के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं माना जाता। स्वास्थ्य और जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यह शोध पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। यदि भविष्य के परीक्षणों में भी ऐसे ही सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं, तो इससे चिकनगुनिया समेत अन्य वायरल संक्रमणों के उपचार के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं। साथ ही यह प्राकृतिक स्रोतों से दवा विकास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। भारत में हर वर्ष मानसून और उसके बाद के मौसम में चिकनगुनिया के मामलों में वृद्धि देखी जाती है। ऐसे में वायरस के खिलाफ प्रभावी उपचार की खोज सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय इस अध्ययन को प्रारंभिक स्तर की एक उत्साहजनक उपलब्धि मान रहा है, जबकि अंतिम निष्कर्षों और व्यावहारिक उपयोग के लिए आगे के व्यापक परीक्षणों का इंतजार किया जा रहा है।

सेंसिटिव टूथपेस्ट पर विशेषज्ञों की चेतावनी, दांतों को राहत देने वाला तत्व कुछ मरीजों के लिए बन सकता है खतरा

नई दिल्ली । दांतों की संवेदनशीलता से राहत दिलाने वाले विशेष टूथपेस्ट का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। ठंडी या गर्म चीजें खाने-पीने पर दांतों में होने वाली झनझनाहट से परेशान लोग ऐसे उत्पादों का सहारा लेते हैं, जो तत्काल राहत देने का दावा करते हैं। हालांकि अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इन टूथपेस्ट में मौजूद कुछ तत्व विशेष परिस्थितियों में हृदय और किडनी के मरीजों के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, कई सेंसिटिव टूथपेस्ट में पोटैशियम नाइट्रेट नामक तत्व का उपयोग किया जाता है। यह दांतों की नसों की गतिविधि को शांत करके संवेदनशीलता से होने वाले दर्द को कम करने में मदद करता है। यही कारण है कि ऐसे टूथपेस्ट दांतों में होने वाली झनझनाहट और असहजता को नियंत्रित करने में प्रभावी माने जाते हैं। हालांकि कुछ विशेष स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों के लिए इसके उपयोग को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि पोटैशियम शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए आवश्यक तत्व है। यह विशेष रूप से हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने वाले विद्युत संकेतों के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि शरीर में पोटैशियम का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है तो हृदय की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में धड़कनों की अनियमितता सहित कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न होने का खतरा बढ़ सकता है। विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल सेंसिटिव टूथपेस्ट के उपयोग से अधिकांश स्वस्थ लोगों में कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या होने की संभावना बहुत कम होती है। चिंता मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है जो पहले से हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं या ऐसी दवाएं ले रहे हैं जो शरीर में पोटैशियम के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे मरीजों में अतिरिक्त पोटैशियम का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों ने कुछ श्रेणियों के मरीजों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है। इनमें उच्च रक्तचाप या हार्ट फेलियर के उपचार के लिए कुछ विशेष दवाएं लेने वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा पोटैशियम संतुलन को प्रभावित करने वाली दवाओं का सेवन करने वाले मरीजों को भी अपने चिकित्सक की सलाह के बिना किसी नए उत्पाद का नियमित उपयोग शुरू नहीं करना चाहिए। किडनी रोगियों के लिए भी यह विषय महत्वपूर्ण माना जा रहा है। किडनी शरीर में पोटैशियम के स्तर को नियंत्रित रखने में प्रमुख भूमिका निभाती है। जब किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, तब शरीर में अतिरिक्त पोटैशियम जमा होने की आशंका बढ़ जाती है। यही कारण है कि क्रोनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों को ऐसे उत्पादों के उपयोग के दौरान चिकित्सकीय सलाह लेना उचित माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी स्वास्थ्य संबंधी जोखिम का मूल्यांकन व्यक्ति की समग्र स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल किसी एक उत्पाद को पूरी तरह खतरनाक मान लेना उचित नहीं है। सेंसिटिव टूथपेस्ट आज भी दांतों की संवेदनशीलता से राहत देने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं और अधिकांश लोगों के लिए सुरक्षित माने जाते हैं। फिर भी यदि कोई व्यक्ति हृदय या किडनी संबंधी बीमारी से पीड़ित है, तो उसे अपने डॉक्टर या दंत चिकित्सक से परामर्श लेकर ही ऐसे उत्पादों का चयन करना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता और चिकित्सकीय सलाह के साथ किसी भी उत्पाद का सुरक्षित उपयोग संभव है। इसलिए दांतों की समस्या से राहत पाने के साथ-साथ अपनी संपूर्ण स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना भी उतना ही आवश्यक है।

हर बार फीकी या कड़वी बनती है चाय? अपनाएं ये साइंटिफिक तरीका और पाएं होटल जैसी कड़क चाय

नई दिल्ली ।भारत में चाय केवल एक पेय नहीं बल्कि लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा है। सुबह की शुरुआत से लेकर शाम की थकान मिटाने तक एक कप गर्म चाय लोगों को ताजगी और सुकून देती है। खासतौर पर कड़क चाय के शौकीनों की संख्या काफी ज्यादा है। हालांकि बहुत से लोग यह मानते हैं कि चाय को जितनी देर तक उबाला जाएगा वह उतनी ही कड़क बनेगी। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। दरअसल परफेक्ट कड़क चाय का राज उसे देर तक उबालने में नहीं बल्कि सही समय पर सही सामग्री डालने में छिपा होता है। यदि चाय बनाने की प्रक्रिया को सही तरीके से अपनाया जाए तो केवल तीन से चार मिनट में बेहतरीन स्वाद वाली चाय तैयार की जा सकती है। क्यों खराब हो जाता है स्वाद? कई लोग कड़क चाय बनाने के लिए चायपत्ती को लंबे समय तक उबालते रहते हैं। ऐसा करने से चायपत्ती में मौजूद टैनिन्स अधिक मात्रा में निकलने लगते हैं और धीरे-धीरे जलने लगते हैं। इसका असर चाय के स्वाद पर पड़ता है और चाय कड़वी लगने लगती है। नतीजतन चाय का प्राकृतिक स्वाद और खुशबू दोनों प्रभावित हो जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चाय को जरूरत से ज्यादा पकाने की बजाय उसे सही समय तक उबालना ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसे बनाएं परफेक्ट कड़क चाय सबसे पहले एक बर्तन में आवश्यकतानुसार पानी डालकर गर्म करें। जब पानी में उबाल आने लगे तो उसमें चायपत्ती डालें। इसके बाद चायपत्ती को लगभग तीन मिनट तक पानी में अच्छी तरह उबलने दें। इस दौरान अदरक को कूटकर तैयार कर लें। तीन मिनट पूरे होने के बाद अदरक को चाय में डालें और करीब एक मिनट तक पकने दें। इससे अदरक में मौजूद प्राकृतिक तेल और सुगंध पूरी तरह बाहर आ जाते हैं और चाय का स्वाद बेहतर बनता है। इसके बाद दूध मिलाएं और चाहें तो स्वादानुसार चीनी भी डाल सकते हैं। कुछ लोग चाय में बेहद कम मात्रा में नमक डालने की सलाह देते हैं। माना जाता है कि चुटकी भर से भी कम नमक चाय के स्वाद को नमकीन नहीं बनाता बल्कि अन्य फ्लेवर को उभारने में मदद कर सकता है। चाय बनाने के पीछे है स्वाद का विज्ञान खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार चाय का स्वाद पूरी तरह संतुलन पर आधारित होता है। यदि चायपत्ती ज्यादा देर तक उबाली जाए तो उसका कड़वापन बढ़ सकता है। वहीं अदरक को शुरुआत में डालने से उसके आवश्यक तेल पूरी तरह रिलीज नहीं हो पाते। इसी वजह से चायपत्ती को पहले उबालना और कुछ मिनट बाद अदरक मिलाना अधिक प्रभावी माना जाता है। वहीं अंत में दूध डालने से चाय का रंग स्वाद और सुगंध संतुलित बनी रहती है। यदि आप भी हर बार रेस्टोरेंट या ढाबे जैसी कड़क और स्वादिष्ट चाय बनाना चाहते हैं तो अगली बार चाय को घंटों उबालने की बजाय इस आसान तकनीक को जरूर अपनाएं।

दूध उबालते समय करें बस ये एक काम, मलाई देखकर रह जाएंगे हैरान

नई दिल्ली । घरों में दूध की मलाई जमा करके घी और मक्खन बनाना एक पुरानी परंपरा रही है। कई लोग रोजाना दूध की मलाई इकट्ठा करते हैं ताकि बाद में उससे शुद्ध देसी घी तैयार किया जा सके। हालांकि अक्सर शिकायत रहती है कि दूध से पर्याप्त मात्रा में मलाई नहीं निकलती। खासकर जब दूध कम मात्रा में हो या उसमें फैट कम हो तो मलाई की परत पतली रह जाती है। लेकिन कुछ आसान किचन टिप्स अपनाकर कम दूध से भी भरपूर और मोटी मलाई प्राप्त की जा सकती है।दरअसल मलाई की मात्रा केवल दूध की गुणवत्ता पर ही निर्भर नहीं करती बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि दूध को किस तरह उबाला और ठंडा किया गया है। यदि सही प्रक्रिया अपनाई जाए तो एक लीटर दूध से भी काफी अधिक मात्रा में मलाई जमा की जा सकती है। दूध उबालते समय रखें ये ध्यान मलाई की मोटी परत जमाने के लिए सबसे पहले दूध को सही तरीके से उबालना जरूरी है। इसके लिए बर्तन में थोड़ा सा पानी डालें और फिर दूध डालकर गैस पर रखें। दूध गर्म होने के दौरान उसे बीच-बीच में चलाते रहें। इससे दूध तले में नहीं लगेगा और उसका स्वाद भी बेहतर बना रहेगा। यदि आप नियमित रूप से घी या मक्खन बनाते हैं तो फुल क्रीम दूध का इस्तेमाल करना सबसे अच्छा माना जाता है। इसमें फैट की मात्रा अधिक होने के कारण मलाई भी ज्यादा निकलती है। उबाल आने के बाद तुरंत गैस बंद न करें ज्यादातर लोग दूध में उबाल आते ही गैस बंद कर देते हैं लेकिन यही सबसे बड़ी गलती होती है। जब दूध में पहला उबाल आ जाए तो उसे धीमी आंच पर तीन से चार मिनट तक और पकने दें। इस दौरान दूध को बिल्कुल न चलाएं। धीमी आंच पर पकाने से दूध में मौजूद फैट ऊपर की सतह पर इकट्ठा होने लगता है और मलाई की मोटी परत बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कुछ ही मिनटों में आप देखेंगे कि दूध के ऊपर मलाई जमने लगी है। इसके बाद गैस बंद कर दें। दूध को सही तरीके से ठंडा करें दूध उबलने के बाद उसे पूरी तरह बंद ढक्कन से न ढकें। इसकी जगह किसी जाली या छलनी से ढककर रखें ताकि धूल या अन्य चीजें दूध में न जाएं। पूरी तरह ढक देने से भाप अंदर ही रहती है और मलाई अच्छी तरह नहीं जम पाती। दूध को सामान्य तापमान पर ठंडा होने दें। जब दूध पूरी तरह ठंडा हो जाए तब उसे फ्रिज में रख दें। रातभर फ्रिज में रखें मलाई को अच्छी तरह जमाने के लिए दूध को कम से कम आठ घंटे या पूरी रात फ्रिज में रखना चाहिए। ठंडे तापमान में दूध के ऊपर मोटी और सख्त मलाई की परत बन जाती है। सुबह किसी चाकू या चम्मच की सहायता से बर्तन के किनारों से मलाई को धीरे-धीरे निकाल लें। सही तरीके से तैयार की गई मलाई इतनी मोटी होगी कि वह रोटी या पराठे जैसी परत का अहसास दे सकती है। मलाई का करें कई तरह से उपयोग इस मलाई से घर पर शुद्ध देसी घी और मक्खन तैयार किया जा सकता है। इसके अलावा इसे पराठों पर लगाकर खाया जा सकता है या फिर कई मिठाइयों और स्वादिष्ट व्यंजनों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

हर वॉश के बाद चमकेंगे बाल, दही और चावल का यह आसान हेयर मास्क करेगा कमाल

नई दिल्ली ।आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बालों की देखभाल करना आसान नहीं रह गया है। बढ़ता प्रदूषण धूल मिट्टी अनियमित खानपान और बार-बार हेयर स्टाइलिंग टूल्स का इस्तेमाल बालों की सेहत पर बुरा असर डालता है। इसका नतीजा यह होता है कि बाल धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक चमक खोने लगते हैं और रूखे बेजान व कमजोर नजर आने लगते हैं। ऐसे में लोग महंगे हेयर ट्रीटमेंट और केमिकल युक्त प्रोडक्ट्स का सहारा लेते हैं लेकिन कई बार घरेलू नुस्खे भी शानदार परिणाम दे सकते हैं। दही और चावल से तैयार किया गया हेयर मास्क ऐसा ही एक आसान और असरदार घरेलू उपाय है जो बालों को गहराई से पोषण देने का काम करता है। यह मास्क बालों में नमी बनाए रखने के साथ उन्हें मुलायम चमकदार और मजबूत बनाने में मदद करता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे तैयार करने के लिए किसी महंगे प्रोडक्ट की जरूरत नहीं होती और घर में मौजूद सामान्य सामग्री से इसे आसानी से बनाया जा सकता है। दही को बालों के लिए प्राकृतिक कंडीशनर माना जाता है। इसमें मौजूद प्रोटीन कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व बालों की जड़ों को मजबूती प्रदान करते हैं। दही स्कैल्प को हाइड्रेट रखने में मदद करता है और रूखेपन को कम करता है। नियमित रूप से दही का उपयोग करने से बाल अधिक मुलायम और स्वस्थ दिखाई देते हैं। वहीं चावल भी बालों की सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है। चावल में मौजूद पोषक तत्व बालों की बनावट सुधारने और उन्हें मजबूत बनाने में सहायक होते हैं। चावल का पेस्ट बालों पर एक हल्की परत बनाता है जिससे बाल कम उलझते हैं और उनमें प्राकृतिक चमक बढ़ती है। इस हेयर मास्क को बनाने के लिए एक कटोरी उबले हुए चावल आधी कटोरी दही दो चम्मच एलोवेरा जेल और एक चम्मच नारियल तेल की आवश्यकता होगी। इन सभी सामग्रियों को मिक्सर में डालकर अच्छी तरह पीस लें और एक मुलायम पेस्ट तैयार कर लें। मास्क लगाने से पहले बालों को अच्छी तरह सुलझा लें। इसके बाद तैयार पेस्ट को बालों की जड़ों से लेकर सिरों तक समान रूप से लगाएं। ध्यान रखें कि मास्क पूरे बालों पर अच्छी तरह फैल जाए। अब बालों को हल्के से बांध लें और लगभग 40 से 45 मिनट तक इसे लगा रहने दें। तय समय के बाद सामान्य पानी से बाल धो लें और फिर हल्के शैंपू का इस्तेमाल करें। इस मास्क के नियमित उपयोग से बालों का रूखापन कम हो सकता है। यह बालों को मुलायम बनाने के साथ उनकी प्राकृतिक चमक बढ़ाने में मदद करता है। कमजोर और टूटते बालों को पोषण मिल सकता है तथा उलझने की समस्या भी कम हो सकती है। बाल अधिक स्मूद और मैनेजेबल महसूस होते हैं। हालांकि इस मास्क का इस्तेमाल सप्ताह में एक या दो बार से अधिक नहीं करना चाहिए। यदि स्कैल्प पर किसी प्रकार की एलर्जी संक्रमण या अन्य समस्या है तो पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहेगा। साथ ही बाल धोते समय बहुत गर्म पानी का उपयोग करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे बालों का रूखापन बढ़ सकता है।

कचरे से कमाई का नया तरीका 20 दिन में तैयार करें घर पर नेचुरल काला सोना खाद

नई दिल्ली । घर के किचन से निकलने वाला कचरा अक्सर लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं, लेकिन यही कचरा सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो पौधों के लिए सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक खाद बन सकता है, जिसे गार्डनिंग की दुनिया में ‘काला सोना’ कहा जाता है। आज के समय में जब बाजार की महंगी खाद हर किसी के लिए आसान नहीं है, ऐसे में घर पर ही ऑर्गेनिक खाद बनाना एक किफायती और पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है। गार्डनिंग एक्सपर्ट जोड़ी अन्नू और वरुण ने एक ऐसा सरल तरीका बताया है, जिससे केवल 20 दिनों में किचन वेस्ट पूरी तरह से पौधों के लिए उपयोगी खाद में बदल सकता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत सही कंटेनर चुनने से होती है। प्लास्टिक के बजाय मिट्टी का गमला या वेंटिलेशन वाला कंटेनर सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि इसमें हवा का संचार बेहतर होता है। नीचे ड्रेनेज होल होना जरूरी है ताकि अतिरिक्त नमी बाहर निकल सके। गमले को सीधे जमीन पर न रखकर किसी स्टैंड पर रखने से भी एयर फ्लो बना रहता है और बदबू या कीड़ों की समस्या कम होती है। इसके बाद किचन से निकलने वाले गीले कचरे का सही चयन जरूरी है। इसमें फलों के छिलके, सब्जियों के अवशेष, चाय की पत्ती और सूखी पत्तियां शामिल की जा सकती हैं। लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि पका हुआ खाना, तेल, घी, मांस, डेयरी उत्पाद या हड्डियां बिल्कुल नहीं डालनी चाहिए क्योंकि इससे सड़न और फंगस की समस्या बढ़ सकती है। अन्नू और वरुण के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया का सबसे खास हिस्सा है एक विशेष कंपोस्टिंग पाउडर का इस्तेमाल। हर बार जब भी कचरा डाला जाए, उस पर केवल एक छोटा चम्मच पाउडर छिड़कना होता है। इसमें मौजूद अच्छे बैक्टीरिया कचरे को तेजी से तोड़कर उसे खाद में बदलने में मदद करते हैं और बदबू को भी नियंत्रित रखते हैं। कंपोस्टिंग में ऑक्सीजन की भूमिका बहुत अहम होती है। इसलिए हर 3 से 4 दिन में कचरे को हल्का-हल्का मिलाना जरूरी है ताकि हवा सभी हिस्सों तक पहुंच सके। यह प्रक्रिया नमी और तापमान को संतुलित रखती है और खाद बनने की गति को तेज कर देती है। सामान्य तौर पर खाद बनने में महीनों लग सकते हैं, लेकिन इस आसान तकनीक से लगभग 20 दिनों में ही गीला कचरा गहरे भूरे रंग की सूखी, खुशबूदार और पोषक तत्वों से भरपूर ऑर्गेनिक खाद में बदल जाता है। यह घर की बनी खाद पौधों के लिए किसी प्राकृतिक अमृत से कम नहीं है। इसमें मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, जड़ों को मजबूत बनाते हैं और पौधों की ग्रोथ को तेजी से बढ़ाते हैं। इस तरह यह तरीका न केवल आपके पौधों को स्वस्थ बनाता है बल्कि कचरे के सही उपयोग से पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  घर के किचन से निकलने वाला कचरा अक्सर लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं, लेकिन यही कचरा सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो पौधों के लिए सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक खाद बन सकता है, जिसे गार्डनिंग की दुनिया में ‘काला सोना’ कहा जाता है। आज के समय में जब बाजार की महंगी खाद हर किसी के लिए आसान नहीं है, ऐसे में घर पर ही ऑर्गेनिक खाद बनाना एक किफायती और पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है। गार्डनिंग एक्सपर्ट जोड़ी अन्नू और वरुण ने एक ऐसा सरल तरीका बताया है, जिससे केवल 20 दिनों में किचन वेस्ट पूरी तरह से पौधों के लिए उपयोगी खाद में बदल सकता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत सही कंटेनर चुनने से होती है। प्लास्टिक के बजाय मिट्टी का गमला या वेंटिलेशन वाला कंटेनर सबसे अच्छा माना जाता है क्योंकि इसमें हवा का संचार बेहतर होता है। नीचे ड्रेनेज होल होना जरूरी है ताकि अतिरिक्त नमी बाहर निकल सके। गमले को सीधे जमीन पर न रखकर किसी स्टैंड पर रखने से भी एयर फ्लो बना रहता है और बदबू या कीड़ों की समस्या कम होती है। इसके बाद किचन से निकलने वाले गीले कचरे का सही चयन जरूरी है। इसमें फलों के छिलके, सब्जियों के अवशेष, चाय की पत्ती और सूखी पत्तियां शामिल की जा सकती हैं। लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि पका हुआ खाना, तेल, घी, मांस, डेयरी उत्पाद या हड्डियां बिल्कुल नहीं डालनी चाहिए क्योंकि इससे सड़न और फंगस की समस्या बढ़ सकती है। अन्नू और वरुण के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया का सबसे खास हिस्सा है एक विशेष कंपोस्टिंग पाउडर का इस्तेमाल। हर बार जब भी कचरा डाला जाए, उस पर केवल एक छोटा चम्मच पाउडर छिड़कना होता है। इसमें मौजूद अच्छे बैक्टीरिया कचरे को तेजी से तोड़कर उसे खाद में बदलने में मदद करते हैं और बदबू को भी नियंत्रित रखते हैं। कंपोस्टिंग में ऑक्सीजन की भूमिका बहुत अहम होती है। इसलिए हर 3 से 4 दिन में कचरे को हल्का-हल्का मिलाना जरूरी है ताकि हवा सभी हिस्सों तक पहुंच सके। यह प्रक्रिया नमी और तापमान को संतुलित रखती है और खाद बनने की गति को तेज कर देती है। सामान्य तौर पर खाद बनने में महीनों लग सकते हैं, लेकिन इस आसान तकनीक से लगभग 20 दिनों में ही गीला कचरा गहरे भूरे रंग की सूखी, खुशबूदार और पोषक तत्वों से भरपूर ऑर्गेनिक खाद में बदल जाता है। यह घर की बनी खाद पौधों के लिए किसी प्राकृतिक अमृत से कम नहीं है। इसमें मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, जड़ों को मजबूत बनाते हैं और पौधों की ग्रोथ को तेजी से बढ़ाते हैं। इस तरह यह तरीका न केवल आपके पौधों को स्वस्थ बनाता है बल्कि कचरे के सही उपयोग से पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान

नई दिल्ली। बच्चों में होने वाली सबसे आम लेकिन बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है दस्त, जिसे चिकित्सा भाषा में Diarrhea कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है, यदि समय पर ध्यान न दिया जाए। विशेषकर छोटे बच्चों में दस्त के कारण शरीर में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की तेजी से कमी हो जाती है, जिससे निर्जलीकरण (Dehydration), कमजोरी और कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नेशनल हेल्थ मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार National Health Mission लगातार लोगों को जागरूक कर रहा है कि बच्चों में दस्त को हल्के में लेना गंभीर भूल साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और तुरंत उपचार ही बच्चे की जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि दस्त से बचाव के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है शिशु को शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध देना। स्तनपान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है और कई संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह प्राकृतिक रूप से बच्चे के शरीर को मजबूत आधार देता है। दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है स्वच्छता का पालन। गंदगी और अस्वच्छ वातावरण दस्त फैलाने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। इसलिए बच्चों के आसपास साफ-सफाई रखना, हाथों को नियमित धोना और सुरक्षित पेयजल का उपयोग करना बेहद जरूरी माना गया है। इसके साथ ही रोटावायरस और खसरा जैसी बीमारियों के खिलाफ समय पर टीकाकरण भी बच्चों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। तीसरा और सबसे जरूरी कदम है—यदि बच्चे को दस्त हो जाए तो तुरंत उपचार शुरू करना। डॉक्टरों के अनुसार हर बार दस्त होने पर बच्चे को Oral Rehydration Solution (ओआरएस) देना चाहिए ताकि शरीर में पानी और नमक की कमी पूरी हो सके। इसके साथ ही चिकित्सक की सलाह पर जिंक की गोली 14 दिनों तक देना भी लाभकारी माना जाता है, जो दस्त की अवधि और गंभीरता को कम करने में मदद करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि माता-पिता समय पर इन उपायों को अपनाएं तो बच्चों को गंभीर स्थिति में पहुंचने से बचाया जा सकता है। दस्त के दौरान सबसे बड़ी चुनौती शरीर में तेजी से होने वाला पानी का नुकसान होता है, जिसे समय रहते रोका जाए तो स्थिति सामान्य की जा सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि बच्चों को हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक आहार दिया जाए तथा किसी भी तरह की लापरवाही न बरती जाए। दस्त के लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना सबसे सुरक्षित विकल्प है। कुल मिलाकर, जागरूकता, स्वच्छता और सही उपचार ही बच्चों को इस खतरनाक लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी से सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।

हार्ट हेल्थ के लिए योगासन: तनाव घटाएं, दिल को बनाएं मजबूत और जीवन को रखें स्वस्थ

नई दिल्ली । आज की तेज रफ्तार जिंदगी में लोग सफलता, कमाई और उपलब्धियों के पीछे भागते हुए अपनी सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। खासकर दिल की सेहत, जो शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, उस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ दिल ही लंबी और खुशहाल जिंदगी की असली नींव है। लगातार तनाव, अनियमित खान-पान और खराब लाइफस्टाइल हृदय रोगों के खतरे को तेजी से बढ़ा रहे हैं। ऐसे में योगासन और प्राणायाम दिल को सुरक्षित रखने का एक प्राकृतिक और प्रभावी उपाय बनकर सामने आए हैं। योग और ध्यान से मिलता है दिल को प्राकृतिक संरक्षणआयुष विशेषज्ञों के अनुसार नियमित योग और ध्यान न केवल शरीर को स्वस्थ रखते हैं बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। योगाभ्यास से तनाव कम होता है, मन स्थिर रहता है और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है। इसका सीधा असर हृदय स्वास्थ्य पर पड़ता है। योग करने से रक्त संचार बेहतर होता है, कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रित रहता है और दिल की मांसपेशियां मजबूत बनती हैं। यही कारण है कि योग को हार्ट हेल्थ के लिए बेहद फायदेमंद माना गया है। दिल के लिए लाभकारी प्रमुख योगासविशेषज्ञों ने कुछ ऐसे योगासन बताए हैं जो दिल की सेहत को मजबूत बनाने में विशेष भूमिका निभाते हैं। भुजंगासन, शवासन, अनुलोम-विलोम और सूर्य नमस्कार जैसे योगासन नियमित रूप से करने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और तनाव कम होता है। भुजंगासन रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाता है और रक्त प्रवाह को सुधारता है।शवासन मानसिक तनाव को दूर कर शरीर को गहरी शांति प्रदान करता है।अनुलोम-विलोम प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाकर मन को शांत करता है और दिल पर दबाव कम करता है।सूर्य नमस्कार पूरे शरीर का संतुलित व्यायाम है, जो ऊर्जा और लचीलापन बढ़ाता है। प्राणायाम और ध्यान से कम होता है तनावतनाव को दिल की बीमारियों का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। ऐसे में गहरी सांस लेने वाले व्यायाम जैसे प्राणायाम मानसिक दबाव को कम करने में बेहद प्रभावी हैं। नियमित ध्यान और प्राणायाम से हार्ट रेट स्थिर रहता है और शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है, जिससे दिल स्वस्थ रहता है। जीवनशैली में छोटे बदलाव ला सकते हैं बड़ा सुधारविशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोजाना 30 से 45 मिनट योग करना दिल की सेहत के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही संतुलित आहार लेना, पर्याप्त नींद लेना और तनावपूर्ण विचारों से दूर रहना भी आवश्यक है। तैलीय और जंक फूड से दूरी बनाकर हरी सब्जियों और फल का सेवन करना हृदय रोगों के खतरे को कम करता है। योगासन और प्राणायाम केवल व्यायाम नहीं बल्कि एक स्वस्थ जीवन का आधार हैं। नियमित अभ्यास से न केवल दिल मजबूत बनता है बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी मिलती है। यदि योग को जीवन का हिस्सा बना लिया जाए तो कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है और जीवन को अधिक स्वस्थ और संतुलित बनाया जा सकता है।

बेसन और गुलाब जल से पाएं पार्लर जैसा निखार, घर पर ही चमकेगी त्वचा

नई दिल्ली। बदलती जीवनशैली और बढ़ते प्रदूषण के बीच त्वचा की देखभाल एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में लोग प्राकृतिक और सुरक्षित उपायों की ओर फिर से लौट रहे हैं। इन्हीं में से एक बेहद लोकप्रिय और असरदार घरेलू नुस्खा है बेसन और गुलाब जल का फेसपैक, जो त्वचा को बिना किसी साइड इफेक्ट के निखार देने में मदद करता है। घरेलू सौंदर्य उपायों में बेसन को सदियों से प्राकृतिक क्लींजर के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह त्वचा की गहराई से सफाई करने, अतिरिक्त तेल हटाने और डेड स्किन सेल्स को निकालने में मदद करता है। वहीं गुलाब जल त्वचा को ठंडक देने, पोर्स को टाइट करने और चेहरे पर प्राकृतिक नमी बनाए रखने का काम करता है। इन दोनों का संयोजन त्वचा के लिए एक बेहतरीन टॉनिक की तरह काम करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह घरेलू फेसपैक न केवल चेहरे की गंदगी हटाता है, बल्कि स्किन टोन को भी बेहतर बनाता है। नियमित उपयोग से त्वचा पर प्राकृतिक चमक आती है और चेहरे पर मौजूद दाग-धब्बे धीरे-धीरे हल्के होने लगते हैं। खास बात यह है कि यह उपाय हर प्रकार की त्वचा—चाहे ऑयली हो, ड्राई हो या कॉम्बिनेशन—के लिए सुरक्षित माना जाता है। फेसपैक बनाने के लिए दो चम्मच बेसन में आवश्यकतानुसार गुलाब जल मिलाकर एक स्मूद पेस्ट तैयार किया जाता है। इसे चेहरे और गर्दन पर समान रूप से लगाकर 15 से 20 मिनट तक सूखने दिया जाता है। इसके बाद हल्के हाथों से पानी की मदद से चेहरा साफ कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया सप्ताह में दो से तीन बार दोहराने से बेहतर परिणाम मिलते हैं। बेसन और गुलाब जल का यह प्राकृतिक कॉम्बिनेशन त्वचा की गहराई से सफाई करने के साथ-साथ उसे मॉइस्चराइज भी करता है। यह खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो मुंहासों, अतिरिक्त तेल या सुस्त त्वचा की समस्या से परेशान रहते हैं। इसके नियमित उपयोग से त्वचा मुलायम, साफ और अधिक आकर्षक दिखने लगती है। आज के समय में जब केमिकल युक्त ब्यूटी प्रोडक्ट्स त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं, ऐसे में यह घरेलू उपाय एक सुरक्षित और किफायती विकल्प बनकर उभरता है। न तो इसमें अधिक खर्च होता है और न ही किसी तरह के साइड इफेक्ट का डर रहता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी प्राकृतिक फेसपैक का उपयोग करने से पहले त्वचा की संवेदनशीलता को जरूर जांच लेना चाहिए। इसके अलावा पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना और नियमित सफाई भी त्वचा की सेहत के लिए जरूरी है। कुल मिलाकर, बेसन और गुलाब जल का यह सरल उपाय आज भी प्राकृतिक स्किनकेयर का सबसे भरोसेमंद और असरदार तरीका माना जाता है, जो घर बैठे ही चेहरे को निखारने में मदद करता है।

मौसम का दोहरा वार: धूप और बारिश से ऐसे करें बचाव, जानें जरूरी सावधानियां

नई दिल्ली । इन दिनों मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कभी तेज धूप शरीर को झुलसा रही है तो कभी अचानक बारिश लोगों को भीगा रही है। इस दोहरे मौसम का सबसे ज्यादा असर बच्चों, बुजुर्गों और कामकाजी लोगों पर पड़ रहा है। दिन के समय चिलचिलाती धूप जहां लू और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ा रही है, वहीं बारिश के बाद बढ़ी नमी सर्दी-जुकाम और वायरल संक्रमण को जन्म दे रही है। तेज धूप में कैसे रखें खुद का ध्यानधूप से बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच अनावश्यक बाहर निकलने से बचा जाए। यदि बाहर जाना जरूरी हो तो सिर को टोपी, छाता या गमछे से ढककर रखें। हल्के और ढीले सूती कपड़े पहनें ताकि शरीर में हवा का प्रवाह बना रहे। पानी का अधिक सेवन करें और शरीर को हाइड्रेटेड रखें। नींबू पानी, नारियल पानी और ओआरएस का सेवन लू से बचाव में मदद करता है। बारिश में संक्रमण से बचाव जरूरीबारिश में भीगने से सर्दी, खांसी और बुखार जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ सकती हैं। ऐसे में कोशिश करें कि बारिश में भीगने से बचें। यदि भीग जाएं तो तुरंत सूखे कपड़े पहनें और शरीर को अच्छे से सुखाएं। गीले जूते और कपड़े लंबे समय तक पहनने से त्वचा संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें और बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचें। खान-पान में रखें विशेष सावधानीमौसम बदलने के दौरान खान-पान का सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ता है। ऐसे समय में तला-भुना और भारी भोजन कम करें। ताजे फल, सब्जियां और हल्का भोजन शरीर के लिए बेहतर होता है। स्ट्रीट फूड से दूरी बनाए रखें क्योंकि बारिश में संक्रमण का खतरा अधिक होता है। बच्चों और बुजुर्गों की विशेष देखभालबच्चों और बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, इसलिए उन्हें विशेष देखभाल की जरूरत होती है। बच्चों को धूप और बारिश दोनों से बचाकर रखें और बुजुर्गों को समय-समय पर पानी और हल्का भोजन देते रहें। लापरवाही बन सकती है बड़ी वजहमौसम की इस अस्थिरता को हल्के में लेना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। थोड़ी सी सावधानी आपको बड़ी बीमारियों से बचा सकती है। इसलिए मौसम चाहे धूप वाला हो या बारिश वाला, सतर्क रहना ही सबसे अच्छा उपाय है। धूप और बारिश दोनों ही मौसम अपने साथ अलग-अलग खतरे लेकर आते हैं। सही सावधानी, संतुलित खान-पान और सतर्क जीवनशैली अपनाकर आप इन दोनों मौसमों के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रह सकते हैं।