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मां जगदम्बा की पूजा से लेकर शरीर की देखभाल तक, दूब घास का अद्भुत उपयोग

नई दिल्ली । घास का महत्व केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य और शरीर की देखभाल में भी अहम भूमिका निभाती है। विशेष रूप से दूब घास, जिसे आयुर्वेद में ‘अमृता’ की उपाधि दी गई है, शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी मानी जाती है। नवरात्रि में मां जगदम्बा की पूजा में दूब घास का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि बिना दूब के पूजन अधूरा माना जाता है। घर में कन्या पूजन के समय भी दूब घास का इस्तेमाल पैर छूने और सम्मान के लिए किया जाता है। धार्मिक महत्व के अलावा दूब घास के गुणों को आयुर्वेद में कई तरह से दर्शाया गया है। यह कफ और वात को संतुलित करने वाली औषधि मानी जाती है। यदि शरीर में वात या कफ असंतुलित हैं तो दूब घास का उचित सेवन इन दोषों को संतुलित करने में मदद करता है। लेकिन इसके सही उपयोग से पहले इसके आंतरिक और बाहरी गुणों को जानना बेहद आवश्यक है। बाहरी उपयोग: दूब घास में रक्त को रोकने की क्षमता होती है। चोट लग जाने पर यदि रक्त नहीं रुक रहा है या पुराने घाव में बार-बार खून आता है, तो दूब का लेप किया जा सकता है। यह घाव को भरने और संक्रमण से बचाने में भी मदद करता है। गर्मियों में नाक से खून आना या सिरदर्द जैसी समस्याओं में दूब के रस को नाक में डालना आराम देता है। इसके अलावा, मुल्तानी मिट्टी के साथ मिलाकर सूंघने से भी राहत मिलती है। यदि गर्मियों में त्वचा जलने लगती है, तो दूब का लेप त्वचा को ठंडक और आराम प्रदान करता है।आंतरिक उपयोग: दूब घास का आंतरिक सेवन पेट संबंधी परेशानियों और मासिक धर्म के दर्द में लाभकारी होता है। इसके लिए दूब का रस लेने से पहले चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है। आयुर्वेद में इसे पाचन सुधारने और शरीर को पोषण देने वाला उपाय माना गया है। सीमित मात्रा में इसका नियमित सेवन शरीर को ऊर्जा, मजबूती और आंतरिक शांति प्रदान करता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि दूब घास का अधिक सेवन या गलत तरीके से इस्तेमाल करने से प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकते हैं। इसलिए बाहरी या आंतरिक उपयोग में आयुर्वेदिक और चिकित्सकीय मार्गदर्शन को अपनाना आवश्यक है। इस प्रकार दूब घास का महत्व सिर्फ धार्मिक पूजा में ही नहीं, बल्कि शरीर और स्वास्थ्य के लिए भी अद्वितीय है। बाहरी लेप के रूप में इसका प्रयोग चोट, जलन और रक्तस्राव में राहत देता है, वहीं आंतरिक रूप में इसका सेवन पेट, मासिक धर्म और दोष संतुलन के लिए उपयोगी है। नवरात्रि या किसी भी दिन इसे सही तरीके से अपनाकर व्यक्ति स्वास्थ्य और आध्यात्मिक लाभ दोनों प्राप्त कर सकता है।

LOTUS FLOWER BENEFITS : केवल बाहरी सौंदर्य ही नहीं, भीतर स्थिरता और संतुलन लाने में मदद करता है कमल का फूल

  LOTUS FLOWER BENEFITS : नई दिल्ली कमल को पूज्यनीय फूलों में गिना जाता है क्योंकि यह महालक्ष्मी को बहुत प्रिय है। मां लक्ष्मी की आराधना कमल के फूल से की जाती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि कमल का फूल औधषीय गुणों से भरपूर है। फूलों में सबसे सुंदर दिखने वाला कमल शुद्धता, शीतलता और संतुलन का प्रतीक है। आयुर्वेद में कमल को शीतल, मन को शांत और त्वचा और पेट को शांति देने वाला फूल माना जाता है। आयुर्वेद के मुताबिक कमल केवल बाहरी सौंदर्य नहीं बढ़ाता बल्कि भीतर की स्थिरता और संतुलन का भी स्मरण कराता है। कीचड़ में जन्म लेने के बाद भी कमल में कई औषधीय गुण विद्यमान होते हैं, जो इसे बाकी सुंदर फूलों से अलग बनाते हैं। कमल पित्त को संतुलित करता है और शरीर में रक्त का संचार को भी ठीक करता है, जिससे हृदय पर पड़ने वाला दबाव कम होता है। गर्मियों में पाचन की गड़बड़ी और ज्यादा तेलीय और तीखा खाने की वजह से पेट से जुड़े समस्याओं परेशान करने लगती है। गर्मियों में अतिसार की परेशानी आम है। ऐसे में कमल के पत्तों का ताजा रस पेट को ठंडक देकर अतिसार को रोकता है। यह बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए लाभकारी है। बवासीर की परेशानी में भी कमल का उपयोग लाभकारी माना गया है। आयुर्वेद में कमल के पत्तों का चूर्ण या कंद के चूर्ण को ठंडे दूध में मिलाकर दिन में दो बार लेना चाहिए। इससे पेट में शीतलता बनी रहती है और बवासीर की वजह से होने वाला मल से रक्त का रिसाव भी कम हो जाता है। हालांकि उसका इस्तेमाल शुरुआती स्टेज में ही करें। गंभीर लक्षण होने पर चिकित्सक के पास जरूर जाएं। गर्मियों में तापमान बढ़ने की वजह से उच्च रक्तचाप की परेशानी आम है। इसके लिए कमल के फूल से बनी औषधि बाजार में आसानी से मिल जाती है। औषधि के साथ (चिकित्सक की सलाह पर) दूध का सेवन भोजन से पहले करें। औषधि का सेवन बिना चिकित्सक की सलाह के न करें। गर्मियों में यूटीआई और जलन की समस्या सबसे ज्यादा देखी जाती है। दूषित पानी पीने या फिर कम पानी पीने की वजह से यूटीआई की परेशानी होती है। ऐसे में गुलकंद और दूध का सेवन यूटीआई में होने वाली जलन को कम करने में मदद करता है।

रोज ट्रैवल के दौरान कैसे रखें स्किन का ध्यान? अपनाएं ये ट्रिक

नई दिल्ली ऑफिस के दौरान महिलाओं को अक्सर घर से बाहर जाना ही पड़ता है। ऐसे में सबसे पहले यह ख्याल आता है कि गर्मी की शुरुआत में ही वह अपनी स्क्रीन पर ध्यान कैसे देंगी।धूप, धूल और पॉल्यूशन की वजह का बुरा असर स्किन पर पड़ता है। यही वजह है कि आज के समय में कम उम्र में ही स्किन में डलनेस, ऑयल, एक्ने यहां तक कि एजिंग के साइन भी नजर आने लगते हैं। लेकिन आपको डरने की जरूरत नहीं है बस आपको इस ट्रिक को अपनाने की जरूरत है। इस प्रकार रखें स्क्रीन का ध्यानकई बार देखा जाता है कि हम अपनी स्कीम में निखार लाने के चक्कर में कई बार प्रोडक्ट भी बदलते रहते हैं ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए बार-बार अलग-अलग तरीके का प्रोडक्ट उसे करने से भी आपकी स्क्रीन डैमेज हो जाती है। क्योंकि कभी वह प्रोडक्ट आपको शूट करते हैं और कभी नहीं। इसलिए आपको घर पर ही कुछ खास पेस्ट और उबटन बनाकर स्क्रीन पर अप्लाई करना चाहिए। रूखी व बेजान स्किनजब आप ट्रैवल करते हैं तो इस दौरान एसी, हीट व पॉल्यूशन की वजह से स्किन रूखी व बेजान हो जाती है। इसलिए आपको घर आने के बाद बेसन हल्दी दही शहद मिलाकर एक पेस्ट तैयार कर लेना चाहिए और इसको हफ्ते में तीन-चार दिन अपने स्क्रीन पर और चेहरे पर अप्लाई करना चाहिए फिर इसे धूल देना चाहिए ऐसा करने से आपकी स्किन में रूखापन चला जाएगा और त्वचा मुलायम रहेगी और निखार भी दिखेगा। स्किन प्रोटेक्शनअगर आप रोज ट्रैवल करती हैं तो स्किन प्रोटेक्शन के लिए सनस्क्रीन जरूर लगाएं। यह यूवी किरणें और पॉल्यूशन से स्किन को प्रोटेक्ट करने में मदद करता है। इसके साथ ही आप चाहें तो रोजाना रात में एक बार अपने चेहरे पर एलोवेरा पेस्ट जरूर लगाएं। इसे आप घर पर ही बना सकती हैं। एलोवेरा को एक बॉल में निकाल कर रोजाना अप्लाई करें इससे आपके चेहरे की रंगत हमेशा बनी रहेगी।

Travel Tips: बिना देरी के निकल जाएं इन जगहों पर, सुंदर हरा -भरा दिखेगा नजारा

नई दिल्ली  अगर आप कई दिनों से घूमने की इच्छा रख रहे हैं तो यह समय आपके लिए बिल्कुल सही है। इस समय मार्च के महीने में ना तो ठंडी लगेगी और ना तो गर्मी। यह मौसम घूमने के लिए काफी अच्छा माना जाता है। तो अगर आपको घूमने की जगह समझ नहीं आ रही है तो चलिए आपके लिए हम ऐसे कई जगहों के बारे में पूरी जानकारी लेकर आए हैं। मनालीइस समय मनाली का मौसम काफी सुनहरा है। यहां पर अभी भी काफी तेजी से बर्फबारी हो रही है तो अगर आपको मार्च और अप्रैल के महीने में भी बर्फबारी का आनंद उठाना है तो आप मनाली की तरह रख कर सकते हैं। मनाली में आपको कई ऐसी जगह मिल जाएगी जहां पर आप काफी अच्छी एक्टिविटी भी कर सकेंगे। इसके साथ ही वहां के स्ट्रीट फूड और वहां के सुंदर-सुंदर नजारे आप अपने कमरे में रिकॉर्ड कर सकते हैं और अच्छी यादें बना सकते हैं। शिमलाइस समय मौसम काफी अच्छा है हल्की-हल्की बारिश भी हो रही है तो ऐसे में आपको शिमला जरूर जाना चाहिए।अगर आपको पहाड़ों की ठंडी हवा और हरियाली से प्यार है आप ह‍िमाचल का रुख कर सकते हैं। इन हिल स्टेशन पर जाना आपके लिए स्वर्ग से कम नहीं होगा। अप्रैल में यहां का मौसम काफी रोमांट‍िक होता है। हरी-भरी वादियां आपको मंत्रमुग्‍ध कर सकती हैं। आप यहां कई तरह के एडवेंचर स्‍पोर्ट्स में भी ह‍िस्‍सा ले सकते हैं। मेघायलमेघालय घूमने का प्‍लान है तो मार्च और अप्रैल का महीना बेस्ट माना जाता है। इस दाैरान यहां न बहुत ज्यादा सर्दी होती है और न ही गर्मी। एडवेंचर और नेचर लवर्स के लिए तो ये जगह जन्नत से कम नहीं है। हर थोड़ी दूर पर यहां आपको वाटरफॉल्स देखने को म‍िल जाएंगे। हालांकि कुछ वाटरफॉल्स को देखने के लिए आपको लंबी ट्रैकिंग भी करनी पड़ सकती है। आपको वहां पहुंचकर अलग ही नजारा देखने को मिलेगा।

भूटान का पारो फेस्टिवल संस्कृति आस्था और रंगों का अद्भुत उत्सव..

नई दिल्ली:  भूटान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहार लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं और सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। इन्हीं में से सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध उत्सव है पारो त्शेचू फेस्टिवल यह उत्सव हर साल वसंत ऋतु में मनाया जाता है, आमतौर पर अप्रैल के शुरुआती दिनों में। इस वर्ष यह फेस्टिवल 29 मार्च से 2 अप्रैल तक आयोजित किया जा रहा है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भूटान की आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रदर्शन है पारो त्शेचू के दौरान भिक्षु और स्थानीय लोग पारंपरिक मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं और बौद्ध मंत्रों का जाप करते हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यताओं और कहानियों को दर्शाता है इस उत्सव में लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में शामिल होते हैं, जिससे पूरा वातावरण जीवंत और आकर्षक बन जाता है। यहां होने वाले मुखौटा नृत्य प्राचीन बौद्ध कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं इस फेस्टिवल में गुरु पद्मसंभव की कहानियों को भी दर्शाया जाता है, जिन्होंने भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। माना जाता है कि उन्होंने भूटान के सम्राट को ठीक करने में मदद की थी और इसी से तिब्बती बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई पारो त्शेचू फेस्टिवल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भूटान की संस्कृति, आस्था और विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाला एक भव्य उत्सव है

रामनवमी 2026: प्रभु श्री राम से प्रेरित रंगोली से सजाएं घर

नई दिल्ली । रामनवमी के पावन अवसर पर घर को सजाना और धार्मिक रूप से महत्त्वपूर्ण प्रतीकों से सजावट करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसी अवसर पर रंगोली बनाना न केवल घर की खूबसूरती बढ़ाता है, बल्कि इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। 2026 में रामनवमी पर लोग पारंपरिक रंगोली से हटकर प्रभु श्री राम से जुड़ी थीम-बेस्ड रंगोली बनाने को अधिक पसंद कर रहे हैं। ऐसे रंगोली डिज़ाइन न केवल सुंदर दिखाई देते हैं, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करते हैं। सबसे सरल और प्रभावशाली डिजाइन के रूप में धनुष-बाण वाली रंगोली को अपनाया जा सकता है। इसके लिए लाल और पीले रंगों का उपयोग कर बड़े धनुष का आकार बनाएं और बीच में “जय श्री राम” लिखें। किनारों पर गेंदे के फूल सजाने से रंगोली को एक पेशेवर लुक मिलता है। यह डिजाइन बच्चों और बड़ों दोनों के लिए आसान और आकर्षक होता है। भगवान राम के आगमन के प्रतीक के रूप में चरण पादुका वाली रंगोली भी बहुत लोकप्रिय है। मुख्य द्वार पर छोटी-छोटी चरण पादुकाएं कुमकुम और सफेद चौक से बनाई जाती हैं और इनके चारों ओर फूलों की पंखुड़ियों का घेरा तैयार किया जाता है। यह डिज़ाइन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है। अगर आपको चित्र बनाना कठिन लगता है, तो नाम मंत्र वाली रंगोली एक बेहतरीन विकल्प है। गहरे नीले या केसरिया रंग के बेस पर सफेद रंग से “राम” या “जय श्री राम” लिखें। बिंदुओं की मदद से इसे सजाना बेहद आसान है। इस तरह की रंगोली केवल 5 मिनट में तैयार हो सकती है और घर के मुख्य द्वार को खूबसूरती से सजाती है। दीपक और कमल के फूल का संयोजन भी रामलला के स्वागत के लिए अत्यंत आकर्षक विकल्प है। कमल के फूल का डिजाइन बनाएं और उसके बीच में मिट्टी का दीपक जलाएं। यह डिजाइन सादगी और भव्यता का अद्भुत मिश्रण प्रस्तुत करता है। यदि सटीक लाइन खींचना मुश्किल हो, तो चूड़ी और चम्मच का उपयोग करके गोल घेरे और उभरे हुए डिजाइन तैयार किए जा सकते हैं। रंगों के साथ-साथ ताजे गेंदे और गुलाब के फूलों का प्रयोग रंगोली को जीवंत और आकर्षक बनाता है। इन डिज़ाइनों से न केवल घर महक उठता है बल्कि आने वाले मेहमान और पड़ोसी भी आपकी रचनात्मकता की तारीफ किए बिना नहीं रह पाते। रंगोली बनाने का यह अनुभव धार्मिक, सौंदर्यात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से आनंददायक होता है। इस प्रकार, रामनवमी पर प्रभु श्री राम से प्रेरित रंगोली बनाना न केवल घर को सजाने का माध्यम है बल्कि यह श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी बनता है। चाहे धनुष-बाण हो, चरण पादुका, नाम मंत्र या दीपक-कमल का संयोजन, ये डिज़ाइन सभी उम्र के लोगों के लिए आसान और खूबसूरत विकल्प हैं। इस बार रामनवमी 2026 पर इन रंगोली डिज़ाइनों से घर को सजाएं और प्रभु श्री राम का स्वागत भव्य तरीके से करें।

गर्मियों में फटी एड़ियों और टैनिंग से राहत, घर पर करें आसान 15 मिनट पेडिक्योर

नई दिल्ली । गर्मियों में पैरों की देखभाल पर ध्यान न देने से फटी एड़ियां, टैनिंग और रूखापन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। दिनभर जूतों में बंद रहने, पसीने और धूल के कारण पैर प्रभावित होते हैं और फंगल इंफेक्शन, खुजली और बदबू जैसी परेशानियां घर करने लगती हैं। ऐसे में महंगे पार्लर की बजाय आप घर पर ही आसान और प्राकृतिक उपायों से पैरों को फ्रेश और बेबी सॉफ्ट बना सकते हैं। सबसे पहले बात करते हैं पैरों की सफाई और नमी की सही देखभाल की। नहाने के बाद अक्सर लोग शरीर तो पोंछ लेते हैं, लेकिन पैरों की उंगलियों के बीच के हिस्से गीले छोड़ देते हैं। यही नमी फंगल इंफेक्शन की असली जड़ बन जाती है। इसलिए पैरों को तौलिये से अच्छी तरह सुखाएं और अगर संभव हो तो थोड़ी देर उन्हें हवा या हल्की धूप दिखाएं। यह कदम पैरों को संक्रमण और बैक्टीरिया से बचाने में मदद करता है। फुटवियर का चयन भी बेहद महत्वपूर्ण है। गर्मियों में टाइट या सिंथेटिक जूते पहनने से बचें। ऐसे जूते चुनें जिनमें हवा का संचार आसानी से हो सके। कॉटन के मोज़े पहनना और समय-समय पर जूतों को धूप दिखाना पैरों की बदबू रोकने का सरल उपाय है। नीम का उपयोग आयुर्वेद में त्वचा की सुरक्षा के लिए सबसे प्रभावशाली माना गया है। गर्मियों में पैरों को फंगल इंफेक्शन और बैक्टीरिया से बचाने के लिए नहाने के पानी में नीम की पत्तियां डालें या नीम के तेल की 3-4 बूंदें मिलाएं। इसके एंटी-बैक्टीरियल गुण पैरों को साफ और स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। पैरों की मृत त्वचा हटाने के लिए किचन में उपलब्ध प्राकृतिक स्क्रब का उपयोग करें। इसके लिए थोड़ी सी शक्कर या चीनी में नारियल तेल मिलाकर पैरों की हल्की मालिश करें। यह सप्ताह में एक बार करें। यह न केवल डेड स्किन को हटाता है बल्कि नारियल तेल पैरों को मखमली कोमलता और पोषण भी देता है। इसके साथ ही रक्त संचार भी बेहतर होता है, जिससे पैरों की त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनी रहती है। इसके अलावा, फटी एड़ियों से राहत पाने के लिए पैरों को नियमित रूप से मॉइश्चराइज करना जरूरी है। रात को सोने से पहले नारियल या बादाम के तेल से एड़ियों की मालिश करें और कपड़े के सोक्स पहन लें। इससे पैरों की त्वचा नमी बनाए रखती है और टैनिंग कम होती है। नियमित सफाई, सही फुटवियर, नीम और नारियल आधारित प्राकृतिक उपाय अपनाकर आप गर्मियों में पैरों को स्वस्थ, सुंदर और फ्रेश रख सकते हैं। फटी एड़ियों, टैनिंग और खुजली जैसी परेशानियों से राहत पाने के लिए बस 15 मिनट का नियमित पेडिक्योर काफी है। इस गर्मी अपने पैरों को भी वही देखभाल दें जो आप अपने चेहरे को देते हैं और घर पर ही बेबी सॉफ्ट पैरों का अनुभव पाएं।

हफ्ते से ज्यादा खांसी है तो हो जाए सावधान टीबी का संकेत हो सकता है

नई दिल्ली:  टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस आज भी भारत में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। बदलते मौसम में खांसी होना आम बात है, लेकिन हर खांसी को हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। कई बार साधारण दिखने वाली खांसी किसी बड़ी बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकती है सामान्य खांसी आमतौर पर 5 से 7 दिनों में ठीक हो जाती है, जो सर्दी, वायरल इंफेक्शन या एलर्जी के कारण होती है। लेकिन अगर खांसी 2 से 3 हफ्ते से ज्यादा समय तक बनी रहती है और दवाओं से आराम नहीं मिलता, तो यह टीबी का संकेत हो सकता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है टीबी सिर्फ खांसी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह शरीर को अंदर से कमजोर कर देती है। इसके साथ कई अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे शाम के समय हल्का बुखार, रात में ज्यादा पसीना आना, बिना कारण वजन कम होना, लगातार थकान महसूस होना और सीने में दर्द टीबी के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है और दूसरों में भी फैल सकती है। इसलिए अगर खांसी के साथ ये लक्षण नजर आएं, तो देरी न करें और तुरंत जांच कराएं विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूकता और समय पर इलाज ही टीबी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। अगर शुरुआती लक्षणों को पहचान लिया जाए, तो इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है हर खांसी को नजरअंदाज न करें। अगर यह लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे चेतावनी संकेत मानकर तुरंत मेडिकल सलाह लेना ही समझदारी है

बाल झड़ने और डैंड्रफ की समस्या? गर्मियों में एलोवेरा बनेगा आपका उपाय

नई दिल्ली। गर्मियों का मौसम बालों और स्कैल्प के लिए कई चुनौतियां लेकर आता है। तेज धूप, पसीना और धूल के कारण बाल कमजोर पड़ने लगते हैं, झड़ने लगते हैं और स्कैल्प में खुजली व डैंड्रफ की समस्या आम हो जाती है। ऐसे समय में शैंपू-कंडीशनर से ज्यादा असरदार और प्राकृतिक उपाय के रूप में एलोवेरा को माना जाता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद के विशेषज्ञों के अनुसार, एलोवेरा आयुर्वेद का सबसे भरोसेमंद और प्राकृतिक विकल्प है। यह बालों और स्कैल्प की गहराई तक सफाई करता है, जड़ों को मजबूत बनाता है और बालों को सिरे तक स्वस्थ बनाए रखता है। एलोवेरा में मौजूद प्राकृतिक एंजाइम, विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स बालों के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। एलोवेरा स्कैल्प पर जमा अतिरिक्त तेल को हटाता है, जिससे तैलीय बालों की समस्या कम होती है। यह बालों की जड़ों को पोषण देता है, टूटने-झड़ने से बचाता है और बालों को रिपेयर करने में मदद करता है। इसके एंटी-फंगल गुण डैंड्रफ और अन्य फंगल इंफेक्शन को रोकते हैं। साथ ही यह खुजली को शांत करता है और गर्मियों में पसीने से होने वाली जलन और इरिटेशन से तुरंत राहत देता है। एलोवेरा से बालों की देखभाल करना बेहद आसान है। इसके लिए ताजा एलोवेरा का जेल निकालकर सीधे स्कैल्प पर लगाएं और 30-40 मिनट बाद हल्के शैंपू से धो लें। सप्ताह में 2-3 बार एलोवेरा जेल में नारियल तेल मिलाकर सिर की मालिश करने से बालों की जड़ों को अतिरिक्त पोषण मिलता है और बाल मजबूत होते हैं। इसके अलावा, एलोवेरा जेल को नींबू के रस के साथ मिलाकर लगाने से डैंड्रफ और तैलीयता कम होती है। बालों में एलोवेरा जेल को रातभर लगाकर सुबह धोने से बाल मुलायम, चमकदार और स्वस्थ बनते हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित रूप से एलोवेरा का उपयोग करने से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं, बालों का झड़ना कम होता है और स्कैल्प स्वस्थ रहता है। यह गर्मियों में केमिकल युक्त शैंपू के विकल्प के रूप में सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक तरीका है। एलोवेरा न केवल बालों को पोषण देता है बल्कि स्कैल्प को ठंडक और राहत भी प्रदान करता है। गर्मियों में एलोवेरा का उपयोग बालों की लंबी उम्र, उनकी मजबूती और प्राकृतिक चमक बनाए रखने के लिए अत्यंत प्रभावी है। इसे घर पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है और यह बालों की देखभाल को सरल, सुरक्षित और प्राकृतिक बनाता है। इस प्रकार, गर्मियों में बालों और स्कैल्प की पूरी देखभाल के लिए शैंपू-कंडीशनर की जगह एलोवेरा अपनाना न केवल फायदेमंद है बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी यह अत्यंत प्रभावशाली उपाय है।

अंकुरित अनाज: सही तरीका और सही व्यक्ति, नहीं तो हो सकता है नुकसान

नई दिल्ली । प्रोटीन और फाइबर शरीर के लिए ऊर्जा, ताकत और मांसपेशियों के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, रोजमर्रा के आहार में इनकी पर्याप्त मात्रा शामिल करना अक्सर मुश्किल होता है। ऐसे में लोग अंकुरित अनाज यानी स्प्राउट्स का सहारा लेते हैं, क्योंकि यह पोषण का एक प्राकृतिक और समृद्ध स्रोत माना जाता है। लेकिन आयुर्वेद और पोषण विशेषज्ञों के अनुसार अंकुरित आहार का सही सेवन और सही व्यक्ति के लिए ही लाभकारी होता है। अंकुरित अनाज कई तरह से शरीर को फायदा पहुंचाते हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स की पर्याप्त मात्रा होती है, जो शरीर की ऊर्जा बढ़ाने, मांसपेशियों को मजबूत करने और कोशिकाओं के निर्माण में सहायक होती है। लेकिन यदि इसे सही तरीके से नहीं लिया जाए तो यह पाचन संबंधी समस्याओं का कारण भी बन सकता है। आयुर्वेद के अनुसार अंकुरित अनाज पचने में थोड़ा भारी होता है और अधिक सेवन से वात दोष और गैस की समस्या बढ़ सकती है। इससे शरीर में रूखापन बढ़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि स्प्राउट्स को हमेशा हल्का पकाकर, घी या तेल के साथ और सीमित मात्रा में ही लिया जाए। ऐसा करने से यह शरीर को ताकत देने के साथ पाचन को भी संतुलित रखता है। विशेष रूप से जिन लोगों का पाचन मंद है और कब्ज की समस्या रहती है, उन्हें अंकुरित आहार से बचना चाहिए। पाचन मंद होने पर अंकुरित अनाज शरीर में ठीक से पच नहीं पाता और पोषण की जगह शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा हो सकते हैं। इसी कारण बच्चे और बुजुर्गों को भी अंकुरित अनाज देने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इन उम्र में पाचन सबसे कमजोर होता है। इसके अलावा वात प्रवृत्ति वाले लोग भी इस आहार का सेवन सीमित मात्रा में ही करें। आयुर्वेद में वात दोष को बढ़ाने वाले आहार से बचने की सलाह दी जाती है, और अंकुरित अनाज वात में वृद्धि कर सकता है। इसलिए इसे हल्का पकाकर, घी या तेल के साथ, और उचित मात्रा में लेना ही फायदेमंद होता है। अंकुरित अनाज का सेवन करते समय कुछ विशेष उपाय भी ध्यान में रखने चाहिए। सबसे पहले इसे कच्चा खाने से बचें। अंकुरित अनाज को हल्का उबालकर या घी/तेल में पकाकर ही खाना चाहिए। इसके अलावा अंकुरित अनाज को तुरंत ही सेवन करना चाहिए। ज्यादा लंबे समय तक अंकुरित रहने पर इसके पोषक तत्वों पर असर पड़ सकता है। इस प्रकार, अंकुरित अनाज का सेवन शरीर के लिए लाभकारी है, लेकिन केवल सही व्यक्ति और सही तरीके से ही। नियमित रूप से नियंत्रित मात्रा में और हल्का पकाकर सेवन करने से यह ऊर्जा, ताकत और पाचन दोनों में सुधार करता है। वहीं, गलत तरीके या अधिक मात्रा में लेने पर यह पाचन और वात दोष जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक दृष्टि से स्प्राउट्स को संतुलित, समय पर और विधिपूर्वक ही आहार में शामिल करना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।