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तनाव को कहें अलविदा बालकनी में लगाएं ये 7 पौधे और पाएं शुद्ध हवा व शांत मन

नई दिल्ली । योग दिवस केवल शरीर को लचीला बनाने का अभ्यास नहीं है बल्कि यह मन को शांत करने और जीवन में संतुलन लाने की एक गहरी प्रक्रिया है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग तनाव और चिंता से घिरे रहते हैं ऐसे में घर का वातावरण भी मानसिक शांति पर बड़ा असर डालता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर आपकी बालकनी को सही तरीके से सजाया जाए तो यह एक प्राकृतिक योग और ध्यान स्थल बन सकती है। खास बात यह है कि कुछ पौधे न केवल हवा को शुद्ध करते हैं बल्कि मानसिक तनाव को भी कम करने में सहायक होते हैं और पूरे वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं। स्नेक प्लांट एक ऐसा पौधा है जो कम देखभाल में भी आसानी से बढ़ता है। यह हवा से हानिकारक तत्वों को कम करने में मदद करता है और रात के समय भी वातावरण को हल्का और शुद्ध बनाए रखता है। इसे बालकनी के किसी कम रोशनी वाले कोने में रखा जा सकता है और बहुत कम पानी की जरूरत होती है। एरेका पाम बालकनी को हरा भरा और शांत वातावरण देने वाला पौधा है। इसकी पत्तियां वातावरण को ताजगी देती हैं और इसे देखने मात्र से मानसिक तनाव कम महसूस होता है। यह पौधा अच्छी रोशनी में बेहतर बढ़ता है और घर को प्राकृतिक सुंदरता प्रदान करता है। रोजमेरी और लैवेंडर जैसे सुगंधित पौधे मानसिक थकान को कम करने में बेहद प्रभावी माने जाते हैं। इनकी खुशबू मन को तुरंत शांत करती है और ध्यान लगाने में मदद करती है। यह पौधे धूप वाले स्थान पर अच्छे से विकसित होते हैं और बालकनी को एक सुगंधित ध्यान क्षेत्र में बदल देते हैं। चमेली का पौधा अपनी खुशबू से पूरे वातावरण को शांत और सकारात्मक बना देता है। इसकी महक तनाव को कम करने और मन को स्थिर करने में सहायक होती है। योग और ध्यान के समय इसकी उपस्थिति मानसिक एकाग्रता बढ़ाती है और वातावरण को अधिक सुकून भरा बनाती है। एलोवेरा एक बहुत ही आसान देखभाल वाला पौधा है जो हवा को शुद्ध करने के साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। इसे अधिक पानी की जरूरत नहीं होती और यह कम देखभाल में भी अच्छा बढ़ता है। गुलदाउदी रंगों से भरा ऐसा पौधा है जो देखने में ही मन को खुश कर देता है। इसके फूल मानसिक थकान को कम करने और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में मदद करते हैं। यह पौधा बालकनी को जीवंत और आकर्षक बनाता है। इन पौधों के साथ बालकनी को एक छोटे प्राकृतिक योग केंद्र में बदला जा सकता है जहां योग और ध्यान का अनुभव और भी गहरा हो जाता है। मिट्टी को छूना पौधों को पानी देना और उनकी देखभाल करना भी मानसिक शांति देने वाली एक प्राकृतिक थेरेपी की तरह काम करता है।

क्रिस्पी और चीजी पराठा चिली गार्लिक फ्लेवर, से भरपूर आसान रेसिपी

नई दिल्ली । सुबह के नाश्ते में अगर रोजाना के सादे पराठों से बोरियत हो गई है तो चिली चीज गार्लिक पराठा एक बेहतरीन और टेस्टी विकल्प हो सकता है। यह पराठा अपने तीखे स्वाद लहसुन की खुशबू और चीज के मेल से इतना स्वादिष्ट बनता है कि इसे बच्चे हों या बड़े सभी बहुत पसंद करते हैं। खासकर सुबह के समय इसे झटपट बनाकर परिवार के लिए एक खास ब्रेकफास्ट तैयार किया जा सकता है। इस पराठे को बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं का आटा लेकर उसमें नमक और थोड़ा सा घी मिलाकर अच्छे से गूंथ लें। पानी की मदद से नरम आटा तैयार करें और इसे दस से पंद्रह मिनट के लिए ढककर रख दें ताकि यह अच्छी तरह सेट हो जाए। इस बीच पराठे का स्वाद बढ़ाने के लिए दो अलग अलग मिश्रण तैयार किए जाते हैं। पहले मिश्रण में पिघला हुआ मक्खन बारीक कटा हुआ लहसुन और हरा धनिया मिलाया जाता है जिससे एक फ्लेवरफुल गार्लिक बटर तैयार होता है। दूसरे मिश्रण में कद्दूकस किया हुआ मोजेरेला चीज बारीक कटी हरी मिर्च चिली फ्लेक्स और हरा धनिया मिलाकर स्टफिंग तैयार की जाती है। यह स्टफिंग पराठे को स्पाइसी और चीजी स्वाद देती है। अब गूंथे हुए आटे से छोटी लोई बनाकर उसे सूखे आटे की मदद से गोल बेल लें। बेली हुई रोटी पर पहले तैयार किया गया गार्लिक बटर चारों तरफ अच्छे से लगा दें। इसके बाद बीच में तैयार की गई चीज और मिर्च की स्टफिंग भर दें। अब रोटी के किनारों को उठाकर बीच में लाकर पोटली की तरह बंद कर दें ताकि स्टफिंग बाहर न निकले। इसके बाद इस पोटली को हल्के हाथों से फिर से बेलकर पराठे का आकार दें। अब तवा गर्म करें और इस पर बेली हुई रोटी डालें। मध्यम आंच पर पराठे को दोनों तरफ से सेकें। जब एक तरफ हल्का सुनहरा रंग आ जाए तो उसे पलट दें और दोनों तरफ मक्खन लगाकर अच्छे से क्रिस्पी होने तक सेकें। पराठा जब गोल्डन ब्राउन और क्रिस्पी हो जाए तो इसे तवे से उतार लें। आपका चिली चीज गार्लिक पराठा अब पूरी तरह तैयार है। इसे गर्मागर्म हरी चटनी दही या सॉस के साथ परोसा जा सकता है। इसका तीखा और चीजी स्वाद सुबह के नाश्ते को खास बना देता है और पूरे परिवार को पसंद आता है।

किडनी कैंसर पर जागरूकता जरूरी शराब और धूम्रपान बढ़ाते हैं जोखिम, समय पर पहचान से बच सकती है जान

नई द‍िल्‍ली । किडनी कैंसर दुनिया भर में तेजी से बढ़ती एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। यह वैश्विक स्तर पर 14वां सबसे आम कैंसर माना जाता है, जिसमें हर साल लाखों नए मामले सामने आते हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत भी होती है। पुरुषों, बुजुर्गों और विकसित देशों में इसके मामले अधिक देखे जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी केवल इन्हीं वर्गों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किडनी कैंसर का समय पर पता चल जाए तो सर्जरी, थेरेपी और अन्य आधुनिक उपचारों के माध्यम से मरीज की जान बचाई जा सकती है। समस्या यह है कि अधिकतर मामलों में इसका पता तब चलता है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है। किडनी कैंसर को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं, जो इसके समय पर निदान और उपचार में बाधा बन सकती हैं। एक आम धारणा यह है कि यह बीमारी केवल बुजुर्गों को होती है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह पूरी तरह सही नहीं है। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ जाता है, लेकिन युवाओं में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। शोध बताते हैं कि 50 वर्ष से कम उम्र के लगभग एक तिहाई मामलों में यह बीमारी पाई जा सकती है। खराब जीवनशैली, धूम्रपान, शराब का सेवन, आनुवांशिक कारण और पहले से मौजूद किडनी संबंधी बीमारियां इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। एक और आम मिथक यह है कि पेशाब में खून आना हमेशा किडनी कैंसर का संकेत होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह लक्षण कई अन्य बीमारियों में भी दिख सकता है, जैसे यूटीआई या संक्रमण। हालांकि यदि कई दिनों तक पेशाब का रंग लाल, बरगंडी या गहरा दिखाई दे तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए। लिंग को लेकर भी एक गलत धारणा है कि महिलाओं में किडनी कैंसर का खतरा अधिक होता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। पुरुषों में इसका जोखिम महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुना पाया गया है। इसका एक कारण धूम्रपान और कार्यस्थल पर हानिकारक रसायनों के संपर्क में आना भी माना जाता है। हालांकि बार-बार होने वाले यूटीआई या संक्रमण से ग्रस्त महिलाओं को भी नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहना चाहिए। इसके अलावा यह भी एक मिथक है कि शराब का सेवन केवल लिवर को नुकसान पहुंचाता है, किडनी को नहीं। डॉक्टरों के अनुसार शराब और धूम्रपान दोनों ही किडनी कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। ये आदतें शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर कैंसर के विकास की संभावना को बढ़ा देती हैं। अनुमान के अनुसार, इन आदतों के कारण पुरुषों में लगभग 30 प्रतिशत और महिलाओं में लगभग 25 प्रतिशत किडनी कैंसर के मामले जुड़े हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी कैंसर से बचाव के लिए जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण कदम है। स्वस्थ जीवनशैली, धूम्रपान और शराब से दूरी, नियमित स्वास्थ्य जांच और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करना इस बीमारी के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। सही समय पर पहचान और इलाज से इस गंभीर बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

योग से बनेगा बच्चों का मजबूत शरीर और तेज दिमाग जानें आसान असरदार आसन

नई दिल्ली । हर साल इक्कीस जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। योग केवल एक अभ्यास नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की एक स्वस्थ पद्धति है। योग से शरीर मन और श्वास तीनों को संतुलन मिलता है। बच्चों के लिए योग और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है। बदलते मौसम में बच्चों को सर्दी जुकाम और संक्रमण जल्दी घेर लेते हैं। ऐसे में योग एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। नियमित योग अभ्यास से शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है और बच्चे कम बीमार पड़ते हैं। धनुरासन बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इस आसन को करने से शरीर की पाचन प्रणाली सक्रिय होती है और पेट संबंधी समस्याएं कम होती हैं। बच्चे जब नियमित रूप से धनुरासन का अभ्यास करते हैं तो उनकी रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है और शरीर में लचीलापन आता है। इस आसन में पेट के बल लेटकर पैरों को पीछे की ओर मोड़कर हाथों से पकड़ना होता है। धीरे धीरे सांसों के साथ शरीर को ऊपर उठाने से पूरे शरीर में रक्त संचार बेहतर होता है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर अधिक ऊर्जावान महसूस करता है। चक्रासन बच्चों के लिए एक प्रभावी योगासन है। यह आसन शरीर की शक्ति और संतुलन को बढ़ाता है। इस अभ्यास से नर्वस सिस्टम सक्रिय होता है और श्वसन क्षमता में सुधार आता है। नियमित अभ्यास करने से हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है। बच्चे जब खेल खेल में इस आसन को सीखते हैं तो उनकी शारीरिक क्षमता तेजी से विकसित होती है। इस आसन में सावधानी आवश्यक होती है ताकि गर्दन कलाई और कंधों पर अनावश्यक दबाव न पड़े। सही मार्गदर्शन में यह आसन बच्चों के संपूर्ण विकास में सहायक होता है। शवासन योग का अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण आसन माना जाता है। यह शरीर और मन दोनों को गहरी शांति प्रदान करता है। इस आसन को करने से तनाव और मानसिक थकान कम होती है। बच्चे जब पढ़ाई और खेल के बाद इस आसन का अभ्यास करते हैं तो उनका मन स्थिर होता है और ध्यान क्षमता बढ़ती है। शवासन में शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़कर सांसों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। इससे नींद की गुणवत्ता में सुधार आता है और शरीर की ऊर्जा पुनः प्राप्त होती है। नियमित अभ्यास से बच्चों में एकाग्रता और आत्म नियंत्रण विकसित होता है। बच्चों के स्वास्थ्य और विकास के लिए योग एक सरल और प्रभावी साधन है। जब बच्चे रोजाना योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास तेजी से होता है। योग केवल शरीर को मजबूत नहीं बनाता बल्कि यह मन को भी शांत और स्थिर रखता है। आज के समय में जब बच्चे मोबाइल और स्क्रीन की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं तब योग उन्हें प्रकृति और अपने शरीर से जोड़ने का कार्य करता है। माता पिता और शिक्षक यदि बच्चों को छोटी उम्र से ही योग की आदत डालें तो उनका भविष्य अधिक स्वस्थ और संतुलित बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक अवसर नहीं है बल्कि यह हमें यह याद दिलाता है कि योग को जीवन का हिस्सा बनाना कितना आवश्यक है। नियमित अभ्यास से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है और वे जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक मजबूती से कर पाते हैं।

जंग लगे चाकू और ब्लेड के इस्तेमाल पर एफएसएसएआई सख्त, खाद्य कारोबारियों को जारी किए नए निर्देश

नई दिल्ली । देशभर में खाद्य सुरक्षा मानकों को और अधिक मजबूत बनाने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने खाद्य कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि अब खाद्य पदार्थों की तैयारी, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और अन्य संबंधित कार्यों में केवल फूड-ग्रेड तथा जंग-रोधी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जंग लगे, टूटे-फूटे या क्षतिग्रस्त उपकरणों के उपयोग को खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताते हुए इसे तत्काल बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। एफएसएसएआई के अनुसार हाल के दिनों में ऐसी कई रिपोर्टें सामने आई थीं, जिनमें कुछ खाद्य कारोबारी जंग लगे, खराब, टूटे हुए, पेंट किए गए या अनुपयोगी हो चुके कटिंग टूल्स का उपयोग करते पाए गए। इन उपकरणों के इस्तेमाल से खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीव संबंधी दूषण (कंटैमिनेशन) का खतरा बढ़ जाता है, जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। प्राधिकरण ने कहा कि खाद्य व्यवसायों में उपयोग होने वाले सभी उपकरण, बर्तन और खाद्य संपर्क सतहें फूड-ग्रेड, विषमुक्त और जंग-रोधी सामग्री से निर्मित होना अनिवार्य है। यह व्यवस्था न केवल खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक है, बल्कि उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। एफएसएसएआई ने अपने निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया है कि सभी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों की नियमित जांच की जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि उनमें जंग, दरार, टूट-फूट, पेंट उखड़ना या किसी प्रकार की क्षति न हो। यदि किसी उपकरण में ऐसी कोई खराबी पाई जाती है, जिससे खाद्य पदार्थ दूषित होने की आशंका हो, तो उसे तुरंत उपयोग से हटाया जाए और उसकी जगह नया उपकरण लगाया जाए। खाद्य सुरक्षा मानकों के तहत उपकरणों की नियमित सफाई, सैनिटाइजेशन और आवश्यकता पड़ने पर स्टरलाइजेशन भी अनिवार्य बताया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य उद्योग में स्वच्छ उपकरणों का उपयोग खाद्य जनित बीमारियों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए यह केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। एफएसएसएआई ने यह भी कहा कि यह निर्देश ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (लाइसेंसिंग एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ फूड बिजनेस) रेगुलेशंस, 2011’ के तहत निर्धारित स्वच्छता और हाइजीन मानकों के अनुरूप हैं। इन नियमों का पालन सभी खाद्य कारोबारियों के लिए अनिवार्य है। प्राधिकरण ने कारोबारियों को चेतावनी दी है कि यदि किसी प्रतिष्ठान में जंग लगे या अनुपयुक्त उपकरणों का उपयोग पाया जाता है तो उसके खिलाफ ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट, 2006’ के तहत कार्रवाई की जा सकती है। इसमें जुर्माना सहित अन्य कानूनी प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं। एफएसएसएआई का मानना है कि इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन से खाद्य सुरक्षा के स्तर में सुधार होगा और उपभोक्ताओं को अधिक सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य उत्पाद उपलब्ध हो सकेंगे।

वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

नई दिल्ली। वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने देश और दुनिया में तेजी से पैर पसार रहे मोटापे को लेकर अब तक की सबसे बड़ी और गंभीर चेतावनी जारी की है। हृदय रोग विशेषज्ञों के इस प्रतिष्ठित संगठन ने पहली बार एक विशेष गाइडलाइन जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मोटापा सिर्फ शरीर का वजन बढ़ने का सामान्य लक्षण या सुंदरता से जुड़ा मुद्दा नहीं है। यह असल में दिल, किडनी और मेटाबॉलिक तंत्र से जुड़ी कई जानलेवा और गंभीर बीमारियों की प्राथमिक जड़ है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इंसानी शरीर में विशेष रूप से पेट के आसपास जमा होने वाली अतिरिक्त चर्बी यानी बेली फैट सीधे तौर पर आंतरिक अंगों को नुकसान पहुँचाना शुरू कर देता है। डॉक्टरों ने अपनी जांच और शोध में पाया है कि यह स्थिति शरीर के भीतर क्रोनिक इन्फ्लेमेशन यानी लगातार बनी रहने वाली सूजन को जन्म देती है। इसके साथ ही यह इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती है और रक्त वाहिकाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करती है। इसी वजह से आगे चलकर मरीजों में डायबिटीज, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर और किडनी खराब होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। मध्य प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच यह चेतावनी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत को वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ‘डायबिटीज कैपिटल’ के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नई गाइडलाइन के मुताबिक, वजन बढ़ने की यह प्रक्रिया अक्सर उन बीमारियों का आधार तैयार करती है जो बाद में हृदय, वृक्क (किडनी) और शरीर के पूरे मेटाबॉलिज्म को एक साथ अपनी चपेट में ले लेती हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में विशेषज्ञ अब इस घातक स्थिति को कार्डियोवैस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक यानी ‘सीकेएम सिंड्रोम’ कह रहे हैं। इस शोध और गाइडलाइन में सबसे चौंकाने वाला तथ्य पेट की चर्बी को लेकर सामने आया है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि किन्हीं दो व्यक्तियों का कुल वजन और बॉडी मास इंडेक्स बिल्कुल समान है, तब भी उनकी आंतरिक सेहत और जोखिम का स्तर पूरी तरह अलग हो सकता है। असली और सबसे बड़ा खतरा पेट के अंदरूनी अंगों के चारों ओर जमा होने वाले ‘विसरल फैट’ से होता है। यह छुपा हुआ विसरल फैट शरीर के भीतर लगातार ऐसे हानिकारक रसायनों का स्राव करता है, जो रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं और इंसुलिन के सकारात्मक प्रभाव को पूरी तरह खत्म कर देते हैं। हृदय रोग विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि खराब खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता और तनाव के कारण कम उम्र में ही भारतीयों का दिल बूढ़ा हो रहा है। कार्डियक अरेस्ट और किडनी फेल्योर के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए अब मोटापे को एक प्राथमिक बीमारी मानकर इसका इलाज करना अनिवार्य हो गया है। चिकित्सा तंत्र ने आम जनता से अपील की है कि वे पेट के घेरे और विसरल फैट को नियंत्रित रखने के लिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं ताकि सीकेएम सिंड्रोम जैसी जटिलताओं से समय रहते बचा जा सके।

40 साल से पहले मेनोपॉज बना सकता है दिल का दुश्मन, महिलाओं में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का बढ़ रहा खतरा

नई दिल्ली । महिलाओं के जीवन में मेनोपॉज एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, लेकिन यदि यह सामान्य उम्र से पहले शुरू हो जाए तो इसके गंभीर स्वास्थ्य परिणाम सामने आ सकते हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस विषय को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है। शोधकर्ताओं के अनुसार, 40 वर्ष की उम्र से पहले मेनोपॉज का अनुभव करने वाली महिलाओं में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा सामान्य महिलाओं की तुलना में काफी बढ़ जाता है। मेडिकल जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में 26 देशों की 1.11 लाख से अधिक महिलाओं के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि जिन महिलाओं में 40 से 44 वर्ष की उम्र के बीच मेनोपॉज हुआ, उनमें सामान्य उम्र में मेनोपॉज होने वाली महिलाओं की तुलना में हृदय रोगों का खतरा 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निष्कर्ष महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की स्थिति इस मामले में और भी चिंताजनक बताई गई है। अध्ययन में शामिल भारतीय महिलाओं के आंकड़ों से पता चला कि बड़ी संख्या में महिलाओं को समय से पहले या अपेक्षाकृत कम उम्र में मेनोपॉज का सामना करना पड़ रहा है। शोध के अनुसार लगभग 18 प्रतिशत महिलाओं में प्रीमैच्योर मेनोपॉज देखा गया, जबकि एक बड़ी संख्या 40 से 44 वर्ष की आयु में ही मेनोपॉज के चरण में पहुंच गई। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारतीय महिलाओं को इस समस्या के प्रति अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मेनोपॉज से पहले महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है, जो हृदय और रक्त वाहिकाओं को सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन जैसे-जैसे मेनोपॉज की प्रक्रिया शुरू होती है, एस्ट्रोजन का स्तर कम होने लगता है। इसके परिणामस्वरूप हृदय रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। यही कारण है कि समय से पहले मेनोपॉज महिलाओं को कम उम्र में ही हृदय संबंधी समस्याओं की ओर धकेल सकता है। शोध में यह भी सामने आया कि दक्षिण एशियाई देशों की महिलाओं में मेनोपॉज की औसत उम्र वैश्विक औसत से कम है। विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण बताते हैं, जिनमें लगातार बढ़ता तनाव, धूम्रपान, प्रदूषण, खराब खानपान, नींद की कमी, मधुमेह और जीवनशैली से जुड़ी अन्य समस्याएं शामिल हैं। इसके अलावा एनीमिया, पोषण की कमी, कम उम्र में विवाह और बार-बार गर्भधारण जैसे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी कारक भी महिलाओं में जल्दी मेनोपॉज की वजह बन सकते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि समय से पहले मेनोपॉज का सामना करने वाली महिलाओं को नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए। हार्ट हेल्थ, ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी के साथ-साथ मेनोपॉज संबंधी स्क्रीनिंग भी जरूरी है। समय रहते पहचान और उचित जीवनशैली अपनाकर हृदय रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञ महिलाओं को संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, तनाव नियंत्रण और धूम्रपान से दूरी बनाए रखने की सलाह दे रहे हैं। क्योंकि स्वस्थ जीवनशैली ही समय से पहले मेनोपॉज और उससे जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मानी जाती है।

स्किन केयर विथ ग्लिसरीन: रूखी त्वचा से लेकर नैचुरल ग्लो तक, जानिए इसके बेहतरीन फायदे

नई दिल्ली । खूबसूरत और स्वस्थ त्वचा पाने के लिए लोग तरह-तरह के ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कई बार प्राकृतिक और सरल उपाय अधिक प्रभावी साबित होते हैं। ग्लिसरीन भी ऐसा ही एक लोकप्रिय स्किन केयर इंग्रीडिएंट है, जिसका उपयोग वर्षों से त्वचा की देखभाल के लिए किया जाता रहा है। खासतौर पर रूखी और बेजान त्वचा के लिए ग्लिसरीन किसी वरदान से कम नहीं मानी जाती। यह त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद करती है और उसे मुलायम व चमकदार बनाती है। ग्लिसरीन एक प्राकृतिक ह्यूमेक्टेंट है, जिसका अर्थ है कि यह वातावरण से नमी खींचकर त्वचा में बनाए रखने का काम करती है। इसी वजह से इसका उपयोग कई मॉइस्चराइजर, लोशन और स्किन केयर उत्पादों में किया जाता है। नियमित उपयोग से त्वचा की ड्राइनेस कम हो सकती है और त्वचा लंबे समय तक हाइड्रेटेड बनी रहती है। यदि आपकी त्वचा बहुत रूखी है, तो ग्लिसरीन का उपयोग रात में सोने से पहले किया जा सकता है। इसके लिए ग्लिसरीन में थोड़ा गुलाब जल मिलाकर चेहरे पर लगाएं। यह मिश्रण त्वचा को गहराई से पोषण देने में मदद करता है और सुबह उठने पर त्वचा अधिक मुलायम महसूस हो सकती है। हालांकि संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को पहले पैच टेस्ट जरूर करना चाहिए। ग्लिसरीन त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा परत को मजबूत बनाने में भी सहायक मानी जाती है। प्रदूषण, धूल और मौसम में बदलाव के कारण त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन ग्लिसरीन त्वचा को नमी देकर उसकी सुरक्षा बनाए रखने में मदद करती है। यही कारण है कि सर्दियों के मौसम में इसका उपयोग विशेष रूप से लोकप्रिय होता है। चेहरे की चमक बढ़ाने के लिए भी ग्लिसरीन का उपयोग किया जा सकता है। कुछ लोग ग्लिसरीन में एलोवेरा जेल या गुलाब जल मिलाकर फेस सीरम की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह त्वचा को ताजगी देने और थकी हुई त्वचा को रिफ्रेश महसूस कराने में मदद कर सकता है। हालांकि अत्यधिक मात्रा में ग्लिसरीन लगाने से त्वचा चिपचिपी महसूस हो सकती है, इसलिए इसका सीमित उपयोग करना बेहतर माना जाता है। ग्लिसरीन फटी एड़ियों और खुरदरी त्वचा की देखभाल में भी उपयोगी साबित हो सकती है। रात में पैरों पर ग्लिसरीन लगाकर मोजे पहनने से त्वचा को नमी मिलती है और धीरे-धीरे रूखापन कम होने लगता है। इसके अलावा कोहनी और घुटनों की काली एवं रूखी त्वचा पर भी इसका उपयोग किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि त्वचा की देखभाल केवल बाहरी उत्पादों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पर्याप्त पानी पीना, संतुलित आहार लेना और अच्छी नींद लेना भी उतना ही आवश्यक है। ग्लिसरीन को अपनी स्किन केयर रूटीन में शामिल करने के साथ यदि स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जाए तो त्वचा की गुणवत्ता में बेहतर सुधार देखा जा सकता है। हालांकि किसी भी नए उत्पाद या घरेलू उपाय का उपयोग करने से पहले त्वचा के एक छोटे हिस्से पर परीक्षण करना उचित रहता है। यदि जलन, खुजली या एलर्जी जैसी समस्या हो तो उसका उपयोग बंद कर विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। सही तरीके से इस्तेमाल की गई ग्लिसरीन त्वचा को हाइड्रेटेड, मुलायम और प्राकृतिक रूप से चमकदार बनाने में मदद कर सकती है। यही वजह है कि आज भी यह स्किन केयर की दुनिया में सबसे भरोसेमंद और लोकप्रिय विकल्पों में से एक मानी जाती है।

नाश्ते में चाहिए कुछ नया और स्वादिष्ट? ट्राई करें पनीर स्टफ्ड चाइनीज अप्पे, बच्चों से बड़ों तक सबको आएंगे पसंद

नई दिल्ली । सुबह के नाश्ते में रोज एक जैसे व्यंजन खाने से अक्सर लोग कुछ नया और अलग स्वाद तलाशने लगते हैं। ऐसे में चाइनीज अप्पे एक ऐसा विकल्प बनकर उभरते हैं जो स्वाद, पोषण और आसान तैयारी का बेहतरीन संतुलन पेश करता है। सूजी, ओट्स, पनीर और ताजी सब्जियों के मेल से तैयार यह डिश पारंपरिक अप्पों को एक नया ट्विस्ट देती है और बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आ सकती है। खास बात यह है कि यह रेसिपी केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मौजूद सामग्री इसे पौष्टिक भी बनाती है। सूजी ऊर्जा प्रदान करती है, ओट्स फाइबर से भरपूर होते हैं और पनीर प्रोटीन का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसके साथ इस्तेमाल की जाने वाली सब्जियां शरीर को आवश्यक विटामिन और मिनरल्स उपलब्ध कराती हैं। यही वजह है कि यह व्यंजन हेल्दी ब्रेकफास्ट और हल्के स्नैक्स के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इस रेसिपी की शुरुआत सूजी, पिसे हुए ओट्स, दही, हल्दी और नमक से तैयार घोल से होती है। इन सभी सामग्रियों को अच्छी तरह मिलाकर कुछ समय के लिए रखा जाता है ताकि मिश्रण अच्छी तरह फूल जाए और अप्पों की बनावट मुलायम बने। सही तरीके से तैयार घोल बाद में अप्पों को स्वादिष्ट और स्पंजी बनाता है। दूसरी ओर भरावन तैयार करने के लिए पत्तागोभी, गाजर, शिमला मिर्च और प्याज जैसी ताजी सब्जियों को हल्का भून लिया जाता है। इसके बाद इसमें कद्दूकस किया हुआ पनीर, टोमेटो सॉस, चिली सॉस, काली मिर्च, चाट मसाला और नमक मिलाया जाता है। यह मिश्रण अप्पों को चाइनीज फ्लेवर देने के साथ-साथ स्वाद को और अधिक आकर्षक बनाता है। तैयार मिश्रण से छोटी-छोटी बॉल्स बनाई जाती हैं, जिन्हें बाद में अप्पों के अंदर भरा जाता है। अप्पे पैन में सबसे पहले थोड़ा घोल डाला जाता है, फिर बीच में पनीर और सब्जियों की बॉल रखी जाती है। इसके ऊपर दोबारा घोल डालकर भरावन को ढक दिया जाता है। धीमी आंच पर पकाने से अप्पे बाहर से सुनहरे और कुरकुरे बनते हैं, जबकि अंदर का हिस्सा मुलायम और स्वाद से भरपूर रहता है। दोनों तरफ से अच्छी तरह सेंकने के बाद यह व्यंजन परोसने के लिए तैयार हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को सब्जियां खिलाने का यह एक प्रभावी तरीका भी हो सकता है। कई बच्चे सीधे तौर पर सब्जियां खाने से बचते हैं, लेकिन ऐसे आकर्षक व्यंजनों में उनका स्वाद आसानी से पसंद कर लेते हैं। इसके अलावा यह रेसिपी तली हुई चीजों की तुलना में कम तेल में तैयार होती है, जिससे यह अपेक्षाकृत हल्का विकल्प भी बन जाती है। घर पर अचानक मेहमान आने की स्थिति में भी यह रेसिपी उपयोगी साबित हो सकती है। कम समय में तैयार होने के साथ-साथ इसका स्वाद रेस्तरां शैली के स्नैक्स जैसा अनुभव देता है। इसे हरी चटनी, टोमेटो सॉस या किसी पसंदीदा डिप के साथ परोसा जा सकता है। स्वाद और सेहत का संतुलन चाहने वाले लोगों के लिए चाइनीज अप्पे एक ऐसा विकल्प हैं जो पारंपरिक नाश्ते को नया स्वाद देने के साथ-साथ पौष्टिकता का भी पूरा ध्यान रखते हैं।

स्किन केयर में बेसन का कमाल: महंगे प्रोडक्ट्स को दे सकता है टक्कर, चेहरे पर लाएगा प्राकृतिक निखार

नई दिल्ली ; आज के समय में हर कोई स्वस्थ, चमकदार और बेदाग त्वचा पाना चाहता है। इसके लिए लोग महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स और कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट्स पर हजारों रुपये खर्च करते हैं। हालांकि, भारतीय परंपरा में कई ऐसे घरेलू उपाय मौजूद हैं जो कम खर्च में त्वचा की देखभाल करने में मदद कर सकते हैं। इन्हीं में से एक है बेसन। वर्षों से बेसन का उपयोग घरेलू उबटन और फेस पैक के रूप में किया जाता रहा है। माना जाता है कि यह त्वचा की गहराई से सफाई करने और प्राकृतिक निखार बनाए रखने में सहायक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार बेसन त्वचा पर जमा अतिरिक्त तेल, धूल और गंदगी को हटाने में मदद करता है। नियमित रूप से बेसन का उपयोग करने से त्वचा साफ और ताजगी भरी महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग फेस वॉश की जगह बेसन का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। हालांकि, हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए किसी भी घरेलू उपाय को अपनाने से पहले अपनी त्वचा की प्रकृति को समझना जरूरी है। त्वचा पर निखार लाने के लिए बेसन और दही का फेस पैक काफी लोकप्रिय माना जाता है। दही में मौजूद पोषक तत्व त्वचा को नमी प्रदान करने में मदद करते हैं, जबकि बेसन त्वचा की सफाई का काम करता है। इसी तरह बेसन में हल्दी मिलाकर बनाया गया उबटन भी पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों पर दूल्हा-दुल्हन को हल्दी-बेसन का उबटन लगाने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। ऑयली स्किन वाले लोगों के लिए बेसन और गुलाब जल का मिश्रण उपयोगी माना जाता है। यह त्वचा को ताजगी देने और अतिरिक्त तेल को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। वहीं, शुष्क त्वचा वाले लोग बेसन में दूध या शहद मिलाकर फेस पैक तैयार कर सकते हैं। इससे त्वचा को पोषण और नमी मिलने में सहायता मिल सकती है। बेसन का उपयोग हल्के एक्सफोलिएटर के रूप में भी किया जाता है। यह त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद कर सकता है, जिससे त्वचा अधिक साफ और चमकदार दिखाई देती है। हालांकि, बहुत अधिक रगड़ने से त्वचा को नुकसान भी पहुंच सकता है, इसलिए इसका उपयोग सावधानी से करना चाहिए। त्वचा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी घरेलू नुस्खे को अपनाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। यदि त्वचा पर जलन, खुजली या एलर्जी जैसी समस्या महसूस हो तो उसका उपयोग तुरंत बंद कर देना चाहिए। साथ ही, गंभीर त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर रहता है। सही खानपान, पर्याप्त पानी, अच्छी नींद और नियमित स्किन केयर रूटीन के साथ बेसन जैसे पारंपरिक उपाय त्वचा की देखभाल में सहायक भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि आज भी बेसन भारतीय घरेलू सौंदर्य उपचारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।