चावल खाने से नहीं बढ़ता पेट, एक्सपर्ट ने बताया सही तरीका, बस इन 5 आयुर्वेदिक नियमों का रखें ध्यान

नई दिल्ली। भारतीय भोजन में चावल का बहुत खास स्थान है। देश के अधिकांश घरों में लंच और डिनर में चावल जरूर बनाया जाता है। दाल चावल, राजमा चावल या अलग अलग तरह की करी के साथ चावल खाना लोगों को बेहद पसंद होता है। हालांकि कई लोग यह मानते हैं कि चावल खाने से पेट बाहर निकल आता है और वजन तेजी से बढ़ने लगता है। इसी डर की वजह से कई लोग अपनी डाइट से चावल को पूरी तरह हटाने का फैसला कर लेते हैं। लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि चावल खुद मोटापा नहीं बढ़ाता बल्कि इसे गलत तरीके से खाने या गलत किस्म के चावल चुनने से पाचन पर असर पड़ सकता है और शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा हो सकती है। इसलिए चावल खाने से पहले कुछ जरूरी आयुर्वेदिक नियमों को समझना जरूरी है। आयुर्वेद में चावल की उम्र को बहुत महत्व दिया गया है। आमतौर पर लोग बाजार से नया चावल खरीद कर इस्तेमाल करने लगते हैं। लेकिन आयुर्वेद के अनुसार नया चावल भारी माना जाता है और इसे पचाने में शरीर को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। नया चावल कफ बढ़ा सकता है और पाचन को धीमा कर सकता है। जिन लोगों को अक्सर सुस्ती महसूस होती है या जिनका पाचन कमजोर है उन्हें नया चावल खाने से बचना चाहिए। इसके विपरीत एक साल पुराना चावल हल्का और सुपाच्य माना जाता है। पुराने चावल की तासीर ऐसी हो जाती है कि वह पेट पर ज्यादा बोझ नहीं डालता और शरीर को जल्दी ऊर्जा देता है। इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि संभव हो तो एक साल पुराना चावल ही इस्तेमाल करना चाहिए। चावल बनाने का तरीका भी सेहत पर असर डाल सकता है। आजकल ज्यादातर लोग कुकर में चावल बनाना पसंद करते हैं क्योंकि इससे समय की बचत होती है। लेकिन आयुर्वेद में कुकर में बने चावल को उतना अच्छा नहीं माना गया है। विशेषज्ञों के अनुसार चावल को खुले बर्तन में ज्यादा पानी के साथ पकाना चाहिए और पकने के बाद उसका माड़ यानी अतिरिक्त पानी निकाल देना चाहिए। इससे चावल हल्का और पचने में आसान हो जाता है। इसके अलावा आयुर्वेद में शरीर की प्रकृति के अनुसार भी खानपान को महत्व दिया गया है। हर व्यक्ति की प्रकृति अलग होती है और उसी के अनुसार चावल खाने का तरीका भी अलग हो सकता है। जिन लोगों की वात प्रकृति होती है उन्हें अक्सर जोड़ों में दर्द, गैस या त्वचा में रूखापन जैसी समस्याएं रहती हैं। ऐसे लोगों को चावल खाते समय उसमें थोड़ा सा घी मिलाकर खाना चाहिए। इससे पाचन बेहतर होता है और शरीर को संतुलन मिलता है। पित्त प्रकृति वाले लोगों को अक्सर एसिडिटी, सीने में जलन या ज्यादा गर्मी महसूस होती है। ऐसे लोगों के लिए दूध के साथ चावल या चावल की खीर खाना फायदेमंद माना जाता है क्योंकि यह शरीर की गर्मी को संतुलित करने में मदद करता है। वहीं कफ प्रकृति वाले लोगों का वजन जल्दी बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है और उन्हें सर्दी खांसी की समस्या भी हो सकती है। ऐसे लोगों को हमेशा पुराना चावल खाना चाहिए और चावल का माड़ निकाल कर ही सेवन करना चाहिए। इस तरह सही प्रकार का चावल चुनकर और सही तरीके से पकाकर खाने से न केवल पाचन बेहतर रहता है बल्कि वजन बढ़ने का खतरा भी कम हो सकता है। इसलिए चावल को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसे सही नियमों के साथ खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है।
Women’s Day Special: पैरों की थकान से राहत दिलाएगा टोगा योगा, 5 मिनट की ये एक्सरसाइज देगी शरीर और दिमाग को एनर्जी

नई दिल्ली। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में महिलाएं एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाती हैं। घर संभालना, ऑफिस का काम करना और परिवार की देखभाल करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। ऐसे में अक्सर महिलाएं अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं। दिनभर खड़े रहना, ज्यादा चलना या लंबे समय तक बैठकर काम करना पैरों में दर्द, सूजन और थकान का कारण बन सकता है। इन्हीं समस्याओं से राहत दिलाने के लिए एक बेहद आसान और असरदार एक्सरसाइज है टोगा योगा। यह एक सरल फुट एक्सरसाइज है जो पैरों की उंगलियों और तलवों की मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद करती है। टोगा शब्द Toe यानी पैर की उंगलियों और Yoga यानी योग से मिलकर बना है। इसे करने के लिए किसी विशेष उपकरण या ज्यादा समय की जरूरत नहीं होती। दिन में सिर्फ पांच मिनट इस एक्सरसाइज को करने से शरीर और दिमाग दोनों को नई ऊर्जा मिल सकती है। टोगा योगा में पैरों की उंगलियों को अलग अलग तरीके से हिलाया और स्ट्रेच किया जाता है। देखने में यह एक्सरसाइज बहुत आसान लगती है लेकिन इसके फायदे काफी प्रभावी होते हैं। हमारे पैरों में कई छोटी छोटी मांसपेशियां होती हैं जो शरीर के संतुलन, चलने फिरने और खड़े रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। टोगा योगा इन मांसपेशियों को सक्रिय और मजबूत बनाने में मदद करता है। इस एक्सरसाइज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। जब पैरों की मसल्स मजबूत होती हैं तो लंबे समय तक खड़े रहने या चलने के दौरान थकान कम महसूस होती है। खासतौर पर उन महिलाओं के लिए यह एक्सरसाइज काफी फायदेमंद हो सकती है जिन्हें काम के दौरान लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ता है। टोगा योगा करने से पैरों में ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है। जब पैरों की उंगलियों को हिलाया और स्ट्रेच किया जाता है तो रक्त प्रवाह में सुधार होता है जिससे सूजन और भारीपन की समस्या कम हो सकती है। बेहतर ब्लड सर्कुलेशन पूरे शरीर में ऊर्जा बनाए रखने में भी मदद करता है। यह एक्सरसाइज मानसिक तनाव और थकान को कम करने में भी सहायक मानी जाती है। जब हम ध्यानपूर्वक पैरों की मांसपेशियों को स्ट्रेच करते हैं तो शरीर में रिलैक्सेशन का एहसास होता है। इससे दिनभर की थकान कम होती है और मन भी शांत महसूस करता है। टोगा योगा करने के लिए कुछ आसान एक्सरसाइज अपनाई जा सकती हैं। इसमें टो स्प्रेड एक्सरसाइज के तहत पैरों की सभी उंगलियों को फैलाकर कुछ सेकंड तक उसी स्थिति में रखा जाता है। बिग टो लिफ्ट में पैर की बाकी उंगलियों को जमीन पर रखते हुए केवल अंगूठे को ऊपर उठाने की कोशिश की जाती है। टो कर्ल एक्सरसाइज में पैरों की उंगलियों को अंदर की ओर मोड़कर फिर सीधा किया जाता है। टो टैपिंग में उंगलियों को धीरे धीरे जमीन पर टैप किया जाता है। वहीं तौलिया ग्रिप एक्सरसाइज में जमीन पर रखे छोटे तौलिये को पैरों की उंगलियों से पकड़कर अपनी ओर खींचा जाता है। महिलाएं अक्सर अपने परिवार और काम की जिम्मेदारियों के बीच खुद को समय नहीं दे पातीं। लेकिन दिन में सिर्फ कुछ मिनट का यह छोटा सा प्रयास सेहत के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है। टोगा योगा एक ऐसी आसान और प्रभावी एक्सरसाइज है जिसे रोजाना अपनाकर पैरों की मजबूती, बेहतर ब्लड सर्कुलेशन और मानसिक राहत हासिल की जा सकती है।
Women’s Day Special: साइलेंट बोन लॉस से बचना है तो अपनाएं ये 6 हेल्थ टिप्स, 30 के बाद महिलाओं के लिए बेहद जरूरी

नई दिल्ली। हर साल 8 मार्च को दुनिया भर में विमेंस डे मनाया जाता है। यह दिन केवल महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए ही नहीं बल्कि उनकी सेहत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए भी खास माना जाता है। अक्सर महिलाएं परिवार और काम की जिम्मेदारियों में इतनी व्यस्त हो जाती हैं कि अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं। खासतौर पर 30 की उम्र के बाद शरीर में कई ऐसे बदलाव शुरू हो जाते हैं जिनका असर हड्डियों की मजबूती पर भी पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कई महिलाओं में 30 साल की उम्र के बाद बोन डेंसिटी धीरे धीरे कम होने लगती है। हड्डियों के कमजोर होने की इस प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में ऑस्टियोपोरोसिस या साइलेंट बोन लॉस कहा जाता है। इसे साइलेंट बीमारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि शुरुआती दौर में इसके लक्षण साफ दिखाई नहीं देते। जब तक इसका पता चलता है तब तक कई बार हड्डियां काफी कमजोर हो चुकी होती हैं और मामूली चोट में भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में हड्डियों के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का कम होना है। यह हार्मोन हड्डियों को मजबूत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे जैसे उम्र बढ़ती है और खासकर मेनोपॉज के दौरान इसका स्तर तेजी से घटने लगता है। इसके अलावा कैल्शियम और विटामिन D की कमी भी हड्डियों को कमजोर बना सकती है। आज की लाइफस्टाइल भी इस समस्या को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, एक्सरसाइज न करना और शारीरिक गतिविधियों की कमी हड्डियों को कमजोर कर सकती है। वहीं धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन भी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को प्रभावित करता है जिससे हड्डियों की ताकत धीरे धीरे कम होने लगती है। कुछ मामलों में पारिवारिक इतिहास भी इस समस्या का कारण बन सकता है। अगर परिवार में किसी को पहले से ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या रही है तो महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा बहुत कम वजन वाली महिलाओं में भी हड्डियों के कमजोर होने की संभावना अधिक रहती है। साइलेंट बोन लॉस का खतरा इसलिए भी ज्यादा माना जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण आसानी से समझ नहीं आते। कई बार हल्की चोट में भी हड्डी टूट जाना, कमर या पीठ में लगातार दर्द रहना, शरीर का झुकना या उम्र के साथ लंबाई का धीरे धीरे कम होना इसके संकेत हो सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञ समय समय पर बोन डेंसिटी टेस्ट कराने की सलाह देते हैं ताकि हड्डियों की स्थिति का सही पता चल सके। हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए सही खानपान और स्वस्थ जीवनशैली बेहद जरूरी है। कैल्शियम और विटामिन D से भरपूर आहार जैसे दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां, बादाम, अखरोट और मछली का सेवन हड्डियों के लिए फायदेमंद माना जाता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह से सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं। इसके अलावा नियमित व्यायाम भी हड्डियों की मजबूती के लिए बहुत जरूरी है। रोजाना वॉकिंग, योग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और हल्की एक्सरसाइज करने से हड्डियां मजबूत रहती हैं और शरीर भी एक्टिव बना रहता है। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि कैफीन और शराब का अधिक सेवन करने से बचना चाहिए और धूम्रपान से दूरी बनाकर रखना चाहिए। साथ ही मानसिक तनाव को कम करने के लिए योग और मेडिटेशन जैसी आदतें अपनाना भी सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी सेहत को प्राथमिकता दें और समय समय पर हेल्थ चेकअप कराएं। सही डाइट, एक्टिव लाइफस्टाइल और नियमित जांच की मदद से हड्डियों को लंबे समय तक मजबूत और स्वस्थ रखा जा सकता है।
घर में एक्सपायर्ड दवाओं का स्मार्ट इस्तेमाल: बर्तन साफ करें, ब्लेड तेज करें और कीड़े भगाएं

नई दिल्ली । आजकल हर घर में मेडिकल स्टॉक रहता है लेकिन एक्सपायर्ड दवाओं को ज्यादातर लोग सीधे डस्टबिन में फेंक देते हैं। दरअसल इनके रेपर यानी गोलियों और कैप्सूल की एल्युमिनियम फॉयल का इस्तेमाल घरेलू कामों में बेहद कारगर साबित हो सकता है। सबसे पहले रेपर से दवाओं को निकालकर अलग रख लें। यह कड़ाही तवा और अन्य बर्तनों की सफाई में काम आता है। हल्का रगड़ने पर बर्तन फिर से चमकने लगते हैं। इसके अलावा कैंची या मिक्सर ब्लेड की धार कम होने पर भी इन्हीं रेपर से इसे तेज किया जा सकता है। कैंची से रेपर को कई बार काटने पर धार बढ़ती है जबकि मिक्सर ब्लेड के लिए रेपर को छोटे टुकड़ों में काटकर पीस दें। एक्सपायर्ड दवाओं का इस्तेमाल कीड़े और बदबू दूर करने में भी होता है। इसके लिए रेपर को गर्म पानी में घोलें और हल्का मीठा सोडा मिलाकर सिंक में डाल दें। इससे कीड़े ब्लॉकेज और बदबू दूर होती है। यह मिश्रण पौधों में लगने वाले फंगस से छुटकारा पाने में भी मदद करता है। इस तरह घर में पड़े एक्सपायर्ड दवाओं को केवल फेंकने की बजाय उनका स्मार्ट इस्तेमाल करके आप पैसों की बचत भी कर सकते हैं और रसोई-सफाई ब्लेड तेज करना और कीट नियंत्रण जैसे कई काम कर सकते हैं। यह तरीका सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता है।
DIY होम डेकोर ट्रिक: 20 लीटर की पुरानी पानी की केन से बनाएं मिनी पॉन्ड, फ्री में मिलेगा गार्डन जैसा लुक
DIY होम डेकोर ट्रिक: 20 लीटर की पुरानी पानी की केन से बनाएं मिनी पॉन्ड, फ्री में मिलेगा गार्डन जैसा लुक शॉर्ट डिस्क्रिप्शनहिंदी: बेकार पड़ी 20 लीटर पानी की केन से आसानी से बनाएं खूबसूरत मिनी पॉन्ड, बिना खर्च घर और गार्डन की सजावट का शानदार तरीका। English: Create a beautiful DIY mini pond using a waste 20 litre water can and enhance your home decor naturally at zero cost. टैगDIY Mini Pond, Home Decor Ideas, Gardening Hacks, Waste to Best, Creative DIY रनिंग मैटरआजकल लोग अपने घर और गार्डन को सजाने के लिए महंगे डेकोरेशन आइटम खरीदते हैं लेकिन कई बार घर में मौजूद बेकार सामान से भी बेहद खूबसूरत सजावट की जा सकती है। अगर आप भी घर को नेचुरल और यूनिक लुक देना चाहते हैं तो एक साधारण 20 लीटर की पानी की केन से शानदार मिनी पॉन्ड बनाया जा सकता है। यह एक आसान और क्रिएटिव DIY आइडिया है जो कम मेहनत में आपके घर की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा सकता है। सोशल मीडिया पर इन दिनों ऐसे कई DIY आइडिया वायरल हो रहे हैं जिनमें बेकार सामान को इस्तेमाल कर नई चीजें बनाई जा रही हैं। इसी तरह एक वीडियो में दिखाया गया है कि किस तरह साधारण वाटर केन को एक खूबसूरत प्लांटेड मिनी पॉन्ड में बदला जा सकता है। अगर आप गार्डनिंग के शौकीन हैं तो यह आइडिया आपके लिए बेहद काम का साबित हो सकता है। मिनी पॉन्ड बनाने के लिए सबसे पहले एक खाली 20 लीटर की पानी की केन लें और उसे अच्छी तरह साफ कर लें। केन जितनी साफ होगी अंदर का दृश्य उतना ही साफ और आकर्षक दिखाई देगा। इसके बाद केन के निचले हिस्से को सावधानी से काट लें ताकि वह खुला टैंक जैसा दिखने लगे। इसके बाद केन के ढक्कन में एक छोटा सा छेद करें और उसमें एक प्लास्टिक की टोटी फिट कर दें। यह टोटी बाद में पानी निकालने और सफाई करने के काम आएगी। जब टोटी फिट हो जाए तो ढक्कन को केन में अच्छी तरह बंद कर दें। मिनी पॉन्ड बनाते समय सबसे बड़ी समस्या पानी के रिसाव की हो सकती है। इसलिए ढक्कन को बंद करने से पहले उस पर टेफ्लॉन टेप अच्छी तरह लपेट दें ताकि पानी बाहर न निकले। इसके अलावा सुरक्षा के लिए ढक्कन और टोटी वाली जगह को एम सील से भी सील कर सकते हैं। इससे पानी का रिसाव पूरी तरह रुक जाता है। इसके बाद केन को उल्टा करके सेट करें और उसमें पानी भर दें। अब इसमें छोटे-छोटे जलीय पौधे लगाए जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर रोटाला रोटुंडिफोलिया ग्रीन नाम का पौधा छोटे प्लास्टिक कंटेनर में एक्वेरियम सॉइल के साथ लगाया जा सकता है। इसके अलावा एनुबियास जैसे पौधे भी इसमें लगाए जा सकते हैं। एनुबियास की खासियत यह है कि इसे मिट्टी की जरूरत नहीं होती और यह पत्थर या लकड़ी के सहारे भी आसानी से बढ़ जाता है। अगर आप चाहें तो इस मिनी पॉन्ड में छोटी मछलियां और झींगे भी रख सकते हैं। लेकिन चूंकि इसमें कोई फिल्टर नहीं लगाया जाता इसलिए बहुत ज्यादा जीव नहीं रखने चाहिए। इसमें एम्बर टेट्रा जैसी छोटी मछलियां और कुछ झींगे रखना बेहतर माना जाता है ताकि पानी ज्यादा गंदा न हो और बायोलोड कम बना रहे। पौधों को सही तरीके से बढ़ने के लिए रोशनी भी जरूरी होती है। इसके लिए एक साधारण एक्वेरियम एलईडी लाइट का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसे रोजाना लगभग सात घंटे तक जलाया जा सकता है। इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और मिनी पॉन्ड देखने में भी बेहद खूबसूरत लगता है। पानी की सफाई के लिए केन में लगी टोटी काफी मददगार होती है। जब भी पानी बदलना हो तो नीचे लगे टैप को खोलकर आसानी से पानी निकाला जा सकता है और नया पानी डाला जा सकता है। इस तरह घर में पड़ी एक साधारण और बेकार पानी की केन को इस्तेमाल कर आप बेहद खूबसूरत मिनी पॉन्ड बना सकते हैं। यह न केवल घर की सजावट को खास बनाता है बल्कि गार्डनिंग के शौकीनों के लिए भी एक शानदार और किफायती आइडिया साबित होता है।
स्ट्रोक के लक्षणों को न करें नजरअंदाज,बचाव फॉर्मूला से बनाएं समय पर पहचान

नई दिल्ली। स्ट्रोक या ब्रेन अटैक एक गंभीर और जानलेवा स्थिति है। यह तब होता है जब मस्तिष्क तक खून पहुंचने में रुकावट आ जाती है, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। स्ट्रोक के मामले में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। जितनी जल्दी पहचान और इलाज होता है, उतनी बेहतर रिकवरी की संभावना बनती है। नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) स्ट्रोक के लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह देता है। समय पर पहचान और त्वरित कार्रवाई से जान बचाई जा सकती है। NHM ने स्ट्रोक की पहचान और बचाव के लिए आसान और कारगर फॉर्मूला पेश किया है जिसेबचाव कहा जाता है। स्ट्रोक में देरी का मतलब मस्तिष्क में स्थायी नुकसान है। समय पर अस्पताल पहुंचने से क्लॉट-बस्टिंग दवाएं और अन्य इलाज उपलब्ध हो सकते हैं जो रिकवरी में मदद करते हैं। स्ट्रोक से बचाव के लिए ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें, धूम्रपान और शराब से बचें, नियमित व्यायाम करें और संतुलित आहार अपनाएं। ‘बचाव’ फॉर्मूला स्ट्रोक के मुख्य लक्षणों को याद रखने का आसान तरीका है। इसमें शामिल हैं: ब – बाजू (बाहों में कमजोरी): व्यक्ति से दोनों बाहें ऊपर उठाने को कहें। यदि एक बाजू नीचे गिर जाए या कमजोर लगे, तो यह स्ट्रोक का संकेत हो सकता है। च – चेहरा (चेहरा असमान): मुस्कुराने के लिए कहें। चेहरे का एक हिस्सा लटकना या असमान दिखना स्ट्रोक की संभावना दर्शाता है। आ – आवाज (बोलने में कठिनाई): व्यक्ति से कोई सरल वाक्य बोलने को कहें। आवाज अस्पष्ट, तुतलाती या बोलने में कठिनाई होना गंभीर संकेत है। व – वक्त (समय): यदि ऊपर के कोई भी लक्षण दिखाई दें, तुरंत समय बर्बाद न करें। 108 पर कॉल करें, एम्बुलेंस बुलाएं और नजदीकी अस्पताल पहुंचें, जहां सीटी स्कैन उपलब्ध हो। हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार, स्ट्रोक के ये लक्षण अचानक प्रकट होते हैं और अक्सर शरीर के एक तरफ प्रभाव डालते हैं। अन्य संकेतों में अचानक संतुलन बिगड़ना, आंखों में धुंधलापन या गंभीर सिरदर्द शामिल हो सकते हैं। स्ट्रोक कोसाइलेंट किलर भी कहा जाता है क्योंकि यह कभी-कभी बिना चेतावनी के आता है। लेकिनबचाव फॉर्मूला से 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में जल्दी पहचान संभव है। समय पर कार्रवाई से गंभीर जटिलताओं और स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है। इसलिए किसी भी संदिग्ध लक्षण को हल्के में न लें। शरीर की भाषा समझें,बचाव फॉर्मूला याद रखें और तुरंत चिकित्सकीय मदद लें। हर मिनट मायने रखता है और जीवन बच सकता है।
पालक की पौष्टिकता और पनीर का स्वाद मिलकर बनाएंगे कमाल जानें आसान पालक पनीर रेसिपी

नई दिल्ली । भारतीय रसोई में कई ऐसी पारंपरिक और स्वादिष्ट डिशेज हैं जो हर उम्र के लोगों को पसंद आती हैं। उन्हीं में से एक है पालक पनीर। यह डिश स्वाद और सेहत दोनों का बेहतरीन मेल मानी जाती है। पालक में भरपूर मात्रा में आयरन और पोषक तत्व पाए जाते हैं जबकि पनीर प्रोटीन और कैल्शियम का अच्छा स्रोत होता है। जब इन दोनों को एक साथ पकाया जाता है तो एक बेहद स्वादिष्ट और मलाईदार सब्जी तैयार होती है जिसे रोटी नान या पराठे के साथ बड़े चाव से खाया जाता है। अक्सर लोगों को लगता है कि रेस्टोरेंट जैसा स्वाद घर पर बनाना मुश्किल होता है लेकिन सही सामग्री और सही विधि अपनाकर आप घर पर भी बिल्कुल रेस्टोरेंट स्टाइल पालक पनीर बना सकते हैं। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसे बनाना ज्यादा कठिन नहीं है और थोड़ी सी तैयारी के साथ आप कुछ ही समय में स्वादिष्ट पालक पनीर तैयार कर सकते हैं। पालक पनीर बनाने के लिए सबसे पहले ताजा और साफ पालक का उपयोग करना जरूरी है। पालक को अच्छी तरह धोकर उसमें मौजूद मिट्टी और गंदगी को हटा लें। इसके बाद एक बर्तन में पानी उबालें और उसमें पालक की पत्तियों को लगभग दो से तीन मिनट तक डालकर हल्का उबाल लें। फिर तुरंत पालक को ठंडे पानी में डाल दें। ऐसा करने से पालक का प्राकृतिक हरा रंग बरकरार रहता है और सब्जी देखने में भी आकर्षक लगती है। इसके बाद उबले हुए पालक को हरी मिर्च और थोड़ा सा पानी डालकर मिक्सर में पीस लें और एक स्मूद पेस्ट तैयार कर लें। अब एक कढ़ाही में तेल या घी गर्म करें और उसमें जीरा डालकर हल्का भून लें। जब जीरा चटकने लगे तो उसमें बारीक कटा हुआ प्याज डालें और उसे सुनहरा होने तक पकाएं। अब इसमें अदरक लहसुन का पेस्ट डालकर कुछ सेकंड तक भूनें ताकि उसका कच्चापन खत्म हो जाए। इसके बाद बारीक कटे हुए टमाटर डालें और मसाले को तब तक पकाएं जब तक टमाटर पूरी तरह गल न जाएं और मसाले से हल्का तेल अलग होने लगे। यह चरण बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे ग्रेवी का स्वाद और भी अच्छा बनता है। जब मसाला अच्छी तरह पक जाए तो उसमें हल्दी पाउडर धनिया पाउडर और स्वादानुसार नमक डालकर अच्छी तरह मिलाएं। अब तैयार पालक का पेस्ट इसमें डाल दें और धीमी आंच पर तीन से चार मिनट तक पकाएं ताकि सभी मसाले पालक के साथ अच्छी तरह मिल जाएं। इसके बाद इसमें पनीर के टुकड़े डालें और हल्के हाथ से मिलाएं ताकि पनीर टूटे नहीं। अंत में इसमें थोड़ा गरम मसाला और क्रीम डालकर लगभग दो मिनट तक पकाएं। इससे सब्जी में हल्की मलाईदार बनावट और शानदार स्वाद आ जाता है। जब पालक पनीर पूरी तरह तैयार हो जाए तो इसे एक सर्विंग बाउल में निकाल लें। ऊपर से थोड़ा क्रीम और बारीक कटा हरा धनिया डालकर सजाएं। अब आपका गर्मागर्म और स्वादिष्ट पालक पनीर तैयार है जिसे आप रोटी नान पराठे या जीरा राइस के साथ परोस सकते हैं। यह आसान रेसिपी घर पर ही रेस्टोरेंट जैसा स्वाद देने के साथ परिवार के लिए पौष्टिक और हेल्दी भोजन भी साबित हो सकती है।
शुगर के मरीज रोज कितनी चीनी खा सकते हैं ज्यादा मिठास बन सकती है गंभीर खतरा

नई दिल्ली :भारत में खुशी के हर मौके पर मुंह मीठा कराने की परंपरा रही है। त्योहार हो या कोई शुभ अवसर मिठाइयों के बिना जश्न अधूरा माना जाता है। लेकिन यही मिठास कई लोगों के लिए खतरे की घंटी बन सकती है खासकर उन लोगों के लिए जो डायबिटीज से जूझ रहे हैं। रिफाइंड शुगर यानी साधारण चीनी का ज्यादा सेवन ब्लड शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकता है और लंबे समय में गंभीर जटिलताओं की वजह बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार डायबिटीज के मरीजों के लिए चीनी की कोई तय सुरक्षित न्यूनतम मात्रा नहीं है। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ फिजीशियन डॉ अनिल बंसल के मुताबिक डायबिटीज के मरीजों का शरीर ग्लूकोज को प्रभावी तरीके से प्रोसेस नहीं कर पाता। ऐसे में थोड़ी सी अतिरिक्त चीनी भी ब्लड शुगर को असंतुलित कर सकती है। यही कारण है कि अधिकतर विशेषज्ञ शुगर के मरीजों को रिफाइंड शुगर से पूरी तरह दूरी बनाने की सलाह देते हैं। हालांकि जिन मरीजों का ब्लड शुगर पूरी तरह नियंत्रित है वे कभी कभी सीमित मात्रा में चीनी ले सकते हैं लेकिन यह भी डॉक्टर की सलाह के बाद ही होना चाहिए। आम तौर पर दिनभर में एक से दो छोटी चम्मच से अधिक चीनी लेने की सिफारिश नहीं की जाती और कई मामलों में इसे भी टालने की सलाह दी जाती है। क्योंकि शरीर को आवश्यक शुगर फलों दूध और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से मिल जाती है इसलिए अलग से रिफाइंड शुगर लेने की जरूरत नहीं होती। अगर डायबिटीज का मरीज जरूरत से ज्यादा चीनी खाता है तो उसका ब्लड शुगर लेवल तेजी से बढ़ सकता है। लंबे समय तक हाई शुगर रहने से आंखों पर असर पड़ता है जिससे रेटिनोपैथी का खतरा होता है। किडनी प्रभावित हो सकती है जिससे नेफ्रोपैथी की समस्या पैदा होती है और नसों को नुकसान पहुंच सकता है जिसे न्यूरोपैथी कहा जाता है। इसके अलावा ज्यादा चीनी शरीर में सूजन बढ़ाती है जिससे घाव भरने में देरी होती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। सिर्फ डायबिटीज के मरीज ही नहीं बल्कि सामान्य लोगों को भी चीनी का सेवन सीमित रखना चाहिए। American Heart Association के अनुसार स्वस्थ पुरुषों को प्रतिदिन 36 ग्राम यानी लगभग 9 चम्मच से ज्यादा चीनी नहीं लेनी चाहिए जबकि महिलाओं के लिए यह सीमा 25 ग्राम यानी करीब 6 चम्मच है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस सीमा में केवल चाय या मिठाई में डाली गई चीनी ही शामिल नहीं है बल्कि फलों दूध और प्रोसेस्ड फूड में मौजूद छिपी हुई शुगर भी गिनी जाती है। अधिक चीनी का सेवन इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ा सकता है जिससे भविष्य में डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। खासतौर पर प्रीडायबिटीज से जूझ रहे लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। जितनी कम रिफाइंड शुगर का सेवन होगा उतना ही बेहतर ब्लड शुगर कंट्रोल रहेगा और बीमारी का खतरा कम होगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि मीठा खाने की इच्छा होने पर प्राकृतिक विकल्प जैसे फल या सीमित मात्रा में ड्राई फ्रूट्स का सेवन किया जा सकता है। संतुलित आहार नियमित व्यायाम और डॉक्टर की सलाह के साथ ही डायबिटीज को नियंत्रित रखा जा सकता है। मिठास जीवन में जरूरी है लेकिन समझदारी से ली गई मिठास ही सेहत के लिए सुरक्षित होती है।
ईयरफोन की तेज आवाज छीन रही सुनने की ताकत वर्ल्ड हियरिंग डे पर एम्स की सख्त चेतावनी

नई दिल्ली :तेज आवाज में लंबे समय तक ईयरफोन या हेडफोन का इस्तेमाल अब युवाओं और किशोरों के लिए गंभीर खतरे की घंटी बनता जा रहा है। 3 मार्च को मनाए जाने वाले वर्ल्ड हियरिंग डे के अवसर पर नई दिल्ली स्थित All India Institute of Medical Sciences New Delhi के ईएनटी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पर्सनल लिसनिंग डिवाइस का अत्यधिक उपयोग नॉइज इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस का बड़ा कारण बन रहा है। एम्स के ईएनटी विभाग की डॉ पूनम सागर के अनुसार कान के अंदर मौजूद बेहद संवेदनशील हेयर सेल्स ध्वनि को पहचानकर उसे दिमाग तक पहुंचाने का काम करती हैं। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक तेज आवाज में गाने सुनता है तो ये कोशिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। एक बार इनका नुकसान हो जाए तो सुनने की क्षमता पूरी तरह वापस नहीं आती। यही वजह है कि विशेषज्ञ इस समस्या को लेकर लगातार जागरूकता की अपील कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि 120 डेसीबल की तीव्रता पर केवल पांच मिनट तक ईयरफोन सुनना भी कानों के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है। वहीं 60 डेसीबल की अपेक्षाकृत कम आवाज पर आठ घंटे लगातार सुनना भी सुरक्षित नहीं माना जाता। दोनों ही स्थितियों में कानों पर दबाव पड़ता है और धीरे धीरे सुनने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। नॉइज इंड्यूस्ड हियरिंग लॉस के मामले अब कम उम्र में तेजी से बढ़ रहे हैं। पहले जहां 50 वर्ष की आयु के बाद सुनने की क्षमता में कमी आम मानी जाती थी वहीं अब 40 की उम्र के बाद ही हियरिंग लॉस के केस सामने आने लगे हैं। इसके पीछे पर्सनल लिसनिंग डिवाइस का बढ़ता चलन एक बड़ी वजह माना जा रहा है। टीनएजर्स में मोबाइल गेमिंग ऑनलाइन क्लास और म्यूजिक स्ट्रीमिंग के कारण ईयरफोन का इस्तेमाल कई घंटों तक होता है। मेट्रो बस या ट्रैफिक जैसे शोरगुल वाले माहौल में लोग बाहरी आवाज दबाने के लिए वॉल्यूम और बढ़ा देते हैं। तेज बाहरी शोर और हाई वॉल्यूम का यह संयोजन कानों के लिए दोहरा खतरा पैदा करता है। विशेषज्ञों ने कुछ शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह दी है। यदि कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज सुनाई दे जिसे टिनिटस कहा जाता है बातचीत के दौरान शब्द साफ न सुनाई दें या बार बार सामने वाले से बात दोहराने को कहना पड़े तो यह हियरिंग लॉस के संकेत हो सकते हैं। ऐसे में तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है। डॉ पूनम सागर का कहना है कि बचाव संभव है यदि लोग कुछ सरल सावधानियां अपनाएं। डिवाइस को उसकी अधिकतम वॉल्यूम के 60 प्रतिशत से कम पर रखें और लगातार लंबे समय तक इस्तेमाल न करें। लगभग 60 मिनट सुनने के बाद ब्रेक लेना जरूरी है ताकि कानों को आराम मिल सके। शोरगुल वाले माहौल में ईयरफोन के उपयोग से बचना बेहतर है। वर्ल्ड हियरिंग डे का उद्देश्य यही है कि लोग अपनी सुनने की सेहत को गंभीरता से लें। सुनने की क्षमता अनमोल है और इसे लापरवाही से खोना आसान लेकिन वापस पाना लगभग असंभव है। सही आदतें अपनाकर और जागरूक रहकर हम अपने कानों को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकते हैं।
होली खेलते समय न करें यह गलती केमिकल वाले रंग बढ़ा रहे अस्थमा और एलर्जी का खतरा

नई दिल्ली :होली रंगों और खुशियों का त्योहार है लेकिन जरा सी लापरवाही बच्चों की सेहत पर भारी पड़ सकती है। खासकर हवा में उड़ता गुलाल उनके फेफड़ों और आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। इस समय बाजार में हर्बल के नाम पर बिक रहे कई सिंथेटिक रंगों में ऐसे केमिकल पाए जाते हैं जो बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि हर साल होली के बाद अस्पतालों में सांस और त्वचा से जुड़ी शिकायतों वाले मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। अहमदाबाद स्थित Narayana Hospital Ahmedabad की कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ शची पंडित के अनुसार बच्चे होली के दौरान लंबे समय तक बाहर खेलते हैं और मजे में खूब गुलाल उड़ाते हैं। यह बारीक रंगीन धूल सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंच जाती है। इससे ब्रोंकियल इरिटेशन सांस फूलना खांसी और एलर्जिक रिएक्शन की समस्या हो सकती है। जिन बच्चों को पहले से अस्थमा या एलर्जी की शिकायत है उनके लिए खतरा और बढ़ जाता है। डॉक्टरों के मुताबिक सस्ते सिंथेटिक रंगों में लेड ऑक्साइड कॉपर सल्फेट मर्करी सल्फाइड और क्रोमियम कंपाउंड जैसे तत्व मिलाए जा सकते हैं। ये तत्व त्वचा की बाहरी सुरक्षा परत को नुकसान पहुंचाते हैं और सूजन पैदा कर सकते हैं। जब ये बारीक कण हवा में तैरते हैं तो बच्चों के शरीर में सांस के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। Asian Hospital Faridabad के रेस्पिरेटरी विभाग के विशेषज्ञ डॉ मानव मनचंदा बताते हैं कि होली के मौसम में एलर्जिक ब्रोंकाइटिस और अस्थमा के अटैक के मामले बढ़ जाते हैं। रंगों के महीन कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर सांस की नलियों में सूजन पैदा कर सकते हैं। इससे घरघराहट तेज खांसी और सीने में जकड़न महसूस हो सकती है। फेफड़ों के अलावा आंखें भी सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। बच्चे अक्सर बिना सावधानी के सीधे चेहरे पर गुलाल लगा देते हैं जिससे रंग आंखों में चला जाता है। सिंथेटिक रंगों के कण कंजंक्टिवाइटिस यानी आंखों में लालिमा और पानी आने की समस्या पैदा कर सकते हैं। कुछ मामलों में कॉर्नियल एपिथेलियल डिफेक्ट यानी आंख की ऊपरी परत पर खरोंच तक आ सकती है खासकर जब रंगों में हानिकारक केमिकल या महीन कांच के कण मिले हों। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन बच्चों को अस्थमा एलर्जिक राइनाइटिस एक्जिमा या सेंसिटिव स्किन की समस्या है उन्हें खास सावधानी बरतनी चाहिए। होली खेलने से पहले त्वचा पर नारियल तेल या मॉइश्चराइजर लगाने से केमिकल का सीधा असर कम किया जा सकता है। आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मा पहनना बेहतर है और जबरदस्ती चेहरे पर रंग लगाने से बचना चाहिए। डॉक्टर सलाह देते हैं कि केवल सर्टिफाइड हर्बल या पौधों से बने रंगों का ही इस्तेमाल करें। त्योहार की खुशी तभी पूरी है जब वह सेहत पर भारी न पड़े। थोड़ी जागरूकता और सावधानी से होली को सुरक्षित और यादगार बनाया जा सकता है ताकि रंगों की मिठास लंबे समय तक रहे और किसी तरह की स्वास्थ्य समस्या त्योहार की खुशी को फीका न कर दे।